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भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) — मॉड्यूल 07/07 • हिंदी एवं English Technical Terms
GS Paper-I • भौतिक भूगोल अध्याय 07 (Geomorphology) UPSC CSE & BPSC Prelims + Mains

7. बहिर्जात प्रक्रियाएँ और अपरदन-निक्षेपण स्थलाकृतियाँ

Exogenic Processes & Erosional-Depositional Landforms — Complete Visual & Analytical Study Notes
⏱️ पठन समय: 45–55 मिनट 📐 इंटरैक्टिव आरेख: अनाच्छादन चक्र, नदीय अवस्थाएँ, कार्स्ट गुफा एवं हिमानी-पवन-तटीय स्थलरूप 🎯 परीक्षा प्रासंगिकता: UPSC Prelims (2014, 2021, 2023 PYQ) + GS-1 Mains (2022, 2023)
🧭 अध्याय का सार (At a Glance — इस अध्याय को कैसे पढ़ें?)

पृथ्वी का धरातल दो विपरीत बलों के निरंतर संघर्ष का परिणाम है — जहाँ अंतर्जात बल (Endogenic Forces) पर्वत-निर्माण और ज्वालामुखी द्वारा धरातल पर विषमताएँ (Relief) रचते हैं, वहीं बहिर्जात प्रक्रियाएँ (Exogenic Processes) सौर ऊर्जा और गुरुत्वाकर्षण की सहायता से उच्च भू-भागों के निम्नीकरण (Degradation) और निम्न बेसिनों के अधिवृद्धि/भराव (Aggradation) द्वारा समतलीकरण (Gradation) का कार्य करती हैं।

🔍 मुख्य आधार (NCERT Core): अपक्षय (Weathering) एक स्व-स्थाने (In-situ) प्रक्रिया है, बृहद क्षरण (Mass Wasting) केवल गुरुत्वाकर्षण से संचालित होता है, जबकि अपरदन (Erosion) के लिए गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) अनिवार्य है।
🌊 पंच-प्रक्रम मैट्रिक्स: प्रवाहित जल (Fluvial), भूमिगत जल (Karst), हिमानी (Glacial), पवन (Aeolian) और सागरीय तरंगें (Coastal) — प्रत्येक अभिकर्ता के अपरदनात्मक व निक्षेपणात्मक स्थलरूपों की युग्म-तुलना से हर वर्ष प्रश्न आते हैं।
🏔️ Mains GS-1 फोकस: हिमालय बनाम पश्चिमी घाट भूस्खलन, भारत के पूर्वी बनाम पश्चिमी तट तथा फियोर्ड (Fjords, Mains 2023) जैसे विश्लेषणात्मक प्रश्नों का मॉडल उत्तर इस अध्याय में शामिल है।
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बहिर्जात प्रक्रियाएँ एवं अनाच्छादन (Denudation Framework)

Exogenic Forces, Gradation (Degradation & Aggradation) and the Four Pillars of Denudation

पृथ्वी की सतह पर बाहर से कार्य करने वाले बलों को बहिर्जात बल (Exogenic Forces) कहते हैं। इन प्रक्रियाओं के पीछे मूल प्रेरक शक्ति सूर्य की ताप ऊर्जा (Solar Energy) द्वारा उत्पन्न वायुमंडलीय परिसंचरण तथा ढालों के सहारे कार्य करने वाला गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force) है।

(A) तल-संतुलन या क्रमिक समतलीकरण (Gradation)

  • निम्नीकरण (Degradation): अपक्षय, बृहद क्षरण और अपरदन द्वारा ऊँचे उठे स्थलरूपों (पर्वत, पठार, कटक) की ऊँचाई का लगातार घिसकर कम होना।
  • अधिवृद्धि (Aggradation): अपरदित अवसादों का गर्तों, घाटियों या समुद्र तलों में निक्षेपण (Deposition) द्वारा भराव होना।
  • अनाच्छादन (Denudation): लैटिन शब्द 'Denudare' (अर्थ: आवरण हटाना या नग्न करना) से बना यह एक व्यापक शब्द है जिसमें पृथ्वी की ऊपरी चट्टानी परत को तोड़ने, खिसकाने और बहा ले जाने वाली सभी बहिर्जात प्रक्रियाएँ शामिल हैं।
अनाच्छादन (DENUDATION) धरातलीय आवरण का विखंडन, स्थानांतरण एवं अपरदन 1. अपक्षय (Weathering) स्व-स्थाने (In-situ) विखंडन परिवहन शून्य या नगण्य 2. बृहद क्षरण (Mass Wasting) ढाल के सहारे मलबे का खिसकना बिना गतिशील अभिकर्ता के 3. अपरदन (Erosion) चट्टानी मलबे का कटाव व ग्रहण नदी, हिमानी, पवन, तरंग द्वारा 4. परिवहन व निक्षेपण Transportation & Deposition ऊर्जा घटने पर बेसिन में जमाव प्रेरक बल (Driving Force): आणविक प्रतिबल + ताप-दाब + रसायन प्रेरक बल (Driving Force): प्रत्यक्ष गुरुत्वाकर्षण बल (Gravity) प्रेरक बल (Driving Force): गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) प्रेरक बल (Driving Force): गतिज ऊर्जा एवं ढाल का ह्रास
चित्र 1.1: अनाच्छादन (Denudation) के चार प्रमुख घटक एवं उनके विशिष्ट प्रेरक बल (NCERT Class 11 मानक आरेख)
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अपक्षय (Weathering): भौतिक, रासायनिक एवं जैविक प्रक्रियाएँ

In-situ Mechanical Disintegration and Chemical Decomposition of Rocks

अपक्षय (Weathering) मौसम और जलवायु के विभिन्न तत्वों के प्रभाव से चट्टानों का अपने ही स्थान पर यांत्रिक विखंडन (Mechanical Disintegration) तथा रासायनिक वियोजन (Chemical Decomposition) है। चूँकि इसमें पदार्थों का परिवहन नगण्य या शून्य होता है, इसलिए इसे स्व-स्थाने (In-situ / On-site) प्रक्रिया कहा जाता है।

1. रासायनिक अपक्षय आर्द्र-उष्ण प्रदेश

जल, ऑक्सीजन, CO₂ और जैविक अम्लों की उपस्थिति में खनिजों का रासायनिक रूपांतरण:

  • विलयन / घोल (Solution): जल में घुलनशील खनिजों (रॉक साल्ट, जिप्सम, चूना पत्थर) का घुलकर अलग होना।
  • कार्बोनेशन (Carbonation): वर्षा जल में घुली CO₂ से निर्मित कार्बोनिक अम्ल (H₂CO₃) द्वारा कैल्शियम कार्बोनेट (चूना पत्थर/डोलोमाइट) का घुलना → कार्स्ट गुफाओं का निर्माण।
  • जलयोजन (Hydration): खनिजों द्वारा जल सोखने पर आयतन में विस्तार (जैसे कैल्शियम सल्फेट/एनहाइड्राइट का जिप्सम में बदलना)।
  • ऑक्सीकरण व न्यूनीकरण (Oxidation & Reduction): लौह-युक्त चट्टानों में जंग लगना (लाल/भूरा रंग); जलमग्न या ऑक्सीजन-रहित दशा में न्यूनीकरण से रंग हरा/नीला-धूसर हो जाता है।

2. भौतिक / यांत्रिक अपक्षय शुष्क एवं शीत प्रदेश

तापमान परिवर्तन, दाब-मुक्ति और तुषार क्रिया द्वारा बिना रासायनिक बदलाव के चट्टान का टूटना:

  • भार-विहीनीकरण एवं अपपत्रण (Unloading & Expansion): ऊपरी अपरदन से दाब हटने पर गहराई की आग्नेय चट्टानों (ग्रेनाइट) में चादरों के रूप में परतें उतरना → विशाल अपपत्रण गुंबद (Exfoliation Domes) (जैसे तेलंगाना का भुवनगिरि/भोंगिर ग्रेनाइट गुंबद)।
  • तापक्रम परिवर्तन (Thermal Expansion): मरुस्थलों में दैनिक तापांतर से बाहरी परत का प्याज के छिलके की भाँति उतरना (Onion-peeling) तथा टॉर (Tors) का निर्माण।
  • तुषार वेजिंग (Frost Wedging): दरारों में जल के जमने से आयतन में ~9% वृद्धि → चट्टानों का कोणीय टुकड़ों (Scree/Talus) में टूटना।
  • लवण अपक्षय (Salt Weathering): तटीय व शुष्क भागों में लवण क्रिस्टलों के तापीय विस्तार से चट्टानों में छोटे गड्ढे (Honeycomb / Tafoni) बनना।

3. जैविक अपक्षय भौतिक + रासायनिक

वनस्पति, जीव-जंतुओं और मानवीय क्रियाओं का योगदान:

  • वृक्षों की जड़ें (Root Wedging): चट्टानों की संधियों में जड़ों के फैलने से यांत्रिक दबाव।
  • बिलकारी जीव (Burrowing Animals): केंचुए, दीमक, चींटियाँ और कृंतक (Rodents) मिट्टी खोदकर नई चट्टानी सतह को नमी व वायु के संपर्क में लाते हैं।
  • शैवाल, काई व लाइकेन (Lichens & Mosses): चट्टानों पर उगकर ह्यूमिक एवं कार्बनिक अम्ल छोड़ते हैं जो खनिजों का रासायनिक विघटन करते हैं।
  • अपक्षय का आर्थिक महत्व: मृदा निर्माण (Regolith) के साथ-साथ अपक्षय से मूल्यवान खनिजों का संवर्धन (Enrichment) होता है (जैसे एल्युमिनियम/बॉक्साइट, लौह एवं मैंगनीज अयस्क)।
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बृहद क्षरण (Mass Wasting) एवं भूस्खलन (Landslides)

Gravity-Driven Downslope Movement of Rock Debris & Himalayas vs Western Ghats Comparison

बृहद क्षरण (Mass Wasting / Mass Movement) के अंतर्गत वे सभी संचलन आते हैं जिनमें चट्टानी मलबा गुरुत्वाकर्षण के प्रत्यक्ष प्रभाव से ढाल के सहारे नीचे खिसकता है। इसमें वायु, जल या हिमानी सीधे मलबे को ढोते नहीं हैं, बल्कि मलबा स्वयं अपने साथ जल या बर्फ को ले जा सकता है।

संचलन की श्रेणी प्रमुख प्रकार (Types) प्रक्रिया एवं UPSC परीक्षा हेतु मुख्य पहचान बिंदु
1. मंद संचलन
(Slow Movements)
• मृदा सर्पण (Soil Creep)
• मृदा प्रवाह (Solifluction)
• मृदा सर्पण (Creep): मंद ढालों पर अत्यंत धीमा, अगोचर संचलन — बिजली के खंभों, बाड़ों और पेड़ों के तनों का ढाल की ओर झुक जाना इसका प्रमाण है।
• सोलिफ्लक्शन (Solifluction): परिहिमानी (Periglacial) या आर्द्र शीतोष्ण क्षेत्रों में जब ऊपरी मृदा जल से संतृप्त होकर नीचे की जमी हुई अपारगम्य परत (Permafrost) के ऊपर गाढ़े कीचड़ की तरह धीरे-धीरे खिसकती है।
2. तीव्र एवं आर्द्र संचलन
(Rapid Wet Flows)
• पंक प्रवाह (Mudflow)
• पृथ्वी प्रवाह (Earthflow)
• मलबा अवधाव (Debris Avalanche)
• पंक प्रवाह (Mudflow): वनस्पति-विहीन ढालों पर भारी वर्षा या ज्वालामुखी राख (Lahar) के साथ कीचड़ की नदियों का तीव्र प्रवाह।
• मलबा अवधाव (Debris Avalanche): हिम अवधाव (Snow Avalanche) के समान तीव्र ढालों पर जल-संतृप्त मलबे का अत्यंत तेज़ विनाशकारी प्रवाह (जैसे केदारनाथ व वायनाड त्रासदी)।
3. शुष्क भूस्खलन
(Landslides)
• अवतलन / सर्पण (Slump)
• मलबा/शैल स्खलन (Rockslide)
• शैल पतन (Rockfall)
• अवतलन (Slump): चट्टानी मलबे की एक या अधिक इकाइयों का वक्राकार तल के सहारे पश्च-घूर्णन (Backward Rotation) के साथ नीचे धँसना।
• शैल स्खलन (Rockslide): संस्तरण तल (Bedding Plane) या भ्रंश दरार के सहारे चट्टानी खंडों का तीव्र फिसलन।
• शैल पतन (Rockfall): तीव्र ऊर्ध्वाधर भृगु (Cliff) से चट्टानों का मुक्त रूप से (Free-fall) गिरना।

तुलनात्मक विश्लेषण: हिमालय बनाम पश्चिमी घाट में भूस्खलन (UPSC Mains GS-1)

तुलना का आधार हिमालय पर्वत क्षेत्र (Himalayan Region) पश्चिमी घाट (Western Ghats)
1. भूगर्भिक एवं विवर्तनिक प्रकृति नवीन वलित पर्वत; भारतीय व यूरेशियन प्लेट के अभिसरण के कारण विवर्तनिक रूप से अत्यधिक अस्थिर व भूकंप-प्रवण (Zone IV & V)। प्राचीन, स्थिर प्रायद्वीपीय ब्लॉक (दक्कन ट्रैप बेसाल्ट एवं प्राचीन नाइस/चार्नोकाइट); भूकंपीय सक्रियता अपेक्षाकृत कम।
2. चट्टानों की संरचना असंगठित अवसादी चट्टानें (शेल, बलुआ पत्थर, फाइलाइट) जो आसानी से टूटती व खिसकती हैं। कठोर बेसाल्ट व रूपांतरित चट्टानों के ऊपर गहरी लेटराइट मृदा व अपक्षयित आवरण (Regolith) की मोटी परत।
3. ढाल एवं अपरदन कारक अत्यधिक तीक्ष्ण ढाल (Steep Gradients), युवा नदियों द्वारा गहरा शीर्षवर्ती व लंबवत कटाव (Toe cutting) एवं हिमनद झील विस्फोट (GLOF)। पश्चिमी कगार (Escarpment) पर तीव्र ढाल तथा दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान अल्प अवधि में मूसलाधार वर्षा से मृदा का जल-संतृप्त होना।
4. मानवीय हस्तक्षेप चारधाम/सीमांत सड़क चौड़ीकरण, सुरंग निर्माण, जलविद्युत बांध (Blasting) व अनियोजित पर्यटन नगरीकरण (जैसे जोशीमठ)। वनों की कटाई कर एकल रोपण कृषि (चाय, कॉफी, रबर), अवैध पत्थर उत्खनन (Quarrying) एवं ढालों का समतलीकरण।
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नदीजनित स्थलरूप (Fluvial Landforms — युवा, प्रौढ़ एवं वृद्धावस्था)

Erosional & Depositional Landforms Created by Running Water Across the Geomorphic Cycle

आर्द्र प्रदेशों में धरातल के समतलीकरण का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अभिकर्ता प्रवाहित जल (Running Water / River) है। नदी द्वारा अपरदन चार मुख्य क्रियाओं द्वारा होता है: (i) जलगति क्रिया (Hydraulic Action) — जल के वेग से चट्टानों का टूटना, (ii) अपघर्षण (Abrasion / Corrasion) — नदी के साथ बहते कंकड़-पत्थरों द्वारा तल व किनारों की रगड़, (iii) सन्निघर्षण (Attrition) — शैल टुकड़ों का आपस में टकराकर गोल व छोटा होना, तथा (iv) संक्षारण (Corrosion / Solution) — घुलनशील खनिजों का जल में घुलना।

1. युवावस्था (Youth Stage) तीव्र ढाल • लंबवत कटाव (Vertical Erosion) 2. प्रौढ़ावस्था (Mature Stage) मध्यम ढाल • पार्श्विक कटाव (Lateral Erosion) 3. वृद्धावस्था (Old Stage) न्यूनतम ढाल • निक्षेपण (Deposition) V-आकार घाटी / गॉर्ज • गॉर्ज एवं कैनियन (Gorge & Canyon) • जलप्रपात व अवनमन कुंड (Plunge Pool) • जलगर्तिका (Potholes) व नदी अपहरण • उथले जल-विभाजक, कोई बाढ़ मैदान नहीं अवतल (कटाव) उत्तल (Point Bar) • जलोढ़ पंख व शंकु (Alluvial Fans) • नदी विसर्प (Meanders) व चौड़ी घाटी • अंतर्ग्रथित पर्वत प्रक्षेप (Interlocking Spurs) • बाढ़ के मैदान का प्रारंभिक विकास गोखुर झील (Ox-bow) डेल्टा • गोखुर झील (Ox-bow Lake - काँवर ताल) • प्राकृतिक तटबंध (Natural Levees) • गुंफित नदी (Braided) व समप्राय मैदान • डेल्टा (चापाकार, पंजाकार, ज्वारनदमुखी)
चित्र 4.1: नदी अपरदन चक्र की तीन अवस्थाएँ (Youth, Mature, Old) एवं उनमें निर्मित अपरदनात्मक व निक्षेपणात्मक स्थलरूप

नदीजनित अपरदनात्मक एवं निक्षेपणात्मक स्थलाकृतियों की विस्तृत तालिका

वर्ग स्थलाकृति (Landform) निर्माण प्रक्रिया, संरचना एवं प्रमुख भारतीय/वैश्विक उदाहरण
अपरदनात्मक
(Erosional)
1. गॉर्ज बनाम कैनियन
(Gorge vs Canyon)
दोनों गहरी व संकरी घाटियाँ हैं। गॉर्ज (Gorge) के दोनों किनारे लगभग लंबवत तथा शीर्ष व तल पर समान चौड़ाई के होते हैं (जैसे सिंधु, सतलज व ब्रह्मपुत्र गॉर्ज); जबकि कैनियन (Canyon) सीढ़ीदार ढाल वाला होता है जो ऊपर चौड़ा और तल में संकरा होता है (जैसे कोलोराडो का ग्रैंड कैनियन, आंध्र प्रदेश में पेन्नार नदी का गांडीकोटा कैनियन)।
2. जलगर्तिका एवं अवनमन कुंड
(Potholes & Plunge Pools)
नदी तल की चट्टानों में भँवर के साथ घूमते कंकड़ों के अपघर्षण से बने बेलनाकार गड्ढे जलगर्तिका (Potholes) कहलाते हैं। जलप्रपात के ठीक आधार पर गिरते जल के भीषण प्रहार से बने विशाल व गहरे कुंड को अवनमन कुंड (Plunge Pool) कहते हैं।
3. अधःकर्तित विसर्प
(Incised / Entrenched Meanders)
जब किसी विसर्पी नदी के क्षेत्र में भू-गर्भिक उत्थान (Upliftment / Rejuvenation) होता है या आधार-तल गिरता है, तो नदी अपने विसर्पी मार्ग को कठोर चट्टानों में गहराई तक काट देती है। यह नदी नवोन्मेष (Rejuvenation) का प्रमुख प्रमाण है।
4. नदी वेदिकाएँ
(River Terraces)
प्राचीन बाढ़ के मैदानों के तल में नदी द्वारा पुनः लंबवत कटाव करने से दोनों किनारों पर बने सीढ़ीदार सोपान। यदि दोनों किनारों पर समान ऊँचाई पर हों तो युग्मित वेदिका (Paired Terraces) कहते हैं, जो त्वरित विवर्तनिक उत्थान दर्शाती हैं।
5. समप्राय मैदान व मोनाडनॉक
(Peneplain & Monadnock)
वृद्धावस्था के अंत में अपरदन से बना लगभग समतल व तरंगित मैदान पेनिप्लेन (डेविस) कहलाता है, जिस पर बचे हुए कठोर चट्टानों के अवशिष्ट टीलों को मोनाडनॉक (Monadnock) कहते हैं।
निक्षेपणात्मक
(Depositional)
1. जलोढ़ पंख एवं शंकु
(Alluvial Fans & Cones)
पर्वत पदीय क्षेत्र (Foothills) में जब नदी अचानक मैदान में उतरती है, तो ढाल घटने से वह मोटे कंकड़-पत्थर पंख के आकार में बिछा देती है (जैसे हिमालय के गिरिपद में भाबर पट्टी)। शुष्क प्रदेशों में इनका ढाल तीव्र (शंकु) और आर्द्र प्रदेशों में मंद (पंख) होता है।
2. विसर्प, कटऑफ व गोखुर झील
(Meander & Ox-bow Lake)
विसर्प एक स्थलरूप नहीं बल्कि एक प्रक्रिया है जिसमें बाहरी/अवतल किनारे (Concave Bank) पर सक्रिय अपरदन (Cut-off bank) तथा भीतरी/उत्तल किनारे (Convex Bank) पर निक्षेपण से विसर्पी रोधिका (Point Bar / Slip-off slope) बनती है। लूप अधिक मुड़ने पर मुख्य धारा से कटकर गोखुर झील (Ox-bow Lake) बनती है (उदा.: बिहार के बेगूसराय की काँवर झील / Kabartal — रामसर स्थल)।
3. प्राकृतिक तटबंध
(Natural Levees)
बाढ़ के दौरान नदी का जल किनारों से बाहर फैलते ही वेग कम होने के कारण मोटे अवसादों को दोनों किनारों के सहारे लंबे, कम ऊँचे कटकों के रूप में जमा कर देता है।
4. गुंफित वाहिकाएँ
(Braided Channels)
जब नदी में अवसाद भार अत्यधिक हो और ढाल कम हो, तो मुख्य धारा के बीच में रेत/बजरी के द्वीप (Sandbars) जम जाते हैं और नदी कई शाखाओं में बँटकर गुँथी हुई चोटी जैसी दिखती है (उदा.: असम में ब्रह्मपुत्र नदी और माजुली नदी द्वीप)।
5. डेल्टा (Delta) के प्रकार • चापाकार (Arcuate): धनुषाकार व उभरा हुआ — गंगा-ब्रह्मपुत्र, नील, राइन, सिंधु।
• पंजाकार (Bird-foot): चूना-रहित बारीक कणों का शांत समुद्र में दूर तक जमाव — मिसिसिपी नदी (USA)।
• ज्वारनदमुखी (Estuarine): भ्रंश घाटी व तीव्र ज्वारीय धाराओं वाली नदियाँ — नर्मदा, ताप्ती, मैकेंजी।
• रुंडित / दंताग्र (Cuspate): दांत के आकार का नुकीला डेल्टा — इटली की टाइबर (Tiber) व स्पेन की एब्रो नदी।
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कार्स्ट एवं भूमिगत जल स्थलरूप (Karst Topography)

Surface & Subterranean Landforms Formed by Solution & Carbonation in Limestone Regions

चूना पत्थर (Limestone) या डोलोमाइट (Dolomite) की चट्टानों वाले क्षेत्रों में सतही व भूमिगत जल की रासायनिक घोलन क्रिया (Solution & Carbonation) से निर्मित स्थलाकृतियों को एड्रियाटिक सागर के तट पर स्थित पूर्व यूगोस्लाविया (स्लोवेनिया/क्रोएशिया) के कार्स्ट प्रदेश के नाम पर कार्स्ट स्थलाकृति (Karst Topography) कहा जाता है।
भारत में प्रमुख कार्स्ट क्षेत्र: (1) रोहतास पठार की गुप्तधाम गुफाएँ (बिहार — BPSC हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण), (2) विशाखापत्तनम की बोरा गुफाएँ (Borra Caves, अराकू घाटी), (3) बस्तर की कुटुमसर गुफाएँ (छत्तीसगढ़), (4) मेघालय की खासी-जयंतिया पहाड़ियाँ (मासिनराम/चेरापूंजी गुफाएँ), (5) उत्तराखंड (रॉबर्स केव, देहरादून) एवं चित्रकूट (गुप्त गोदावरी)।

लैपीज (Lapies) घोल रंध्र (Sinkhole) डोलाइन व युवाला (Doline/Uvala) पोलजे (Polje - विशाल गर्त) स्टैलेक्टाइट (Stalactite) छत (Ceiling) से नीचे लटकते स्तंभ स्टैलेग्माइट (Stalagmite) फर्श (Ground) से ऊपर उठते स्तंभ कंदरा स्तंभ (Cave Pillar) दोनों के मिलने से निर्मित स्तंभ
चित्र 5.1: कार्स्ट प्रदेश के सतही अपरदनात्मक गर्त (लैपीज, घोल रंध्र, डोलाइन, पोलजे) एवं भूमिगत गुफा निक्षेप (स्टैलेक्टाइट, स्टैलेग्माइट व कंदरा स्तंभ)
💡 UPSC Prelims मेमोरी ट्रिक (आकार क्रम एवं गुफा निक्षेप):
1. कार्स्ट गर्तों का छोटे से बड़े का सही अनुक्रम (S → D → U → P): Sinkhole (घोल रंध्र) → Doline (डोलाइन) → Uvala (युवाला / घाटी रंध्र) → Polje (पोलजे / सबसे बड़ा राजकुंड)।
2. StalaCtite बनाम StalaGmite: अंग्रेज़ी अक्षर C (Stalactite) = Ceiling (छत से लटकने वाला); अक्षर G (Stalagmite) = Ground (ज़मीन/फर्श से ऊपर बढ़ने वाला)!
वर्ग स्थलाकृति का नाम प्रमुख विशेषताएँ एवं निर्माण प्रक्रिया
अपरदनात्मक
(Erosional)
1. लैपीज या कारेन (Lapies / Karren) चूना पत्थर की ऊपरी सतह पर घोलन क्रिया से बनी अत्यधिक ऊबड़-खाबड़, नुकीली शिखरिकाओं एवं संकरी नालियों (Pinnacles & Grooves) वाली स्थलाकृति।
2. घोल रंध्र → डोलाइन → युवाला → पोलजे वर्षा जल के घोलन से बने कीपाकार गड्ढे घोल रंध्र (Sinkholes) कहलाते हैं। कई घोल रंध्रों के मिलने से बड़ा डोलाइन (Doline), कई डोलाइनों के विलय से लंबी युवाला (Uvala), तथा भ्रंशन व घोलन से बनी सबसे विशाल समतल तली वाली घाटी पोलजे (Polje) कहलाती है।
3. विलय रंध्र व अंधी घाटी
(Swallow Hole & Blind Valley)
जब कोई सतही नदी किसी विलय रंध्र (Swallow Hole / Ponor) में गिरकर अचानक भूमिगत हो जाती है और आगे की घाटी सूखी रह जाती है, तो उसे अंधी घाटी (Blind Valley) कहते हैं।
4. कार्स्ट खिड़की व हम्स
(Karst Window & Hums)
भूमिगत गुफा की छत के आंशिक रूप से ढहने से जब सतह से भूमिगत नदी दिखाई देने लगती है तो उसे कार्स्ट खिड़की कहते हैं। कार्स्ट मैदान के अंत में बचे अवशिष्ट चूना-पत्थर टीलों को हम्स (Hums) तथा लाल अवशिष्ट मृदा को टेरा रोसा (Terra Rossa) कहते हैं।
निक्षेपणात्मक
(Depositional)
1. स्टैलेक्टाइट (Stalactite) कंदरा (Cave) की छत से टपकते कैल्शियम बाइकार्बोनेट युक्त जल के वाष्पीकरण व CO₂ मुक्त होने से छत से नीचे की ओर लटकते हुए नुकीले चूने के स्तंभ।
2. स्टैलेग्माइट (Stalagmite) कंदरा के फर्श पर टपकते जल से ऊपर की ओर बढ़ने वाले अपेक्षाकृत मोटे व चपटे स्तंभ।
3. कंदरा स्तंभ (Cave Pillar) व ट्रावर्टाइन स्टैलेक्टाइट और स्टैलेग्माइट के आपस में जुड़ने से बना पूर्ण स्तंभ। गर्म झरनों या गुफाओं के बाहर निक्षेपित कैल्शियम कार्बोनेट को ट्रावर्टाइन (Travertine) या कैलकेरियस टुफा (Tufa) कहते हैं।
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हिमानी एवं परिहिमानी स्थलरूप (Glacial & Periglacial Landforms)

Landforms Carved by Plucking & Abrasion and Deposited by Till & Outwash Streams

गुरुत्वाकर्षण के अधीन ढाल के सहारे अत्यंत धीमी गति (कुछ सेंटीमीटर से कुछ मीटर प्रतिदिन) से प्रवाहित होने वाली विशाल हिमराशि को हिमनद या हिमानी (Glacier) कहते हैं। हिमानी अपरदन दो मुख्य क्रियाओं से होता है: (1) उत्पाटन (Plucking / Quarrying) — गतिशील हिमनद द्वारा तली की संधियुक्त चट्टानों को जमाकर उखाड़ लेना, तथा (2) अपघर्षण (Abrasion) — हिम के साथ जमे शैल टुकड़ों द्वारा घाटी की तली और दीवारों को रेगमाल (Sandpaper) की तरह रगड़ना व पॉलिश करना।

(A) हिमानी अपरदनात्मक स्थलरूप (Erosional) हॉर्न / गिरिशृंग (Horn) अरेत (Arête) सर्क व टार्न झील (Cirque/Tarn) U-आकार की हिमानी घाटी (Glacial Trough) + लटकती घाटी (Hanging Valley) • रॉश मुटोने • फियोर्ड (B) हिमानी निक्षेपणात्मक स्थलरूप (Depositional) हिमनद प्रवाह की दिशा (Ice Flow) → तीव्र कुंद सिरा (Stoss) मंद ढाल पूँछ (Lee) ड्रमलिन (Drumlin) एस्कर (Esker - सर्पिल कटक) • अस्तरीकृत (Unstratified Till): हिमोढ़ (Moraines) व ड्रमलिन • स्तरीकृत (Stratified Outwash): एस्कर, केम, हिमानी धौत मैदान • ड्रमलिन समूह = 'अंडे की टोकरी की स्थलाकृति' (Basket of Eggs)
चित्र 6.1: हिमानी अपरदन (सर्क, अरेत, हॉर्न, U-आकार घाटी) तथा हिमानी निक्षेप (ड्रमलिन का ढाल-अभिविन्यास एवं एस्कर)
वर्ग स्थलाकृति (Landform) निर्माण प्रक्रिया, पहचान बिंदु एवं उदाहरण
अपरदनात्मक
(Erosional)
1. सर्क / हिमगह्वर एवं टार्न झील
(Cirque / Corrie & Tarn)
पर्वतीय ढालों पर हिमनद के उद्गम पर बनी आरामकुर्सी (Armchair) जैसी गहरी अर्धवृत्ताकार घाटी सर्क कहलाती है। हिम पिघलने पर इसके बेसिन में जल भरने से बनी झील को टार्न झील (Tarn Lake) कहते हैं (जैसे चंद्रताल व रूपकुंड)।
2. अरेत एवं हॉर्न
(Arête & Horn)
जब दो विपरीत सर्कों का शीर्षवर्ती अपरदन होता है, तो उनके बीच बची कंघी या आरी के दांत जैसी तीक्ष्ण कटक को अरेत (Arête) कहते हैं। तीन या अधिक सर्कों के पीछे हटने से बनी पिरामिड जैसी नुकीली चोटी हॉर्न (Horn) कहलाती है (उदा.: आल्प्स का मैटरहॉर्न, हिमालय का शिवलिंग व कामेट)।
3. U-आकार की घाटी एवं लटकती घाटी
(U-Shaped & Hanging Valley)
हिमनद अपनी घाटी की तली के साथ-साथ पार्श्व दीवारों को भी रगड़कर चौड़ी और सपाट तली वाली U-आकार की घाटी बनाता है। मुख्य हिमनद घाटी की तुलना में सहायक हिमनद घाटी कम गहरी कटती है, इसलिए मुख्य घाटी के ऊपर लटकती घाटी (Hanging Valley) के रूप में दिखती है और उच्च जलप्रपात बनाती है।
4. रॉश मुटोने बनाम क्रैग एंड टेल
(Roche Moutonnée vs Crag & Tail)
रॉश मुटोने (भेड़पीठ शैल): हिमनद के आने की दिशा (Stoss side) में अपघर्षण से चिकना व मंद ढाल तथा उतरने की दिशा (Lee side) में उत्पाटन (Plucking) से उबड़-खाबड़ व तीव्र ढाल। क्रैग एंड टेल: कठोर आग्नेय शैल (Crag) के पीछे कोमल चट्टान (Tail) का अपरदन से बचना।
5. नुनाटक एवं फियोर्ड
(Nunatak & Fjord)
विशाल हिमचादरों के बीच द्वीप की तरह उभरी हिम-मुक्त चोटियों को नुनाटक (Nunatak) कहते हैं। उच्च अक्षांशों में गहरी हिमानी U-घाटियों में समुद्र का जल भरने से बने संकरे, गहरे व खड़ी दीवार वाले निवेशिका तट को फियोर्ड (Fjord) कहते हैं (नॉर्वे, चिली, न्यूज़ीलैंड, ग्रीनलैंड)।
निक्षेपणात्मक
(Depositional)
1. हिमोढ़ (Moraines) — अस्तरीकृत टिल हिमनद द्वारा सीधे निक्षेपित अस्तरीकृत व बिना छँटे (Unstratified & Unsorted) शैल मलबे को टिल (Glacial Till) कहते हैं। स्थिति के अनुसार ये 4 प्रकार के होते हैं: अंतस्थ (Terminal), पार्श्विक (Lateral), मध्यस्थ (Medial - दो पार्श्विक हिमोढ़ों के मिलने से) और तलस्थ (Ground Moraine)।
2. ड्रमलिन (Drumlin) — अस्तरीकृत गोलाश्म मृत्तिका (Boulder Clay / Till) से निर्मित उल्टी नाव या कटे हुए अंडे के समान चिकने, अंडाकार टीले। इनका कुंद व तीव्र ढाल (Blunt Stoss end) हिमनद के आने की दिशा में तथा मंद ढाल वाली पूँछ (Tail) हिमनद प्रवाह की दिशा में होती है। इनके समूह को 'अंडे की टोकरी की स्थलाकृति' (Basket of Eggs Topography) कहते हैं।
3. एस्कर (Esker) — स्तरीकृत हिम-जलोढ़ हिमनद के नीचे बहने वाली उप-हिमानी जलधाराओं (Sub-glacial meltwater streams) द्वारा रेत, बजरी व गोल कंकड़ों के स्तरीकृत (Stratified) जमाव से बनी लंबी, संकरी व सर्पिल कटकें। ये स्कैंडिनेविया व कनाडा में प्राकृतिक सड़क व रेलमार्ग बनाने में अत्यंत उपयोगी हैं।
4. केम, केटल एवं हिमानी धौत मैदान
(Kame, Kettle & Outwash Plain)
हिमनद के अग्रभाग पर पिघलते जल द्वारा बने टीले केम (Kame) कहलाते हैं। हिमखंडों के पिघलने से बने गड्ढे केटल (Kettle Holes) तथा अंतस्थ हिमोढ़ के आगे बारीक बजरी-रेत से बने विस्तृत मैदान को हिमानी धौत मैदान (Outwash Plain / Sandur) कहते हैं।
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पवन एवं शुष्क प्रदेशीय स्थलरूप (Aeolian / Arid Landforms)

Wind & Ephemeral Water Landforms in Deserts — Deflation, Abrasion, Dunes & Loess

गर्म मरुस्थलों में वनस्पति के अभाव और यांत्रिक अपक्षय के कारण पवन तीन मुख्य तरीकों से कार्य करती है: (1) अपवाहन (Deflation) — ढीले व बारीक धूल-रेत कणों को उड़ा ले जाना, (2) अपघर्षण (Abrasion) — पवन में उड़ते रेत कणों द्वारा चट्टानों पर रगड़ (सतह से 1–2 मीटर की ऊँचाई तक सर्वाधिक प्रभावी), तथा (3) सन्निघर्षण (Attrition) — रेत कणों का आपस में टकराकर गोल (Millet-seed sand) होना। इसके अतिरिक्त मरुस्थलों में आकस्मिक मूसलाधार वर्षा (Cloudbursts) से भी पेडिमेंट, बजादा व प्लाया जैसी महत्वपूर्ण स्थलाकृतियाँ बनती हैं।

1. छत्रक शैल (Mushroom Rock) चौड़ी छतरी (कम अपघर्षण) आधार के पास (1-2m) रेत कणों से सर्वाधिक अपघर्षण (सहारा में 'गारा') 2. बरखान बनाम परवलयिक टिब्बा पवन की दिशा (Wind Direction) → बरखान (Barchan) सींग पवन की दिशा में (Downwind) परवलयिक (Parabolic): सींग पवन के विपरीत (वनस्पति द्वारा भुजाएँ स्थिर रहने से) 3. मरुस्थलीय बेसिन (Bolson) पर्वत अग्रभाग पेडिमेंट (शैल तल) बजादा (जलोढ़) प्लाया झील • पेडिमेंट: पर्वत पाद पर मंद ढाल शैल सतह • बजादा: जलोढ़ पंखों के मिलने से बना मैदान • प्लाया (Playa): उथली लवणीय झील
चित्र 7.1: (1) छत्रक शैल, (2) बरखान बनाम परवलयिक टिब्बों की भुजाओं की दिशा, तथा (3) मरुस्थलीय बालसन बेसिन (पेडिमेंट, बजादा व प्लाया)
वर्ग स्थलाकृति (Landform) निर्माण प्रक्रिया, संरचना एवं विशिष्ट परीक्षा तथ्य
अपरदनात्मक
(Erosional)
1. अपवाहन गर्त व मरुद्यान
(Deflation Hollows & Oasis)
पवन द्वारा ढीली रेत को उड़ा ले जाने से बने विशाल गर्त (Blowouts)। जब ये गर्त भूमिगत जल-स्तर (Water Table) तक गहरे हो जाते हैं, तो वहाँ मरुद्यान (Oasis) बन जाते हैं (उदा.: मिस्र का कतारा गर्त / Qattara Depression — समुद्र तल से 133 मी. नीचे)।
2. छत्रक शैल / गारा
(Mushroom / Pedestal Rock)
पवन में उड़ते रेत के भारी कण धरातल से 1–2 मीटर की ऊँचाई तक ही अधिक चलते हैं, जिससे चट्टान का निचला आधार पतला कट जाता है और ऊपरी भाग छतरी जैसा रह जाता है। सहारा में इसे 'गारा' (Gara) और जर्मनी में 'पिल्सफेलसेन' कहते हैं।
3. ज्यूगेन बनाम यारडंग
(Zeugen vs Yardang)
ज्यूगेन (Zeugen): जब कठोर और कोमल चट्टानों की परतें क्षैतिज (Horizontal) रूप में एक के ऊपर एक बिछी हों, तो तुषार व पवन अपघर्षण से बनी दवात (Inkpot) या मेज जैसी आकृति (3–30 मी. ऊँची)।
यारडंग (Yardang): जब कठोर और कोमल चट्टानों की परतें लंबवत (Vertical) हों और पवन की दिशा के समानांतर हों, तो कोमल शैल कटने से बनी मुर्गे की कलगी जैसी तीक्ष्ण कटकें।
4. इन्सेलबर्ग, पेडिमेंट एवं ड्राईकैंटर
(Inselberg, Pediment & Dreikanter)
मरुस्थलीय समतलीकरण के बाद मैदान में द्वीप की तरह खड़े गुंबदाकार अवशिष्ट ग्रेनाइट/नाइस के टीले इन्सेलबर्ग (Inselberg / Bornhardt) कहलाते हैं। पर्वत के आधार और बजादा के बीच मंद ढाल वाली अपरदित चट्टानी सतह पेडिमेंट (Pediment) है। पवन से घिसकर तीन फलकों वाले बने पत्थरों को ड्राईकैंटर (Dreikanter) कहते हैं।
निक्षेपणात्मक
(Depositional)
1. बालू के टिब्बे (Sand Dunes):
बरखान, परवलयिक एवं सीफ
• बरखान (Barchan): अर्धचंद्राकार गतिशील टिब्बे जिनके दोनों नुकीले सींग (Horns) पवन के बहने की दिशा में (Downwind) होते हैं; पवनमुखी ढाल मंद व उत्तल तथा पवनविमुखी ढाल तीव्र व अवतल होता है।
• परवलयिक टिब्बे (Parabolic): आंशिक वनस्पति युक्त रेतीले क्षेत्रों में बनते हैं; इनके सींग वनस्पति से बंधे होने के कारण पवन की आने वाली दिशा में (Upwind) होते हैं (बरखान के ठीक विपरीत)।
• सीफ (Seif): केवल एक ही पंख/सींग वाला लंबा, संकरा कटक (जब पवन की दिशा में आंशिक बदलाव से बरखान की एक भुजा लंबी बढ़ जाती है)।
• अनुदैर्ध्य (Longitudinal) व अनुप्रस्थ (Transverse): पवन की दिशा के समानांतर (अनुदैर्ध्य) तथा पवन की दिशा के समकोण पर (अनुप्रस्थ) बनने वाले टिब्बे।
2. लोएस का मैदान (Loess) पवन द्वारा मरुस्थलों या हिमानी धौत मैदानों से उड़ाकर दूर ले जाई गई अत्यंत बारीक, पीले रंग की चूना-युक्त एवं छिद्रमय गाद (Silt) के जमाव से निर्मित अत्यधिक उपजाऊ व स्तर-रहित मैदान (उदा.: उत्तरी चीन का पीत लोएस पठार जहाँ ह्वांगहो नदी बहती है; यूरोप में 'लिमन')।
3. बजादा एवं प्लाया (Bajada & Playa) अंतःपर्वतीय मरुस्थलीय बेसिन (Bolson) के किनारों पर जलोढ़ पंखों के आपस में मिलने से बना तरंगित निक्षेपण मैदान बजादा (Bajada) कहलाता है। बेसिन के केंद्र में बनी अस्थायी, उथली व खारे पानी की झील को प्लाया (Playa), लवण की अधिकता होने पर सेलिनास (Salinas) तथा अरब में खबारी/ममल्लाह कहते हैं।
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तटीय एवं सागरीय स्थलरूप (Coastal & Marine Landforms)

Wave-Driven Erosional & Depositional Features and High Rocky vs Low Sedimentary Coasts

महासागरीय तरंगें, धाराएँ और ज्वार-भाटा तटीय क्षेत्रों में जलगति क्रिया (Hydraulic Action) और अपघर्षण (Corrasion) द्वारा तीव्र परिवर्तन लाते हैं। तटीय भू-आकृतियों का स्वरूप इस बात पर निर्भर करता है कि तट उच्च शैलमय एवं निमज्जित (High Rocky / Submerged Coast — जैसे भारत का पश्चिमी तट) है जहाँ अपरदनात्मक स्थलरूप प्रधान होते हैं, अथवा निम्न अवसादी एवं उन्मज्जित (Low Sedimentary / Emerged Coast — जैसे भारत का पूर्वी तट) है जहाँ निक्षेपणात्मक स्थलरूप प्रधान होते हैं।

वर्ग तटीय स्थलाकृति (Landform) निर्माण प्रक्रिया, विकास क्रम एवं प्रमुख उदाहरण
अपरदनात्मक
(Erosional)
1. समुद्री भृगु एवं तरंग-घर्षित वेदी
(Sea Cliff & Wave-cut Platform)
शैलमय तटों पर तरंगों के निरंतर प्रहार से आधार में खাঁच (Notch) बनती है और ऊपरी चट्टान ढहने से खड़ी ढाल वाला समुद्री भृगु (Sea Cliff) बनता है। भृगु के पीछे हटने से उसके सामने समुद्र तल पर बनी चपटी शैल सतह को तरंग-घर्षित वेदी (Wave-cut Platform) कहते हैं।
2. कंदरा → मेहराब → स्टैक → स्टंप
(Cave → Arch → Stack → Stump)
शीर्षस्थ अंतरीप (Headland) की कोमल संधियों में तरंग प्रहार से पहले समुद्री गुफा (Sea Cave) बनती है। गुफा के आर-पार खुलने पर समुद्री मेहराब (Sea Arch) बनता है। मेहराब की छत गिरने पर समुद्र में अकेला खड़ा स्तंभ स्टैक (Sea Stack / सागरीय स्तंभ) और उसके घिसकर जलस्तर तक रह जाने पर स्टंप (Stump) कहलाता है।
3. ब्लो-होल एवं जियो
(Blowhole / Gloup & Geo)
समुद्री गुफा की छत में संपीडित वायु के दबाव से छेद हो जाने पर जब तरंगों का पानी फव्वारे की तरह ऊपर फूटता है तो उसे ब्लो-होल या ग्लूप (Gloup) कहते हैं। गुफा की पूरी छत धँसने से बनी संकरी तटीय खाड़ी को जियो (Geo) कहते हैं।
निक्षेपणात्मक
(Depositional)
1. पुलीन एवं तटीय टिब्बे
(Beaches & Coastal Dunes)
तट के सहारे रेत, बजरी व शिंगल (Shingle) के अस्थायी निक्षेप से पुलीन (Beach) बनते हैं (जैसे चेन्नई का मरीना बीच, पुरी बीच)। पुलीन के ठीक पीछे पवन द्वारा उड़ाई गई रेत से तटीय टिब्बे बनते हैं।
2. रोधिका, स्पिट एवं हुक
(Offshore Bar, Spit & Hook)
तट से कुछ दूर समानांतर रूप में बनी रेत/बजरी की कटक को अपतट रोधिका (Offshore Bar) और जल से ऊपर दिखने पर रोधिका द्वीप (Barrier Island) कहते हैं। जब रोधिका का एक सिरा मुख्य भूमि (Headland) से जुड़ा हो और दूसरा समुद्र की ओर निकला हो तो उसे स्पिट (Spit / जिह्वा) तथा मुड़ जाने पर हुक (Hook) कहते हैं।
3. टॉम्बोलो (Tombolo) जब कोई बालू रोधिका (Sand Spit) मुख्य भूमि के तट को किसी अपतटीय द्वीप (Island) या समुद्री स्टैक से जोड़ देती है, तो उस संयोजक बालू-सेतु को टॉम्बोलो (Tombolo) कहते हैं (जैसे इटली का मोंटे अर्जेंतारियो)।
4. लैगून / अनूप झील (Lagoon / Kayal) स्पिट या अवरोधक रोधिका (Barrier Bar) द्वारा समुद्री खाड़ी का मुहाना आंशिक या पूर्ण रूप से बंद हो जाने पर बनी उथली खारे/अर्ध-खारे पानी की तटीय झील (उदा.: ओडिशा की चिल्का झील, आंध्र-तमिलनाडु की पुलिकट झील एवं केरल के कयाल / वेम्बनाड)।

प्रमुख तटीय वर्गीकरण (Types of Coasts — Prelims Quick Revision)

  • रिया तट (Ria Coast): नदी द्वारा अपरदित V-आकार की घाटियों के समुद्री जल में डूबने (Submergence) से बना कीपाकार तट (जैसे उत्तर-पश्चिमी स्पेन व दक्षिण-पश्चिम आयरलैंड)।
  • फियोर्ड तट (Fjord Coast): हिमानी द्वारा अपरदित गहरी U-आकार की घाटियों के जलमग्न होने से बना खड़ी दीवारों वाला तट (जैसे नॉर्वे, चिली, दक्षिण न्यूज़ीलैंड)।
  • डालमेशियन तट (Dalmatian Coast): तट के समानांतर फैली पर्वत श्रेणियों के जलमग्न होने से बना तट, जहाँ पर्वत शिखर तटीय द्वीपों की श्रृंखला के रूप में दिखते हैं (जैसे एड्रियाटिक सागर का क्रोएशिया तट)।
  • हैफ तट (Haff Coast): निम्न तटीय भागों में बालू की रोधिकाओं (Nehrungs) द्वारा घिरे उथले लैगून वाला तट (जैसे बाल्टिक सागर का दक्षिणी तट)।
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UPSC Prelims Traps एवं Mains GS-1 उत्तर-लेखन फ्रेमवर्क

High-Yield Exam Alerts, Common Conceptual Pitfalls & 150-Word Model Answer Structure

⚠️ UPSC Prelims Alert — जहाँ 90% छात्र गलती करते हैं!
  • Trap 1 (बरखान बनाम परवलयिक टिब्बे के सींग): बरखान (Barchan) के दोनों सींग (Horns) पवन की बहने वाली दिशा में (Downwind) नुकीले होते हैं; जबकि परवलयिक (Parabolic) टिब्बों में वनस्पति किनारों को जकड़ लेती है और मध्य भाग आगे खिसक जाता है, इसलिए इसके सींग पवन की आने वाली दिशा (Upwind) की ओर होते हैं!
  • Trap 2 (ड्रमलिन बनाम रॉश मुटोने का ढाल): रॉश मुटोने (अपरदनात्मक) में हिमनद के आने की दिशा में ढाल मंद व चिकना तथा आगे की दिशा में तीव्र/उबड़-खाबड़ होता है। इसके ठीक विपरीत ड्रमलिन (निक्षेपणात्मक) में हिमनद के आने की दिशा वाला सिरा कुंद व तीव्र ढाल (Steep Stoss side) वाला तथा प्रवाह की दिशा में पूँछ मंद ढाल वाली होती है!
  • Trap 3 (क्या बृहद क्षरण अपरदन का भाग है? — NCERT Class 11 Trap): NCERT स्पष्ट रूप से लिखती है कि बृहद क्षरण (Mass Movement) को अपरदन (Erosion) के अंतर्गत नहीं रखा जाना चाहिए, क्योंकि बृहद क्षरण में प्रवाहित जल, हिमानी या पवन सीधे मलबे को नहीं ढोते; यह पूर्णतः गुरुत्वाकर्षण (Gravity) से संचालित है।
  • Trap 4 (ड्रमलिन बनाम एस्कर की संरचना): ड्रमलिन हिमनद द्वारा सीधे निक्षेपित अस्तरीकृत गोलाश्म मृत्तिका (Unstratified Glacial Till) से बनते हैं; जबकि एस्कर (Esker) पिघलते हिमजल की धाराओं द्वारा बिछाए गए स्तरीकृत रेत व बजरी (Stratified Fluvio-Glacial Outwash) से बनते हैं!
  • Trap 5 (ज्यूगेन बनाम यारडंग में चट्टानी परतें): ज्यूगेन (Zeugen) में कठोर व कोमल चट्टानों की परतें क्षैतिज (Horizontal) होती हैं, जबकि यारडंग (Yardang) में कठोर व कोमल चट्टानों की परतें लंबवत (Vertical) होती हैं।
  • Trap 6 (अधःकर्तित विसर्प — Incised Meanders): सामान्य नदी विसर्प (Meanders) प्रौढ़ व वृद्धावस्था में कोमल जलोढ़ मैदानों पर बनते हैं, किंतु कठोर चट्टानों में गहरे कटे हुए अधःकर्तित विसर्प (Incised / Entrenched Meanders) क्षेत्र के विवर्तनिक उत्थान (Upliftment) या नदी नवोन्मेष (Rejuvenation) के प्रमाण हैं।

✍️ Mains GS-1 अभ्यास प्रश्न एवं 150-शब्द मॉडल उत्तर फ्रेमवर्क

प्रश्न: "यद्यपि बहिर्जात भू-आकृतिक प्रक्रियाओं का अंतिम उद्देश्य धरातलीय विषमताओं का समतलीकरण (Gradation) करना है, तथापि विभिन्न जलवायु प्रदेशों में इनकी सापेक्षिक प्रभावशीलता भिन्न-भिन्न स्थलाकृतियों को जन्म देती है। उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।" (150 शब्द, 10 अंक)

  • 1. भूमिका (Introduction — 20–25 शब्द): बहिर्जात प्रक्रियाओं (सौर ऊर्जा + गुरुत्वाकर्षण से संचालित अनाच्छादन) को परिभाषित करें जो निम्नीकरण (Degradation) और अधिवृद्धि (Aggradation) द्वारा अंतर्जात विषमताओं को समतल करती हैं।
  • 2. मुख्य भाग (Body — 90–100 शब्द):
    • आर्द्र उष्ण व शीतोष्ण प्रदेश (Fluvial & Karst): उच्च वर्षा व तापमान के कारण रासायनिक अपक्षय और नदी अपरदन की प्रधानता → गॉर्ज, विसर्प, डेल्टा तथा चूना पत्थर क्षेत्रों में कार्स्ट गुफाएँ (स्टैलेक्टाइट/स्टैलेग्माइट)।
    • शीत एवं उच्च अक्षांशीय/पर्वतीय प्रदेश (Glacial): तुषार वेजिंग (Frost Wedging) तथा हिमनदों के उत्पाटन व अपघर्षण से सर्क, हॉर्न, U-आकार की घाटियाँ, ड्रमलिन एवं फियोर्ड तट।
    • शुष्क एवं अर्ध-शुष्क मरुस्थल (Aeolian): तापीय प्रसरण व पवन अपघर्षण/अपवाहन से छत्रक शैल, यारडंग, बरखान टिब्बे एवं लोएस मैदान। (साथ में पंच-प्रक्रम मैट्रिक्स आरेख बनाएँ)।
  • 3. निष्कर्ष (Conclusion — 20–25 शब्द): इस प्रकार बहिर्जात बल केवल धरातल को घिसने वाले कारक नहीं हैं, बल्कि वे जलवायु और शैल-संरचना (Lithology) की अंतर्क्रिया से पृथ्वी की पारिस्थितिक एवं भू-आकृतिक विविधता के निर्माता हैं।
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UPSC Mains — Chapter 7 Full Model Answer Bank

बहिर्जात प्रक्रियाओं, फियोर्ड (Mains 2023), भूस्खलन और तटीय स्थलाकृतियों से जुड़े 4 पूर्ण मॉडल उत्तर

भूमिका: फियोर्ड (Fjords) उच्च अक्षांशीय तटीय क्षेत्रों में पाई जाने वाली लंबी, संकरी, अत्यधिक गहरी और तीन ओर से खड़ी चट्टानी दीवारों (Cliffs) से घिरी समुद्री निवेशिकाएँ (Inlets) हैं, जिनका निर्माण हिमानी अपरदन और पश्च-हिमयुग सागरीय निमज्जन के संयुक्त प्रभाव से हुआ है।

मुख्य भाग:
(A) फियोर्ड के निर्माण की भू-आकृतिक प्रक्रिया:
1. गहन हिमानी अपरदन: प्लीस्टोसीन हिमयुग के दौरान विशाल घाटी हिमनदों ने उत्पाटन (Plucking) और अपघर्षण (Abrasion) द्वारा तटीय पर्वतों को काटकर समुद्र तल से भी गहरी और खड़ी दीवारों वाली U-आकार की हिमानी द्रोणियाँ (Glacial Troughs) बनाईं।
2. समुद्री जल का प्रवेश (Holocene Submergence): हिमयुग की समाप्ति पर जब हिमनद पिघले और समुद्र का जलस्तर बढ़ा, तो इन गहरी U-आकार की घाटियों में समुद्र का जल भर गया। फियोर्ड के मुहाने पर अक्सर उथली हिमोढ़ देहली (Terminal Moraine Sill) पाई जाती है, जबकि भीतर का भाग 1,000 मीटर से अधिक गहरा होता है (जैसे नॉर्वे का सोग्नेफियोर्ड)।
(B) विश्व के सबसे सुरम्य (Picturesque) क्षेत्र होने के कारण:
1. नाटकीय भू-दृश्य (Dramatic Relief Contrast): शांत, दर्पण जैसे नीले समुद्री जल के ठीक बगल में 1,000 मीटर तक ऊँची खड़ी ग्रेनाइट/नाइस की चट्टानें और हिमाच्छादित चोटियाँ अद्भुत दृश्य विरोधाभास रचती हैं।
2. लटकती घाटियाँ एवं सहस्रों जलप्रपात: मुख्य फियोर्ड से जुड़ी सहायक लटकती घाटियों (Hanging Valleys) से सैकड़ों मीटर नीचे सीधे समुद्र में गिरते जलप्रपात (जैसे न्यूज़ीलैंड का मिलफोर्ड साउंड व नॉर्वे का गीरेंजरफियोर्ड)।
3. शांत जल व जैव-विविधता: मुहाने की उथली देहली (Sill) खुले महासागर की उग्र तरंगों को रोकती है, जिससे फियोर्ड शांत प्राकृतिक बंदरगाह और प्रवाल, सील व व्हेल का आवास बनते हैं।

निष्कर्ष: नॉर्वे, चिली, न्यूज़ीलैंड (साउथ आइलैंड), ग्रीनलैंड और अलास्का के फियोर्ड तट हिमानी भू-आकृति विज्ञान के उत्कृष्ट जीवंत संग्रहालय हैं, जो पर्यावरण-पर्यटन और यूनेस्को विश्व धरोहर के रूप में वैश्विक महत्व रखते हैं।

भूमिका: भूस्खलन (Landslide) बृहद क्षरण (Mass Wasting) का एक तीव्र रूप है जिसमें गुरुत्वाकर्षण के प्रत्यक्ष प्रभाव से शैल व मृदा मलबा ढाल के सहारे नीचे खिसकता है। यद्यपि भारत के हिमालय और पश्चिमी घाट दोनों ही भूस्खलन-प्रवण हैं, किंतु भूगर्भिक आयु, विवर्तनिकी और ढाल अस्थिरता के कारण हिमालय में इनकी आवृत्ति व तीव्रता कहीं अधिक है।

मुख्य भाग:
1. विवर्तनिक सक्रियता बनाम भूगर्भिक स्थिरता: हिमालय एक नवीन वलित पर्वत है जहाँ भारतीय प्लेट आज भी ~5 सेमी/वर्ष की दर से यूरेशियन प्लेट के नीचे क्षेपित हो रही है। MCT, MBT और HFT जैसी सक्रिय भ्रंश रेखाओं और भूकंपों (Seismic Zone IV & V) से चट्टानों में निरंतर दरारें पड़ती हैं। इसके विपरीत पश्चिमी घाट प्राचीन व स्थिर प्रायद्वीपीय शील्ड का भ्रंशित कगार है जहाँ भूकंपीय हलचल नगण्य है।
2. शैल-संरचना (Lithology): हिमालय (विशेषकर शिवालिक व लघु हिमालय) असंगठित अवसादी और कायांतरित चट्टानों (शेल, स्लेट, फाइलाइट, चूना पत्थर) से बना है जो जल सोखने पर तुरंत भुरभुरी हो जाती हैं। वहीं पश्चिमी घाट मुख्यतः कठोर दक्कन ट्रैप बेसाल्ट और आर्कियन चार्नोकाइट/नाइस से निर्मित है, जहाँ केवल ऊपरी अपक्षयित लेटराइट मृदा आवरण (Debris/Mudflow) ही खिसकता है।
3. उच्चावच एवं नदीय कटाव (Relief & Toe-Cutting): हिमालय में ढाल अत्यधिक तीक्ष्ण (60° से अधिक) हैं और युवावस्था की नदियाँ (गंगा, तीस्ता, सतलज) आधार-कटाव (Toe erosion) द्वारा ढालों का संतुलन बिगाड़ देती हैं। पश्चिमी घाट की औसत ऊँचाई कम (900–1600 मी.) है और नदियाँ प्रौढ़ावस्था में हैं।
4. हिमानी व जलवायविक कारक: हिमालय में बादल फटने (Cloudbursts), तुषार वेजिंग (Freeze-thaw cycles) और हिमनद झील विस्फोट (GLOF) से विशाल मलबा अवधाव (Debris Avalanches) उत्पन्न होते हैं, जबकि पश्चिमी घाट में भूस्खलन मुख्यतः दक्षिण-पश्चिम मानसून की अतिवृष्टि के समय जल-संतृप्त मृदा प्रवाह (जैसे वायनाड व इडुक्की) तक सीमित रहता है।

निष्कर्ष: हिमालय और पश्चिमी घाट दोनों की भू-आकृतिक संवेदनशीलता भिन्न है; अतः हिमालय में सुरंग/बांध निर्माण से पूर्व सीस्मिक-माइक्रोज़ोनेशन तथा पश्चिमी घाट में गाडगिल/कस्तूरीरंगन समिति की अनुशंसाओं के अनुरूप ढाल-संरक्षण व खनन नियंत्रण अनिवार्य है।

भूमिका: अपक्षय (Weathering) वायुमंडलीय कारकों द्वारा चट्टानों का स्व-स्थाने (In-situ) यांत्रिक विखंडन और रासायनिक वियोजन है। भू-आकृति विज्ञान में यह अनाच्छादन (Denudation) की प्रथम कड़ी है जो कठोर शैल-संरचना को कमजोर कर अपरदन और जीवमंडल की नींव तैयार करती है।

मुख्य भाग:
1. बृहद क्षरण और अपरदन की पूर्व-पीठिका: विशाल आग्नेय व कायांतरित चट्टानों पर नदी, पवन या हिमानी तब तक प्रभावी अपरदन नहीं कर सकते जब तक कि भौतिक अपक्षय (तुषार वेजिंग, तापीय प्रसरण, भार-मुक्ति) और रासायनिक अपक्षय (कार्बोनेशन, जलयोजन) उन्हें संधियों के सहारे तोड़कर ढीले आवरण (Regolith) में न बदल दें।
2. मृदा निर्माण (Pedogenesis) और जीवमंडल का आधार: अपक्षय से प्राप्त चट्टानी चूर्ण (Regolith) ही मृदा का मूल जनक पदार्थ (Parent Material) बनता है। इसमें जैविक ह्यूमस और खनिज पोषक तत्वों (पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस) की उपलब्धता से ही स्थलीय वनस्पति, कृषि और खाद्य श्रृंखला का अस्तित्व संभव है।
3. खनिजों का आर्थिक संवर्धन (Supergene Enrichment): रासायनिक अपक्षय और निक्षालन (Leaching) की प्रक्रिया से घुलनशील व अवांछित सिलिका आदि पदार्थ बह जाते हैं और शेष चट्टान में मूल्यवान धात्विक अयस्कों की सांद्रता बढ़ जाती है, जिससे वाणिज्यिक खनन आर्थिक रूप से व्यवहार्य हो जाता है। उदाहरणार्थ — उष्णकटिबंधीय आर्द्र प्रदेशों में लेटराइटीकरण (Laterization) द्वारा बॉक्साइट (एल्युमिनियम अयस्क — ओडिशा/झारखंड के पाट प्रदेश), उच्च कोटि के लौह अयस्क, मैंगनीज और निकल का संवर्धन।
4. विशिष्ट स्थलाकृतियों एवं भू-जल भंडारों का विकास: कार्बोनेशन अपक्षय से चूना पत्थर में कार्स्ट गुफाएँ व जलभृत (Aquifers) बनते हैं तथा ग्रेनाइट चट्टानों में अपपत्रण गुंबद (Exfoliation domes) व टॉर (Tors) निर्मित होते हैं।

निष्कर्ष: अतः अपक्षय केवल चट्टानों के विनाश की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह स्थलमंडल, वायुमंडल और जीवमंडल के मध्य खनिज चक्रण, मृदा सृजन और औद्योगिक संसाधन निर्माण का सेतु है।

भूमिका: प्रायद्वीपीय भारत के दोनों ओर विस्तृत पश्चिमी और पूर्वी तटीय मैदान अपनी भूगर्भिक उत्पत्ति (निमज्जन बनाम उन्मज्जन), ढाल प्रवणता और नदी-तरंग क्रियाओं के अंतर के कारण दो विपरीत तटीय स्थलाकृतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

मुख्य भाग:
1. निमज्जन बनाम उन्मज्जन (Submergence vs Emergence): पश्चिमी तटीय मैदान (विशेषकर कोंकण व कर्नाटक तट) जलमग्न शैलमय तट (Submerged Rocky Coast) का उदाहरण है (केवल मालाबार तट में उन्मज्जन के प्रमाण हैं); इसलिए यह संकरा (10–65 किमी) है और यहाँ समुद्री भृगु (Cliffs), तरंग-घर्षित वेदी व खाड़ियाँ प्रमुख हैं। इसके विपरीत पूर्वी तटीय मैदान (उत्कल व कोरोमंडल) उन्मज्जित अवसादी तट (Emerged Sedimentary Coast) है जो काफी चौड़ा (80–120 किमी) है।
2. ज्वारनदमुख (Estuaries) बनाम विशाल डेल्टा (Deltas): पश्चिमी घाट से अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ (नर्मदा, ताप्ती, मांडवी, जुआरी, शरावती) छोटी, तीव्रगामी हैं और कठोर चट्टानों से बहने के कारण कम अवसाद लाती हैं, जिससे वे डेल्टा के स्थान पर ज्वारनदमुख (Estuaries) बनाती हैं। वहीं बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली लंबी नदियाँ (महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी) मंद ढाल पर भारी जलोढ़ निक्षेप से विस्तृत चापाकार डेल्टा बनाती हैं।
3. पत्तन विकास एवं लैगून: दंतुरित व गहरा होने से पश्चिमी तट पर प्राकृतिक बंदरगाहों (मुंबई, मर्मगाओ, कोच्चि, कारवार) के लिए आदर्श दशाएँ हैं तथा केरल में पश्चजल (Backwaters / कयाल — वेम्बनाड, अष्टमुडी) मिलते हैं। पूर्वी तट पर चौड़े महाद्वीपीय मग्नतट और अपतट बालू रोधिकाओं (Spits/Bars) के कारण चिल्का, पुलिकट व कोल्लेरू जैसे विशाल लैगून तथा विस्तृत पुलीन (मरीना बीच) बने हैं, पर प्राकृतिक बंदरगाह कम हैं।

निष्कर्ष: दोनों तटीय मैदानों का यह भू-आकृतिक अंतर भारत की पत्तन अर्थव्यवस्था, डेल्टाई धान कृषि और तटीय पारिस्थितिकी को सीधे तौर पर निर्धारित करता है।

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UPSC Prelims — Chapter 7 PYQ + Practice MCQ Bank

अध्याय 7 से जुड़े वास्तविक PYQ और उच्च-स्तरीय कथन-आधारित प्रश्न — विकल्प, सही उत्तर और विस्तृत व्याख्या सहित

प्रश्न:
1. अपक्षय (Weathering) एक स्व-स्थाने (In-situ) प्रक्रिया है जिसमें चट्टानी मलबे का कोई महत्वपूर्ण क्षैतिज परिवहन नहीं होता।
2. बृहद क्षरण (Mass Movement) को अपरदन (Erosion) की श्रेणी में रखा जाता है क्योंकि इसमें प्रवाहित जल, हिमानी और पवन प्रत्यक्ष रूप से मलबे का परिवहन करते हैं।
3. अपरदन और परिवहन के लिए गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) मुख्य प्रेरक बल है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
विकल्प: (A) केवल एक  |  (B) केवल दो (1 और 3)  |  (C) सभी तीन  |  (D) कोई नहीं
सही उत्तर: (B) केवल दो (कथन 1 और 3 सही हैं)
व्याख्या: NCERT (अध्याय 6) के अनुसार कथन 2 गलत है: बृहद क्षरण केवल गुरुत्वाकर्षण (Gravity) से संचालित होता है और इसमें जल, पवन या हिमानी सीधे मलबे को नहीं ढोते, इसलिए इसे अपरदन के अंतर्गत नहीं रखा जाता।

प्रश्न: निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
1. ड्रमलिन (Drumlin) — हिमनद द्वारा निर्मित अपरदनात्मक स्थलरूप
2. एस्कर (Esker) — पिघलते हिमजल की धाराओं द्वारा निर्मित स्तरीकृत निक्षेपणात्मक कटक
3. यारडंग (Yardang) — पवन अपघर्षण द्वारा निर्मित अपरदनात्मक स्थलरूप
4. लैपीज (Lapies) — भूमिगत जल द्वारा निर्मित निक्षेपणात्मक स्थलरूप
उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
विकल्प: (A) केवल एक  |  (B) केवल दो (2 और 3)  |  (C) केवल तीन  |  (D) सभी चार
सही उत्तर: (B) केवल दो (युग्म 2 और 3 सही हैं)
व्याख्या: युग्म 1 गलत है क्योंकि ड्रमलिन हिमनद का निक्षेपणात्मक (Depositional) स्थलरूप है (गोलाश्म मृत्तिका से बनी उल्टी नाव जैसी आकृति)। युग्म 4 गलत है क्योंकि लैपीज चूना पत्थर की सतह पर घोलन क्रिया से बना अपरदनात्मक (Erosional) स्थलरूप है।

प्रश्न:
1. बरखान (Barchan) अर्धचंद्राकार टिब्बे हैं जिनके दोनों सींग (Horns) पवन के बहने की दिशा में (Downwind) इंगित करते हैं।
2. परवलयिक टिब्बे (Parabolic Dunes) आंशिक रूप से वनस्पति-युक्त रेतीले क्षेत्रों में बनते हैं और इनके सींग पवन की आने वाली दिशा (Upwind) की ओर होते हैं।
3. सीफ (Seif) टिब्बा बरखान के समान ही होता है किंतु पवन की दिशा में बदलाव के कारण इसमें केवल एक ही पंख या भुजा विकसित होती है।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
विकल्प: (A) केवल 1 और 2  |  (B) केवल 2 और 3  |  (C) केवल 1 और 3  |  (D) 1, 2 और 3
सही उत्तर: (D) 1, 2 और 3 (तीनों कथन पूर्णतः सत्य हैं)
व्याख्या: NCERT के अनुसार बरखान के सींग पवन की दिशा में (Downwind) होते हैं, जबकि परवलयिक टिब्बों के सींग वनस्पति से जकड़े रहने के कारण पवन की विपरीत दिशा (Upwind) में रहते हैं। सीफ में केवल एक ही लंबी भुजा होती है।

प्रश्न: चूना पत्थर (Karst) क्षेत्रों में घोलन क्रिया से बनने वाले सतही गर्तों का छोटे से बड़े आकार में सही विकास क्रम कौन-सा है?
विकल्प:
(A) डोलाइन → घोल रंध्र (Sinkhole) → पोलजे → युवाला
(B) घोल रंध्र (Sinkhole) → डोलाइन (Doline) → युवाला (Uvala) → पोलजे (Polje)
(C) घोल रंध्र → युवाला → डोलाइन → पोलजे
(D) लैपीज → पोलजे → युवाला → डोलाइन
सही उत्तर: (B) घोल रंध्र (Sinkhole) → डोलाइन (Doline) → युवाला (Uvala) → पोलजे (Polje)
व्याख्या: सबसे छोटे कीपाकार छिद्र घोल रंध्र (Sinkhole) हैं; उनके मिलने से डोलाइन, कई डोलाइनों के मिलने से घाटी रंध्र या युवाला, और अंततः भ्रंशन व विलय से विशाल समतल तली वाला पोलजे (Polje) बनता है (सूत्र: S → D → U → P)।

प्रश्न: कठोर चट्टानों में गहरे 'अधःकर्तित विसर्प (Incised Meanders)' तथा 'युग्मित नदी वेदिकाओं (Paired River Terraces)' की उपस्थिति मुख्य रूप से किस भू-आकृतिक घटना का संकेत देती है?
विकल्प:
(A) समुद्र तल में निरंतर वृद्धि (Rise in Sea Level)
(B) नदी द्वारा अवसाद भार में अत्यधिक वृद्धि और डेल्टा निर्माण
(C) भू-भाग का विवर्तनिक उत्थान (Tectonic Upliftment) एवं नदी नवोन्मेष (Rejuvenation)
(D) हिमानीकृत घाटी का मरुस्थलीकरण
सही उत्तर: (C) भू-भाग का विवर्तनिक उत्थान (Tectonic Upliftment) एवं नदी नवोन्मेष (Rejuvenation)
व्याख्या: जब किसी प्रौढ़ विसर्पी नदी के बेसिन का विवर्तनिक उत्थान होता है या समुद्र तल गिरता है, तो नदी की लंबवत अपरदन क्षमता पुनः बढ़ जाती है (Rejuvenation), जिससे वह अपने विसर्पों को कठोर चट्टान में गहरा काट देती है और पुराने बाढ़ मैदान सीढ़ीदार नदी वेदिकाओं में बदल जाते हैं।

प्रश्न: तटीय स्थलाकृतियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. टॉम्बोलो (Tombolo) एक निक्षेपणात्मक बालू रोधिका (Sand bar) है जो किसी अपतटीय द्वीप को मुख्य भूमि से जोड़ती है।
2. समुद्री मेहराब (Sea Arch) की छत के ढह जाने के बाद समुद्र में अकेले खड़े रह गए चट्टानी स्तंभ को स्टैक (Sea Stack) कहते हैं।
3. भारत का पूर्वी तट मुख्यतः जलमग्न शैलमय तट (Submerged Rocky Coast) का उदाहरण है।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
विकल्प: (A) केवल 1 और 2  |  (B) केवल 2 और 3  |  (C) केवल 1 और 3  |  (D) 1, 2 और 3
सही उत्तर: (A) केवल 1 और 2
व्याख्या: कथन 1 और 2 सही हैं। कथन 3 गलत है क्योंकि भारत का पूर्वी तट उन्मज्जित अवसादी तट (Emerged Low Sedimentary Coast) है जहाँ डेल्टा, पुलीन और लैगून प्रधान हैं; जबकि पश्चिमी तट (कोंकण/कर्नाटक) जलमग्न शैलमय तट का उदाहरण है।

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इस अध्याय को पढ़ने के बाद नीचे दिए गए 4 प्रश्नों के विकल्पों पर क्लिक कर अपनी समझ तुरंत जाँचें:

प्रश्न 1. 'स्टैलेक्टाइट (Stalactite)' और 'स्टैलेग्माइट (Stalagmite)' के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. स्टैलेक्टाइट चूना पत्थर की गुफाओं की छत से नीचे की ओर लटकते हुए कैल्शियम कार्बोनेट के निक्षेप हैं। 2. ये दोनों भूमिगत जल की अपरदनात्मक (Erosional) स्थलाकृतियाँ हैं। उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
📖 व्याख्या: सही उत्तर (a) केवल 1 है। स्टैलेक्टाइट (Stalactite = Ceiling) छत से नीचे लटकते हैं और स्टैलेग्माइट (Stalagmite = Ground) फर्श से ऊपर उठते हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि ये दोनों भूमिगत जल के निक्षेपणात्मक (Depositional) स्थलरूप हैं, अपरदनात्मक नहीं।
प्रश्न 2. निम्नलिखित में से किस स्थलाकृति समूह को 'अंडे की टोकरी की स्थलाकृति (Basket of Eggs Topography)' कहा जाता है?
📖 व्याख्या: सही उत्तर (c) है। हिमनद द्वारा गोलाश्म मृत्तिका (Glacial Till) के निक्षेपण से बने उल्टी नाव या कटे हुए अंडे जैसे टीलों को ड्रमलिन (Drumlin) कहते हैं। जब ये एक मैदान में सैकड़ों की संख्या में एक साथ पाए जाते हैं, तो इन्हें 'अंडे की टोकरी की स्थलाकृति' कहा जाता है।
प्रश्न 3. मरुस्थलीय भू-आकृतियों में 'पेडिमेंट (Pediment)', 'बजादा (Bajada)' और 'प्लाया (Playa)' का पर्वत के अग्रभाग से बेसिन के केंद्र की ओर सही क्रम कौन-सा है?
📖 व्याख्या: सही उत्तर (b) पेडिमेंट → बजादा → प्लाया है। पर्वत के ठीक पाद (Foot) पर मंद ढाल वाली अपरदित चट्टानी सतह पेडिमेंट होती है, उसके आगे जलोढ़ पंखों के मिलने से बना निक्षेपण मैदान बजादा होता है, और अंतःपर्वतीय बेसिन (Bolson) के सबसे निचले केंद्र में उथली लवणीय झील प्लाया (Playa) होती है।
प्रश्न 4. निम्नलिखित में से कौन-सी एक स्थलाकृति 'अपरदनात्मक (Erosional)' प्रक्रिया से निर्मित नहीं है?
📖 व्याख्या: सही उत्तर (d) लोएस (Loess) है। छत्रक शैल (पवन), हॉर्न व अरेत (हिमानी) तथा तरंग-घर्षित वेदी (सागरीय तरंग) तीनों अपरदनात्मक स्थलरूप हैं; जबकि लोएस (Loess) पवन द्वारा उड़ाकर लाई गई बारीक गाद (Silt) के जमाव से निर्मित एक निक्षेपणात्मक (Depositional) मैदान है।
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