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GS Paper-I • भौतिक भूगोल अध्याय 05 / 07 • Argon Complete Edition Prelims + 4 Mains Model Answers + 12 Mapping + Solved MCQs

5. भूकंप और सुनामी

Earthquakes & Tsunami — Complete Argon Edition
🌍 भूकंप: Focus, Epicenter, Waves, Magnitude 📉 Seismology: Wadati-Benioff + Shadow Zones 🌊 सुनामी: Shoaling Effect + ITEWS 🗺️ मानचित्रण: भारत + विश्व के 12 प्रमुख स्थल

🧭 Complete Argon Source

इस पेज में दिए गए Chapter 5 HTML source को संक्षिप्त किए बिना रखा गया है। इसमें तीनों मूल visuals—भूकंप उत्पत्ति/Wadati-Benioff diagram, सुनामी Shoaling Effect visual और भारत का seismic zoning/fault map—सहित विस्तृत tables, mapping, Mains answers और solved Prelims MCQs शामिल हैं।

1. भूकंप की परिभाषा, मूल यांत्रिकी (प्रत्यास्थ प्रतिक्षेप सिद्धांत), अवकेंद्र बनाम अधिकेंद्र, और भूकंपीय तरंगें

भूकंप (Earthquake): पृथ्वी के स्थलमंडल (Lithosphere) के भीतर अचानक होने वाले विवर्तनिक प्रतिबल (Tectonic Stress) के विमोचन से उत्पन्न कंपन या दोलन को भूकंप कहते हैं। जब भूपर्पटी की शैलों में संचित ऊर्जा अचानक मुक्त होती है, तो यह सभी दिशाओं में भूकंपीय तरंगों (Seismic Waves) के रूप में संचरित होती है।

🔬 प्रत्यास्थ प्रतिक्षेप सिद्धांत (Elastic Rebound Theory — H.F. Reid, 1906):

1906 के सैन फ्रांसिस्को भूकंप के अध्ययन के बाद अमेरिकी भूवैज्ञानिक हैरी फील्डिंग रीड (H.F. Reid) ने प्रतिपादित किया कि चट्टानें प्रत्यास्थ (Elastic / रबर जैसी) होती हैं। विवर्तनिक बलों के कारण भ्रंश रेखा (Fault Line) के दोनों ओर चट्टानों में खिंचाव या दबाव से प्रतिबल (Stress) संचित होता रहता है। चट्टानें एक निश्चित सीमा (Elastic Limit) तक मुड़ती हैं, किंतु जब प्रतिबल उनकी घर्षण व संसंजक शक्ति (Frictional Strength) से अधिक हो जाता है, तो चट्टानें अचानक टूट जाती हैं (Brittle Failure) और झटके से अपनी मूल असंपीड़ित स्थिति में वापस लौटती हैं। इसी क्षण संचित स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy) गतिज भूकंपीय ऊर्जा में रूपांतरित होकर चारों ओर विस्फोटित होती है।

उद्गम केंद्र / अवकेंद्र (Focus / Hypocenter)

भूगर्भ के भीतर वह वास्तविक बिंदु जहाँ विवर्तनिक भ्रंशन प्रारंभ होता है और जहाँ से भूकंपीय ऊर्जा सर्वप्रथम मुक्त होती है। अधिकांश विनाशकारी भूकंपों का अवकेंद्र 0 से 70 किमी (उथली गहराई) पर स्थित होता है।

अधिकेंद्र (Epicenter)

अवकेंद्र के ठीक लंबवत (Vertically 90° Above) धरातल का वह बिंदु जो अवकेंद्र के निकटतम होता है और जहाँ भूकंपीय तरंगें सबसे पहले पहुँचती हैं। सामान्यतः भूकंप का सर्वाधिक तीव्र झटका और प्रारंभिक विनाश अधिकेंद्र पर ही दर्ज किया जाता है।

🌊 भूकंपीय तरंगों की यांत्रिकी और कंपन दिशा (UPSC Prelims Core Comparison):

तरंग प्रकार तरंग प्रकृति व ध्वनि/प्रकाश समरूपता कणों के कंपन की दिशा (Particle Motion) गमन माध्यम व औसत वेग
प्राथमिक तरंगें (P-Waves / Primary) अनुदैर्ध्य / संपीडन तरंगें (ध्वनि तरंगों के समान) तरंग संचरण की दिशा के समानांतर (आगे-पीछे / Push-Pull) ठोस, द्रव और गैस (तीनों में); वेग सर्वाधिक: 6–13 km/s
द्वितीयक तरंगें (S-Waves / Secondary) अनुप्रस्थ / अपरूपण तरंगें (प्रकाश तरंगों के समान) तरंग संचरण की दिशा के लंबवत (ऊपर-नीचे / Side-to-side) केवल ठोस माध्यम (Only Solids); बाह्य क्रोड में लुप्त; वेग: 3.5–7 km/s
धरातलीय तरंगें (L & R: Love & Rayleigh) जटिल धरातलीय विक्षोभ (दीर्घ तरंगें / Surface Waves) Love: क्षैतिज आड़े-तिरछे; Rayleigh: दीर्घवृत्ताकार रोलिंग (Rolling motion) केवल धरातलीय चट्टानों के साथ; वेग सबसे कम (~3 km/s) किंतु सर्वाधिक आयाम व विनाशकारी

2. भूकंपों का व्यापक वर्गीकरण: गहराई के आधार पर तथा उत्पत्ति कारणों के आधार पर (Induced Seismicity Special)

A. अवकेंद्र की गहराई के आधार पर (Focal Depth):

  • 1. उथले भूकंप (Shallow Focus Earthquakes: 0 से 70 km): कुल वैश्विक भूकंपीय ऊर्जा का 80% से 85% भाग केवल उथले भूकंपों से निकलता है। सतह के सर्वाधिक करीब होने के कारण ये सर्वाधिक संहारक व विनाशकारी होते हैं (उदा. कच्छ 2001, लातूर 1993, नेपाल 2015)।
  • 2. मध्यम भूकंप (Intermediate Focus Earthquakes: 70 से 300 km): सबडक्शन क्षेत्रों और रूपांतरित सीमाओं पर उत्पन्न (~12% वैश्विक ऊर्जा)।
  • 3. गहरे / पातालीय भूकंप (Deep Focus / Plutonic: 300 से 700 km): केवल अभिसारी प्लेट किनारों (Wadati-Benioff Zone) पर पाए जाते हैं। 700 km से अधिक गहराई पर मेंटल चट्टानें अत्यधिक प्लास्टिक/लचीली हो जाती हैं, अतः भंगुर विखंडन न होने से 700 km से नीचे भूकंप दर्ज नहीं होते।

B. उत्पत्ति के कारणों के आधार पर (Genetic Classification):

  1. विवर्तनिक भूकंप (Tectonic Earthquakes): प्लेटों की पारस्परिक गति, भ्रंशों के खिसकने से उत्पन्न (विश्व के >90% भूकंप इसी श्रेणी में आते हैं)।
  2. ज्वालामुखीय भूकंप (Volcanic Earthquakes): मैग्मा के विस्फोट व निकास नली में दबाव परिवर्तन से उत्पन्न स्थानीय झटके (उदा. क्राकाटोआ, एटना)।
  3. निपाती भूकंप (Collapse Earthquakes): अत्यधिक भूमिगत खनन (Mining) या कार्स्ट चूना पत्थर की गुफाओं की छत ढहने से उत्पन्न सूक्ष्म झटके।
  4. विस्फोटक भूकंप (Explosion Earthquakes): परमाणु परीक्षणों (उदा. पोखरण 1998) या भारी रासायनिक डायनामाइट विस्फोटों से उत्पन्न।
  5. जलाशय-प्रेरित भूकंपीयता (Reservoir-Induced Seismicity - RIS): मानव निर्मित विशाल जलाशयों के जलभार और छिद्र जलदाब से उत्पन्न (उदा. कोयना 1967)।

💡 जलाशय-प्रेरित भूकंपीयता (RIS) और 1967 का कोयना भूकंप (Koyna Earthquake Case Study)

यांत्रिकी: जब किसी नदी पर विशाल बांध बनाकर भारी मात्रा में जल एकत्र किया जाता है (जैसे महाराष्ट्र की कोयना नदी पर शिवाजी सागर जलाशय), तो दो भौतिक परिवर्तन होते हैं: (1) स्थैतिक जलभार (Hydrostatic Load): करोड़ों टन जल का प्रत्यक्ष भार नीचे की चट्टानों पर लिथोस्टैटिक दबाव बढ़ाता है; (2) छिद्र जलदाब (Pore Water Pressure): जल रिसकर नीचे गहराई पर मौजूद प्राचीन सुप्त भ्रंशों (Fault Zones) में प्रवेश करता है। उच्च जलदाब भ्रंश तलों पर प्रभावी अभिलंब प्रतिबल (Effective Normal Stress) को घटा देता है और चट्टानों के बीच घर्षण गुणांक कम कर देता है। परिणामस्वरूप भ्रंश तल अचानक फिसल जाते हैं।

11 दिसंबर 1967 को कोयना में आया 6.3 Mw परिमाण का भूकंप विश्व में जलाशय-प्रेरित भूकंपीयता का सबसे प्रामाणिक और विनाशकारी उदाहरण माना जाता है, जिसने प्रायद्वीपीय भारत की 'स्थिर शील्ड' धारणा को चुनौती दी थी।

3. वादाती-बेनिऑफ मंडल (Wadati-Benioff Zone) और सबडक्शन भूकंपीयता (Subduction Seismology)

जापानी भूकंपविद् कियो वादाती (Kiyoo Wadati - 1928) और अमेरिकी भूभौतिकीविद् ह्यूगो बेनिऑफ (Hugo Benioff - 1949) ने स्वतंत्र रूप से खोज की कि अभिसारी प्लेट सीमाओं पर स्थित भूकंपीय अवकेंद्र एक यादृच्छिक रूप से नहीं, बल्कि सबडक्टिंग महासागरीय प्लेट के ऊपरी ढाल पर झुकी हुई समतल पट्टी (Inclined Planar Zone) के सहारे संकेंद्रित रहते हैं। इसे ही वादाती-बेनिऑफ मंडल कहते हैं।

भूकंप उत्पत्ति यांत्रिकी और वादाती-बेनिऑफ मंडल (Earthquake Genesis, Fault Rupture & Wadati-Benioff Zone)
चित्र 5.1: (A) भूकंप की मूल यांत्रिकी — अवकेंद्र (Focus/Hypocenter), 90° लंबवत अधिकेंद्र (Epicenter), भ्रंश संचलन व P, S तथा धरातलीय L/R तरंगों का प्रसार; (B) सबडक्शन सीमा पर वादाती-बेनिऑफ मंडल (Wadati-Benioff Zone) के सहारे उथले (<70 km), मध्यम (70–300 km) और पातालीय (300–700 km) भूकंपों का सुस्पष्ट वितरण।

वादाती-बेनिऑफ मंडल के मुख्य वैज्ञानिक लक्षण:

  • झुकाव कोण (Dip Angle): यह सामान्यतः 30° से 60° (औसतन ~45°) के कोण पर महासागरीय गर्त (Trench) से प्रारंभ होकर महाद्वीप या द्वीप चाप के नीचे 700 km की गहराई तक जाता है। पुरानी और भारी महासागरीय क्रस्ट (उदा. मारियाना) अधिक तीव्र ढाल (लगभग 90°) पर डूबती है, जबकि युवा व हल्की क्रस्ट (उदा. चिली/पेरू) मंद ढाल (~30°) पर धँसती है।
  • प्लेट विवर्तनिकी का प्रत्यक्ष प्रमाण: वादाती-बेनिऑफ मंडल इस बात का निर्विवाद भूभौतिकीय प्रमाण है कि कठोर शीतल स्थलमंडलीय प्लेट वास्तव में गर्म दुर्बलता मंडल में गहराई तक प्रवेश कर रही है।
  • भूकंपों का गहराई अनुक्रम: गर्त के निकट केवल उथले भूकंप आते हैं, तट के निकट मध्यम गहराई के भूकंप, और ज्वालामुखीय पर्वतमाला के पीछे (Back-arc) केवल गहरे पातालीय भूकंप दर्ज होते हैं।

📐 UPSC Mains जीएस-1 उत्तर-लेखन रफ आरेख (Schematic Sketch 5.1): वादाती-बेनिऑफ मंडल व अवकेंद्र/अधिकेंद्र

                       [ अधिकेंद्र / Epicenter (सतह पर 90° लंबवत) ]
                       ▲
                       │
       धरातल / सतह     │     महासागरीय गर्त (Trench)
 ──────────────────────┼─────────────────▼─────────────────────
  महाद्वीपीय क्रस्ट    │               /  \       महासागरीय क्रस्ट (3.0 g/cm³)
 (2.7 g/cm³, ग्रेनाइट) │              /    \◄────────────────────────────
 ══════════════════════╪═════════════/      \═══════════════════╗
                       │ उथले भूकंप /        \ सबडक्शन स्लैब   ║
               [अवकेंद्र / Focus]  /          \ (धँसती प्लेट)    ║
               (0-70 km) •       /            \                ▼
                                /              \  वादाती-बेनिऑफ मंडल
                  मध्यम भूकंप  /                \ (Wadati-Benioff Zone)
                 (70-300 km)  •                  \ 
                                                                        पातालीय / गहरे भूकंप                              (300-700 km गहराई)  •                                                              \ 700 km (अधिकतम गहराई)
              

💡 मेंस टिप: सबडक्शन ज़ोन में 45° झुके बेनिऑफ ज़ोन और 0-700 km गहराई पर भूकंपों के अनुक्रम को यह आरेख 1 मिनट में स्पष्ट करता है।

4. भूकंप मापन प्रणालियाँ: रिक्टर परिमाण (Magnitude) बनाम मरकेली तीव्रता (Intensity) एवं ऊर्जा संबंध

भूकंप मापन में परीक्षार्थियों द्वारा सबसे आम भूल 'परिमाण' (Magnitude) और 'तीव्रता' (Intensity) को एक ही मान लेना है। वास्तव में ये दोनों भूकंप के बिल्कुल भिन्न पक्षों को मापते हैं:

मापदंड रिक्टर पैमाना (Richter / Moment Magnitude) संशोधित मरकेली पैमाना (Modified Mercalli Scale)
क्या मापता है? परिमाण (Magnitude): अवकेंद्र पर मुक्त होने वाली कुल ऊर्जा की मात्रा। तीव्रता (Intensity): धरातल पर अनुभव किए गए झटके और प्रत्यक्ष संरचनात्मक क्षति।
पैमाने की प्रकृति खुला लघुगणकीय पैमाना (Logarithmic Scale): 0 से सैद्धांतिक रूप से अनंत (व्यावहारिक रूप से 1–10)। बंद गुणात्मक पैमाना (Qualitative Scale): रोमन अंकों में I से XII (1 से 12)।
स्थान परिवर्तन के साथ मान स्थिर रहता है: एक भूकंप का पूरे विश्व में केवल एक ही रिक्टर परिमाण होता है। बदलता रहता है: अधिकेंद्र पर सर्वाधिक (उदा. X), दूर जाने पर घटता जाता है (उदा. VI, IV, II)।
मापन का उपकरण/साधन सीस्मोग्राफ (Seismograph): तरंगों के वास्तविक आयाम और भ्रंश क्षेत्र के क्षेत्रफल का गणितीय परिकलन। प्रत्यक्षदर्शी सर्वेक्षण (Visual Damage): भवनों का गिरना, दरारें पड़ना, व्यक्तियों द्वारा झटके की अनुभूति।
संबंधित मानचित्र रेखाएँ ऊर्जा समतुल्य रेखाएँ / सीस्मिक मोमेंट समभूकंपीय रेखाएँ (Isoseismal Lines): समान क्षति/तीव्रता वाले बिंदुओं को जोड़ने वाले बंद वक्र।

⚡ रिक्टर पैमाने पर ऊर्जा वृद्धि का गणितीय नियम (Gutenberg-Richter Relation):

भूकंप से विमुक्त ऊर्जा ($E$ अर्ग में) और रिक्टर परिमाण ($M$) के बीच संबंध निम्नलिखित समीकरण से व्यक्त होता है:

$\log_{10} E = 4.8 + 1.5 \cdot M \quad \Longrightarrow \quad rac{E_{M+1}}{E_M} = 10^{1.5} pprox 31.62 pprox 32 ext{ गुना}$
  • रिक्टर पैमाने पर परिमाण में 1 अंक की वृद्धि होने पर सीस्मोग्राफ पर तरंगों का आयाम (Amplitude) 10 गुना बढ़ जाता है।
  • किंतु अवकेंद्र से मुक्त होने वाली वास्तविक ऊर्जा लगभग 31.6 गुना (लगभग 32 गुना) बढ़ जाती है!
  • परिमाण में 2 अंक की वृद्धि (उदा. 5 से 7 Mw) होने पर ऊर्जा $31.6 imes 31.6 pprox \mathbf{1,000 ext{ गुना}}$ बढ़ जाती है!

5. भूकंपीय आपदा प्रभाव: मृदा द्रवीकरण (Soil Liquefaction), भूस्खलन, आग और NDMA आपदा न्यूनीकरण

विशिष्ट भूगर्भिक परिघटना

मृदा द्रवीकरण (Soil Liquefaction)

परिभाषा: जब संतृप्त, असंगठित रेतीली या गादयुक्त मृदा (Saturated Loose Sand/Silt) तीव्र भूकंपीय झटकों के संपर्क में आती है, तो कणों के बीच का छिद्र जलदाब (Pore Water Pressure) अत्यधिक बढ़ जाता है। इससे कणों का परस्पर संपर्क समाप्त हो जाता है और ठोस भूमि क्षण भर में तरल दलदल या त्वरित बालू (Quicksand) की तरह व्यवहार करने लगती है।

विनाशकारी प्रभाव: बहुमंजिला भवन बिना किसी संरचनात्मक टूट-फूट के सीधे जमीन में धँस जाते हैं या झुक जाते हैं (उदा. निगाता जापान 1964), भूमिगत पाइपलाइनें व सीवर टैंक तैरकर सतह पर आ जाते हैं, और रेत के फव्वारे (Sand Boils) फूट पड़ते हैं। गंगा के मैदान, डेल्टाई क्षेत्रों और तटीय बालू पर निर्मित बस्तियों में द्रवीकरण का अत्यधिक जोखिम है।

द्वितीयक संहारक प्रभाव

भूकंप जनित द्वितीयक संकट (Secondary Hazards)

  • पर्वतीय भूस्खलन और हिमस्खलन (Landslides & Avalanches): 2015 के नेपाल भूकंप ने लांगतांग घाटी में भारी हिमस्खलन पैदा किया। पर्वतीय सड़कों का अवरुद्ध होना बचाव कार्य में सबसे बड़ी बाधा बनता है।
  • आग (Conflagration): गैस पाइपलाइनों और बिजली के तारों के टूटने से शहरों में भीषण आग लग जाती है (1906 के सैन फ्रांसिस्को और 1923 के टोक्यो भूकंप में 80% मृत्यु आग से हुई थी)।
  • नदियों का मार्ग अवरुद्ध होना व बाढ़ (Landslide Dams): 1950 के असम भूकंप में सुबनसिरी नदी पर मलबे का बांध बन गया था, जिसके 8 दिन बाद टूटने से प्रलयंकारी बाढ़ आई।

🛡️ NDMA दिशा-निर्देश एवं भूकंप न्यूनीकरण (Disaster Mitigation Framework)

"भूकंप स्वयं लोगों को नहीं मारता, बल्कि असुरक्षित भवन मारते हैं।" राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के 6-स्तंभीय दृष्टिकोण:

1. सीस्मिक रेट्रोफिटिंग: प्राचीन व असुरक्षित भवनों में बेस-आइसोलेटर और शीयर वॉल लगाकर भूकंपरोधी बनाना।
2. भवन निर्माण संहिता (BIS Codes): नए निर्माणों में IS 1893 और IS 13920 (भूकंपरोधी डिजाइन) का कड़ाई से पालन।
3. माइक्रोज़ोनेशन (Microzonation): महानगरों (दिल्ली, मुंबई) का मृदा प्रकार व द्रवीकरण भेद्यता के आधार पर 1:10,000 पैमाने पर मानचित्रण।

6. सुनामी की उत्पत्ति और भौतिक यांत्रिकी (Tsunami Genesis & Shoaling Effect Mechanism)

सुनामी (Tsunami) जापानी भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ 'हार्बर वेव' (बंदरगाह की लहर) है। यह सामान्य पवन-जनित समुद्री लहरों (Wind waves) से पूर्णतः भिन्न होती है। सामान्य समुद्री लहरें केवल समुद्र के ऊपरी 10-20 मीटर जल को प्रभावित करती हैं, जबकि सुनामी संपूर्ण जल-स्तंभ (Entire Water Column — सतह से लेकर 4,000 मीटर गहराई तक) का सामूहिक संचलन होती है।

सुनामी उत्पत्ति यांत्रिकी और उथलापन प्रभाव (Tsunami Genesis & Shoaling Effect Mechanism)
चित्र 5.2: सुनामी की उत्पत्ति और उथलापन प्रभाव (Shoaling Effect) — समुद्र अधस्तल पर मेगाथ्रस्ट सबडक्शन भ्रंश से जल-स्तंभ का उत्थान, गहरे महासागर में उच्च वेग ($v pprox 800$ km/h) व निम्न आयाम ($A pprox 0.5$ m), तथा तट के निकट गहराई घटने से गति का ह्रास और ऊर्जा संरक्षण के कारण 15–30 मीटर ऊँची संहारक जल-दीवार का निर्माण।

🌊 उथलापन प्रभाव (Shoaling Effect) की भौतिकी — सूत्र एवं यांत्रिकी

सुनामी उथले जल की दीर्घ तरंग (Shallow-water gravity wave) के समीकरण का पालन करती है: $v = \sqrt{g \cdot d}$ (जहाँ $g$ गुरुत्वीय त्वरण तथा $d$ महासागर की गहराई है)।

  • गहरे महासागर में ($d pprox 4,000$ m): गति $v = \sqrt{9.8 imes 4000} pprox 200 ext{ m/s} pprox \mathbf{720 ext{ से }900 ext{ km/h}}$ (वाणिज्यिक जेट विमान की गति)। तरंगदैर्ध्य ($\lambda$) 150 से 300 किमी लंबा होता है, जबकि तरंग की ऊँचाई ($A$) मात्र 0.5 से 1 मीटर होती है। अतएव गहरे समुद्र में पोतों को सुनामी के गुजरने का आभास तक नहीं होता।
  • तटीय उथलेपन पर ($d pprox 10$ m): जैसे ही सुनामी महाद्वीपीय मग्नतट पर पहुँचती है, गहराई $d$ घटने से गति गिरकर 40 से 50 km/h रह जाती है। तरंगदैर्ध्य संकुचित होकर 5-10 किमी रह जाता है।
  • ऊर्जा फ्लक्स संरक्षण (Green's Law): चूँकि तरंग की कुल ऊर्जा स्थिर रहती है ($E \propto A^2 \cdot v$), अतः गति घटने पर ऊर्जा को संरक्षित रखने के लिए तरंग का आयाम $A$ तेजी से बढ़ता है ($A \propto d^{-1/4}$)। परिणामतः समुद्र का जल 15 से 30 मीटर ऊँची दीवार बनकर तटों पर प्रलय ढा देता है।
  • जल का पश्चापसरण (Drawback): यदि सुनामी का गर्त (Trough) तट पर पहले पहुँचता है, तो तटरेखा से समुद्र का जल अचानक सैकड़ों मीटर पीछे हट जाता है और मछलियाँ व समुद्री तल अनावृत हो जाते हैं। यह आगामी सुनामी दीवार की अंतिम प्राकृतिक चेतावनी होती है।

📐 UPSC Mains जीएस-1 उत्तर-लेखन रफ आरेख (Schematic Sketch 5.2): सुनामी की उत्पत्ति और तटीय उथलापन प्रभाव (Shoaling Effect)

           [ गहरे महासागर में सुनामी ]                    [ उथले तट के निकट (Shoaling Effect) ]
           गहराई (d) = 4,000 m                         गहराई (d) = 10 m
           तरंग गति (v) = 700-900 km/h                 तरंग गति (v) = 40-50 km/h (घटती है)
           तरंगदैर्ध्य (λ) = 200-500 km (विशाल)        तरंगदैर्ध्य (λ) = <10 km (संकुचित)
           तरंग ऊँचाई (H) = मात्र 0.5-1.0 m            तरंग ऊँचाई (H) = 15-30 m (जल-दीवार!)
               ____                                                  _/\_
  समुद्र तल   /    \___________________                         ____/    \____ तटीय भूमि
 ────────────/─────────────────────────\───────────────────────/──────────────\───────
                                        \                     /
                                         \                   / तली का घर्षण (Friction)
                                          \                 /  जल संपीडन व ऊँचाई वृद्धि
                                           \_______________/
  समुद्र अधस्तल (Ocean Floor)               
 ═══════════════════════════════════════════
        ▲ मेगाथ्रस्ट भ्रंश (भूकंपीय ऊर्ध्वाधर विस्थापन)
              

💡 मेंस टिप: v = √(g·d) सूत्र और गहरे समुद्र से उथले तट तक तरंगदैर्ध्य के संकुचन एवं आयाम की 30 गुना वृद्धि को प्रदर्शित करें।

7. 26 दिसंबर 2004 की हिंद महासागरीय सुनामी (Boxing Day Tsunami) और भारतीय सुनामी पूर्व चेतावनी प्रणाली (ITEWS - INCOIS)

2004 हिंद महासागरीय सुनामी (Boxing Day Tragedy): 26 दिसंबर 2004 को इंडोनेशिया के उत्तरी सुमात्रा तट के निकट हिंद महासागर में 9.1 से 9.3 Mw परिमाण का मेगाथ्रस्ट सबडक्शन भूकंप आया। इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट के बर्मा माइक्रोप्लेट के नीचे सबडक्शन ज़ोन में लगभग 1,300 किमी लंबी भ्रंश रेखा पर समुद्र तल 10 से 15 मीटर ऊपर उठ गया था।

भारत पर प्रभाव:

  • तमिलनाडु (नागापट्टिनम, कन्याकुमारी, चेन्नई), आंध्र प्रदेश, केरल और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में भारी तबाही हुई; भारत में 10,000 से अधिक और 14 देशों में कुल 2,30,000 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई।
  • भारत का दक्षिणतम भौगोलिक बिंदु इंदिरा पॉइंट (Indira Point - 6°45' N, ग्रेट निकोबार) समुद्र में 4.25 मीटर जलमग्न हो गया।

📡 भारतीय सुनामी पूर्व चेतावनी प्रणाली (ITEWS — INCOIS, हैदराबाद)

वैश्विक स्तर पर अग्रणी

2004 की आपदा से सबक लेते हुए भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) ने अक्टूबर 2007 में हैदराबाद स्थित भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (INCOIS) में अत्याधुनिक ITEWS (Indian Tsunami Early Warning System) की स्थापना की। वर्तमान में यह हिंद महासागर के 28 देशों को सुनामी चेतावनी सेवा प्रदाता (RTSP) के रूप में सेवा दे रहा है:

1. रीयल-टाइम सीस्मिक नेटवर्क: अंडमान-सुमात्रा और मकरान सबडक्शन ज़ोन में भूकंप आते ही 10 मिनट के भीतर परिमाण, गहराई व अधिकेंद्र का सटीक निर्धारण।
2. बॉटम प्रेशर रिकॉर्डर (BPR / DART Buoys): गहरे समुद्र तल पर स्थापित संवेदक जल-स्तंभ के दबाव परिवर्तन को 1 मिमी की परिशुद्धता से मापकर उपग्रह द्वारा चेतावनी केंद्र को भेजते हैं।
3. संख्यात्मक प्रसरण मॉडल (TUNAMI-N2): पूर्व-गणनाकृत परिदृश्यों (Pre-computed Scenarios) द्वारा तटीय जल में सुनामी आगमन का सटीक समय और तरंग ऊँचाई का पूर्वानुमान।

8. भारत का भूकंपीय भूगोल और भूकंपीय ज़ोनिंग मानचित्र (BIS IS 1893: 2016 — Zone II, III, IV, V)

भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian Standards - BIS) ने देश के ऐतिहासिक भूकंपों, विवर्तनिक भ्रंशों और भूवैज्ञानिक संरचनाओं के आधार पर भारत को 4 भूकंपीय ज़ोनों (Seismic Zones) में विभाजित किया है। पूर्व में 5 ज़ोन (I से V) थे, किंतु 2002 के संशोधन के बाद ज़ोन I को समाप्त कर ज़ोन II में मिला दिया गया, क्योंकि भारत में कोई भी क्षेत्र शून्य भूकंपीय जोखिम वाला नहीं है।

भारत का भूकंपीय ज़ोनिंग और प्रमुख भ्रंश मानचित्र (Seismic Zoning Map of India — BIS IS 1893 & Major Faults)
चित्र 5.3: भारत का भूकंपीय ज़ोनिंग मानचित्र (BIS IS 1893: 2016) — ज़ोन V (अति-उच्च जोखिम: हिमालय, उत्तर-पूर्व, कच्छ, अंडमान-निकोबार), ज़ोन IV (उच्च जोखिम: दिल्ली-NCR, उत्तरी मैदान, कोयना-लातूर), ज़ोन III (मध्यम जोखिम), तथा ज़ोन II (निम्न जोखिम: प्रायद्वीपीय आंतरिक भाग)। साथ ही प्रमुख भ्रंश रेखाएँ (HFT, MBT, MCT, SONATA) व ऐतिहासिक भूकंप स्थल।
भूकंपीय ज़ोन (Seismic Zone) क्षति जोखिम स्तर (Risk Level) ज़ोन गुणांक (Z Factor) व तीव्रता भारत के प्रमुख भौगोलिक क्षेत्र व राज्य
ज़ोन V (Zone V) अति-उच्च क्षति जोखिम (Very High Damage Risk — MSK IX या अधिक) Z = 0.36
(~11% भूभाग)
संपूर्ण उत्तर-पूर्वी राज्य, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार का उत्तरी भाग (रक्सौल/मधुबनी), गुजरात का कच्छ प्रायद्वीप, और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह।
ज़ोन IV (Zone IV) उच्च क्षति जोखिम (High Damage Risk — MSK VIII) Z = 0.24
(~18% भूभाग)
दिल्ली-NCR, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश का तराई क्षेत्र, बिहार, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, महाराष्ट्र का कोयना-लातूर क्षेत्र, तथा गुजरात का शेष उत्तरी भाग।
ज़ोन III (Zone III) मध्यम क्षति जोखिम (Moderate Damage Risk — MSK VII) Z = 0.16
(~30% भूभाग)
केरल, गोवा, लक्षद्वीप द्वीप समूह, गुजरात का दक्षिणी भाग, पूर्वी राजस्थान, मध्य प्रदेश का अधिकांश भाग, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु का तटीय क्षेत्र और कर्नाटक।
ज़ोन II (Zone II) निम्न क्षति जोखिम (Low Damage Risk — MSK VI या कम) Z = 0.10
(~41% भूभाग)
प्रायद्वीपीय भारत का स्थिर आंतरिक भाग (डेक्कन शील्ड के वे भाग जो ज़ोन III या IV में शामिल नहीं हैं)।

📜 भारत के 6 ऐतिहासिक भूकंप और उनके विवर्तनिक सबक:

1. कच्छ 1819 (7.7 Mw): 80 किमी लंबा 3 मीटर ऊँचा प्राकृतिक तटबंध बना जिसे स्थानीय लोगों ने 'अल्लाह का बांध' कहा।
2. असम 1897 (8.2 Mw) व 1950 (8.6 Mw): शिलॉन्ग पठार का 10 मीटर उत्थान हुआ; ब्रह्मपुत्र नदी का तल ऊपर उठने से असम में स्थायी बाढ़ की समस्या उत्पन्न हुई।
3. बिहार-नेपाल 1934 (8.1 Mw): मुंगेर और पटना में बड़े पैमाने पर मृदा द्रवीकरण (Liquefaction) हुआ; खेत दलदल में बदल गए।
4. कोयना 1967 (6.3 Mw): जलाशय-प्रेरित भूकंपीयता (RIS) का वैश्विक उदाहरण।
5. लातूर/किल्लारी 1993 (6.2 Mw): स्थिर प्रायद्वीपीय शील्ड के भीतर उथली गहराई (12 km) पर भ्रंश सक्रियण; मिट्टी-पत्थर के घरों (धज्जी-दीवारी के अभाव) से 10,000 मौतें।
6. भुज 2001 (7.7 Mw): 26 जनवरी को कच्छ के अंतरा-प्लेट थ्रस्ट भ्रंश पर महाविनाश; इसके बाद भारत में आपदा प्रबंधन अधिनियम (DMA 2005) और NDMA का गठन हुआ।

9. विश्व एवं भारत भूकंप व सुनामी मानचित्रण: 12 प्रमुख ऐतिहासिक स्थल व विवर्तनिक संधियाँ

क्र.सं. व स्थल (Location) देश / भौगोलिक क्षेत्र विवर्तनिक संरचना एवं प्रकार UPSC परीक्षा दृष्टि से भूगर्भिक महत्व
1. वाल्डिविया (Valdivia, 1960) दक्षिणी चिली, दक्षिण अमेरिका नाज़का प्लेट व द. अमेरिकी प्लेट सबडक्शन आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा दर्ज भूकंप (9.5 Mw)। इसने पूरे प्रशांत महासागर में सुनामी भेजी, जिससे 10,000 km दूर हवाई और जापान में भी सैकड़ों मौतें हुईं।
2. तोहोकू (Tohoku, 2011) उत्तर-पूर्वी जापान (होंशू द्वीप तट) प्रशांत प्लेट व ओखोत्स्क/यूरेशियन प्लेट सबडक्शन 9.1 Mw परिमाण का मेगाथ्रस्ट भूकंप जिसने 40.5 मीटर ऊँची सुनामी उत्पन्न की; फुकुशिमा दाइची परमाणु संयंत्र आपदा का कारण बना। होंशू द्वीप 2.4 मीटर पूर्व खिसक गया।
3. सुमात्रा-अंडमान (2004) उत्तरी सुमात्रा व अंडमान सागर (हिंद महासागर) इंडो-ऑस्ट्रेलियन व बर्मा प्लेट सबडक्शन 9.1–9.3 Mw का भूकंप; 1,300 km लंबी भ्रंश रेखा खिसकी; 2004 की हिंद महासागरीय सुनामी का जनक, जिससे भारत का इंदिरा पॉइंट जलमग्न हुआ।
4. सैन एंड्रियास भ्रंश (San Andreas) कैलिफोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) प्रशांत व उ. अमेरिकी प्लेट रूपांतरित भ्रंश विश्व का सबसे चर्चित स्ट्राइक-स्लिप रूपांतरित भ्रंश (~1,200 km); 1906 के सैन फ्रांसिस्को भूकंप का केंद्र। यहाँ ज्वालामुखी नहीं पाए जाते।
5. अनातोलियन भ्रंश (2023 तुर्की भूकंप) तुर्की और उत्तरी सीरिया (कहमानमारास) पूर्वी और उत्तरी अनातोलियन रूपांतरित भ्रंश 6 फरवरी 2023 को आए दोहरे भूकंप (7.8 व 7.5 Mw); अरेबियन प्लेट के उत्तरगामी धक्के से अनातोलियन प्लेट 3 मीटर पश्चिम खिसक गई; 50,000+ मौतें। भारत ने 'ऑपरेशन दोस्त' चलाया।
6. लिस्बन (Lisbon, 1755) पुर्तगाल तट (उत्तरी अटलांटिक महासागर) अटलांटिक अंतरा-प्लेट विवर्तनिक भ्रंश 1 नवंबर 1755 का ऐतिहासिक 8.5–9.0 Mw भूकंप; भूकंप के बाद सुनामी और आग ने पूरे लिस्बन शहर को नष्ट कर दिया। आधुनिक भूकंप विज्ञान (Seismology) का जनक माना जाता है।
7. कच्छ और अल्लाह का बांध (1819 & 2001) गुजरात, भारत कच्छ रिफ्ट बेसिन (अंतरा-प्लेट थ्रस्ट भ्रंश) 1819 में 80 km लंबा 3 मीटर ऊँचा अल्लाह का बांध बना; 2001 में भुज भूकंप (7.7 Mw) ने भारत के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन ढांचे (DMA 2005) की नींव रखी।
8. कोयना नगर (1967) सतारा जिला, महाराष्ट्र, भारत जलाशय-प्रेरित भूकंपीयता (RIS) 6.3 Mw का भूकंप; शिवाजी सागर जलाशय के जलभार व छिद्र जलदाब द्वारा कुरुडुवाड़ी भ्रंश पर घर्षण घटने से उत्पन्न हुआ।
9. लातूर और किल्लारी (1993) लातूर-उस्मानाबाद, महाराष्ट्र, भारत स्थिर महाद्वीपीय क्षेत्र (SCR) अंतरा-प्लेट भ्रंश 6.2 Mw परिमाण; मात्र 12 km की उथली गहराई; बेसाल्टिक शील्ड के भीतर प्राचीन भ्रंश के पुनः सक्रिय होने से आया; धज्जी-दीवारी विहीन पत्थरों के घरों के ढहने से 10,000 मौतें।
10. उत्तरकाशी (1991) व चमोली (1999) गढ़वाल हिमालय, उत्तराखंड, भारत मुख्य केंद्रीय भ्रंश (MCT) अभिसारी सीमा हिमालयी थ्रस्ट भ्रंशों में संचित विवर्तनिक तनाव से उत्पन्न; पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन और हिमनदी झीलों के टूटने (GLOF) के खतरे को उजागर किया।
11. गोर्खा (Gorkha, नेपाल 2015) नेपाल हिमालय (काठमांडू के निकट) मेन हिमालयन थ्रस्ट (MHT) सबडक्शन डिफ्लेक्शन 7.8 Mw भूकंप; काठमांडू घाटी 3 मीटर दक्षिण खिसक गई और माउंट एवरेस्ट 3 सेमी नीचा हो गया; भारत के उत्तरी राज्यों में तीव्र झटके महसूस किए गए।
12. मकरान सबडक्शन ज़ोन (Makran, 1945) अरब सागर (पाकिस्तान-ईरान तट के सामने) अरेबियन प्लेट व यूरेशियन प्लेट सबडक्शन 28 नवंबर 1945 को 8.1 Mw भूकंप से 12 मीटर ऊँची सुनामी उठी, जिसने कराची, मुंबई और गुजरात के तटों पर भारी तबाही मचाई थी। अरब सागर में सुनामी का प्रमुख संभावित स्रोत।

10. परीक्षा की दृष्टि से विशेष बिंदु: 6 प्रिलिम्स स्टेटमेंट ट्रैप्स एवं 4 संपूर्ण मेंस मॉडल उत्तर (Mains GS-1)

⚠️ प्रिलिम्स स्टेटमेंट ट्रैप्स (6 High-Yield Prelims Traps — अध्याय 5)

ट्रैप 1: सुनामी की उत्पत्ति

गलतफहमी: "समुद्र में आने वाला प्रत्येक तीव्र भूकंप सुनामी उत्पन्न करता है।"
✔ सही तथ्य: सुनामी केवल तभी बनती है जब समुद्र अधस्तल में ऊर्ध्वाधर विस्थापन (Vertical Displacement) हो (उदा. थ्रस्ट या सामान्य भ्रंशन); क्षैतिज स्ट्राइक-स्लिप भ्रंशन से जल-स्तंभ विस्थापित नहीं होता।

ट्रैप 2: गहरे समुद्र में सुनामी की ऊँचाई

गलतफहमी: "गहरे समुद्र में सुनामी की लहरें बहुत ऊँची होती हैं और तट तक आते-आते उनकी ऊँचाई कम हो जाती है।"
✔ सही तथ्य: गहरे समुद्र में सुनामी की ऊँचाई मात्र 0.5 से 1 मीटर होती है; तट के पास उथलापन प्रभाव (Shoaling Effect) के कारण गति घटने से तरंग ऊँचाई अचानक 15–30 मीटर हो जाती है।

ट्रैप 3: रिक्टर पैमाना और ऊर्जा अनुपात

गलतफहमी: "रिक्टर पैमाने पर 1 अंक बढ़ने पर भूकंप की ऊर्जा 10 गुना बढ़ जाती है।"
✔ सही तथ्य: 1 अंक बढ़ने पर तरंगों का आयाम (Amplitude) 10 गुना बढ़ता है, किंतु विमुक्त ऊर्जा लगभग 31.6 गुना (या 32 गुना) बढ़ती है ($10^{1.5}$).

ट्रैप 4: भारत के भूकंपीय ज़ोन

गलतफहमी: "भारत में वर्तमान में 5 भूकंपीय ज़ोन (I से V) हैं और प्रायद्वीपीय भारत ज़ोन I में आता है।"
✔ सही तथ्य: BIS द्वारा ज़ोन I को समाप्त कर दिया गया है; वर्तमान में केवल ज़ोन II, III, IV और V मान्य हैं। प्रायद्वीपीय भारत का स्थिर भाग ज़ोन II में है।

ट्रैप 5: लातूर भूकंप की विवर्तनिक स्थिति

गलतफहमी: "1993 का लातूर भूकंप हिमालयी अभिसारी प्लेट सीमा पर आया था।"
✔ सही तथ्य: लातूर भूकंप किसी प्लेट सीमा पर नहीं, बल्कि प्रायद्वीपीय शील्ड के आंतरिक भाग (Stable Continental Region - SCR) में कुरुडुवाड़ी भ्रंश के पुनः सक्रिय होने से उथली गहराई (12 km) पर आया था।

ट्रैप 6: कोयना भूकंप का कारण

गलतफहमी: "कोयना भूकंप शुद्ध रूप से प्राकृतिक प्लेट विवर्तनिकी का परिणाम था।"
✔ सही तथ्य: कोयना (1967) जलाशय-प्रेरित भूकंपीयता (RIS) का उदाहरण था, जहाँ शिवाजी सागर जलाशय के जलभार और छिद्र जलदाब ने भ्रंश तल पर घर्षण घटा दिया था।

📝 UPSC Mains GS-1 संपूर्ण 4 मॉडल उत्तर (Introduction - Body - Conclusion Format)

प्रश्न 1 (Mains GS-1 Core): रिक्टर पैमाने पर मापे गए भूकंप के 'परिमाण' (Magnitude) और मरकेली पैमाने पर मापी गई 'तीव्रता' (Intensity) में क्या अंतर है? स्पष्ट कीजिए कि कम परिमाण का भूकंप भी कभी-कभी अधिक परिमाण वाले भूकंप की तुलना में अधिक विनाशकारी क्यों सिद्ध हो सकता है। (250 शब्द / 15 अंक) Mains GS-1 Model Answer

उत्तर दृष्टिकोण:
• प्रस्तावना (Intro, 35 शब्द): भूकंप मापन में 'परिमाण' अवकेंद्र से विमुक्त आंतरिक ऊर्जा का वस्तुनिष्ठ वैज्ञानिक माप है, जबकि 'तीव्रता' धरातल पर अनुभव किए गए झटके और जान-माल के संरचनात्मक नुकसान का स्थानिक व व्यक्तिपरक प्रभाव है।
• मुख्य भाग (Body, 175 शब्द):
1. मूल अंतर:
- रिक्टर पैमाना (Richter / Mw): लघुगणकीय पैमाना (0-10), पूरे विश्व में एक ही मान, सीस्मोग्राफ द्वारा ऊर्जा विमुक्ति का मापन ($\Delta M = 1 \Rightarrow 31.6 imes$ ऊर्जा)।
- संशोधित मरकेली पैमाना (MMI): बंद गुणात्मक पैमाना (I से XII), अधिकेंद्र से दूरी के साथ मान घटता है, प्रत्यक्ष क्षति पर आधारित (समभूकंपीय रेखाएँ)।
2. कम परिमाण वाले भूकंप के अधिक विनाशकारी होने के प्रमुख कारण:
- अवकेंद्र की गहराई (Focal Depth): अलास्का 1964 (9.2 Mw) 25 km गहराई पर था किंतु निर्जन था; जबकि लातूर 1993 (मात्र 6.2 Mw) केवल 12 km की उथली गहराई पर आया और अधिकेंद्र घनी आबादी के ठीक नीचे था, जिससे 10,000 मौतें हुईं।
- जनसंख्या घनत्व व अवसंरचनात्मक गुणवत्ता: जापान (7.5 Mw) में सख्त सीस्मिक बिल्डिंग कोड के कारण नुकसान नगण्य होता है; जबकि हैती 2010 (7.0 Mw) और तुर्की 2023 (7.8 Mw) में कमजोर कंक्रीट और गैर-इंजीनियर्ड भवनों के कारण 2 लाख से अधिक मौतें हुईं।
- मृदा संघटन (Soil Liquefaction): जलोढ़ मृदा और भराव क्षेत्र (उदा. 1985 का मेक्सिको भूकंप 8.0 Mw जो 350 km दूर था) झील के अवसादों में तरंग प्रवर्धन (Wave Amplification) के कारण ध्वस्त हो गया।
- समय: रात्रि में आया भूकंप (लातूर तड़के 3:56 AM) सोते हुए लोगों को भागने का अवसर नहीं देता।
• निष्कर्ष (Conclusion, 40 शब्द): अतः भूकंप आपदा प्रबंधन में केवल रिक्टर परिमाण पर निर्भर रहने के बजाय क्षेत्रीय भूवैज्ञानिक संरचना, जनसंख्या संकेंद्रण और सीस्मिक माइक्रोज़ोनेशन आधारित संरचनात्मक रेट्रोफिटिंग को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

प्रश्न 2 (UPSC Mains 2023 / 2021 Tsunami Core): सुनामी की उत्पत्ति की भौतिक यांत्रिकी की व्याख्या कीजिए। 'उथलापन प्रभाव' (Shoaling Effect) किस प्रकार गहरे समुद्र की लहरों को तट के पास विनाशकारी जल-दीवार में परिवर्तित कर देता है? 2004 की सुनामी के संदर्भ में भारत की पूर्व चेतावनी प्रणाली (ITEWS) का मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द / 15 अंक) Mains GS-1 Model Answer

उत्तर दृष्टिकोण:
• प्रस्तावना (Intro, 35 शब्द): सुनामी सामान्य पवन-जनित लहरें नहीं हैं, बल्कि समुद्र अधस्तल के अचानक ऊर्ध्वाधर विस्थापन से उत्पन्न संपूर्ण जल-स्तंभ (Water Column) की गुरुत्वीय तरंगें हैं, जो तट के पास उथलापन प्रभाव से संहारक बन जाती हैं।
• मुख्य भाग (Body, 175 शब्द):
1. उत्पत्ति यांत्रिकी: सबडक्शन सीमाओं पर जब भारी प्लेट के खिंचाव से ऊपर स्थित प्लेट का अग्रभाग अचानक ऊपर उछलता है (Elastic Rebound / Megathrust Faulting >7.5 Mw), तो ऊपर का जल-स्तंभ लंबवत विस्थापित हो जाता है।
2. उथलापन प्रभाव (Shoaling Effect Physics):
- गहरे समुद्र में गहराई $d pprox 4,000$ m होने से गति $v = \sqrt{gd} pprox 800$ km/h होती है और तरंगदैर्ध्य 200 km होता है, किंतु आयाम मात्र 0.5–1 m होता है।
- तट के पास गहराई $d pprox 10$ m रह जाने से गति घटकर 40–50 km/h हो जाती है और तरंगदैर्ध्य संकुचित हो जाता है।
- ग्रीन के नियम के अनुसार ऊर्जा फ्लक्स ($E \propto A^2 \cdot v$) संरक्षित रहने के कारण गति घटने से तरंग ऊँचाई $A$ अचानक बढ़कर 15 से 30 मीटर की संहारक दीवार बन जाती है।
3. भारत की ITEWS (INCOIS, हैदराबाद) का मूल्यांकन:
- 2004 में भारत के पास कोई चेतावनी तंत्र नहीं था। 2007 में स्थापित ITEWS आज विश्व की अग्रणी प्रणाली है जो 10 मिनट में भूकंप का आकलन और 20 मिनट में सुनामी एडवाइजरी जारी करती है।
- घटक: रीयल-टाइम सीस्मिक स्टेशन, गहरे समुद्र में BPR (बॉटम प्रेशर रिकॉर्डर) / DART बुआए नेटवर्क, तटीय ज्वारमापी (Tide Gauges) और TUNAMI-N2 प्रसरण मॉडल।
- सफलता: 2012 व 2016 के हिंद महासागरीय भूकंपों में शून्य जनहानि के साथ सटीक चेतावनी; 28 हिंद महासागरीय देशों को सेवा।
• निष्कर्ष (Conclusion, 40 शब्द): ITEWS ने भारत को सुनामी भेद्यता से लचीलेपन (Vulnerability to Resilience) की ओर अग्रसर किया है; अब फोकस 'अंतिम मील संचार' (Last-Mile Warning) और तटीय मैंग्रोव बायो-शील्ड के सुदृढ़ीकरण पर होना चाहिए।

प्रश्न 3 (Indian Seismology Core): भारतीय मानक ब्यूरो (BIS IS 1893: 2016) के भूकंपीय ज़ोनिंग मानचित्र की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए। प्रायद्वीपीय भारत में लातूर (1993) और कोयना (1967) जैसे भूकंपों के कारणों की व्याख्या कीजिए। (150 शब्द / 10 अंक) Mains GS-1 Model Answer

उत्तर दृष्टिकोण:
• प्रस्तावना (Intro, 25 शब्द): BIS IS 1893 भारत का आधिकारिक भूकंपरोधी डिजाइन कोड है, जो देश को ऐतिहासिक भूकंपीयता और विवर्तनिक भ्रंशों के आधार पर वर्गीकृत करता है।
• मुख्य भाग (Body, 95 शब्द):
1. ज़ोनिंग मानचित्र की विशेषताएँ:
- 4 ज़ोन (Zone II, III, IV, V): पूर्व के ज़ोन I को समाप्त कर दिया गया है क्योंकि भारत का कोई भी भूभाग शून्य जोखिम में नहीं है। देश का ~59% भूभाग मध्यम से अति-उच्च जोखिम में है।
- ज़ोन V (अति-उच्च जोखिम ~11%): कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, उत्तर-पूर्व, उत्तरी बिहार, कच्छ, अंडमान। ज़ोन IV (~18%): दिल्ली-NCR, तराई, कोयना-लातूर।
2. प्रायद्वीपीय भारत में भूकंपों के कारण:
- स्थिर महाद्वीपीय क्षेत्र (SCR) अंतरा-प्लेट भ्रंश: यद्यपि प्रायद्वीप स्थिर शील्ड है, किंतु भारतीय प्लेट के निरंतर उत्तरगामी धक्के (5 cm/yr) से प्रायद्वीप के आंतरिक प्राचीन भ्रंशों (SONATA, कुरुडुवाड़ी) में प्रतिबल संचित होता है। 1993 का लातूर भूकंप इसी उथले भ्रंश के खिसकने से हुआ।
- जलाशय-प्रेरित भूकंपीयता (RIS): 1967 का कोयना भूकंप शिवाजी सागर जलाशय के विशाल जलभार और छिद्र जलदाब द्वारा भ्रंश तल पर घर्षण घटने का परिणाम था।
• निष्कर्ष (Conclusion, 30 शब्द): लातूर और कोयना ने सिद्ध किया कि प्रायद्वीपीय भारत पूर्णतः 'अकंप्य' नहीं है, अतः यहाँ भी सख्त सीस्मिक कोड और नियमित सुरक्षा ऑडिट आवश्यक हैं।

प्रश्न 4 (Disaster Management Core): भूकंप प्रेरित 'मृदा द्रवीकरण' (Soil Liquefaction) क्या है? यह नगरीय अवसंरचनाओं को किस प्रकार क्षति पहुँचाता है? भारत के गंगा के मैदान और तटीय नगरों में द्रवीकरण के जोखिम को कम करने के उपाय सुझाइए। (150 शब्द / 10 अंक) Mains GS-1 Model Answer

उत्तर दृष्टिकोण:
• प्रस्तावना (Intro, 25 शब्द): मृदा द्रवीकरण एक ऐसी भू-तकनीकी परिघटना है जिसमें जल-संतृप्त, ढीली असंगठित रेतीली मृदा भूकंपीय झटकों के दौरान अपनी अपरूपण सामर्थ्य (Shear strength) खोकर तरल की तरह बहने लगती है।
• मुख्य भाग (Body, 95 शब्द):
1. यांत्रिकी व अवसंरचना को क्षति: भूकंपीय तरंगे कणों के बीच छिद्र जलदाब बढ़ा देती हैं। इसके प्रभाव से:
- भारी बहुमंजिला इमारतें बिना टूटे सीधे जमीन में धँस जाती हैं या एक तरफ झुक जाती हैं (उदा. निगाता 1964)।
- भूमिगत पाइपलाइनें, सीवर लाइनें और पुलों के खंभे उखड़ जाते हैं; सड़कों पर रेत के फव्वारे (Sand boils) फूट पड़ते हैं।
2. भारत में जोखिम (गंगा मैदान व तटीय नगर): गंगा-ब्रह्मपुत्र के गहरे जलोढ़ मैदान (उच्च भूजल स्तर) तथा मुंबई, चेन्नई, कोलकाता जैसे तटीय रीक्लेम्ड भूमि पर द्रवीकरण का अत्यधिक जोखिम है (1934 बिहार में बड़े पैमाने पर हुआ था)।
3. शमन उपाय:
- भूमि सुधार: वाइब्रो-कॉम्पैक्शन (Vibro-compaction) और गतिशील संघनन द्वारा बालू के कणों को सघन करना।
- जल निकासी: वर्टिकल ड्रेन और ग्राउटिंग द्वारा अतिरिक्त छिद्र जलदाब को तुरंत विमुक्त करना।
- नींव डिजाइन: पाइल फाउंडेशन (Pile Foundations) को द्रवीकरण परत से नीचे ठोस आधारशिला (Bedrock) तक ले जाना।
• निष्कर्ष (Conclusion, 30 शब्द): भारतीय शहरों के सीस्मिक माइक्रोज़ोनेशन और नेशनल बिल्डिंग कोड में द्रवीकरण सुरक्षा मानकों को अनिवार्य बनाकर नगरीय आपदा जोखिम को प्रभावी रूप से न्यूनतम किया जा सकता है।

📌 फैक्ट कार्ड 1: तरंग क्रम व छाया क्षेत्र

• वेग क्रम: P > S > L > R | आयाम व विनाश: R/L > S > P
• P-तरंग छाया क्षेत्र: 105°–145° (अपवर्तन से अंदर झुकना)
• S-तरंग छाया क्षेत्र: 105° से पार संपूर्ण क्षेत्र (>40% ग्लोब, तरल बाह्य क्रोड)

📌 फैक्ट कार्ड 2: परिमाण बनाम तीव्रता

• Richter / Mw: मुक्त ऊर्जा (Magnitude), खुला लघुगणकीय पैमाना (0–10)। +1 अंक = 10x आयाम, ~31.6x (32x) ऊर्जा।
• Mercalli: प्रत्यक्ष क्षति/तीव्रता (Intensity), I से XII (रोमन)।

📌 फैक्ट कार्ड 3: BIS ज़ोन व सुनामी

• BIS IS 1893: कुल 4 ज़ोन (II, III, IV, V) — Zone I समाप्त।
• Zone V (~10.9%): पूर्वोत्तर, कश्मीर, उत्तराखंड, उत्तर बिहार, कच्छ, अंडमान।
• ITEWS: 2007, INCOIS हैदराबाद (BPRs + टाइड गेज)।

🎯 3 उच्च-स्तरीय प्रिलिम्स अभ्यास प्रश्न (UPSC Standard Solved MCQs)

प्रश्न 5.1: भूकंपीय तरंगों और भूकंप के मापन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. P-तरंगों में कणों का कंपन तरंग संचरण की दिशा के समानांतर होता है, जबकि S-तरंगों में कणों का दोलन लंबवत होता है।
  2. रिक्टर पैमाने पर परिमाण (Magnitude) में 1 अंक की वृद्धि भूकंपीय तरंगों के आयाम में 10 गुना तथा मुक्त ऊर्जा में लगभग 32 गुना वृद्धि को दर्शाती है।
  3. गहरे उद्गम केंद्र वाले भूकंप (Deep-focus: 300–700 km) उथले भूकंपों की तुलना में धरातल पर अधिक व्यापक संरचनात्मक विनाश पैदा करते हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

A) केवल 1 और 2
B) केवल 2 और 3
C) केवल 1 और 3
D) 1, 2 और 3
✔ सही उत्तर: A (केवल 1 और 2 सही हैं)
व्याख्या: कथन 3 गलत है क्योंकि उथले भूकंप (0–70 km) धरातल के अत्यंत निकट होने के कारण सर्वाधिक ऊर्जा धरातल पर छोड़ते हैं और सर्वाधिक विनाशकारी होते हैं; गहरे भूकंपों की ऊर्जा धरातल तक पहुँचते-पहुँचते काफी क्षीण हो जाती है।

प्रश्न 5.2: सुनामी (Tsunami) तरंगों की भौतिक यांत्रिकी के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. समुद्र के भीतर रूपांतरित भ्रंशों (Strike-Slip Faults) पर आने वाले भूकंपों से सामान्यतः विनाशकारी सुनामी उत्पन्न नहीं होती है।
  2. गहरे महासागर में सुनामी तरंगों का तरंगदैर्ध्य अत्यधिक लंबा (100–500 km) होता है, किंतु उनकी ऊँचाई प्रायः 1 मीटर से भी कम होती है।
  3. उथले तटीय जल में प्रवेश करने पर तरंग की गति बढ़ जाती है और तरंगदैर्ध्य विस्तृत हो जाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

A) केवल 1 और 3
B) केवल 1 और 2
C) केवल 2 और 3
D) 1, 2 और 3
✔ सही उत्तर: B (केवल 1 और 2 सही हैं)
व्याख्या: कथन 3 गलत है क्योंकि तटीय उथलेपन (Shoaling Effect) के कारण समुद्र की गहराई घटने से गति (v = √gd) घटती है (40-50 km/h) और तरंगदैर्ध्य संकुचित होता है (<10 km), जिससे ऊर्जा संरक्षण नियम के अनुसार तरंग की ऊँचाई बढ़कर 15–30 मीटर की विनाशकारी दीवार बन जाती है।

प्रश्न 5.3: भारत में भूकंपीय संवेदनशीलता और ज़ोनिंग (BIS IS 1893: 2016) के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:

क्षेत्र भूकंपीय ज़ोन (Seismic Zone)
1. कच्छ का रण (गुजरात) ज़ोन V (अति-उच्च जोखिम)
2. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (दिल्ली-NCR) ज़ोन IV (उच्च जोखिम)
3. कोयना एवं लातूर क्षेत्र (महाराष्ट्र) ज़ोन IV (उच्च जोखिम)
4. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह ज़ोन III (मध्यम जोखिम)

उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?

A) केवल एक युग्म
B) केवल दो युग्म
C) केवल तीन युग्म
D) सभी चारों युग्म
✔ सही उत्तर: C (केवल तीन युग्म — युग्म 1, 2 और 3 सही हैं)
व्याख्या: युग्म 4 गलत है क्योंकि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह इंडो-बर्मी सबडक्शन क्षेत्र में स्थित होने के कारण सर्वाधिक संवेदनशील 'ज़ोन V' (Zone V) में शामिल है, न कि ज़ोन III में।