अभ्यास प्रश्न 18
प्रश्न
"बिहार और पूर्वी भारत ने न केवल बौद्ध और जैन धर्मों को जन्म दिया, बल्कि मौर्य काल से लेकर पाल काल तक भारतीय स्थापत्य और मूर्तिकला के मानकों को भी निर्धारित किया।" इस कथन का परीक्षण कीजिए।
प्रश्न की मांग
बिहार (और बंगाल/ओडिशा) के स्थापत्य योगदान—प्रारंभिक स्तूप (वैशाली, केसरिया), मौर्य स्तंभ व बाराबर गुफाएँ, बोधगया महाबोधि मंदिर, राजगीर की सोन भंडार गुफा व पावापुरी, और नालंदा-विक्रमशिला महाविहार व पाल कला—का समग्र विश्लेषण करना।
भूमिका की दिशा
छठी शताब्दी ईसा पूर्व से बारहवीं शताब्दी ईस्वी तक लगभग अठारह सौ वर्षों तक बिहार (मगध, अंग, वज्जि) केवल राजनीतिक साम्राज्यों का ही नहीं, बल्कि बौद्ध, जैन और आजीवक वास्तुकला के प्रयोगों की सबसे बड़ी प्रयोगशाला भी रहा।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
- स्तूप और चैत्य परंपरा का उद्गम: वैशाली का प्रारंभिक मिट्टी का अस्थि-स्तूप, राजगृह की सप्तपर्णी गुफा व जीवक आम्रवन, और पूर्वी चंपारण का विशाल सीढ़ीदार 'केसरिया स्तूप' स्तूप स्थापत्य के आदिम से विकसित रूप को दर्शाते हैं।
- मौर्यकालीन प्रस्तर क्रांति: पाटलिपुत्र (कुम्हरार का 80 स्तंभों वाला कक्ष), लौरिया नंदनगढ़ व रामपुरवा के एकाश्म स्तंभ, और बाराबर व नागार्जुनी की आजीवक गुफाओं ने पूरे भारत में शैलकृत और पाषाण कला की नींव रखी।
- जैन स्थापत्य और मूर्तिकला के प्राचीनतम साक्ष्य: पटना के लोहानीपुर से प्राप्त मौर्यकालीन जैन तीर्थंकर धड़, राजगीर की सोन भंडार जैन गुफाएँ व मनियार मठ, और पावापुरी व चंपापुरी के जैन तीर्थ।
- गुप्तकालीन ईंट मंदिर और महाविहार: बोधगया का महाबोधि मंदिर (प्रारंभिक ईंट शिखर स्थापत्य का प्रतिमान) और कुमारगुप्त कालीन नालंदा महाविहार (विश्व का प्रथम आवासीय विश्वविद्यालय परिसर)।
- पालकालीन पुनर्जागरण (8वीं–12वीं शती): विक्रमशिला (भागलपुर) और ओदंतपुरी महाविहार तथा नालंदा व कुर्किहार की कांस्य एवं काले बेसाल्ट की वज्रयान/बौद्ध मूर्तियाँ।
उपयोगी उदाहरण
बाराबर (लोमस ऋषि), केसरिया स्तूप, महाबोधि मंदिर (बोधगया), नालंदा महाविहार (मंदिर सं. 3), विक्रमशिला (अंतीचक) और सोन भंडार गुफा।
निष्कर्ष की दिशा
पूर्वी भारत की इस स्थापत्य विरासत ने न केवल भारतीय कला को गढ़ा, बल्कि बोधगया और नालंदा के माध्यम से आज भी विश्व भर के बौद्ध और जैन श्रद्धालुओं के लिए भारत को आध्यात्मिक केंद्र बनाए रखा है।