1. परिचय
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में मध्य गंगा घाटी में उभरे श्रमण आंदोलनों—विशेषकर बौद्ध धर्म और जैन धर्म—ने न केवल भारतीय दर्शन और सामाजिक संरचना को नई दिशा दी, बल्कि भारतीय कला एवं स्थापत्य के इतिहास में एक स्थायी स्मारकीय परंपरा की नींव भी रखी। प्रारंभिक वैदिक परंपरा में जहाँ यज्ञ-वेदियाँ अस्थायी होती थीं और किसी स्थायी प्रस्तर स्मारक की आवश्यकता नहीं थी, वहीं बौद्ध और जैन परंपराओं में महापुरुषों के शारीरिक अवशेषों (Relics) के संरक्षण, भिक्षु-संघ के वर्षावास (Monastic Retreat) और सामूहिक उपासना की व्यावहारिक आवश्यकताओं ने स्थायी वास्तुकला को जन्म दिया।
इस धार्मिक-सांस्कृतिक प्रेरणा से भारतीय स्थापत्य के चार प्रमुख स्तंभ विकसित हुए—स्तूप (स्मृति एवं अवशेष-पूजा के केंद्र), चैत्यगृह (प्रार्थना एवं उपासना मंडप), विहार (भिक्षु आवास एवं शिक्षा केंद्र) तथा शैलकृत गुफाएँ (पहाड़ियों को काटकर बनाई गई स्थायी संरचनाएँ)। प्रारंभिक काल में जब बुद्ध की मानव आकृति का अंकन नहीं किया जाता था, तब धर्मचक्र, बोधि वृक्ष, रिक्त सिंहासन और पदचिह्न जैसे प्रतीकों ने अमूर्त दार्शनिक विचारों को जनसाधारण के लिए दृश्य भाषा में रूपांतरित किया। मौर्य काल में सम्राट अशोक के राजकीय संरक्षण से काष्ठ से प्रस्तर (लकड़ी से पत्थर) की ओर जो तकनीकी संक्रमण प्रारंभ हुआ, वह शुंग, सातवाहन, चेदि (खारवेल), कुषाण, गुप्त और वाकाटक कालों से होता हुआ पूर्व-मध्यकाल के भव्य संरचनात्मक मंदिरों (जैसे दिलवाड़ा, रणकपुर और महाबोधि व पाल महाविहार) तक निरंतर समृद्ध होता गया। यह स्थापत्य केवल धार्मिक आस्था का दर्पण नहीं है, बल्कि प्राचीन भारत के द्वितीय नगरीकरण, व्यापारिक मार्गों, वणिक श्रेणियों (Guilds), सामूहिक दान परंपरा और सामाजिक-सांस्कृतिक समन्वय को समझने का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्रोत भी है।
2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारतीय उपमहाद्वीप में बौद्ध और जैन स्थापत्य का विकास किसी शून्य में नहीं हुआ, बल्कि यह छठी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर पूर्व-मध्यकाल तक होने वाले सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और तकनीकी परिवर्तनों के साथ गहराई से जुड़ा रहा।
(क) छठी शताब्दी ईसा पूर्व की धार्मिक-सामाजिक परिस्थितियाँ एवं श्रमण परंपरा का उदय
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में मध्य गंगा घाटी में लौह तकनीक के प्रसार, कृषि अधिशेष (Agricultural Surplus) और ‘द्वितीय नगरीकरण’ (Second Urbanisation) के परिणामस्वरूप राजगृह, वैशाली, कौशांबी, वाराणसी और चंपा जैसे नगरों का उदय हुआ। इस नगरीय समाज में उभरते हुए व्यापारी वर्ग (वैश्य/सेट्ठि) और कृषक समुदाय को कर्मकांड-प्रधान वैदिक व्यवस्था की तुलना में अहिंसा, कर्मवाद और सामाजिक समानता पर आधारित बौद्ध एवं जैन दर्शन अधिक अनुकूल लगे। बुद्ध और महावीर के उपदेशों के साथ जब संगठित ‘संघ’ (Sangha) की स्थापना हुई, तो भिक्षुओं और श्रमणों के ठहरने, ध्यान करने और उपासकों के एकत्र होने के लिए भौतिक स्थानों की आवश्यकता उत्पन्न हुई।
(ख) प्रारंभिक धार्मिक स्थापत्य की प्रकृति और काष्ठ से प्रस्तर की ओर संक्रमण
बुद्ध और महावीर के जीवनकाल तथा उनके तुरंत बाद के काल (5वीं–4थी शताब्दी ईसा पूर्व) में स्थापत्य मुख्यतः मिट्टी, ईंट, बांस और लकड़ी (काष्ठ) जैसी नाशवान सामग्रियों पर आधारित था। प्रारंभिक ‘आराम’ (उपवन-निवास) और कुटियाँ लकड़ी एवं फूस से बनाई जाती थीं। हालांकि, तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मौर्य साम्राज्य के राजनीतिक एकीकरण और आर्थिक समृद्धि ने स्थापत्य में ‘काष्ठ से प्रस्तर’ (Wood to Stone) के ऐतिहासिक संक्रमण को संभव बनाया। फिर भी, कारीगरों के मन में लकड़ी की वास्तुकला की स्मृति इतनी गहरी थी कि जब उन्होंने पत्थर को तराशना शुरू किया (जैसे बाराबर की लोमस ऋषि गुफा या साँची के तोरण और भाजा-कार्ले के चैत्य), तो उन्होंने पत्थर में भी लकड़ी की कड़ियों (Ribs), शहतीरों और जोड़ने की तकनीकों का हूबहू अनुकरण किया।
(ग) मौर्यकालीन संरक्षण और अशोक का योगदान (3री शताब्दी ईसा पूर्व)
मौर्य काल में स्थापत्य को पहली बार विशाल राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ। सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को केवल व्यक्तिगत आस्था तक सीमित न रखकर उसे स्मारकीय रूप दिया। बौद्ध अनुश्रुतियों के अनुसार, अशोक ने बुद्ध के मूल अवशेषों को खुलवाकर उन्हें साम्राज्य के विभिन्न भागों में वितरित किया और उन पर लगभग 84,000 स्तूपों का निर्माण करवाया (यद्यपि यह संख्या प्रतीकात्मक है, किंतु साँची, सारनाथ, तक्षशिला और भरहुत के मूल ईंट-स्तूप अशोक के काल के ही हैं)। इसके अतिरिक्त, अशोक और उनके पौत्र दशरथ ने बिहार की बाराबर और नागार्जुनी पहाड़ियों में कठोर ग्रेनाइट चट्टानों को काटकर आजीवक संप्रदाय के भिक्षुओं के लिए गुफाओं का निर्माण करवाया। इन गुफाओं की दर्पण-जैसी चमकदार पॉलिश (Mauryan Polish) और लोमस ऋषि गुफा का घोड़े की नाल जैसा प्रवेश-रूप बाद की चैत्य-मेहराब और शैलकृत स्थापत्य परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण प्रारंभिक उदाहरण माना जाता है।
(घ) उत्तर-मौर्य विकास: शुंग, कण्व और चेदि काल (2री–1ली शताब्दी ईसा पूर्व)
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद स्थापत्य संरक्षण का आधार अधिक विविध हुआ। राजकीय संरक्षण के साथ व्यापारी, श्रेणियाँ, भिक्षु-भिक्षुणियाँ और स्थानीय दानदाता भी स्मारक निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे।
- शुंग काल: यद्यपि शुंग शासक स्वयं वैदिक/ब्राह्मण धर्म के अनुयायी थे, तथापि उनके शासनकाल में साँची (स्तूप संख्या 1 का विस्तार एवं पाषाण आच्छादन), भरहुत (सतना, म.प्र.) और बोधगया में विशाल स्तूपों व अलंकृत वेदिकाओं (Railings) का निर्माण हुआ। इस काल में ईंटों के स्थान पर पत्थर का व्यापक प्रयोग हुआ और वेदिकाओं पर जातक कथाओं तथा यक्ष-यक्षिणियों का सजीव उत्कीर्णन किया गया।
- कलिंग का चेदि वंश (खारवेल): प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में कलिंग के शासक खारवेल ने जैन धर्म को प्रबल राजकीय संरक्षण दिया। भुवनेश्वर के निकट उदयगिरि और खंडगिरि की पहाड़ियों में जैन मुनियों के निवास हेतु अनेक एकमंजिला और दोमंजिला गुफाएँ (जैसे रानी गुम्फा, हाथी गुम्फा, गणेश गुम्फा) उत्कीर्ण की गईं।
(ङ) सातवाहन और पश्चिमी क्षत्रप काल (2री शताब्दी ईसा पूर्व – 3री शताब्दी ईस्वी)
दक्कन और आंध्र क्षेत्र में सातवाहन काल के दौरान दो समानांतर स्थापत्य धाराएँ विकसित हुईं:
1. पश्चिमी दक्कन (महाराष्ट्र): सह्याद्रि (पश्चिमी घाट) की बेसाल्ट चट्टानों में भोरघाट, नानेघाट और थालघाट जैसे प्रमुख व्यापारिक दर्रों के किनारे भाजा, बेडसा, कोंडाने, पितलखोरा, नासिक (पांडुलेना), कार्ले, जुन्नर और कन्हेरी जैसी भव्य बौद्ध शैलकृत गुफाओं (चैत्य एवं विहार) का निर्माण हुआ।
2. पूर्वी दक्कन (आंध्र क्षेत्र): कृष्णा-गोदावरी घाटी में अमरावती (धान्यकटक), जग्गय्यपेट, भट्टीप्रोलु, घंटाशाला और बाद में इक्ष्वाकु शासकों के अधीन नागार्जुनकोंडा में श्वेत-हरित चूना पत्थर (White-greenish Limestone/Palnad Marble) से सज्जित भव्य स्तूपों का विकास हुआ।
(च) कुषाण काल (1ली–3री शताब्दी ईस्वी)
कुषाण काल (विशेषकर कनिष्क प्रथम का शासनकाल) बौद्ध स्थापत्य और मूर्तिकला में क्रांतिकारी परिवर्तन का काल था। ईस्वी सन् की आरंभिक शताब्दियों में गांधार और मथुरा जैसे केंद्रों में बुद्ध तथा बोधिसत्त्वों की मानवाकार प्रतिमाएँ व्यापक होने लगीं। इसे केवल महायान के उदय का सीधा परिणाम मानना उचित नहीं है; अनुष्ठान, संरक्षण, क्षेत्रीय कलाशैलियों और बदलती भक्तिपरक प्रवृत्तियों ने भी इसमें भूमिका निभाई। साथ ही, मथुरा के कंकाली टीला में जैन आयागपट्टों, सर्वतोभद्रिका प्रतिमाओं और जैन स्तूप के साक्ष्य मिलते हैं। स्तूपों का आकार अब अधिक ऊँचा और बेलनाकार होने लगा (जैसे पेशावर का शाह-जी-की-ढेरी स्तूप)।
(छ) गुप्त और वाकाटक काल (4थी–6ठी शताब्दी ईस्वी)
गुप्त और वाकाटक काल को भारतीय कला का ‘शास्त्रीय युग’ (Classical Age) कहा जाता है।
- इस काल में सारनाथ (धमेख स्तूप) और नालंदा में ईंट व पत्थर के ऊँचे बेलनाकार स्तूप तथा महाविहार बने।
- वाकाटक शासक हरिषेण (5वीं शताब्दी के उत्तरार्ध) के काल में अजंता की शैलकृत गुफाओं (विशेषकर गुफा 1, 2, 16, 17, 19, 26) में स्थापत्य, मूर्तिकला और भित्ति-चित्रकला (Murals) का अद्भुत संगम हुआ।
- इसी चरण में विहारों की आंतरिक संरचना में एक बड़ा परिवर्तन आया—अब विहार के पीछे की दीवार के केंद्र में बुद्ध की विशाल प्रतिमा वाला एक ‘गर्भगृह’ (Sanctum) जोड़ा जाने लगा, जिससे विहार केवल निवास स्थान न रहकर ‘चैत्य-सह-विहार’ (मंदिर-सह-निवास) बन गए।
(ज) प्रारंभिक मध्यकाल (7वीं–12वीं शताब्दी ईस्वी)
- दक्कन में राष्ट्रकूट शासकों के अधीन एलोरा में बौद्ध (गुफा 1–12, जैसे तीन-मंजिला विहार और विश्वकर्मा चैत्य), ब्राह्मण (गुफा 13–29) और दिगंबर जैन (गुफा 30–34, जैसे इंद्रसभा और जगन्नाथ सभा) गुफाओं का विकास हुआ।
- पूर्वी भारत (बिहार और बंगाल) में पाल और सेन शासकों के संरक्षण में वज्रयान बौद्ध धर्म के केंद्र के रूप में नालंदा, विक्रमशिला (भागलपुर), ओदंतपुरी और सोमपुर (पहाड़पुर) जैसे विशाल ‘महाविहार’ विकसित हुए।
- पश्चिमी भारत (राजस्थान व गुजरात) और कर्नाटक में जैन मंदिर स्थापत्य अपने चरम पर पहुँचा—श्रवणबेलगोला में गोम्मटेश्वर बाहुबली की एकाश्म प्रतिमा (लगभग 981 ई.) तथा माउंट आबू (दिलवाड़ा), पालीताना और रणकपुर के संगमरमर मंदिर इसके सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हैं।
(झ) व्यापारी वर्ग, श्रेणियों और निजी दानदाताओं की भूमिका
प्राचीन भारतीय बौद्ध और जैन स्थापत्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका अधिकांश भाग राजाओं के राजकोष से नहीं, बल्कि ‘सामूहिक और निजी दान’ (Collective Patronage) से निर्मित हुआ था। साँची, भरहुत, अमरावती, कार्ले और कन्हेरी के सैकड़ों दान-अभिलेख (Votive Inscriptions) बताते हैं कि रथकारों, हाथीदांत कारीगरों (जैसे विदिशा के दंतकार जिन्होंने साँची के दक्षिणी तोरण पर कार्य किया), स्वर्णकारों, बुनकरों, सार्थवाहों (काफिला प्रमुखों), गृहपतियों, भिक्षुओं, भिक्षुणियों और सामान्य महिलाओं ने एक-एक स्तंभ, सूची (क्रॉसबार) या गुफा-कक्ष के निर्माण के लिए दान दिया था।
3. बौद्ध स्तूप
3.1 उत्पत्ति
1. स्तूप शब्द का अर्थ: संस्कृत शब्द ‘स्तूप’ का शाब्दिक अर्थ है—‘किसी वस्तु का ढेर’, ‘मिट्टी का टीला’ या ‘शिखा’ (Heap or Mound)। पाली भाषा में इसे ‘थूप’ (Thupa) कहा गया है।
2. पूर्व-बौद्ध परंपराओं से संबंध: स्तूप की अवधारणा मूलतः बौद्ध धर्म से उत्पन्न नहीं हुई थी। ऋग्वेद में अग्नि की उठती हुई लपटों या वृक्ष के तने के संदर्भ में ‘स्तूप’ शब्द मिलता है। पुरातात्त्विक रूप से, बुद्ध से पूर्व भी भारत में मृतकों या महान संतों के दाह-संस्कार के बाद उनकी अस्थियों/राख के ऊपर मिट्टी या पत्थर का गोल टीला (शवाधान टीला / Tumulus या चैत्य) बनाने की परंपरा प्रचलित थी।
3. बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद अवशेष-वितरण: ‘महापरिनिब्बान सुत्त’ (दीघ निकाय) के अनुसार, जब आनंद ने बुद्ध से पूछा कि उनके निर्वाण के बाद उनके शरीर के साथ कैसा व्यवहार किया जाए, तो बुद्ध ने कहा कि एक चक्रवर्ती सम्राट की भाँति उनके अवशेषों पर चार मार्गों के चौराहे (चतुम्महापथ) पर स्तूप बनाया जाए। कुशीनगर में बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके शारीरिक अवशेषों (अस्थि-कलश) को आठ गणराज्यों/शासकों—1. मगध के अजातशत्रु, 2. वैशाली के लिच्छवि, 3. कपिलवस्तु के शाक्य, 4. अल्कप्प के बुलि, 5. रामग्राम के कोलिय, 6. वेठद्वीप के ब्राह्मण, 7. पावा के मल्ल, और 8. कुशीनगर के मल्ल—के बीच बाँटा गया। इसके अतिरिक्त पिप्पливन के मोरियों ने चिता की अंगार (अंगार स्तूप) और द्रोण ब्राह्मण ने अवशेष बाँटने वाले कलश (कुंभ स्तूप) पर स्तूप बनवाए।
4. अवशेष-पूजा और स्तूपों का वर्गीकरण: बौद्ध परंपरा में स्तूपों को चार प्रमुख श्रेणियों में बाँटा गया है:
- शारीरिक स्तूप (Sharirika Stupa): जिनमें बुद्ध या प्रमुख भिक्षुओं/अर्हतों के शारीरिक अवशेष (अस्थि, दांत, केश, नख) रखे गए हों।
- पारिभौगिक स्तूप (Paribhogika Stupa): जिनमें बुद्ध द्वारा उपयोग की गई वस्तुएँ (भिक्षापात्र, चीवर, दंड आदि) रखी गई हों।
- उद्देशिक स्तूप (Uddeshika Stupa): जो बुद्ध के जीवन से जुड़ी पवित्र घटनाओं या स्थानों (जैसे लुंबिनी, बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर) की स्मृति में बिना किसी अवशेष के बनाए गए हों।
- संकल्पित / मन्नत स्तूप (Votive Stupa): जो तीर्थयात्रियों और श्रद्धालुओं द्वारा पुण्य-लाभ या अपनी मन्नत पूरी होने पर मुख्य स्तूप या महाविहार परिसर में छोटे आकार में बनवाए जाते थे।
5. अशोक और स्तूप निर्माण: तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक ने रामग्राम को छोड़कर अन्य सात मूल स्तूपों से अवशेष निकलवाए और उन्हें समूचे साम्राज्य में वितरित कर हजारों नए स्तूप बनवाए। उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर क्षेत्र में स्थित पिपरहवा स्तूप प्रारंभिक बौद्ध स्तूप-परंपरा और अवशेष-पूजा के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल है; इसकी तिथि और पहचान पर विद्वानों में चर्चा रही है।
3.2 स्तूप की संरचना और उसके अंग
एक विकसित बौद्ध स्तूप (जैसे साँची का महान स्तूप) तीन स्तरों पर कार्य करता है—स्थापत्य संरचना, धार्मिक अनुष्ठान और ब्रह्मांडीय प्रतीकवाद (Cosmological Symbolism):
1. अण्ड (Anda):
- स्थापत्य कार्य: यह स्तूप का मुख्य अर्धगोलाकार (Hemispherical) गुंबद या टीला होता है। प्रारंभ में यह ठोस मिट्टी या ईंटों का होता था, जिसे बाद में पत्थर की सिल्लियों से ढक दिया गया।
- धार्मिक अर्थ: यह बुद्ध के महापरिनिर्वाण (अंतिम मुक्ति) का प्रत्यक्ष रूपक है।
- प्रतीकात्मक अर्थ: यह अनंत आकाश या ब्रह्मांड के गुंबद (Dome of Heaven / Cosmic Egg) का प्रतीक है, जिसके नीचे समस्त सृष्टि समाहित है।
2. मेधि (Medhi):
- स्थापत्य कार्य: यह वह ऊँचा गोलाकार या वर्गाकार चबूतरा (Terrace/Drum) है जिस पर ‘अण्ड’ टिका होता है। इस पर चढ़ने के लिए सोपान (सीढ़ियाँ) बने होते हैं।
- धार्मिक अर्थ: यह स्तूप को सामान्य भूमि से ऊपर उठाकर पवित्र क्षेत्र (Sacred Space) को लौकिक भूमि से अलग करता है और ऊपरी प्रदक्षिणा पथ का आधार बनता है।
- प्रतीकात्मक अर्थ: यह भौतिक पृथ्वी का प्रतीक है जो आकाश रूपी अण्ड को धारण करती है।
3. वेदिका (Vedika / Railing):
- स्थापत्य कार्य: स्तूप के चारों ओर भूमि तल पर (तथा मेधि के ऊपर भी) बनी पत्थर की घेराबंदी। इसमें ऊर्ध्वाधर स्तंभों को ‘थंभ’ (Stambha), उन्हें जोड़ने वाली क्षैतिज पट्टियों को ‘सूची’ (Suchi - Crossbars) और सबसे ऊपर रखी जाने वाली अर्धगोलाकार पत्थर की पट्टी को ‘उष्णीष’ (Ushnisha - Coping Stone) कहा जाता है।
- धार्मिक अर्थ: यह पवित्र स्तूप परिसर की रक्षा करती है और वेदिका के स्तंभों पर उत्कीर्ण जातक कथाएँ भक्तों को धर्म की शिक्षा देती हैं।
- प्रतीकात्मक अर्थ: यह बाहरी अशांत, लौकिक संसार (Samsara) और भीतर के शांत, पवित्र आध्यात्मिक क्षेत्र (Nirvana) के बीच की सीमा-रेखा है।
4. प्रदक्षिणापथ (Pradakshinapatha):
- स्थापत्य कार्य: अण्ड/मेधि और बाहरी वेदिका के बीच स्थित वृत्ताकार गलियारा। साँची में दो प्रदक्षिणापथ हैं—एक भूमि तल पर और दूसरा मेधि के ऊपर।
- धार्मिक अर्थ: श्रद्धालु घड़ी की सुई की दिशा में (Clockwise - अपने दाहिने हाथ को स्तूप की ओर रखते हुए) परिक्रमा करते हुए ध्यान और मंत्रोच्चार करते हैं।
- प्रतीकात्मक अर्थ: प्रदक्षिणा में उपासक पवित्र केंद्र को दाहिनी ओर रखते हुए श्रद्धापूर्वक परिक्रमा करते हैं। व्यापक प्रतीकात्मक व्याख्याओं में इसे धर्म-केंद्रित आध्यात्मिक यात्रा और ब्रह्मांडीय व्यवस्था से भी जोड़ा गया है।
5. हर्मिका (Harmika):
- स्थापत्य कार्य: अण्ड के ठीक शिखर पर बना एक चौकोर (वर्गाकार) घेरा या बालकनी जैसी संरचना।
- धार्मिक अर्थ: यह अण्ड के शीर्ष पर स्थित पवित्र वर्गाकार घेरा है। अवशेष सामान्यतः स्तूप के ठोस केंद्र या निर्धारित धातुगर्भ में प्रतिष्ठित किए जाते थे; हर्मिका स्तूप के ऊर्ध्व भाग को धार्मिक और प्रतीकात्मक महत्त्व देती है।
- प्रतीकात्मक अर्थ: यह नश्वर संसार से ऊपर स्थित ‘देवताओं के निवास’ या स्वर्गलोक (Abode of the Gods / तुषित स्वर्ग) और पवित्र बोधि-मंडप का प्रतीक है।
6. यष्टि (Yashti):
- स्थापत्य कार्य: हर्मिका के केंद्र से ऊपर की ओर उठने वाला एक सीधा पत्थर का दंड या मस्तूल (Central Mast)।
- धार्मिक अर्थ: यह छत्रावली को आधार प्रदान करता है और स्तूप की ऊर्ध्वाधर ऊँचाई को निर्धारित करता है।
- प्रतीकात्मक अर्थ: यह ‘अक्ष-मुंडी’ (Axis Mundi / विश्व-धुरी) का प्रतीक है जो पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग को एक सीध में जोड़ता है तथा बोधि वृक्ष के तने का भी प्रतिनिधित्व करता है।
7. छत्र / छत्रावली (Chhatra / Chhatravali):
- स्थापत्य कार्य: यष्टि के शीर्ष पर लगे एक के ऊपर एक तीन (या अधिक) पत्थर के छत्र, जिनका आकार नीचे से ऊपर की ओर क्रमशः छोटा होता जाता है।
- धार्मिक अर्थ: प्राचीन भारत में छत्र संप्रभुता और राजकीय सम्मान का चिह्न था; यहाँ यह बुद्ध की आध्यात्मिक संप्रभुता (चक्रवर्ती धर्मराज) को दर्शाता है।
- प्रतीकात्मक अर्थ: तीन छत्रों को प्रायः बौद्ध त्रिरत्न—बुद्ध, धम्म और संघ—से जोड़ा जाता है; साथ ही छत्र प्राचीन भारतीय परंपरा में सम्मान और आध्यात्मिक सार्वभौमिकता का चिह्न भी था।
8. तोरण (Torana / Gateway):
- स्थापत्य कार्य: स्तूप की वेदिका के चारों दिशाओं (उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम) में बने भव्य प्रवेश द्वार। प्रत्येक तोरण में दो वर्गाकार स्तंभ और उनके ऊपर तीन मुड़ी हुई क्षैतिज धरनें (Architraves) होती हैं।
- धार्मिक अर्थ: तोरणों पर बुद्ध के जीवन की घटनाओं, पूर्व जन्मों (जातक कथाओं) और मांगलिक प्रतीकों का सघन उत्कीर्णन होता है, जो निरक्षर उपासकों के लिए ‘प्रस्तर में लिखी पुस्तक’ (Visual Scripture) का कार्य करता है।
- प्रतीकात्मक अर्थ: चार दिशाओं के चार तोरण बुद्ध के धम्म के चारों दिशाओं में सार्वभौमिक प्रसार और भक्त के अज्ञान से ज्ञान के लोक में प्रवेश का प्रतीक हैं।
4. प्रमुख स्तूप
4.1 साँची स्तूप (विशेषकर स्तूप संख्या 1 / महास्तूप)
- स्थान एवं वर्तमान राज्य: साँची (प्राचीन नाम—काकनादबोट, काकणाय, बोट-श्रीपर्वत), रायसेन जिला, मध्य प्रदेश (विदिशा से लगभग 10 किमी दूर, बेतवा नदी के समीप एक पहाड़ी पर स्थित; ध्यान दें—यह चंबल नदी की घाटी में नहीं है)।
- काल एवं क्रमिक विकास: तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व (मौर्य काल) से 12वीं शताब्दी ईस्वी तक।
- प्रमुख संरक्षण/राजवंश: मौर्य (अशोक), शुंग (पुष्यमित्र/अग्निमित्र काल), सातवाहन (सातकर्णी) और गुप्त शासक।
- निर्माण सामग्री: अशोक कालीन मूल स्तूप पकी हुई ईंटों (Burnt Bricks) और मिट्टी से बना था; शुंग काल में इसे बलुआ पत्थर (Sandstone) की सिल्लियों से मढ़ा गया।
- स्थापत्य विशेषताएँ:
- मूल निर्माण (मौर्य काल): अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में यहाँ ईंटों का एक अर्धगोलाकार स्तूप और उसके पास चुनार बलुआ पत्थर का एक एकाश्म सिंह-स्तंभ (जिस पर संघ-भेद या Schism Edict उत्कीर्ण है) बनवाया।
- शुंगकालीन विस्तार (2री शताब्दी ईसा पूर्व): शुंग काल में मूल ईंट के स्तूप को तोड़े बिना उसके चारों ओर पत्थर की सिल्लियाँ लगाकर उसका आकार लगभग दोगुना (व्यास लगभग 120 फीट और ऊँचाई लगभग 54 फीट) कर दिया गया। इसमें मेधि के ऊपर दूसरा प्रदक्षिणापथ, अण्ड के ऊपर हर्मिका व त्रि-छत्रावली तथा भूमि तल पर बिना अलंकरण वाली सादी पाषाण वेदिका (Ground Railing) जोड़ी गई।
- सातवाहन काल और चार तोरण (1ली शताब्दी ईसा पूर्व): सातवाहन काल में, लगभग पहली शताब्दी ईस्वी के आसपास, चारों दिशाओं में चार भव्य अलंकृत तोरण (Gateways) जोड़े गए। इनमें ‘दक्षिणी तोरण’ सबसे पहले बना और ‘पश्चिमी तोरण’ सबसे अंत में। दक्षिणी तोरण पर सातवाहन शासक ‘राजा सातकर्णी’ के कारीगरों (आनंद, जो राजमिस्त्रियों का प्रमुख था) तथा विदिशा के हाथीदांत कारीगरों (दंतकारों) द्वारा उत्कीर्णन किए जाने का अभिलेख मिलता है।
- मूर्तिकला, कथात्मक कला और प्रतीकवाद:
- अनाकार बुद्ध निरूपण (Aniconic Representation): साँची के प्रारंभिक तोरण-रिलीफों में बुद्ध की उपस्थिति सामान्यतः मानवाकार प्रतिमा के बजाय प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त की गई है। उनकी उपस्थिति छत्र, रिक्त सिंहासन, बोधि वृक्ष, धर्मचक्र और पदचिह्नों के माध्यम से दर्शाई गई है।
- प्रमुख कथात्मक दृश्य: वेस्संतर जातक (दानशीलता की पराकाष्ठा), छदंत जातक, महाकपि जातक, साम जातक, बुद्ध का कपिलवस्तु से महाभिनिष्क्रमण (बिना सवार के कंथक अश्व और छत्र द्वारा प्रदर्शित), कुशीनगर के अवशेषों के लिए युद्ध (War of the Relics), सम्राट अशोक द्वारा रामग्राम स्तूप की यात्रा, और बंदरों द्वारा शहद दान की कथा।
- लोक एवं मांगलिक प्रतीक: तोरणों के कोष्ठकों (Brackets) पर वृक्ष की शाखा पकड़े हुए ‘शालभंजिका’ (यक्षिणी) की मनोहारी मूर्तियाँ हैं, जो लोक कला और उर्वरता के प्रतीक का बौद्ध कला में समावेशन दर्शाती हैं। साथ ही कमल पर आसीन व हाथियों द्वारा अभिषिक्त ‘गजलक्ष्मी’ (जिसे कुछ विद्वान माया देवी के रूप में भी देखते हैं) का अंकन है।
- साँची के अन्य प्रमुख स्तूप:
- स्तूप संख्या 2: पहाड़ी की ढलान पर स्थित; इसमें कोई तोरण नहीं है, केवल वेदिका है। इसमें अशोक कालीन धर्मप्रचारकों (काश्यपगोत्र, मज्झिम आदि) के अवशेष मिले हैं।
- स्तूप संख्या 3: इसमें केवल एक तोरण है; यहाँ से बुद्ध के दो प्रमुख शिष्यों—‘सारिपुत्र और महामोग्गल्लान’—के पवित्र अस्थि-कलश प्राप्त हुए थे।
- विशिष्टता एवं परीक्षा तथ्य: 1818 ई. में ब्रिटिश अधिकारी जनरल टेलर (General Taylor) ने साँची की पुनः खोज की। भोपाल की बेगमों—शाहजहाँ बेगम और सुल्तान जहाँ बेगम—ने इसके संरक्षण और संग्रहालय निर्माण के लिए जॉन मार्शल को भरपूर वित्तीय सहायता दी। जॉन मार्शल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द मॉन्यूमेंट्स ऑफ साँची’ सुल्तान जहाँ बेगम को समर्पित की। 1989 में साँची को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) घोषित किया गया।
4.2 भरहुत स्तूप
- स्थान एवं वर्तमान राज्य: सतना जिला, मध्य प्रदेश (इलाहाबाद-जबलपुर मार्ग तथा प्राचीन उत्तरापथ और दक्षिणापथ को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्ग पर स्थित)।
- काल एवं राजवंश: भरहुत स्तूप का प्रारंभिक निर्माण ईंटों से हुआ था; इसकी प्रसिद्ध पाषाण वेदिका, स्तंभ और तोरण मुख्यतः दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के मौर्योत्तर चरण से जुड़े हैं। पूर्वी तोरण पर ‘सुगनम रजे...’ (शुंगों के राज्य में) का अभिलेख उत्कीर्ण है।
- निर्माण सामग्री: गहरा लाल बलुआ पत्थर (Dark Red Sandstone)।
- स्थापत्य विशेषताएँ एवं वर्तमान स्थिति: भरहुत का मुख्य स्तूप अब स्थानीय लोगों द्वारा ईंटें निकाल लिए जाने के कारण नष्ट हो चुका है। 1873 ई. में अलेक्जेंडर कनिंघम (Alexander Cunningham) ने इस स्थल की खोज की और इसकी बची हुई पाषाण वेदिका (Railing) तथा पूर्वी तोरण को बचाकर कोलकाता के भारतीय संग्रहालय (Indian Museum, Kolkata) तथा प्रयागराज संग्रहालय में स्थानांतरित करवाया।
- मूर्तिकला, पदक और अभिलेख:
- शैलीगत विशेषताएँ: भरहुत की मूर्तिकला साँची की तुलना में अधिक प्राचीन और प्रारंभिक है। यहाँ उभारदार नक्काशी कम गहरी (Low/Flat Relief) है। मानव आकृतियाँ कुछ हद तक सीधी, कठोर और हाथ-पैर शरीर से चिपके हुए दिखाए गए हैं, जो काष्ठ-तक्षण की प्रारंभिक शैली को दर्शाते हैं।
- पदक (Medallions): वेदिका के स्तंभों और सूचियों पर गोलाकार ‘कमल पदक’ (Lotus Medallions) बने हैं, जिनके भीतर जातक कथाओं के दृश्य उकेरे गए हैं।
- चित्रात्मक अभिलेख (Label Inscriptions): भरहुत की सबसे बड़ी विशिष्टता यह है कि यहाँ प्रत्येक जातक दृश्य या यक्ष प्रतिमा के नीचे या ऊपर ब्राह्मी लिपि और प्राकृत भाषा में उसका नाम/शीर्षक लिखा हुआ है (जैसे—‘भगवतो सकमुनिनो बोधो’ अर्थात् भगवान शाक्यमुनि का बोधि वृक्ष; ‘जेतवन अनाथपिंडिको देति कोटि-संथतेन केता’)। इससे इतिहासकारों को प्राचीन बौद्ध कथाओं की पहचान करने में सर्वाधिक सहायता मिली।
- प्रमुख कथात्मक दृश्य एवं यक्ष-यक्षिणी:
- जेतवन विहार का क्रय: व्यापारी अनाथपिंडिक द्वारा श्रावस्ती के जेतवन को चाँदी के चौकोर सिक्कों (कार्षापण) से ढककर खरीदने का प्रसिद्ध दृश्य।
- जातक कथाएँ: रुरु जातक (मृग जातक), महाकपि जातक, मुग-पक्ख जातक, छदंत जातक, अजातशत्रु की बुद्ध से भेंट, रानी माया का स्वप्न (आकाश से उतरता हाथी)।
- लोक देवता: कुबेर यक्ष, सुदर्शना यक्षिणी, चुलकोका देवता और सिरिमा देवता की आदमकद प्रतिमाएँ वेदिका स्तंभों पर उत्कीर्ण हैं। यहाँ भी बुद्ध का निरूपण पूर्णतः प्रतीकात्मक (अनाकार) है।
4.3 अमरावती स्तूप
- स्थान एवं वर्तमान राज्य: अमरावती (प्राचीन नाम—धान्यकटक / धरणीकोटा), गुंटूर जिला, आंध्र प्रदेश (निचली कृष्णा नदी घाटी के तट पर स्थित; ध्यान दें—यह गोदावरी घाटी में नहीं है)।
- काल एवं संरक्षण: 2री शताब्दी ईसा पूर्व से 3री शताब्दी ईस्वी तक। यह सातवाहन और बाद में इक्ष्वाकु शासकों के काल में तथा ‘महासंघिक’ (विशेषकर चैत्यक शैल) बौद्ध संप्रदाय के प्रमुख केंद्र के रूप में फला-फूला।
- निर्माण सामग्री: श्वेत-हरित चूना पत्थर (Greenish-white Limestone), जो संगमरमर जैसा दिखता है (इसे ‘पलनाड संगमरमर’ या Palnad Marble भी कहा जाता है)।
- स्थापत्य विशेषताएँ:
- अमरावती के स्तूप को अभिलेखों में ‘महाचैत्य’ कहा गया है। इसका व्यास लगभग 160 फीट और ऊँचाई लगभग 90–100 फीट रही होगी, जो आकार में इसे प्राचीन भारत के सबसे विशाल स्तूपों में से एक बनाता है।
- दक्षिण भारतीय (आंध्र) स्तूपों की एक अनूठी स्थापत्य विशेषता यहाँ दिखाई देती है—स्तूप के चारों प्रवेश द्वारों पर तोरण के स्थान पर मेधि से बाहर निकले हुए चार आयताकार मंच बने होते थे जिन्हें ‘आयक मंच’ (Ayaka Platforms) कहा जाता था। प्रत्येक आयक मंच पर पाँच-पाँच ऊँचे स्तंभ खड़े किए जाते थे जिन्हें ‘आयक स्तंभ’ (Ayaka Pillars) कहा जाता था। ये पाँच स्तंभ बुद्ध के जीवन की पाँच महान घटनाओं—1. जन्म, 2. महाभिनिष्क्रमण, 3. संबोधि (ज्ञान प्राप्ति), 4. धर्मचक्रप्रवर्तन, और 5. महापरिनिर्वाण—के प्रतीक थे।
- यहाँ केवल मेधि ही नहीं, बल्कि संपूर्ण अण्ड (गुंबद) को भी सूक्ष्म नक्काशीदार चूना-पत्थर की पट्टियों (कंचुक / Dome Slabs) से ढका गया था।
- मूर्तिकला और कथात्मक दृश्य (साँची व भरहुत से अंतर):
- संक्रमणशील कला: अमरावती की कला दो चरणों में विकसित हुई—प्रारंभिक चरण (2री–1ली शताब्दी ई.पू.) में बुद्ध को प्रतीकों द्वारा (अनाकार) दिखाया गया, किंतु दूसरे चरण (2री–3री शताब्दी ई.) में प्रतीकों के साथ-साथ बुद्ध की मानवाकार प्रतिमाएँ भी उत्कीर्ण की जाने लगीं। कई फलकों पर अण्ड के सामने स्वयं बुद्ध की प्रतिमा या प्रतीकात्मक स्तूप उकेरा गया है।
- गतिशील और भावप्रवण मूर्तिकला: भरहुत की स्थिरता और साँची की सरलता की तुलना में अमरावती की मूर्तिकला अत्यंत गतिशील (Dynamic), भीड़भाड़ वाली, गहरी नक्काशी (High Relief) और त्रिभंग मुद्राओं से युक्त है। आकृतियाँ छरहरी (Slender), लंबी और गहन मानवीय संवेदनाओं से भरी हैं।
- प्रमुख दृश्य: पागल हाथी ‘नालागिरि’ को बुद्ध द्वारा शांत किए जाने का अत्यंत नाटकीय दृश्य (Taming of Nalagiri), राहुल को पिता बुद्ध के समक्ष प्रस्तुत करती यशोधरा, तथा बुद्ध के भिक्षापात्र को स्वर्ग ले जाते देवता।
- परीक्षा तथ्य: 1796–97 में कर्नल कॉलिन मैकेंज़ी (Colin Mackenzie) ने अमरावती के खंडहरों का पता लगाया। बाद में वाल्टर इलियट इसके कई संगमरमर फलक मद्रास और लंदन (ब्रिटिश म्यूजियम) ले गए। एच.एच. कोल (H.H. Cole) ने अमरावती की तरह साँची की मूर्तियों को विदेश ले जाने का विरोध किया और ‘इन-सीटू’ (In-situ / मूल स्थान पर) संरक्षण की वकालत की। अमरावती कला शैली ने बाद की पल्लव-चोल मूर्तिकला के साथ-साथ श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया की बौद्ध कला पर गहरा प्रभाव डाला।
4.4 नागार्जुनकोंडा स्तूप
- स्थान एवं वर्तमान राज्य: गुंटूर (अब पालनाडु) जिला, आंध्र प्रदेश (कृष्णा नदी घाटी में नल्लामलाई पहाड़ियों से घिरा क्षेत्र; प्राचीन नाम—विजयपुरी)।
- काल एवं संरक्षण: 3री–4थी शताब्दी ईस्वी; इक्ष्वाकु राजवंश (वाशिष्ठीपुत्र चाम्तिमुल, वीरपुरुषदत्त, एहुवल चाम्तिमुल)।
- संरक्षकों की विशिष्ट प्रकृति: नागार्जुनकोंडा भारतीय इतिहास में धार्मिक सहिष्णुता और महिला संरक्षण का अद्भुत उदाहरण है। इक्ष्वाकु राजा स्वयं वैदिक धर्म (अश्वमेध व वाजपेय यज्ञ करने वाले) के अनुयायी थे, किंतु राजपरिवार की महिलाओं—विशेषकर रानियों और राजकुमारियों जैसे ‘चाम्तिश्री’ (Chamtisri), अडवि-चाम्तिश्री और बोधिश्री—ने बौद्ध महाचैत्य और विहारों को विशाल दान दिए।
- स्थापत्य विशेषताएँ:
- यहाँ के स्तूपों की सबसे बड़ी तकनीकी विशेषता उनकी आंतरिक निर्माण योजना है—ईंटों की दीवारों को बैलगाड़ी के पहिए की तीलियों (Spoked-wheel Plan) या ‘स्वस्तिक’ (Swastika) के आकार में बनाया जाता था और बीच के खाली स्थानों में मिट्टी व कंकड़ भरे जाते थे। इससे कम सामग्री में विशाल गुंबद को अत्यधिक मजबूती मिलती थी और यह धर्मचक्र का प्रतीकात्मक रूप भी था।
- अमरावती की भाँति यहाँ भी चार दिशाओं में ‘आयक मंच’ और पाँच-पाँच ‘आयक स्तंभ’ बनाए गए थे।
- मूर्तिकला एवं विशिष्ट तथ्य: यहाँ अमरावती शैली की ही निरंतरता दिखती है, परंतु आकृतियों में तीव्र गति के स्थान पर कुछ अधिक सौम्यता और गोलाई आ जाती है। बुद्ध के जीवन के दृश्य, जातक कथाएँ और मिथुन आकृतियाँ प्रमुख हैं। 1950–60 के दशक में नागार्जुनसागर बाँध के निर्माण के समय जब यह पूरी घाटी जलमग्न होने लगी, तब भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) ने एक अभूतपूर्व बचाव अभियान चलाकर यहाँ के स्तूपों और अवशेषों को कृष्णा नदी के बीच स्थित ‘नागार्जुनकोंडा द्वीप’ की पहाड़ी पर ठीक उसी रूप में पुनः स्थापित (Transplant) किया।
4.5 तुलना तालिका: साँची बनाम भरहुत बनाम अमरावती स्तूप
| तुलना का आधार | भरहुत स्तूप | साँची स्तूप (स्तूप सं. 1) | अमरावती स्तूप (महाचैत्य) |
|---|---|---|---|
| 1. वर्तमान राज्य एवं जिला | मध्य प्रदेश (सतना जिला) | मध्य प्रदेश (रायसेन जिला) | आंध्र प्रदेश (गुंटूर जिला, कृष्णा नदी तट) |
| 2. प्रमुख काल | 2री शताब्दी ई.पू. (शुंग काल) | 3री शताब्दी ई.पू. से 1ली शताब्दी ई.पू. | 2री शताब्दी ई.पू. से 3री शताब्दी ईस्वी |
| 3. प्रमुख राजवंश/संरक्षण | मौर्य (मूल) एवं शुंग | मौर्य, शुंग, सातवाहन एवं गुप्त | सातवाहन एवं इक्ष्वाकु (महासंघिक केंद्र) |
| 4. निर्माण सामग्री | गहरा लाल बलुआ पत्थर | ईंट (मूल) एवं पीला-सफेद बलुआ पत्थर | श्वेत-हरित चूना पत्थर (पलनाड संगमरमर) |
| 5. बुद्ध का निरूपण | पूर्णतः अनाकार (प्रतीकात्मक) | पूर्णतः अनाकार (तोरणों पर प्रतीकात्मक; गुप्त काल में अलग से मूर्तियाँ रखी गईं) | प्रारंभिक चरण में अनाकार; उत्तर चरण (2री-3री शती ई.) में मानवाकार प्रतिमाएँ भी |
| 6. स्थापत्य विशिष्टता | अलंकृत पाषाण वेदिका व पदक; प्रत्येक दृश्य के साथ ब्राह्मी में शीर्षक अभिलेख | दोहरा प्रदक्षिणापथ और चार दिशाओं में चार सुसज्जित तोरण द्वार | तोरणों के स्थान पर चार ‘आयक मंच’ और प्रत्येक पर 5 ‘आयक स्तंभ’; पूरा गुंबद संगमरमर से ढका |
| 7. मूर्तिकला शैली | कम उभार (Low Relief), सपाट, सीधी और कुछ हद तक कठोर आकृतियाँ | मध्यम उभार, स्वाभाविक अनुपात, लोक-तत्त्वों (शालभंजिका) का संतुलित समावेश | अत्यधिक उभार (High Relief), छरहरी-गतिशील आकृतियाँ, त्रिभंग मुद्रा और गहन भावाभिव्यक्ति |
| 8. संरक्षण की वर्तमान स्थिति | मुख्य स्तूप नष्ट; वेदिका कोलकाता और प्रयागराज संग्रहालयों में सुरक्षित | अपने मूल स्थान (In-situ) पर पूर्णतः सुरक्षित (UNESCO स्थल - 1989) | मुख्य टीला क्षतिग्रस्त; फलक अमरावती, चेन्नई और ब्रिटिश संग्रहालय (लंदन) में |
5. चैत्य और चैत्यगृह
5.1 चैत्य और चैत्यगृह: अर्थ एवं संकल्पना
- चैत्य शब्द का अर्थ: ‘चैत्य’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के ‘चिता’ (अग्नि-वेदी या श्मशान टीला) अथवा ‘चैतन्य’ (चेतना/ध्यान) से मानी जाती है। पूर्व-बौद्ध और प्रारंभिक बौद्ध साहित्य में किसी भी पवित्र स्थान, पवित्र वृक्ष (वृक्ष-चैत्य), स्मारक टीले या उपासना स्थल को ‘चैत्य’ कहा जाता था।
- चैत्य और चैत्यगृह में अंतर: तकनीकी वास्तुकला की दृष्टि से, गुफा या भवन के अंतिम सिरे पर स्थित छोटा अर्धगोलाकार स्तूप स्वयं ‘चैत्य’ (उपासना की वस्तु) है, और जिस विशाल मंडप या गुफा के भीतर वह स्थित होता है, उसे ‘चैत्यगृह’ (Chaityagriha - प्रार्थना गृह) कहा जाता है। सामान्य प्रचलन में पूरे प्रार्थना मंडप को ही ‘चैत्य’ कह दिया जाता है।
- सामूहिक उपासना (Congregational Worship): चूँकि खुले आकाश के नीचे बने बड़े स्तूपों पर वर्षा ऋतु या प्रतिकूल मौसम में सामूहिक प्रार्थना कठिन होती थी, इसलिए शैलकृत गुफाओं (और कुछ संरचनात्मक भवनों जैसे बैराठ, साँची मंदिर सं. 18, तेर और चेजरला) में चैत्यगृह बनाए गए, जहाँ भिक्षु और उपासक एकत्र होकर स्तूप की परिक्रमा व वंदना कर सकें।
5.2 चैत्यगृह के प्रमुख स्थापत्य अंग
1. आंतरिक स्तूप (Votive/Rock-cut Stupa): चैत्यगृह के सबसे भीतरी अर्धवृत्ताकार सिरे पर चट्टान को ही तराशकर बनाया गया स्तूप, जो उपासना का मुख्य केंद्र होता था।
2. अप्स / गजपृष्ठाकार सिरा (Apse): चैत्यगृह की योजना आयताकार होते हुए भी उसका अंतिम भीतरी सिरा अर्धवृत्ताकार (हाथी की पीठ जैसा—गजपृष्ठाकार या Apsidal) होता था, ताकि स्तूप के चारों ओर आसानी से गोल परिक्रमा की जा सके।
3. नैव / मध्य मंडप (Nave): प्रवेश द्वार से आंतरिक स्तूप तक जाने वाला चौड़ा केंद्रीय कक्ष, जहाँ भिक्षु और उपासक बैठकर प्रार्थना करते थे।
4. पार्श्व मार्ग / वीथियाँ (Side Aisles / Pradakshinapatha): केंद्रीय मंडप (Nave) के दोनों किनारों पर स्तंभों की पंक्तियों द्वारा अलग किए गए संकरे गलियारे। उपासक बाएँ गलियारे से अंदर जाकर स्तूप की परिक्रमा करते हुए दाएँ गलियारे से बाहर निकलते थे, जिससे मध्य मंडप में बैठे लोगों के ध्यान में बाधा नहीं पड़ती थी।
5. स्तंभ (Pillars): मध्य मंडप को पार्श्व गलियारों से अलग करने वाले पत्थर के स्तंभ। प्रारंभिक गुफाओं (जैसे भाजा) में ये स्तंभ सादे, अष्टकोणीय और छत के भार को सहने के लिए अंदर की ओर थोड़े झुके हुए (Slanting) होते थे; बाद में (जैसे कार्ले में) ये सीधे और भव्य रूप से अलंकृत हो गए।
6. चैत्य-वातायन / चंद्रशाला (Chaitya Window / Sun Window): चैत्यगृह के मुख्य द्वार के ठीक ऊपर बनी विशाल घोड़े की नाल के आकार (Horseshoe-shaped) या पीपल के पत्ते जैसी खिड़की। इसका स्थापत्य कार्य गुफा के अंधेरे भीतरी भाग में सूर्य के प्रकाश को सीधे आंतरिक स्तूप पर केंद्रित करना और वायु-संचार बनाए रखना था।
7. बैरल-वॉल्टेड छत (Barrel-Vaulted Roof) और काष्ठ अनुकरण: चैत्यगृह की छत अंदर से अर्ध-बेलनाकार या ढोलाकार (Vaulted) होती थी। यद्यपि छत ठोस चट्टान को काटकर बनाई जाती थी और उसे किसी सहारे की आवश्यकता नहीं थी, फिर भी कारीगरों ने प्राचीन लकड़ी के भवनों की परंपरा की नकल करते हुए छत में सागौन की लकड़ी की असली पसलियाँ (Wooden Ribs) लगाईं या पत्थर में ही लकड़ी की कड़ियों को उकेरा।
5.3 प्रमुख चैत्यगृह उदाहरण
1. भाजा चैत्य (पुणे, महाराष्ट्र - 2री शताब्दी ईसा पूर्व): पश्चिमी भारत के सबसे प्राचीन प्रारंभिक बौद्ध चैत्यगृहों में से एक (गुफा सं. 12)। इसके अष्टकोणीय स्तंभ अंदर की ओर झुके हुए हैं, पूरा अग्रभाग (Facade) कभी लकड़ी के परदे से ढका था जो अब नष्ट हो चुका है, और छत में आज भी प्राचीन लकड़ी की पसलियाँ मौजूद हैं। यहाँ के एक विहार (गुफा 19) में सूर्य (रथ पर सवार) और इंद्र (ऐरावत हाथी पर सवार) की प्रसिद्ध उभारदार मूर्तियाँ हैं।
2. कोंडाने और पितलखोरा चैत्य (महाराष्ट्र - 2री–1ली शताब्दी ईसा पूर्व): कोंडाने में लकड़ी से पत्थर की ओर बढ़ते संक्रमण के स्पष्ट चिह्न दिखते हैं। पितलखोरा (छत्रपति संभाजीनगर) अपनी जल-निकासी प्रणाली और यक्ष आकृतियों (कनकदास स्वर्णकार द्वारा निर्मित) के लिए प्रसिद्ध है।
3. बेडसा चैत्य (पुणे, महाराष्ट्र - 1ली शताब्दी ईसा पूर्व / 1ली शताब्दी ईस्वी): यहाँ के स्तंभों के शीर्ष पर अशोक-स्तंभों से प्रेरित घंटीनुमा कमल (Persepolitan Bell Capital) और उनके ऊपर अश्व व हाथियों पर सवार स्त्री-पुरुष युगल (मिथुन) की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं।
4. अजंता के चैत्यगृह (महाराष्ट्र): अजंता में कुल 5 चैत्यगृह हैं—गुफा संख्या 9 और 10 (प्रारंभिक/सातवाहन चरण, 2री–1ली शताब्दी ई.पू., जहाँ स्तूप पर बुद्ध की आकृति नहीं है; गुफा 9 प्रारंभिक चैत्यगृह योजना का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है) तथा गुफा संख्या 19, 26 और 29 (वाकाटक/महायान चरण, 5वीं शताब्दी ई., जहाँ आंतरिक स्तूप के अग्रभाग पर स्वयं बुद्ध की भव्य प्रतिमा उत्कीर्ण है)।
5.4 कार्ले चैत्य — विशेष अध्ययन
- स्थान एवं काल: लोनावला (पुणे जिला, महाराष्ट्र) के निकट भोरघाट व्यापारिक मार्ग पर स्थित; प्रथम शताब्दी ईस्वी (लगभग 50–120 ईस्वी, सातवाहन एवं पश्चिमी क्षत्रप नहपान का काल)।
- स्थापत्य महत्त्व एवं योजना: कार्ले का चैत्यगृह भारत में समस्त शैलकृत प्रारंभिक बौद्ध चैत्य स्थापत्य का सर्वोत्कृष्ट और सबसे विशाल (लगभग 124 फीट लंबा, 46 फीट चौड़ा और 45 फीट ऊँचा) उदाहरण है। अभिलेख में इसे "जंबूद्वीप का सर्वोत्तम शैलगृह" (जंबूदीपम्हि उत्तमं सेलाघरं) कहा गया है।
- स्तंभ और मूर्तिकला: मध्य मंडप में कुल 37 स्तंभ हैं। मध्य भाग के 30 स्तंभों का आधार कलश के आकार का (कुंभ-आधार / Vase base) है (ठीक वैसे ही जैसे मिट्टी के घड़े में लकड़ी का खंभा गाड़ा जाता था), मध्य भाग अष्टकोणीय है, और शीर्ष पर उल्टे कमल के ऊपर चारण-चौकी (Abacus) है जिस पर घुटने टेके हुए हाथियों, घोड़ों और उन पर बैठे प्रसन्नचित्त स्त्री-पुरुष युगलों (मिथुन आकृतियों) की अत्यंत सजीव मूर्तियाँ हैं। स्तूप के ठीक पीछे परिक्रमा पथ के 7 स्तंभ सादे और अष्टकोणीय हैं।
- प्रवेश भाग एवं लकड़ी के रिब्स: चैत्य के बाहर दो विशाल स्तंभ (सिंह-स्तंभ) थे जिनमें से एक आज भी खड़ा है। बरामदे की दीवारों पर दंपति दानदाताओं (मिथुन) की भव्य मूर्तियाँ हैं और विशाल चैत्य-वातायन के नीचे छोटे-छोटे मेहराबों का जाल है। छत में लगभग 2000 वर्ष पुरानी सागौन की लकड़ी की मूल कड़ियाँ (Wooden Ribs) तथा आंतरिक स्तूप के ऊपर लकड़ी की छत्री आज भी सुरक्षित हैं।
- दानदाता एवं व्यापारी वर्ग: कार्ले के अभिलेख प्राचीन भारत के व्यापारिक नेटवर्क का जीवंत चित्र प्रस्तुत करते हैं—इसका मुख्य निर्माण ‘वैजयंती’ (बनवासी, कर्नाटक) के श्रेष्ठि (बैंकर/व्यापारी) ‘भूतपाल’ (Bhutapala) के संरक्षण में हुआ। इसके अतिरिक्त सोपारा, धेनुकाकटक के यवन (इंडो-ग्रीक) व्यापारियों, बढ़इयों के संघ, भिक्षुणियों तथा सातवाहन शासक वाशिष्ठीपुत्र पुलुमावी और क्षहरात नहपान के दामाद उषवदात ने यहाँ ग्राम दान दिए।
6. विहार
6.1 विहार की संकल्पना और क्रमिक विकास
- विहार का अर्थ और वर्षावास (Vassavasa): ‘विहार’ का शाब्दिक अर्थ है—भ्रमण करना या विश्राम स्थल। प्रारंभ में बौद्ध और जैन भिक्षु वर्ष के आठ महीने गाँव-गाँव घूमकर (परिव्राजक के रूप में) धर्म प्रचार करते थे, किंतु वर्षा ऋतु के चार महीनों (आषाढ़ से कार्तिक तक) में नदियों में बाढ़ आने और चलने से सूक्ष्म जीवों व फसलों को नुकसान पहुँचने (अहिंसा सिद्धांत) के कारण वे एक ही स्थान पर रुककर ध्यान और स्वाध्याय करते थे। इसे ‘वर्षावास’ (Vassavasa) कहा गया।
- भिक्षु निवास के रूप में विकास: वर्षावास की इसी आवश्यकता से प्रारंभ में नगरों के बाहर धनी व्यापारियों द्वारा दान किए गए उद्यानों में कच्चे ‘संघाराम’ (जैसे राजगृह का वेणुवन, वैशाली का आम्रपाली वन, श्रावस्ती का जेतवन) बने। बाद में पश्चिमी घाट और पूर्वी भारत में इन्हें स्थायी शैलकृत गुफाओं (लयन / Lena) और ईंटों के विहारों का रूप दिया गया।
- विहार के प्रमुख स्थापत्य अंग:
1. बरामदा (Verandah): गुफा के प्रवेश द्वार पर स्तंभों वाला बाहरी गलियारा।
2. केंद्रीय मंडप (Central Hall / Mandapa): बरामदे के पीछे स्थित एक विशाल चौकोर या आयताकार कक्ष, जहाँ भिक्षु आपस में धर्म-चर्चा और भोजन आदि के लिए एकत्र होते थे। प्रारंभिक विहारों में इस मंडप में स्तंभ नहीं होते थे (अस्तंभित कक्ष), किंतु गुप्त-वाकाटक काल में बड़े मंडपों की छत को सहारा देने के लिए वर्गाकार क्रम में स्तंभ बनाए जाने लगे।
3. कोशिकाएँ / भिक्षु-कक्ष (Monastic Cells): केंद्रीय मंडप की तीनों दीवारों (बाएँ, दाएँ और पीछे) में बनी छोटी-छोटी कोठरियाँ। प्रत्येक कोठरी में भिक्षु के सोने के लिए चट्टान को ही काटकर बनाया गया पत्थर का पलंग (Rock-cut Bed) और सिरहाने का तकिया तथा दीपक या ग्रंथ रखने के लिए आला (Niche) बना होता था।
4. जल-कुंड (Water Cisterns): प्रत्येक विहार के बाहर वर्षा के जल को संचित करने के लिए चट्टान में गहरे जल-कुंड खोदे जाते थे।
- प्रारंभिक बौद्ध परंपरा से महायान काल तक परिवर्तन (गर्भगृह का विकास):
- प्रारंभिक बौद्ध चरण (2री शताब्दी ईसा पूर्व से आरंभिक ईस्वी शताब्दियाँ): इस काल के विहार (जैसे भाजा, नासिक और अजंता की गुफा सं. 12 व 13) विशुद्ध रूप से आवासीय थे। इनमें किसी भी प्रकार की बुद्ध प्रतिमा या मंदिर-कक्ष नहीं होता था।
- उत्तरकालीन बौद्ध चरण (विशेषकर 5वीं–7वीं शताब्दी ई.): वाकाटक और गुप्त काल में जब मूर्ति-पूजा केंद्रीय हो गई, तब विहार के केंद्रीय मंडप की पिछली दीवार के मध्य भाग की कोठरी को गहरा करके एक ‘अंतराल’ (Vestibule) और ‘गर्भगृह’ (Sanctum Sanctorum) में बदल दिया गया, जिसमें धर्मचक्रप्रवर्तन या पद्मासन मुद्रा में बुद्ध की विशाल प्रतिमा स्थापित की गई (जैसे अजंता की गुफा 1, 2, 16, 17)। इस प्रकार विहार अब केवल छात्रावास न रहकर ‘चैत्य-सह-विहार’ (Monastery-cum-Sanctuary) बन गए।
6.2 प्रमुख विहार उदाहरण
1. नासिक गुफाएँ (पांडुलेना / त्रिरश्मि गुफाएँ, महाराष्ट्र): यहाँ 24 गुफाओं का समूह है (1ली शताब्दी ई.पू. से 3री शताब्दी ई.)। यहाँ की गुफा संख्या 3 (‘गौतमीपुत्र विहार’) और गुफा संख्या 10 (‘नहपान विहार’) अत्यंत प्रसिद्ध हैं। इनके बाहरी स्तंभों और द्वारों पर सुंदर नक्काशी है, जबकि भीतर आवासीय कोठरियाँ हैं।
2. कन्हेरी गुफाएँ (संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान, मुंबई, महाराष्ट्र): प्राचीन बंदरगाह सोपारा और कल्याण के निकट स्थित कन्हेरी में 109 से अधिक शैलकृत गुफाएँ हैं, जो पहली शताब्दी ईस्वी से 10वीं शताब्दी ईस्वी तक निरंतर उपयोग में रहीं। यहाँ के अधिकांश गुफा-कक्ष सरल विहार हैं जिनमें उत्कृष्ट जल-प्रबंधन प्रणाली (वर्षा जल संचयन की नालियाँ और कुंड) है। यहाँ की गुफा संख्या 3 एक बड़ा चैत्य है और गुफा संख्या 11 (‘दरबार हॉल’) एक विशाल सभा-विहार है।
3. अजंता और बाघ के विहार: अजंता में 25 विहार हैं (गुफा 12 सबसे प्राचीन प्रारंभिक बौद्ध विहार है; गुफा 1, 2, 16, 17 महायान काल के चित्रित व मूर्तिकला-युक्त विहार हैं)। मध्य प्रदेश के धार जिले में बाघ नदी के तट पर स्थित ‘बाघ की गुफाएँ’ (9 गुफाएँ, 5वीं–6वीं शताब्दी ई.) भी बौद्ध विहार हैं, जहाँ ‘रंग महल’ (गुफा 4) अपने भित्ति-चित्रों (जैसे हल्लीमस्क/हल्लीसलास्य लोक नृत्य) के लिए प्रसिद्ध है।
4. पूर्वी भारत के संरचनात्मक महाविहार: गुप्त और पाल काल में बिहार व बंगाल में चट्टानों की अनुपस्थिति के कारण पकी ईंटों से विशाल आंगन-आधारित ‘महाविहार’ बने—जैसे नालंदा महाविहार (गुप्त काल से विशेष रूप से विकसित और बाद में हर्ष तथा पाल शासकों के संरक्षण में विस्तृत, विक्रमशिला महाविहार (अंतीचक, भागलपुर—धर्मपाल द्वारा स्थापित), ओदंतपुरी (बिहार शरीफ—गोपाल द्वारा स्थापित) और सोमपुर महाविहार (पहाड़पुर, वर्तमान बांग्लादेश—धर्मपाल द्वारा स्थापित)।
6.3 तुलना तालिका: चैत्य बनाम विहार
| तुलना का आधार | चैत्य (चैत्यगृह) | विहार (संघाराम) |
|---|---|---|
| 1. मुख्य उद्देश्य | बौद्ध भिक्षुओं और उपासकों का सामूहिक प्रार्थना एवं उपासना स्थल (Place of Worship)। | बौद्ध भिक्षुओं के रहने, विश्राम करने और अध्ययन करने का आवासीय स्थान (Dwelling Place of Monks)। |
| 2. तल-योजना (Ground Plan) | सामान्यतः आयताकार मंडप जिसका अंतिम सिरा अर्धवृत्ताकार / गजपृष्ठाकार (Apsidal) होता था। | सामान्यतः एक वर्गाकार या आयताकार केंद्रीय कक्ष (Courtyard/Hall) जिसके तीनों ओर छोटी कोठरियाँ होती थीं। |
| 3. छत की संरचना | अर्ध-बेलनाकार या ढोलाकार (Barrel-vaulted roof), जिसमें अक्सर लकड़ी की पसलियाँ लगी होती थीं। | सपाट छत (Flat roof); प्रारंभिक काल में बिना स्तंभों के और बाद में स्तंभों के सहारे। |
| 4. केंद्रीय पूज्य तत्त्व | मंडप के अंतिम सिरे पर एक चट्टान-निर्मित स्तूप (प्रारंभिक बौद्ध में सादा, महायान में बुद्ध प्रतिमा युक्त)। | प्रारंभिक काल में कोई पूज्य प्रतीक नहीं; महायान काल में पिछली दीवार में बुद्ध प्रतिमा वाला गर्भगृह। |
| 5. आंतरिक विभाजन | स्तंभों की दो पंक्तियों द्वारा मध्य मंडप (Nave) और दो पार्श्व प्रदक्षिणा पथों (Aisles) में विभाजित। | बाहरी बरामदा, केंद्रीय मंडप और भिक्षुओं के सोने के लिए पाषाण-शय्या युक्त छोटी कोशिकाएँ (Cells)। |
| 6. प्रकाश व्यवस्था | प्रवेश द्वार के ऊपर विशाल घोड़े की नाल के आकार का ‘चैत्य-वातायन’ (चन्द्रशाला)। | बरामदे के द्वारों और छोटी खिड़कियों से सामान्य प्रकाश। |
| 7. संख्यात्मक अनुपात | किसी भी गुफा परिसर में चैत्यगृहों की संख्या कम (प्रायः 1 से 5) होती थी। | भिक्षुओं की बड़ी संख्या के कारण विहारों की संख्या बहुत अधिक होती थी (जैसे अजंता में 5 चैत्य और 25 विहार)। |
| 8. प्रमुख उदाहरण | कार्ले, भाजा (गुफा 12), बेडसा, अजंता (गुफा 9, 10, 19, 26), एलोरा (गुफा 10 - विश्वकर्मा)। | अजंता (गुफा 1, 2, 12, 16, 17), नासिक (गुफा 3, 10), कन्हेरी, एलोरा (गुफा 11, 12 - तीन ताल)। |
7. बौद्ध शैलकृत गुफा स्थापत्य
प्राचीन भारतीय कला के इतिहास में शैलकृत स्थापत्य (Rock-cut Architecture) का विशेष महत्त्व है। भारत की शैलकृत परंपरा में बौद्ध गुफाओं का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है और पश्चिमी दक्कन में इनके बड़े समूह विकसित हुए।
(क) शैलकृत स्थापत्य की आवश्यकता और पश्चिमी घाट का भूगोल
- स्थायित्व और जलवायु: लकड़ी, बांस और कच्ची ईंट से बने प्रारंभिक विहार भारी मानसूनी वर्षा में जल्दी नष्ट हो जाते थे। भिक्षु-संघ को वर्षावास के लिए ऐसे स्थायी आश्रयों की आवश्यकता थी जो सदियों तक सुरक्षित रह सकें और एकांत ध्यान के लिए उपयुक्त हों।
- पश्चिमी घाट (सह्याद्रि) की भौगोलिक उपयुक्तता: दक्कन के पठार और पश्चिमी घाट की पहाड़ियाँ (दक्कन ट्रैप) विशाल आग्नेय ‘बेसाल्ट’ (Basalt) चट्टानों की क्षैतिज परतों से बनी हैं। ये चट्टानें एक समान (Homogeneous) और मजबूत थीं, जिन्हें ऊपर से नीचे की ओर तराशना तकनीकी रूप से सुलभ था।
(ख) व्यापारिक मार्ग, व्यापारी समुदाय और श्रेणियाँ
पश्चिमी दक्कन की लगभग सभी प्रमुख बौद्ध गुफाएँ (भाजा, बेडसा, कार्ले, कोंडाने, नासिक, जुन्नर, कन्हेरी, अजंता, पितलखोरा) किसी आकस्मिक स्थान पर नहीं बनी थीं, बल्कि वे दक्कन के भीतरी व्यापारिक नगरों (पैठण/प्रतिष्ठान, तगर, नासिक, उज्जयिनी) को पश्चिमी तट के समृद्ध बंदरगाहों (भड़ौच/भृगुकच्छ, सोपारा, कल्याण, चौल) से जोड़ने वाले पहाड़ी दर्रों—विशेषकर नानेघाट, भोरघाट और थालघाट—के ठीक ऊपर स्थित थीं।
- दीर्घ दूरी के समुद्री और स्थल व्यापार से समृद्ध हुए सार्थवाहों (Caravan leaders), श्रेष्ठियों (Bankers) और कारीगर श्रेणियों (Shrenis) ने पुण्य अर्जन के लिए बौद्ध संघों को दान दिया।
- इन मार्गों पर स्थित विहार यात्रियों और व्यापारिक समुदायों से जुड़े सामाजिक नेटवर्क का हिस्सा बने। अभिलेख स्थायी निधियों, दानों और व्यापारी संरक्षण की मजबूत परंपरा का प्रमाण देते हैं।
(ग) चट्टान काटने की तकनीक और काष्ठ अनुकरण
शैलकृत स्थापत्य जोड़कर खड़ी की गई इमारत नहीं, बल्कि जीवित चट्टान को काटकर निकाली गई संरचना है। कारीगर चट्टान के मुख से भीतर की ओर स्थान निकालते हुए छत, स्तंभ, दीवार और कक्षों को उसी चट्टान में छोड़ते थे। अलग-अलग स्थलों पर उत्खनन की कार्य-पद्धति भूगोल, चट्टान और योजना के अनुसार बदलती थी; इसलिए इसे एक ही कठोर तकनीकी क्रम में बाँधना उचित नहीं है। प्रारंभिक गुफाओं में तिरछे स्तंभ, लकड़ी की मेहराबें और जालीदार खिड़कियाँ स्पष्ट दिखाती हैं कि पत्थर के कारीगर बढ़ईगिरी (Carpentry) की तकनीकों को ही चट्टान में उतार रहे थे।
(घ) प्रमुख शैलकृत गुफा स्थलों का कालानुक्रमिक विकास
1. मौर्य काल (3री शताब्दी ई.पू.): बाराबर और नागार्जुनी गुफाएँ (जहानाबाद, बिहार) — आजीवक संप्रदाय हेतु निर्मित, किंतु तकनीकी रूप से भारतीय शैलकृत परंपरा का प्रारंभ बिंदु।
2. उत्तर-मौर्य / प्रारंभिक सातवाहन काल (2री शताब्दी ई.पू. – 1ली शताब्दी ई.):
- भाजा और कोंडाने (2री शताब्दी ई.पू. - काष्ठ से प्रस्तर संक्रमण की सबसे प्रारंभिक बौद्ध गुफाएँ)।
- पितलखोरा और अजंता का प्रथम चरण (मुख्यतः गुफा 9, 10, 12, 13 और 15A — लगभग दूसरी से पहली शताब्दी ईसा पूर्व)।
- बेडसा, नासिक (पांडुलेना), जुन्नर (लेण्याद्री, मानमोडी, तुलजा) और कार्ले (1ली शताब्दी ई.पू. – 2री शताब्दी ई.)।
- आंध्र प्रदेश में गुंटुपल्ली (वृत्ताकार चैत्यगृह) और सालिहुंडम (स्तूप व विहार परिसर)।
3. गुप्त-वाकाटक काल (5वीं–6ठी शताब्दी ईस्वी):
- अजंता का द्वितीय/महायान चरण (वाकाटक नरेश हरिषेण का काल - गुफा 1, 2, 16, 17, 19, 26)।
- बाघ की गुफाएँ (धार, मध्य प्रदेश - 5वीं–6ठी शताब्दी ई.)।
- कन्हेरी (मुंबई) का विस्तार और औरंगाबाद की गुफाएँ (6ठी–7वीं शताब्दी ई.)।
4. पूर्व-मध्यकाल / राष्ट्रकूट काल (6ठी–8वीं शताब्दी ईस्वी):
- एलोरा की बौद्ध गुफाएँ (गुफा 1 से 12 — महायान और वज्रयान चरण)।
8. बाराबर गुफाएँ
(महत्त्वपूर्ण चेतावनी: बाराबर और नागार्जुनी की गुफाएँ बौद्ध गुफाएँ नहीं हैं; इनका निर्माण मौर्य सम्राट अशोक और उनके पौत्र दशरथ द्वारा मुख्यतः ‘आजीवक संप्रदाय’ के अनुयायियों के लिए करवाया गया था। यह तथ्य प्रारंभिक परीक्षा 2013 और में कई बार पूछा गया है।)
- अवस्थिति: बिहार के जहानाबाद जिले के मखदुमपुर क्षेत्र में (गया से लगभग 24 किमी उत्तर में) फल्गु नदी के पास स्थित जुड़वाँ पहाड़ियों—‘बाराबर’ (4 गुफाएँ) और ‘नागार्जुनी’ (3 गुफाएँ)—में कुल 7 गुफाएँ हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘सतघरवा’ कहा जाता है।
- काल एवं संरक्षक: तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व (मौर्य काल)।
- बाराबर पहाड़ी की गुफाएँ सम्राट अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 12वें और 19वें वर्ष (लगभग 257 ई.पू. और 250 ई.पू.) में दान दीं।
- नागार्जुनी पहाड़ी की तीनों गुफाएँ (गोपिका, वहियक/वापीयक और वडथिका) अशोक के पौत्र और उत्तराधिकारी ‘दशरथ मौर्य’ ने अपने राज्याभिषेक के तुरंत बाद (लगभग 232 ई.पू.) आजीवक भिक्षुओं को वर्षावास हेतु समर्पित कीं।
- आजीवक संप्रदाय से संबंध: आजीवक संप्रदाय की स्थापना बुद्ध और महावीर के समकालीन ‘मक्खलि गोसाल’ ने की थी। इसका केंद्रीय दार्शनिक सिद्धांत ‘नियतिवाद’ (Niyati / Absolute Determinism - भाग्य ही सब कुछ निर्धारित करता है, मानवीय कर्म या प्रयास उसे बदल नहीं सकते) था। अशोक के पिता बिंदुसार आजीवक संप्रदाय के प्रति झुकाव रखते थे, और अशोक ने स्वयं बौद्ध होते हुए भी अपनी धार्मिक सहिष्णुता (धम्म) की नीति के तहत आजीवकों को ये गुफाएँ भेंट कीं।
- बाराबर की चार गुफाओं की स्थापत्य विशेषताएँ:
1. सुदामा गुफा (Sudama Cave): अशोक ने अपने शासन के 12वें वर्ष में इसे ‘निगोह कुभा’ (न्यग्रोध गुफा) नाम से आजीवकों को दान दिया। इसकी आंतरिक योजना में दो कक्ष हैं—एक बड़ा आयताकार मंडप (Barrel-vaulted roof) और उसके सिरे पर एक वृत्ताकार गुंबददार कक्ष, जिसकी छत फूस की झोपड़ी (Thatched Hut) का पत्थर में हूबहू अनुकरण करती है।
2. लोमस ऋषि गुफा (Lomas Rishi Cave): यह स्थापत्य और कला की दृष्टि से सबसे प्रसिद्ध गुफा है। इसमें मौर्यकालीन अभिलेख नहीं है (बाद का मौखरी शासक अनंतवर्मन का अभिलेख है) और इसका भीतरी भाग अधूरा (बिना पॉलिश का) रह गया था, किंतु इसका प्रवेश द्वार (Facade) भारतीय वास्तुकला में युगांतरकारी है। इसके प्रवेश द्वार पर लकड़ी की झोपड़ी के गजपृष्ठाकार छज्जे (Ogee Arch / Chaitya Arch) को पत्थर में तराशा गया है। मेहराब के अर्धवृत्ताकार पट्टे (Frieze) पर दो ओर से स्तूप की पूजा करने आते हुए हाथियों की कतार अत्यंत सजीवता से उत्कीर्ण है। यही मेहराब आगे चलकर बौद्ध चैत्य-वातायन (चंद्रशाला) का मूल रूप बना।
3. कर्ण चौपड़ गुफा (Karan Chaupar): इसे अशोक ने अपने शासन के 19वें वर्ष में बनवाया (मूल नाम—सुप्रिया गुफा)। यह एक चमकदार पॉलिश वाला आयताकार कक्ष है जिसमें चट्टान का एक चबूतरा बना है।
4. विश्व झोपड़ी (Vishva Zopri / विश्वकर्मा गुफा): अशोक के 12वें राजवर्ष में निर्मित; इसमें दो कक्ष हैं।
- मौर्य पॉलिश (Mauryan Polish) और परवर्ती परंपरा पर प्रभाव: ग्रेनाइट जैसी अत्यंत कठोर आग्नेय चट्टान को भीतर से काटकर उस पर ऐसी अद्भुत चमकदार पॉलिश की गई है कि आज भी ये दीवारें काँच या दर्पण की तरह चमकती हैं और भीतर बोलने पर गूँज (Echo) उत्पन्न होती है। बाराबर गुफाओं ने सिद्ध कर दिया कि लकड़ी के अस्थायी रूपों को चट्टानों में स्थायी रूप दिया जा सकता है, और इसी से पश्चिमी भारत की विशाल बौद्ध गुफा परंपरा को तकनीकी प्रेरणा मिली।
9. अजंता की गुफाएँ
- अवस्थिति: महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) जिले में सह्याद्रि की पहाड़ियों में ‘वाघोरा नदी’ (Waghora River) के घोड़े की नाल के आकार के गहरेखड्ड (Gorge) में स्थित। यह प्राचीन व्यापारिक मार्ग पर स्थित था।
- गुफाओं की कुल संख्या एवं धर्म: यहाँ कुल 29 (अधूरी गुफा 15A को मिलाकर 30) गुफाएँ हैं। अजंता की सभी गुफाएँ पूर्णतः ‘बौद्ध धर्म’ से संबंधित हैं (5 चैत्यगृह—गुफा 9, 10, 19, 26, 29; और शेष 25 विहार)।
- समयावधि और दो निर्माण चरण:
1. प्रथम चरण (सातवाहन / प्रारंभिक बौद्ध या प्रारंभिक बौद्ध चरण — 2री शताब्दी ईसा पूर्व से 1ली शताब्दी ईस्वी):
- इस चरण में कुल 6 गुफाएँ बनीं—गुफा संख्या 9 और 10 (चैत्यगृह) तथा गुफा संख्या 8, 12, 13 और 15A (विहार)।
- इस चरण में बुद्ध का अंकन केवल प्रतीकों (स्तूप, छत्र, पदचिह्न) के रूप में हुआ है। गुफा संख्या 10 अजंता का सबसे प्राचीन चैत्यगृह है और गुफा संख्या 12 सबसे प्राचीन विहार है। गुफा 9 और 10 में शुंग-सातवाहन कालीन प्रारंभिक चित्रकला (जैसे छदंत जातक और उपासकों के समूह) के अवशेष भी मिलते हैं।
2. द्वितीय चरण (वाकाटक / महायान चरण — 5वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से 6ठी शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ तक):
- लगभग चार शताब्दियों के अंतराल के बाद, वाकाटक वंश की वत्सगुल्म (वाशिम) शाखा के शक्तिशाली शासक ‘हरिषेण’ (Harishena, लगभग 460–477 ई.) के शासनकाल में अजंता का स्वर्ण युग आया।
- संरक्षण: हरिषेण के प्रधानमंत्री ‘वराहदेव’ ने गुफा संख्या 16 का निर्माण करवाया; अश्मक के सामंत शासक ‘उपेंद्रगुप्त’ ने गुफा संख्या 17 और 19 बनवाईं; तथा भिक्षु ‘बुद्धभद्र’ ने गुफा संख्या 26 का निर्माण करवाया। माना जाता है कि गुफा संख्या 1 स्वयं सम्राट हरिषेण के संरक्षण में बनी।
- स्थापत्य एवं मूर्तिकला विशेषताएँ (महायान प्रभाव):
- गुफा संख्या 19 और 26 महायान चैत्यगृह हैं। इनमें बाहरी अग्रभाग (Facade) पर तथा भीतर के स्तूप के अग्रभाग पर स्वयं बुद्ध की खड़ी या बैठी हुई भव्य मूर्तियाँ तराशी गई हैं।
- गुफा संख्या 26 की बाईं दीवार पर बुद्ध के ‘महापरिनिर्वाण’ (Reclining Buddha) की एक विशाल और अत्यंत भावपूर्ण मूर्ति उत्कीर्ण है, जिसमें बुद्ध दाईं करवट लेटे हैं, ऊपर आकाश में गंधर्व और अप्सराएँ संगीत बजाते हुए पुष्पवर्षा कर रहे हैं, और नीचे आनंद सहित शोकाकुल शिष्य विलाप कर रहे हैं। इसी गुफा में ‘मार-विजय’ (Temptation of Mara) का शिल्प भी है।
- विहारों (गुफा 1, 2, 16, 17) में स्तंभों वाले विशाल मंडप और पिछली दीवार में बुद्ध की धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा वाली प्रतिमा से युक्त गर्भगृह बने हैं।
- चित्रकला (Mural Paintings) एवं तकनीक:
- तकनीक: अजंता के चित्र यूरोपीय ‘ट्रू फ्रेस्को’ (गीले प्लास्टर पर चित्रण) से भिन्न ‘फ्रेस्को-सेको’ या ‘टेम्परा’ (Fresco-Secco / Tempera) तकनीक से बनाए गए हैं। पहले खुरदरी बेसाल्ट दीवार पर मिट्टी, गाय के गोबर, भूसे और पत्थर के चूर्ण का लेप लगाया जाता था; उसके ऊपर चूने (Lime) की पतली सफेदी चढ़ाई जाती थी; फिर सूखने पर लाल गेरू से रेखाचित्र (Outline) बनाकर खनिज व वनस्पति रंगों (जैसे नीले रंग के लिए अफगानिस्तान से आयातित लाजवर्द/Lapis Lazuli, गेरू, काजल, हरिताल) से रंग भरे जाते थे।
- प्रमुख चित्रित गुफाएँ: वर्तमान में मुख्यतः गुफा संख्या 1, 2, 9, 10, 16 और 17 में चित्र सुरक्षित हैं:
- गुफा संख्या 1: यहाँ गर्भगृह के प्रवेश द्वार के दोनों ओर ‘बोधिसत्त्व पद्मपाणि’ (हाथ में नीलकमल लिए, त्रिभंग मुद्रा में करुणा से भरे नेत्रों वाले) और ‘बोधिसत्त्व वज्रपाणि’ के विश्वप्रसिद्ध भित्ति-चित्र हैं। साथ ही महाजनक जातक, शिवि जातक और शंखपाल जातक के चित्र हैं।
- गुफा संख्या 2: विदुरपंडित जातक, हंस जातक, रुरु जातक और सहस्र बुद्ध (Miracle of Sravasti) के चित्र।
- गुफा संख्या 16: ‘मरणासन्न राजकुमारी’ (Dying Princess - बुद्ध के सौतेले भाई नंद की पत्नी सुंदरी, जो नंद के संन्यास लेने की खबर सुनकर मूर्च्छित हो जाती है), बुद्ध का उपदेश और हस्ति जातक।
- गुफा संख्या 17 (चित्रशाला): इसमें सर्वाधिक जातक चित्र सुरक्षित हैं—‘माता और शिशु’ (बुद्ध के भिक्षुक रूप में कपिलवस्तु लौटने पर यशोधरा और राहुल द्वारा उन्हें निहारने का मार्मिक चित्र), वेस्संतर जातक, छदंत जातक, महाकपि जातक, सिंहल अवदान और उड़ती हुई अप्सरा।
- सांस्कृतिक महत्त्व: 1819 ई. में मद्रास रेजिमेंट के ब्रिटिश अधिकारी जॉन स्मिथ (John Smith) ने बाघ के शिकार के दौरान अजंता की खोज की। 1983 में इसे भारत के प्रथम यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों में शामिल किया गया। यह गुप्त-वाकाटक युग के वेशभूषा, आभूषण, स्थापत्य और बौद्ध करुणा दर्शन का सर्वोच्च दृश्य कोश है।
10. एलोरा की बौद्ध गुफाएँ
- अवस्थिति एवं परिचय: महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) जिले में वेरुल (एलोरा) की सह्याद्रि (चरणान्द्रि) पहाड़ियों में कुल 34 प्रमुख शैलकृत गुफाएँ हैं (1983 से UNESCO विश्व धरोहर स्थल)। यह प्राचीन भारत में धार्मिक सह-अस्तित्व का अद्वितीय केंद्र है जहाँ तीन धर्मों की गुफाएँ एक साथ बनी हैं:
1. गुफा संख्या 1 से 12: बौद्ध गुफाएँ (दक्षिणी समूह)
2. गुफा संख्या 13 से 29: ब्राह्मण/हिंदू गुफाएँ (मध्य समूह — जैसे कैलाश मंदिर गुफा 16, दशावतार गुफा 15, रावण की खाई गुफा 14, रामेश्वर गुफा 21, धूमर लेना गुफा 29)
3. गुफा संख्या 30 से 34: दिगंबर जैन गुफाएँ (उत्तरी समूह)
- बौद्ध गुफाओं का काल एवं संप्रदाय: एलोरा की 12 बौद्ध गुफाओं का निर्माण लगभग 5वीं शताब्दी के अंत से 7वीं/8वीं शताब्दी ईस्वी के मध्य (चालुक्य और राष्ट्रकूट काल) हुआ। ये गुफाएँ महायान बौद्ध धर्म के परिपक्व रूप और उसके ‘वज्रयान’ (तांत्रिक बौद्ध धर्म) में संक्रमण को दर्शाती हैं।
- प्रमुख स्थापत्य एवं मूर्तिकला विशेषताएँ:
- गुफा संख्या 1 से 4: प्रारंभिक एकमंजिला विहार हैं।
- गुफा संख्या 5 (महारवाड़ा): यह एक विशाल आयताकार विहार है जिसके मध्य में पत्थर की दो लंबी समानांतर चौकियाँ (Benches) बनी हैं। इसका उपयोग भिक्षुओं द्वारा सामूहिक भोजनशाला या पाठशाला (अध्ययन कक्ष) के रूप में किया जाता था (ऐसा ही एक कक्ष कन्हेरी की गुफा 11 में भी है)।
- गुफा संख्या 10 — ‘विश्वकर्मा गुफा’ (बढ़ई की गुफा / Carpenter‘s Cave): यह एलोरा की बारह बौद्ध गुफाओं में एकमात्र ’चैत्यगृह' है। इसकी ढोलाकार छत में पत्थर को ही इस प्रकार तराशा गया है कि वह लकड़ी की कड़ियों जैसी दिखती है, इसीलिए स्थानीय कारीगर इसे विश्वकर्मा (देवताओं के शिल्पी) की गुफा मानते हैं। इसके आंतरिक स्तूप के अग्रभाग पर ‘प्रलंबपाद आसन’ (यूरोपीय शैली में कुर्सी की तरह पैर नीचे लटकाकर बैठे हुए) में ‘उपदेश देते बुद्ध’ (Preaching Buddha) की 15 फीट ऊँची भव्य प्रतिमा है, जिसके पीछे बोधि वृक्ष तराशा गया है। इसके बाहरी चैत्य-वातायन का रूप अब पारंपरिक घोड़े की नाल से बदलकर एक विकसित त्रि-खंडीय मेहराब (Trefoil Arch) में रूपांतरित हो गया है।
- बहुमंजिला विहार — गुफा संख्या 11 (‘दो ताल’) और गुफा संख्या 12 (‘तीन ताल’): एलोरा के बौद्ध स्थापत्य की सबसे बड़ी तकनीकी उपलब्धि पहाड़ी को काटकर बनाए गए विशाल ‘तीन-मंजिला विहार’ (Three-storeyed Monasteries) हैं। गुफा 11 का नाम ‘दो ताल’ इसलिए पड़ा क्योंकि लंबे समय तक इसका भूतल मलबे में दबा रहा, किंतु वास्तव में यह भी तीन मंजिला है। गुफा संख्या 12 (‘तीन ताल’) में एक विशाल खुला प्रांगण है और तीन मंजिलों में भिक्षु-कक्षों के साथ-साथ बड़े स्तंभित मंडप हैं।
- बुद्ध एवं बोधिसत्त्व प्रतिमाएँ (वज्रयान प्रभाव): एलोरा की गुफाओं (विशेषकर गुफा 6, 10, 11, 12) में केवल बुद्ध ही नहीं, बल्कि पद्मपाणि, वज्रपाणि, मंजुश्री, मैत्रेय तथा तारा, भृकुटी, महामयूरी और चुंदा जैसी बौद्ध तांत्रिक देवियों (तथा सात मानुषी बुद्धों व ध्यानी बुद्धों) की विशाल और बहुभुजी प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं।
- अजंता से एलोरा की बौद्ध गुफाओं का मुख्य अंतर:
1. स्थलाकृति: अजंता की गुफाएँ एक खड़ी घोड़े की नाल जैसी चट्टान में बनी हैं इसलिए उनके आगे खुला आंगन नहीं है; जबकि एलोरा की पहाड़ी ढलानदार (Sloping hill) होने के कारण यहाँ गुफाओं के सामने विशाल खुले प्रांगण (Courtyards) बनाए गए हैं।
2. मंजिलें: अजंता में मुख्यतः एकमंजिला (कुछ अधूरी दोमंजिला जैसे गुफा 6) संरचनाएँ हैं, जबकि एलोरा में विशाल तीन-मंजिला विहार (गुफा 11 व 12) बने हैं।
3. कला माध्यम: अजंता भित्ति-चित्रकला (Paintings) और मूर्तिकला दोनों के लिए प्रसिद्ध है, जबकि एलोरा की बौद्ध गुफाओं में चित्रकला गौण हो गई और विशाल स्थापत्य व गहन शिल्पकला (Sculpture) प्रमुख हो गई।
4. धार्मिक चरण: अजंता में प्रारंभिक बौद्ध से महायान तक का विकास दिखता है, जबकि एलोरा में महायान से वज्रयान (तांत्रिक बौद्ध परंपरा) का स्पष्ट विकास दिखाई देता है।
11. बौद्ध प्रतीकवाद
11.1 प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध का अनाकार निरूपण
मौर्य काल से लेकर प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व (भरहुत, साँची, बोधगया, भाजा और अमरावती के प्रथम चरण) तक की बौद्ध कला में भगवान बुद्ध को कभी भी मानव आकृति (Human form) में चित्रित नहीं किया गया, बल्कि उनके जीवन की घटनाओं और उपस्थिति को प्रतीकों (Symbols) के माध्यम से दर्शाया गया। इसे कला इतिहास में ‘अनाकार चरण’ (Aniconic Phase) कहा जाता है।
प्रमुख बौद्ध प्रतीक और उनका धार्मिक-दार्शनिक अर्थ:
1. कमल और सांड (Lotus and Bull): बुद्ध के ‘जन्म’ (लुंबिनी) का प्रतीक। कमल कीचड़ में खिलकर भी निर्लिप्त रहने वाली आध्यात्मिक पवित्रता और बुद्ध के जन्म के समय उनके सात कदमों के नीचे खिले कमलों का सूचक है; जबकि वृषभ (सांड) उनके जन्म के वैशाख मास (वृषभ राशि) और राजसी शक्ति का प्रतीक है।
2. हाथी (White Elephant / गज): बुद्ध के ‘गर्भावस्था / अवतरण’ का प्रतीक। जातक कथाओं के अनुसार, बुद्ध की माता महामाया ने स्वप्न में छह दांतों वाले एक श्वेत हाथी को अपने गर्भ में प्रवेश करते देखा था, जो तुषित स्वर्ग से बोधिसत्त्व के पृथ्वी पर अवतरण का सूचक था।
3. अश्व / बिना सवार का घोड़ा (Riderless Horse - कंथक): बुद्ध के गृहत्याग अर्थात् ‘महाभिनिष्क्रमण’ (The Great Renunciation) का प्रतीक। साँची के तोरण पर कंथक घोड़े को महल से बाहर जाते और उसके ऊपर केवल एक छत्र दिखाया गया है, जो बुद्ध की अदृश्य उपस्थिति दर्शाता है।
4. खाली सिंहासन / वज्रासन (Empty Seat / Throne): यह बुद्ध के ‘ध्यान’ (Meditation / Dhyana) और बोधि वृक्ष के नीचे उनकी उपस्थिति एवं ज्ञान-साधना का प्रतीक है।
5. बोधि वृक्ष / पीपल वृक्ष (Bodhi Tree / Ashvattha): बुद्ध के सर्वोच्च ज्ञान प्राप्ति अर्थात् ‘संबोधि / निर्वाण’ (Enlightenment at Bodh Gaya) का प्रतीक। कला में इसे प्रायः चारों ओर वेदिका (बोधि-घर) से घिरा हुआ दिखाया जाता है।
6. धर्मचक्र (Dharmachakra / Wheel of Law): सारनाथ (ऋषिपत्तन मृगदाव) में बुद्ध द्वारा दिए गए ‘प्रथम उपदेश’ अर्थात् ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ (First Sermon) का प्रतीक। इसमें प्रायः 8, 12, 24 या 32 तीलियाँ होती हैं, जो अष्टांगिक मार्ग और प्रतीत्यसमुत्पाद (द्वादश निदान) को दर्शाती हैं।
7. स्तूप (Stupa): बुद्ध के पंचस्कंधों के विलीन होने और जन्म-मरण के चक्र से अंतिम मुक्ति अर्थात् ‘महापरिनिर्वाण’ (Mahaparinibbana at Kushinagar) का प्रतीक।
8. पदचिह्न (Buddhapada / Footprints): भक्तों के बीच बुद्ध की जीवंत उपस्थिति और उनके द्वारा दिखाए गए धम्म-मार्ग पर चलने का प्रतीक। पदचिह्नों पर प्रायः धर्मचक्र, त्रिरत्न, स्वस्तिक और कमल उत्कीर्ण होते थे।
9. छत्र (Chhatra / Parasol): बुद्ध की आध्यात्मिक संप्रभुता और ‘चक्रवर्ती धर्मराज’ के रूप में उनकी सर्वोच्चता का प्रतीक।
10. सिंह (Lion): बुद्ध को ‘शाक्यसिंह’ (शाक्य कुल का सिंह) कहा जाता था। सिंह निर्भीकता, राजसी गरिमा और बुद्ध की वाणी की सिंह-गर्जना (सिंहनाद - जो अज्ञान को नष्ट करती है) का प्रतीक है।
11. त्रिरत्न / नंदिपाद (Triratna): वृत्त के ऊपर त्रिशूल जैसी आकृति, जो बौद्ध धर्म के तीन आधार स्तंभों—बुद्ध, धम्म और संघ—का प्रतीक है।
11.2 प्रारंभ में बुद्ध की मानव आकृति क्यों नहीं बनाई गई? (सूक्ष्म ऐतिहासिक विश्लेषण)
- पारंपरिक मत: अल्फ्रेड फूशे (Alfred Foucher) और आनंद कुमारस्वामी जैसे प्रारंभिक कला इतिहासकारों का मानना था कि प्रारंभिक बौद्ध धर्म (स्थविरवाद/थेरवाद) में बुद्ध को एक महान मानवीय गुरु माना गया था जो महापरिनिर्वाण के बाद जन्म-मरण और रूप-संसार (Rupa-kaya) से परे जा चुके थे; इसलिए जो व्यक्तित्व निर्वाण प्राप्त कर अव्यक्त हो चुका है, उसे भौतिक शरीर की सीमाओं में बाँधना दार्शनिक रूप से अनुचित माना गया।
- आधुनिक इतिहासलेखन (सुज़ैन हंटिंगटन आदि का दृष्टिकोण): आधुनिक इतिहासकार इस बात पर बल देते हैं कि प्रारंभिक बौद्ध को ‘मूर्ति-विरोधी’ और महायान को ‘मूर्ति-पूजक’ के रूप में कठोर खाँचों में बाँटना अतिसरलीकरण है। वास्तव में, साँची और भरहुत के कुछ दृश्य केवल बुद्ध की घटना ही नहीं, बल्कि बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उन पवित्र तीर्थ स्थलों (बोधि-वृक्ष, वज्रासन, स्तूप) की पूजा और उत्सवों का भी चित्रण करते हैं। इसके अतिरिक्त, जब कुषाण काल में बुद्ध की मानवाकार प्रतिमाएँ बननी शुरू हुईं, तो मथुरा और सारनाथ में अनेक प्रारंभिक बुद्ध प्रतिमाएँ ‘सर्वास्तिवादी’ और ‘महासंघिक’ जैसे गैर-महायान भिक्षुओं (जैसे भिक्षु बल) द्वारा भी स्थापित करवाई गईं।
11.3 गांधार और मथुरा परंपराओं में मानवाकार बुद्ध प्रतिमाओं का विकास
प्रथम शताब्दी ईस्वी में कुषाण शासकों (विशेषकर कनिष्क प्रथम) के काल में दो प्रमुख केंद्रों—गांधार और मथुरा—में लगभग एक साथ बुद्ध और बोधिसत्त्वों की मानवाकार (Anthropomorphic) प्रतिमाओं का विकास हुआ:
1. गांधार कला शैली (Gandhara School of Art):
- क्षेत्र एवं संरक्षण: पश्चिमोत्तर भारत (तक्षशिला, पेशावर, स्वात घाटी, बामियान); शक और कुषाण शासक।
- सांस्कृतिक प्रभाव: इसमें भारतीय बौद्ध विषयों को यूनानी-बैक्ट्रियन (Greco-Bactrian), रोमन (Roman) और मध्य एशियाई (पार्थियन/सीथियन) कला शैलियों के माध्यम से ढाला गया:
- यूनानी (Hellenistic) तत्व: बुद्ध को यूनानी देवता ‘अपोलो’ (Apollo) के समान सौम्य चेहरे, लहरदार/घुँघराले बालों (Wavy hair), सुडौल और मांसल शरीर (Muscular physique) तथा पारदर्शी चुन्नटदार वस्त्रों में दिखाया गया।
- रोमन (Roman) तत्व: मोटे लबादे (Toga) जैसी सिलवटें, यथार्थवादी व्यक्ति-चित्रण (Realistic portraiture), और कथात्मक उभारदार पट्टियों (Narrative reliefs) में कालानुक्रमिक दृश्य-योजना।
- मध्य एशियाई तत्व: नीले-भूरे शिस्ट पत्थर (Blue-grey Mica Schist) और बाद में स्टुको (Stucco / चूना-प्लास्टर व मिट्टी) का प्रयोग, कुषाण शासकों व संरक्षकों का लंबे कोट, नुकीली टोपी और बूट पहने अंकन, तथा प्रभामंडल (Halo - जो सादा और बिना अलंकरण का होता था) की अवधारणा।
- आध्यात्मिक भाव: बुद्ध प्रायः अर्ध-मुँदे नेत्रों के साथ गहन ध्यान में या मूँछों वाले राजसी बोधिसत्त्व के रूप में दिखाए गए हैं।
2. मथुरा कला शैली (Mathura School of Art):
- क्षेत्र एवं संरक्षण: मथुरा और उसके आसपास का क्षेत्र (कंकाली टीला, कटरा, सोंख); कुषाण संरक्षण।
- सांस्कृतिक आधार एवं सामग्री: यह पूर्णतः ‘स्वदेशी’ (Indigenous) कला परंपरा थी, जिसका विकास प्राचीन भारतीय ‘यक्ष’ प्रतिमाओं (जैसे परखम यक्ष) और ध्यानस्थ योगियों की परंपरा से हुआ। इसमें सफेद चित्तीदार लाल बलुआ पत्थर (Spotted Red Sandstone) का प्रयोग किया गया।
- प्रमुख विशेषताएँ: मथुरा के बुद्ध चौड़े कंधों, भरे हुए प्रसन्न मुखमंडल (Smiling/Radiant face), मुँडे हुए सिर या घोंघे के आकार की जटा (कपर्द / Kapardin type), बाएँ कंधे को ढकते हुए पतले एकल संघाटी वस्त्र, और भव्य रूप से अलंकृत प्रभामंडल (Scalloped & Decorated Halo) से युक्त हैं।
- त्रिवेणी संगम: गांधार जहाँ केवल बौद्ध धर्म तक सीमित था, वहीं मथुरा में बौद्ध, जैन (तीर्थंकर प्रतिमाएँ व आयागपट्ट) और ब्राह्मण (शिव, विष्णु, कार्तिकेय, लक्ष्मी) तीनों धर्मों की मूर्तियाँ समान रूप से बनीं।
11.4 बुद्ध की प्रमुख हस्त-मुद्राएँ
1. भूमिस्पर्श मुद्रा (Bhumisparsha Mudra): बुद्ध पद्मासन में बैठे हैं, बायाँ हाथ गोद में है और दाहिना हाथ घुटने से नीचे लटकते हुए पृथ्वी को स्पर्श कर रहा है। यह बोधगया में कामदेव ‘मार’ (Mara) के प्रलोभनों और आक्रमणों पर विजय पाकर अपने पुण्य और सत्य की साक्षी के रूप में पृथ्वी देवी (वसुंधरा) का आह्वान करने का प्रतीक है।
2. धर्मचक्र मुद्रा (Dharmachakra Mudra): दोनों हाथ छाती के सामने इस प्रकार हैं कि अँगूठे और तर्जनी मिलकर चक्र बनाते हैं; यह सारनाथ के प्रथम उपदेश का प्रतीक है (सारनाथ की गुप्तकालीन बुद्ध प्रतिमा इसका सर्वोत्तम उदाहरण है)।
3. ध्यान / समाधि मुद्रा (Dhyana Mudra): दोनों हाथ गोद में एक-दूसरे के ऊपर रखे हैं और हथेलियाँ ऊपर की ओर हैं; यह परम ध्यान और आध्यात्मिक पूर्णता का प्रतीक है।
4. अभय मुद्रा (Abhaya Mudra): दाहिना हाथ कंधे तक उठा हुआ और हथेली सामने की ओर खुली हुई; यह निर्भयता, सुरक्षा और शांति के आशीर्वाद का प्रतीक है।
5. वरद मुद्रा (Varada Mudra): हथेली बाहर की ओर खुली हुई और हाथ नीचे की ओर झुका हुआ; यह करुणा, दान और भक्तों की इच्छा पूर्ति का प्रतीक है।
12. जैन स्थापत्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- तीर्थंकर परंपरा और महावीर: जैन धर्म की परंपरा अत्यंत प्राचीन है जिसमें 24 तीर्थंकरों की मान्यता है—प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ), 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ (वाराणसी के राजकुमार, 8वीं शताब्दी ई.पू.) और 24वें एवं अंतिम तीर्थंकर वर्धमान महावीर (6ठी शताब्दी ई.पू.)। जैन दर्शन में कठोर अहिंसा, अपरिग्रह और तपश्चर्या (कायोत्सर्ग व संल्लेखना) पर विशेष बल दिए जाने के कारण प्रारंभिक जैन मुनि जंगलों और प्राकृतिक कंदराओं में रहते थे।
- प्रारंभिक जैन कला एवं पुरातात्त्विक साक्ष्य:
- मौर्य काल में पटना के ‘लोहानीपुर’ से नग्न धड़ (Lohanipur Torso) की दो पाषाण प्रतिमाएँ मिली हैं, जिनमें से एक पर मौर्यकालीन चमकदार पॉलिश है; इन्हें कायोत्सर्ग मुद्रा में किसी जैन तीर्थंकर की सबसे प्राचीन मूर्तियों में गिना जाता है।
- कलिंग के शासक खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख (1ली शताब्दी ई.पू.) में उल्लेख मिलता है कि नंद शासक (महापद्मनंद) कलिंग से जिस ‘कलिंग-जिन’ (तीर्थंकर ऋषभदेव/शीतलनाथ) की प्रतिमा को मगध ले गया था, खारवेल ने मगध पर आक्रमण करके उसे वापस कलिंग में स्थापित किया। यह सिद्ध करता है कि 4थी शताब्दी ई.पू. (नंद काल) में ही जैन प्रतिमाओं की पूजा प्रचलित हो चुकी थी।
- कुषाण काल में मथुरा के ‘कंकाली टीला’ में एक विशाल ‘जैन स्तूप’ (जिसके बारे में जैन ग्रंथों में कहा गया है कि वह सुपार्श्वनाथ के सम्मान में देव-निर्मित था) और अनेक ‘आयागपट्ट’ (उपासना की चौकोर पत्थर की पट्टियाँ) मिले हैं।
- राजकीय संरक्षण और व्यापारी समुदाय की भूमिका:
- राजकीय संरक्षण: मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य (जिन्होंने भद्रबाहु के साथ श्रवणबेलगोला जाकर संल्लेखना से प्राण त्यागे), संप्रति (अशोक के पौत्र, जिन्हें जैन परंपरा में ‘जैन अशोक’ कहा जाता है), कलिंग नरेश खारवेल, दक्षिण के गंग, कदंब, राष्ट्रकूट (अमोघवर्ष प्रथम), चालुक्य तथा गुजरात के सोलंकी शासकों (सिद्धराज जयसिंह और कुमारपाल) ने जैन स्थापत्य को प्रबल संरक्षण दिया।
- व्यापारी समुदाय का योगदान: जैन धर्म के अहिंसा सिद्धांत के कारण कृषि और युद्ध की तुलना में वाणिज्य-व्यापार जैन श्रावकों का मुख्य व्यवसाय बना। गुजरात, राजस्थान और कर्नाटक के धनी जैन सेठों, मंत्रियों और श्रेणियों (जैसे विमल शाह, वस्तुपाल-तेजपाल, धरण शाह, चामुंडराय) ने अपनी संपत्ति को मंदिर निर्माण और ज्ञान-भंडारों (पुस्तकालयों) में लगाकर जैन मंदिर स्थापत्य को अद्वितीय सूक्ष्मता और भव्यता प्रदान की।
- गुफाओं से संरचनात्मक मंदिरों तक विकास: जैन स्थापत्य का विकास तीन स्पष्ट चरणों में हुआ—(1) मौर्योत्तर काल की शैलकृत गुफाएँ (उदयगिरि-खंडगिरि और राजगृह की सोन भंडार गुफा), (2) गुप्त एवं पूर्व-मध्यकाल की शैलकृत गुफाएँ (बदामी की गुफा सं. 4, ऐहोल की मेगुती व रावणफाड़ी, सित्तनवासल, और एलोरा की गुफा 30–34), तथा (3) पूर्व-मध्यकाल और मध्यकाल के भव्य संरचनात्मक मंदिर एवं मंदिर-नगर (दिलवाड़ा, रणकपुर, पालीताना, गिरनार, खजुराहो के पार्श्वनाथ व आदिनाथ मंदिर, और श्रवणबेलगोला)।
13. जैन गुफा स्थापत्य
13.1 उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाएँ (ओडिशा)
(महत्त्वपूर्ण अंतर: ओडिशा के भुवनेश्वर के पास स्थित ईसा पूर्व पहली शताब्दी की ‘उदयगिरि-खंडगिरि गुफाएँ’ जैन धर्म से संबंधित हैं; इन्हें मध्य प्रदेश के विदिशा में स्थित पाँचवीं शताब्दी ईस्वी की गुप्तकालीन ‘उदयगिरि गुफाओं’ से कभी न मिलाएँ, जो ब्राह्मण/वैष्णव-शैव धर्म और प्रसिद्ध वराह अवतार मूर्ति के लिए जानी जाती हैं।)
- अवस्थिति एवं काल: ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के निकट स्थित दो आमने-सामने की पहाड़ियाँ—उदयगिरि (सूर्योदय की पहाड़ी, प्राचीन नाम—कुमारी पर्वत, 18 गुफाएँ) और खंडगिरि (टूटी हुई पहाड़ी, प्राचीन नाम—कुमार पर्वत, 15 गुफाएँ)। इनका निर्माण मुख्यतः प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में कलिंग के महामेघवाहन (चेदि) वंश के महान जैन शासक ‘खारवेल’ और उनके उत्तराधिकारियों के काल में हुआ।
- धार्मिक उपयोग एवं स्थापत्य योजना:
- इन्हें स्थानीय रूप से ‘लेण’ या ‘गुम्फा’ कहा जाता है। ये गुफाएँ जैन श्रमणों (मुनियों) के वर्षावास और कठोर तपश्चर्या के लिए बनाई गई थीं।
- बौद्ध गुफाओं के विपरीत, उदयगिरि-खंडगिरि में कोई ‘चैत्यगृह’ (प्रार्थना मंडप) नहीं है; ये सभी आवासीय कोठरियाँ (विहार-सदृश) हैं।
- कोठरियों के द्वार अत्यंत छोटे और नीचे हैं (जिनमें झुककर प्रवेश करना पड़ता है), भीतर का फर्श पीछे की ओर थोड़ा ऊँचा (Sloping floor) उठाया गया है ताकि वह बिना तकिये के सोने के काम आ सके, और बाहर स्तंभों वाला बरामदा है।
प्रमुख गुफाओं का विवरण:
1. हाथीगुम्फा (Hathigumpha - उदयगिरि गुफा सं. 14):
- यह एक प्राकृतिक कंदरा है जिसके ललाट पर राजा खारवेल का प्रसिद्ध 17 पंक्तियों वाला ‘हाथीगुम्फा अभिलेख’ (प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में) उत्कीर्ण है।
- यह अभिलेख ‘णमो अरहंतानं, णमो सव्वसिद्धानं’ (अर्हतों और सिद्धों को नमन - जैन नमस्कार मंत्र का प्राचीनतम अभिलेखीय साक्ष्य) से प्रारंभ होता है और खारवेल के शासन के प्रथम 13 वर्षों की उपलब्धियों का वर्ष-वार (Year-by-year) विवरण देता है—जिसमें नंद राजा द्वारा खुदवाई गई नहर का तनसुली से कलिंगनगर तक विस्तार, मगध के शासक बहकपतिमित्र को पराजित कर नंद राजा द्वारा ले जाई गई ‘कलिंग-जिन’ की प्रतिमा वापस लाना, और कुमारी पर्वत पर जैन मुनियों के लिए गुफाओं का निर्माण शामिल है।
2. रानी गुम्फा (Rani Gumpha / Queen's Cave - उदयगिरि गुफा सं. 1):
- यह इस पूरे समूह की सबसे बड़ी, सबसे भव्य और दोमंजिला (Double-storeyed) गुफा है, जो तीन ओर से खुली हुई (त्रिकूट योजना) है और बीच में एक बड़ा प्रांगण है।
- इसमें उत्कृष्ट ध्वनि-प्रभाव (Acoustics) है। दोनों मंजिलों के बरामदों की दीवारों पर उभारदार पट्टियों (Friezes) में राजा की विजय-यात्रा, वन्य शिकार, नृत्य-संगीत के दृश्य, और द्वारों के दोनों ओर धोती व पगड़ी पहने भाले लिए हुए ‘द्वारपालों’ की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं।
3. गणेश गुम्फा (Ganesh Gumpha - उदयगिरि गुफा सं. 10):
- इसमें दो आवासीय कक्ष और एक बरामदा है। प्रवेश द्वार के पास दो हाथियों की मूर्तियाँ हैं और भीतर बाद के काल में गणेश की आकृति उकेर दी गई। इसकी दीवारों पर उदयन-वासवदत्ता के हरण से मिलती-जुलती कथात्मक पट्टियाँ उत्कीर्ण हैं।
4. बाघ गुम्फा (Vyaghra/Tiger Cave - उदयगिरि गुफा सं. 12): इसका बाहरी भाग दहाड़ते हुए बाघ के खुले मुँह के आकार में तराशा गया है और बाघ का खुला जबड़ा ही गुफा का प्रवेश द्वार है। इसमें नगर-न्यायाधीश ‘सभूति’ का दान अभिलेख है।
5. अनंत गुम्फा (Ananta Gumpha - खंडगिरि गुफा सं. 3): इसके द्वार के मेहराब पर तीन फनों वाले सर्प, गजलक्ष्मी, चार घोड़ों वाले रथ पर सवार सूर्य देवता और पवित्र वृक्ष की पूजा के दृश्य उत्कीर्ण हैं।
6. नवमुनि गुम्फा और बाराभुजी गुम्फा (खंडगिरि): पूर्व-मध्यकाल (सोमवंशी काल, 10वीं–11वीं शताब्दी ई.) में इन गुफाओं में 24 तीर्थंकरों और उनकी शासन-देवियों (यक्षिणियों जैसे चक्रेश्वरी, रोहिणी, अंबिका) की मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गईं।
13.2 अन्य महत्त्वपूर्ण प्रारंभिक एवं पूर्व-मध्यकालीन जैन गुफाएँ
1. सोन भंडार गुफाएँ (राजगीर, बिहार - 3री–4थी शताब्दी ईस्वी): वैभारगिरि पहाड़ी के तल में स्थित दो शैलकृत गुफाएँ। अलेक्जेंडर कनिंघम के अनुसार, यहाँ से प्राप्त अभिलेख में उल्लेख है कि मुनि ‘वैरदेव’ ने जैन अर्हतों (तपस्वियों) के लिए इन दो गुफाओं का निर्माण करवाया था। इनमें मौर्यकालीन बाराबर गुफाओं जैसी स्थापत्य योजना की निरंतरता और भीतर एक चौमुखी जैन तीर्थंकर स्तंभ (प्रतिमा) मिलता है।
2. बादामी की गुफा संख्या 4 (बागलकोट, कर्नाटक - 6ठी शताब्दी के अंत में): चालुक्य शासकों के अधीन बादामी में कुल 4 गुफाएँ बनीं (गुफा 1 शैव, गुफा 2 व 3 वैष्णव, और गुफा 4 जैन)। गुफा संख्या 4 में महावीर की पद्मासन प्रतिमा के साथ-साथ पार्श्वनाथ (सर्प-फण के नीचे) और लता-बेलों से घिरे कायोत्सर्ग में खड़े बाहुबली की भव्य मूर्तियाँ हैं।
3. सित्तनवासल गुफा (पुदुक्कोट्टई, तमिलनाडु - 7वीं–9वीं शताब्दी ईस्वी, पल्लव एवं पांड्य काल): इसे ‘अरिवर कोविल’ (अर्हतों का मंदिर) कहा जाता है। यहाँ जैन मुनियों के लिए पत्थर की शय्याएँ (जिन्हें तमिल में ‘पल्लिपडई’ या ‘पंचपांडव बेड’ कहा जाता है) हैं और छत पर ‘समवसरण’ (तीर्थंकर के दिव्य उपदेश मंडप से जुड़ा कमल-सरोवर, जिसमें भव्य कमल, हंस, मछलियाँ, हाथी और भिक्षु चित्रित हैं) का विश्वप्रसिद्ध भित्ति-चित्र है।
14. एलोरा की जैन गुफाएँ
- अवस्थिति, काल एवं संप्रदाय: एलोरा के उत्तरी छोर पर स्थित गुफा संख्या 30 से 34 तक की 5 गुफाएँ जैन धर्म के ‘दिगंबर संप्रदाय’ (Digambara Sect) से संबंधित हैं। इनका निर्माण 9वीं और 10वीं शताब्दी ईस्वी के दौरान राष्ट्रकूट और यादव शासकों के संरक्षण में हुआ।
- प्रमुख गुफाएँ और उनकी विशेषताएँ:
1. गुफा संख्या 30 (‘छोटा कैलाश’): यह गुफा संख्या 16 के प्रसिद्ध हिंदू कैलाशनाथ मंदिर का छोटे आकार में अनुकरण (Monolithic free-standing shrine) है, किंतु इसमें तीर्थंकरों और जैन देवी-देवताओं का अंकन है।
2. गुफा संख्या 32 (‘इंद्रसभा’ / Indra Sabha):
- यह एलोरा की जैन गुफाओं में सबसे भव्य, विशाल और दोमंजिला (Two-storeyed) शैलकृत मंदिर परिसर है।
- इसके प्रांगण में एक एकाश्म स्तंभ (मानस्तंभ / Manastambha), एक विशाल पत्थर का हाथी और मध्य में एक छोटा चौमुखी मंडप (सर्वतोभद्रिका) है।
- ऊपरी मंजिल के विशाल स्तंभित मंडप के दोनों छोरों पर हाथी पर सवार ‘इंद्र’ (मातंग यक्ष) और सिंह पर सवार ‘अंबिका’ (आदिनाथ/नेमिनाथ से जुड़ी यक्षिणी, जो आम के वृक्ष के नीचे शिशु को गोद में लिए बैठी हैं) की भव्य मूर्तियाँ हैं। गर्भगृह में भगवान महावीर की पद्मासन प्रतिमा है, और दीवारों पर पार्श्वनाथ (कमठ के उपसर्ग से रक्षा करते धरणेंद्र-पद्मावती) तथा बाहुबली (गोम्मटेश्वर) की मूर्तियाँ हैं। इसकी छत पर सुंदर भित्ति-चित्रों के अवशेष भी हैं।
3. गुफा संख्या 33 (‘जगन्नाथ सभा’ / Jagannatha Sabha): यह भी एक दोमंजिला जैन गुफा है, जो इंद्रसभा के समान होते हुए भी अपने भारी और अत्यंत सूक्ष्म नक्काशी वाले स्तंभों के लिए जानी जाती है।
- बौद्ध एवं ब्राह्मण गुफाओं से तुलना:
- आकार बनाम सूक्ष्म अलंकरण: एलोरा की ब्राह्मण गुफाएँ (जैसे कैलाश मंदिर) जहाँ अपने विशालकाय आकार, नाटकीय गतिशीलता और पौराणिक कथाओं की ऊर्जा के लिए जानी जाती हैं, और बौद्ध गुफाएँ (जैसे गुफा 10, 12) अपनी सादगी व गंभीर ध्यान-मुद्रा के लिए प्रसिद्ध हैं, वहीं जैन गुफाएँ आकार में अपेक्षाकृत छोटी होते हुए भी ‘अत्यधिक सघन और सूक्ष्म नक्काशी’ (Intricate Filigree-like Carving) के लिए जानी जाती हैं। यहाँ स्तंभों, छतों और दीवारों का एक इंच भी बिना अलंकरण के नहीं छोड़ा गया है।
15. जैन मंदिर स्थापत्य
पूर्व-मध्यकाल (8वीं से 15वीं शताब्दी ईस्वी) में जैन स्थापत्य ने शैलकृत गुफाओं से निकलकर संरचनात्मक मंदिरों (Structural Temples) और भव्य एकाश्म प्रतिमाओं के रूप में अपना स्वर्ण युग देखा। जैन मंदिरों की कोई अलग स्वतंत्र क्षेत्रीय शैली नहीं थी, बल्कि उन्होंने उत्तर व पश्चिम भारत में ‘नागर शैली’ (विशेषकर मारू-गुर्जर / सोलंकी शैली) और दक्षिण भारत में ‘द्रविड़ शैली’ को अपनाया, किंतु अपने विशिष्ट ‘चौमुखी’ (चतुर्मुख) विन्यास, संगमरमर की जालीदार नक्काशी और मंदिर-नगरों (Temple-Cities) के रूप में उसे एक नई ऊँचाई दी।
1. दिलवाड़ा जैन मंदिर (माउंट आबू, सिरोही जिला, राजस्थान):
- मारू-गुर्जर (सोलंकी) शैली में श्वेत मकराना संगमरमर से निर्मित 5 मंदिरों का विश्वप्रसिद्ध समूह। बाहर से ये मंदिर अत्यंत सादे दिखते हैं, किंतु भीतर से इनकी संगमरमर की नक्काशी इतनी बारीक और पारदर्शी है मानो पत्थर नहीं बल्कि मोम या हाथीदांत को तराशा गया हो।
- विमल वसही मंदिर (1031 ई.): प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) को समर्पित; इसका निर्माण गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) शासक भीमदेव प्रथम के सेनापति व मंत्री ‘विमल शाह’ ने करवाया था। इसके रंगमंडप में 16 विद्यादेवियों की मूर्तियाँ और अद्भुत उल्टे कमल के झूमर वाली छत है।
- लूण वसही मंदिर (1230 ई.): 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ को समर्पित; इसका निर्माण बघेल/सोलंकी शासक वीरधवल के दो प्रसिद्ध मंत्रियों—‘वस्तुपाल और तेजपाल’—ने अपने दिवंगत भाई लूणसिंह की स्मृति में करवाया था। इसमें दो भव्य गोखड़े (‘देवरानी-जेठानी के गवाक्ष’) और हाथीशाला प्रमुख हैं।
2. रणकपुर जैन मंदिर (पाली जिला, राजस्थान — चामुखा / चतुर्मुख धरणी विहार):
- 15वीं शताब्दी (1439 ई.) में मेवाड़ के महाराणा कुंभा के शासनकाल में जैन सेठ और मंत्री ‘धरण शाह’ ने अरावली की घाटी में मघाई नदी के तट पर इस मंदिर का निर्माण करवाया (मुख्य शिल्पी—‘देपाक’ / Depaka)।
- यह प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित एक ‘चतुर्मुख प्रासाद’ (Chaumukha Temple) है, जिसके गर्भगृह में आदिनाथ की चार मुखों वाली संगमरमर की प्रतिमा है जो चारों दिशाओं में खुलने वाले द्वारों से दिखाई देती है।
- यह मंदिर अपने ‘1,444 नक्काशीदार संगमरमर स्तंभों’ के लिए विश्वविख्यात है—विशेषता यह है कि इन 1,444 स्तंभों में से किसी भी दो स्तंभों की नक्काशी एक जैसी नहीं है, और इन्हें इस ज्यामितीय कौशल से लगाया गया है कि मंदिर के किसी भी कोने से देखने पर मुख्य तीर्थंकर प्रतिमा के दर्शन में कोई स्तंभ बाधा नहीं बनता।
3. पालीताना मंदिर समूह (शत्रुंजय पहाड़ी, भावनगर जिला, गुजरात — मंदिर-नगर की अवधारणा):
- जैन स्थापत्य ने ‘मंदिर-नगर’ (Temple-City / Tirtha-Kshetra) की एक अनूठी अवधारणा विकसित की, जहाँ एक पूरी पहाड़ी की चोटी पर सैकड़ों छोटे-बड़े मंदिरों का परिसर बनाया गया (जैसे पालीताना, गिरनार, पावापुरी, सम्मेद शिखर और सोनागिरि)।
- शत्रुंजय पहाड़ी पर 11वीं से 20वीं शताब्दी के बीच लगभग 863 से अधिक संगमरमर के श्वेतांबर जैन मंदिर (9 ‘टूक’ या घेरों में विभाजित) बने हैं। इसका मुख्य मंदिर प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव) को समर्पित है। धार्मिक नियम के अनुसार, यह संपूर्ण पहाड़ी केवल देवताओं और तीर्थंकरों का निवास मानी जाती है, इसलिए सूर्यास्त के बाद यहाँ किसी भी मनुष्य (पुजारी या मुनि को भी) के रुकने की अनुमति नहीं है।
4. श्रवणबेलगोला और गोम्मटेश्वर बाहुबली की एकाश्म प्रतिमा (हासन जिला, कर्नाटक):
- श्रवणबेलगोला दो पहाड़ियों—‘चंद्रगिरि’ (जहाँ चंद्रगुप्त मौर्य और आचार्य भद्रबाहु से जुड़ी चंद्रगुप्त बसदि है) और ‘विंध्यगिरि’ (इंद्रगिरि)—के बीच स्थित दक्षिण भारत का सबसे प्रमुख दिगंबर जैन तीर्थ है।
- गोम्मटेश्वर (बाहुबली) की प्रतिमा: विंध्यगिरि पहाड़ी के शिखर पर पश्चिमी गंग वंश के शासक ‘राचमल्ल चतुर्थ’ (सत्यवाक्य) के सेनापति और मंत्री ‘चामुंडराय’ (Chavundaraya) ने लगभग 981 ईस्वी में भूरे ग्रेनाइट की एक ही चट्टान को तराशकर (Monolithic Statue) लगभग 57 फीट (17.5 मीटर) ऊँची भगवान बाहुबली की विशाल प्रतिमा का निर्माण करवाया।
- ध्यान दें: बाहुबली 24 तीर्थंकरों में से नहीं हैं, बल्कि वे प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) के पुत्र और चक्रवर्ती भरत के भाई थे।
- प्रतिमा का प्रतीकवाद: बाहुबली पूर्ण नग्न अवस्था में सीधे खड़े होकर ‘कायोत्सर्ग’ (Kayotsarga) मुद्रा में कठोर तपस्या कर रहे हैं। उनकी तपस्या इतनी लंबी और अडिग है कि उनके पैरों के पास चींटियों की बांबी (वल्मीक) बन गई है जिसमें से साँप निकल रहे हैं, और उनके पैरों व भुजाओं पर ‘माधवी लताएँ’ (Creepers) लिपट गई हैं, फिर भी उनके मुख पर असीम शांति और वैराग्य की मुस्कान है।
- महामस्तकाभिषेक: प्रत्येक 12 वर्ष के अंतराल पर यहाँ बाहुबली की प्रतिमा का दूध, केसर, चंदन और स्वर्ण-कलशों से भव्य ‘महामस्तकाभिषेक’ किया जाता है।
16. जैन प्रतीकवाद
16.1 जैन प्रतिमा विज्ञान के मुख्य तत्त्व
1. तीर्थंकर प्रतिमाओं की दो ही मुद्राएँ: बौद्ध या हिंदू कला के विपरीत, जैन कला में तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ केवल दो ही शारीरिक मुद्राओं में बनाई जाती हैं:
- कायोत्सर्ग मुद्रा (Kayotsarga Posture): शरीर से ममत्व का त्याग कर दोनों पैरों पर सीधे खड़े होना और दोनों हाथों को बिना किसी सहारे के जाँघों के समानांतर सीधा नीचे लटकाकर रखना। (श्रवणबेलगोला के बाहुबली और लोहानीपुर का धड़ इसके उदाहरण हैं)।
- पद्मासन / पर्यंकासन मुद्रा (Padmasana Posture): दोनों पैरों को मोड़कर कमलासन पर बैठना और दोनों हाथों को नाभि के नीचे गोद में एक-दूसरे के ऊपर (ध्यान मुद्रा में) रखना।
2. श्रीवत्स (Shrivatsa): उत्तर भारत (विशेषकर मथुरा के कुषाण काल से) की जैन तीर्थंकर प्रतिमाओं के वक्षस्थल (छाती के मध्य भाग) पर एक हीरे या चतुष्कोणीय फूल के आकार का शुभ चिह्न अंकित होता है, जिसे ‘श्रीवत्स’ कहा जाता है। यह तीर्थंकर के महापुरुष लक्षण और सर्वोच्च आध्यात्मिक ज्ञान (केवलज्ञान) का प्रतीक है।
3. दिगंबर बनाम श्वेतांबर प्रतिमाएँ: दिगंबर परंपरा की तीर्थंकर प्रतिमाएँ पूर्णतः नग्न, किसी भी आभूषण से रहित और नीचे झुकी हुई शांत दृष्टि वाली होती हैं; जबकि श्वेतांबर परंपरा में प्रतिमाओं पर कमर में वस्त्र (कच्छनी), काँच की खुली आँखें (चक्षु) और कभी-कभी मुकुट व आभूषण (आंगी) चढ़ाए जाते हैं।
4. त्रिरत्न (Three Jewels of Jainism): जैन दर्शन में मोक्ष प्राप्ति के तीन साधन—1. सम्यक् दर्शन (Right Faith), 2. सम्यक् ज्ञान (Right Knowledge), और 3. सम्यक् चरित्र (Right Conduct)—को ‘त्रिरत्न’ कहा जाता है।
5. अष्टमंगल (Ashtamangala - आठ शुभ प्रतीक): जैन कला (विशेषकर मथुरा के आयागपट्टों और कल्पसूत्र की पांडुलिपियों) में आठ मांगलिक प्रतीकों का अंकन होता है:
1. स्वस्तिक (चार गतियों—देव, मनुष्य, तिर्यंच, नरक—और शांति का प्रतीक)
2. श्रीवत्स (अनंत ज्ञान का प्रतीक)
3. नंद्यावर्त (नौ कोनों वाला जटिल स्वस्तिक)
4. वर्धमानक (दो मिट्टी के दीपकों का संपुट - समृद्धि का प्रतीक)
5. भद्रासन (पवित्र सिंहासन)
6. कलश (पूर्ण कुंभ - मंगल एवं प्रज्ञा का प्रतीक)
7. दर्पण (आत्मा के शुद्ध साक्षात्कार का प्रतीक)
8. मत्स्य-युगल (दो मछलियाँ - संसार सागर को पार करने और कामदेव पर विजय का प्रतीक)।
6. मानस्तंभ (Manastambha): दिगंबर जैन मंदिरों के मुख्य द्वार के सामने खड़ा किया जाने वाला एक ऊँचा एकाश्म स्तंभ, जिसके शीर्ष पर चारों दिशाओं में मुख किए हुए चौमुखी तीर्थंकर प्रतिमा होती है। मान्यता है कि इसे देखते ही भक्त का ‘मान’ (अहंकार) नष्ट हो जाता है।
7. समवसरण (Samavasarana): केवलज्ञान प्राप्ति के बाद देवताओं द्वारा निर्मित वह वृत्ताकार या वर्गाकार तीन घेरों वाला दिव्य उपदेश-मंडप जहाँ तीर्थंकर के चारों ओर देवता, मनुष्य और पशु-पक्षी बिना किसी वैर-भाव के बैठकर धर्मोपदेश सुनते हैं।
8. यक्ष और यक्षिणी (शासन देवता): प्रत्येक तीर्थंकर की सेवा में एक संरक्षक यक्ष और एक यक्षिणी (शासन देवी) नियुक्त होते हैं—जैसे ऋषभदेव के गोमुख यक्ष व चक्रेश्वरी यक्षिणी, नेमिनाथ के गोमेद यक्ष व अंबिका (कूष्मांडिनी) यक्षिणी, पार्श्वनाथ के धरणेंद्र यक्ष व पद्मावती यक्षिणी, और महावीर के मातंग यक्ष व सिद्धायिका यक्षिणी।
16.2 विभिन्न तीर्थंकरों की पहचान: ‘लांछन’
चूँकि सभी 24 तीर्थंकरों की शारीरिक बनावट, मुद्रा (कायोत्सर्ग या पद्मासन) और भाव-भंगिमा एक जैसी होती है, इसलिए गुप्त और पूर्व-मध्यकाल से शिल्पकारों ने प्रत्येक तीर्थंकर की प्रतिमा के पाद-पीठ (Pedestal / सिंहासन के निचले भाग) पर एक विशेष चिह्न उत्कीर्ण करना शुरू किया, जिसे ‘लांछन’ (Lanchhana / Emblem) कहा जाता है।
(नोट: प्रारंभिक काल में केवल दो तीर्थंकरों को बिना लांछन के भी पहचाना जा सकता था—प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को उनके कंधों पर लटकती हुई जटाओं/केश-लटों से, और 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ को उनके सिर के ऊपर सात फनों वाले सर्प-छत्र से।)
परीक्षा की दृष्टि से प्रमुख तीर्थंकरों के लांछन (प्रतीक चिह्न) एवं तथ्य:
| क्र. | तीर्थंकर का नाम | क्रम | लांछन (प्रतीक चिह्न) | यक्ष एवं यक्षिणी | विशेष तथ्य / संबंधित स्थल |
|---|---|---|---|---|---|
| 1. | ऋषभदेव (आदिनाथ) | 1वें | वृषभ / सांड (Bull) | गोमुख / चक्रेश्वरी | अयोध्या में जन्म, कैलाश (अष्टापद) पर निर्वाण; ऋग्वेद में उल्लेख। |
| 2. | अजितनाथ | 2रे | हाथी / गज (Elephant) | महायक्ष / अजितबाला | अयोध्या में जन्म, सम्मेद शिखर पर निर्वाण। |
| 3. | संभवनाथ | 3रे | अश्व / घोड़ा (Horse) | त्रिमुख / दुरितारि | श्रावस्ती में जन्म। |
| 4. | सुपार्श्वनाथ | 7वें | स्वस्तिक (Swastika) | मातंग / शांता | वाराणसी में जन्म; सिर पर 5 (या 9) फनों का सर्प-छत्र भी मिलता है। |
| 5. | चंद्रप्रभ | 8वें | अर्धचंद्र (Crescent Moon) | विजय / भृकुटी | चंद्रपुरी में जन्म। |
| 6. | शांतिनाथ | 16वें | मृग / हिरण (Deer) | गरुड़ / निर्वाणी | हस्तिनापुर में जन्म। |
| 7. | मल्लिनाथ | 19वें | कलश (Water Jar) | कुबेर / अपराजिता | मिथिला में जन्म; श्वेतांबर परंपरा इन्हें महिला (राजकुमारी मल्लि) मानती है, जबकि दिगंबर पुरुष मानते हैं। |
| 8. | मुनिसुव्रतनाथ | 20वें | कछुआ / कूर्म (Tortoise) | वरुण / बहुरूपिणी | राजगृह (बिहार) में जन्म। |
| 9. | अरिष्टनेमि (नेमिनाथ) | 22वें | शंख (Conch Shell) | गोमेद / अंबिका | शौरीपुर में जन्म, गिरनार पर्वत (गुजरात) पर निर्वाण; ऋग्वेद में उल्लेख और कृष्ण के समकालीन/चचेरे भाई माने गए। |
| 10. | पार्श्वनाथ | 23वें | सर्प (Serpent / 7-hooded Snake) | धरणेंद्र / पद्मावती | वाराणसी के राजा अश्वसेन के पुत्र; सम्मेद शिखर (पारसनाथ पहाड़ी, झारखंड) पर निर्वाण; चातुर्याम धर्म के प्रवर्तक। |
| 11. | महावीर (वर्धमान) | 24वें | सिंह (Lion) | मातंग / सिद्धायिका | कुंडग्राम (वैशाली) में जन्म, पावापुरी (नालंदा, बिहार) में निर्वाण; पाँचवाँ महाव्रत ‘ब्रह्मचर्य’ जोड़ा। |
17. बौद्ध और जैन स्थापत्य — तुलनात्मक विश्लेषण
यद्यपि बौद्ध और जैन दोनों स्थापत्य परंपराओं का जन्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व की श्रमण संस्कृति से हुआ और दोनों को ही व्यापारी वर्ग तथा उदार शासकों का संरक्षण मिला, तथापि उनके दार्शनिक सिद्धांतों और उपासना पद्धतियों ने उनकी वास्तुकला को भिन्न रूप दिए:
| तुलना का आधार | बौद्ध स्थापत्य | जैन स्थापत्य |
|---|---|---|
| 1. धार्मिक उद्देश्य एवं केंद्र | अवशेष-पूजा (स्तूप), सामूहिक संघ-प्रार्थना (चैत्य) और करुणा-प्रधान बोधिसत्त्व भक्ति। | तीर्थंकरों के वैराग्य, कठोर तपश्चर्या (कायोत्सर्ग) और केवलज्ञान के आदर्श का ध्यान। |
| 2. प्रमुख स्थापत्य रूप | स्तूप, अप्सिडल चैत्यगृह, चतुष्कोणीय विहार और ईंट-निर्मित महाविहार (नालंदा, विक्रमशिला)। | शैलकृत आवासीय गुफाएँ (गुम्फा), चौमुखी (सर्वतोभद्र) संगमरमर मंदिर, मानस्तंभ और मंदिर-नगर। |
| 3. स्तूप की भूमिका | स्तूप बौद्ध स्थापत्य का सबसे केंद्रीय और अनिवार्य स्मारक रहा। | प्रारंभिक काल (जैसे मथुरा का कंकाली टीला) में जैन स्तूप बने, किंतु बाद में स्तूप परंपरा गौण हो गई और मंदिर प्रमुख हो गए। |
| 4. गुफा परंपरा | विशाल अप्सिडल चैत्यगृह और बहुमंजिला बड़े विहार (भाजा, कार्ले, अजंता, एलोरा, कन्हेरी)। | प्रारंभिक गुफाएँ (उदयगिरि-खंडगिरि) बिना चैत्यगृह के छोटे, सादे व नीचे द्वार वाले तपोवन कक्ष थीं; बाद में एलोरा में अलंकृत गुफा-मंदिर बने। |
| 5. प्रतिमा परंपरा एवं मुद्राएँ | बुद्ध व बोधिसत्त्वों की अनेक मुद्राएँ (भूमिस्पर्श, धर्मचक्र, अभय, वरद, शयन/महापरिनिर्वाण) और विविध रूप। | तीर्थंकर प्रतिमाओं में कठोर मानकीकरण—केवल दो मुद्राएँ (कायोत्सर्ग या पद्मासन); पहचान हेतु वक्ष पर ‘श्रीवत्स’ और पाद-पीठ पर ‘लांछन’। |
| 6. कथात्मक कला (Narrative Art) | जातक कथाओं और बुद्ध के जीवन-दृश्यों का अत्यधिक समृद्ध, नाटकीय और भावपूर्ण अंकन (साँची, भरहुत, अमरावती, अजंता)। | तीर्थंकर प्रतिमाओं में भाव-शून्यता (वीतरागता) पर बल; कथात्मक दृश्य अपेक्षाकृत सीमित (छत, तोरण या कल्पसूत्र चित्रों में)। |
| 7. मंदिर स्थापत्य एवं अलंकरण | भारत में संरचनात्मक बौद्ध मंदिर (जैसे महाबोधि मंदिर) सीमित रहे; पूर्व-मध्यकाल के बाद भारत में बौद्ध स्थापत्य का ह्रास हुआ। | पूर्व-मध्यकाल से आधुनिक काल तक भारत में निरंतर जीवंत; बाहर से सादे किंतु भीतर से संगमरमर की जालीदार नक्काशी (दिलवाड़ा, रणकपुर) का चरम उत्कर्ष। |
| 8. क्षेत्रीय प्रसार एवं निरंतरता | मौर्य व कुषाण काल में अखिल भारतीय और एशियाई प्रसार (श्रीलंका, मध्य व पूर्वी एशिया); किंतु 12वीं शती के बाद भारत में पतन। | भारत के बाहर प्रसार नहीं हुआ, किंतु पश्चिमी भारत (गुजरात, राजस्थान), कर्नाटक, बिहार और मध्य भारत में आज तक अक्षुण्ण निरंतरता। |
समानताएँ (Similarities):
1. दोनों ने प्रारंभिक काल में वैदिक यज्ञ-वेदियों के स्थान पर स्थायी पाषाण और शैलकृत स्थापत्य को बढ़ावा दिया।
2. दोनों में प्रारंभिक चरण में प्रतीकों (धर्मचक्र, त्रिरत्न, स्वस्तिक, अष्टमंगल, आयागपट्ट, स्तूप) का समान रूप से प्रयोग हुआ।
3. दोनों ने लोक धर्म के देवी-देवताओं—विशेषकर यक्ष और यक्षिणियों—को अपने धार्मिक ढाँचे में सहायक/संरक्षक देवताओं के रूप में आत्मसात किया।
4. दोनों स्थापत्य परंपराओं की आर्थिक रीढ़ प्राचीन और मध्यकालीन भारत का ‘व्यापारी वर्ग, श्रेणियाँ (Guilds) और नगरवासी दानदाता’ रहे।
18. व्यापार, शहरीकरण और स्थापत्य
प्राचीन भारत में बौद्ध और जैन स्थापत्य का भूगोल वास्तव में प्राचीन भारत के ‘व्यापारिक मार्गों और शहरीकरण का मानचित्र’ है।
1. उत्तरापथ और दक्षिणापथ का संगम:
- प्राचीन भारत के दो महामार्ग थे—‘उत्तरापथ’ (तक्षशिला से मथुरा, प्रयागराज, वाराणसी और पाटलिपुत्र होते हुए ताम्रलिप्ति बंदरगाह तक) और ‘दक्षिणापथ’ (कौशांबी/उज्जयिनी से विदिशा, प्रतिष्ठान/पैठण होते हुए सुदूर दक्षिण तक)।
- साँची (विदिशा के पास) और भरहुत (सतना) ठीक उन्हीं चौराहों पर स्थित थे जहाँ उत्तर भारत से आने वाले काफिले दक्कन और पश्चिमी तट (भड़ौच/सोपारा) की ओर मुड़ते थे।
2. पश्चिमी दक्कन के दर्रे, बंदरगाह और शैलकृत गुफाएँ:
- प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईस्वी के बीच जब भारत और रोमन साम्राज्य के बीच समुद्री व्यापार (Indo-Roman Trade) अपने शिखर पर था, तब पश्चिमी तट के बंदरगाहों—कल्याण, सोपारा (शूर्पारक), चौल और भड़ौच—को दक्कन के भीतरी उत्पादन केंद्रों (पैठण, तगर, नासिक, जुन्नर) से जोड़ने वाले पहाड़ी दर्रों पर सैकड़ों बौद्ध गुफाएँ खोदी गईं:
- नानेघाट दर्रा: जुन्नर की गुफाएँ (जहाँ सर्वाधिक गुफा समूह हैं)।
- भोरघाट दर्रा: कार्ले, भाजा, बेडसा और कोंडाने की गुफाएँ।
- थालघाट दर्रा: नासिक (पांडुलेना) की गुफाएँ।
- बंदरगाह पृष्ठभूमि: कन्हेरी की गुफाएँ (सोपारा और कल्याण बंदरगाहों के ठीक पास)।
- अजंता और पितलखोरा: विदर्भ और खानदेश से उज्जयिनी व पैठण जाने वाले मार्ग पर।
3. व्यापारियों और धार्मिक संस्थानों का पारस्परिक संबंध (Symbiotic Relationship):
- वैचारिक समर्थन: बौद्ध और जैन संस्थानों को व्यापारी समुदायों, सार्थवाहों और श्रेणियों से व्यापक संरक्षण मिला। अभिलेखों में व्यापारिक दान और स्थायी निधियों के उल्लेख से धार्मिक संस्थानों तथा वाणिज्यिक नेटवर्क के घनिष्ठ संबंध का पता चलता है।
- आर्थिक नेटवर्क के केंद्र के रूप में विहार: पश्चिमी दक्कन और आंध्र के बौद्ध विहार केवल आध्यात्मिक केंद्र नहीं थे; वे व्यापारिक काफिलों के लिए सुरक्षित रात्रि-विश्राम स्थल, प्राथमिक चिकित्सा केंद्र और बाजार की सूचनाओं के आदान-प्रदान के केंद्र थे।
- श्रेणियों (Shrenis/Guilds) की बैंकिंग भूमिका: नासिक, जुन्नर और कन्हेरी के अभिलेख बताते हैं कि राजा या धनी व्यापारी जब भिक्षु-संघ को भिक्षुओं के चीवर (वस्त्र) और भोजन के लिए दान देना चाहते थे, तो वे मूल धनराशि किसी ‘श्रेणी’ (जैसे बुनकरों की श्रेणी, तिल-पीसने वालों की श्रेणी या कुम्हारों की श्रेणी) के पास ‘अक्षय-नीवी’ (Perpetual Endowment) के रूप में जमा कर देते थे। श्रेणी उस मूलधन को व्यापार में लगाती थी और उससे मिलने वाले वार्षिक ब्याज से हर वर्ष वर्षावास में भिक्षुओं को वस्त्र और भोजन उपलब्ध कराती थी।
19. राजकीय बनाम निजी एवं सामुदायिक संरक्षण
सामान्य धारणा के विपरीत, प्राचीन भारतीय बौद्ध और जैन स्मारक केवल सम्राटों के आदेश से नहीं बने थे। इनका संरक्षण दो समानांतर धाराओं में बँटा हुआ था:
(क) राजकीय संरक्षण:
- अशोक: स्तूपों, एकाश्म स्तंभों और बाराबर गुफाओं के माध्यम से राजकीय संसाधनों और केंद्रीकृत कार्यशालाओं का उपयोग।
- खारवेल: कलिंग में जैन धर्म के पुनरुत्थान और उदयगिरि-खंडगिरि गुफाओं का संरक्षण।
- सातवाहन और पश्चिमी क्षत्रप: यद्यपि सातवाहन शासक (जैसे गौतमीपुत्र सातकर्णी) वैदिक ब्राह्मण धर्म के पोषक थे, फिर भी उन्होंने और उनकी रानियों (जैसे गौतमी बलश्री) ने नासिक और कार्ले की बौद्ध गुफाओं को कर-मुक्त ग्राम दान दिए।
- वाकाटक और पाल शासक: अजंता (हरिषेण) और पूर्वी भारत के महाविहारों (कुमारगुप्त, हर्षवर्धन, गोपाल, धर्मपाल, देवपाल) में राजकीय और सामंती संरक्षण प्रमुख रहा।
(ख) निजी एवं सामुदायिक संरक्षण:
- शुंग और सातवाहन काल में साँची, भरहुत, अमरावती, कार्ले और कन्हेरी का निर्माण ‘सामूहिक जन-सहयोग’ (Crowd-funding of Ancient India) का परिणाम था।
- विविध सामाजिक वर्गों की भागीदारी: साँची के तोरणों और वेदिकाओं पर 600 से अधिक छोटे-छोटे दान-अभिलेख हैं। इनमें दान देने वालों में गृहिणियाँ, कृषक (गृहपति), वणिक, सार्थवाह, विदिशा के हाथीदांत तराशने वाले कारीगर (दंतकार), बुनकर, लोहार, स्वर्णकार, मालाकार, और यहाँ तक कि विदेशी ‘यवन’ (जैसे कार्ले में धेनुकाकटक के यवन) भी शामिल हैं।
- महिलाओं और भिक्षु-भिक्षुणियों का योगदान: साँची और भरहुत के दान-अभिलेखों में लगभग एक-तिहाई से अधिक दानदाता महिलाएँ (उपासिकाएँ और भिक्षुणियाँ) हैं। नागार्जुनकोंडा में तो इक्ष्वाकु रानियों (चाम्तिश्री) और उपासिका बोधिश्री ने पूरे महाचैत्य और विहार परिसरों का निर्माण करवाया, जबकि उनके पति और पुत्र वैदिक अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे। यह प्राचीन भारत में महिलाओं की धार्मिक स्वायत्तता और आर्थिक अधिकार को सिद्ध करता है।
20. स्थापत्य विकास की विश्लेषणात्मक यात्रा
भारतीय स्थापत्य का विकास—अवशेष-पूजा → स्तूप → चैत्य-विहार → शैलकृत स्थापत्य → प्रतिमा परंपरा → विकसित मंदिर स्थापत्य—एक बहुआयामी और गतिशील प्रक्रिया थी:
1. अवशेष-पूजा से स्मारकीय स्तूप तक: प्रारंभ में जो मिट्टी के साधारण शवाधान टीले थे, वे मौर्य काल में ईंटों के अर्धगोलाकार अण्ड बने, शुंग-सातवाहन काल में पाषाण वेदिकाओं व तोरणों/आयक स्तंभों से सज्जित हुए, और कुषाण-गुप्त काल में ऊँचे बेलनाकार स्तूपों (जैसे सारनाथ का धमेख स्तूप और तक्षशिला का धर्मराजिका व शाह-जी-की-ढेरी) में रूपांतरित हो गए।
2. खुले स्तूप से शैलकृत चैत्य-विहार तक: वर्षा ऋतु में उपासना की आवश्यकता ने स्तूप को गुफा के भीतर प्रतिष्ठापित कर ‘चैत्यगृह’ को जन्म दिया। गजपृष्ठाकार (Apsidal) चैत्य योजना आगे चलकर दक्षिण भारतीय मंदिरों (जैसे ऐहोल का दुर्गा मंदिर और महाबलीपुरम का सहदेव रथ) की ‘गजपृष्ठ विमान’ शैली का आधार बनी।
3. प्रतीक से प्रतिमा और विहार से मंदिर तक: कुषाण काल में जब महायान और भक्ति धारा के प्रभाव से बुद्ध व तीर्थंकरों की मानवाकार प्रतिमाएँ बनीं, तो स्थापत्य की आवश्यकता भी बदल गई। अब स्तूप की परिक्रमा के साथ-साथ ‘मूर्ति के दर्शन और पूजा’ के लिए एक गर्भगृह की आवश्यकता हुई। इसी से अजंता और एलोरा के महायान विहारों में पीछे की दीवार में ‘गर्भगृह’ जुड़ा और शैलकृत स्थापत्य धीरे-धीरे एकाश्म मंदिरों (जैसे एलोरा का कैलाश और छोटा कैलाश) से होता हुआ स्वतंत्र संरचनात्मक मंदिरों (महाबोधि मंदिर, दिलवाड़ा, रणकपुर) में परिणत हो गया।
4. गैर-रैखिक (Non-linear) और सह-अस्तित्व वाली प्रकृति: यह विकास पूर्णतः रैखिक (Linear) नहीं था कि एक रूप समाप्त होने पर ही दूसरा शुरू हुआ हो। उदाहरण के लिए, जब कुषाण और गुप्त काल में मानवाकार प्रतिमाएँ और संरचनात्मक मंदिर बन रहे थे, तब भी अमरावती में प्रतीकात्मक अंकन, कन्हेरी-अजंता-एलोरा में शैलकृत गुफाओं का उत्खनन, और सारनाथ-नालंदा में स्तूपों का निर्माण साथ-साथ चल रहा था।
21. मानचित्र आधारित अध्ययन — 16 प्रमुख स्थल
| क्र. | स्थल का नाम | वर्तमान राज्य (एवं जिला) | संबंधित स्थापत्य एवं धर्म | एक पंक्ति का परीक्षा-उपयोगी महत्त्व |
|---|---|---|---|---|
| 1. | साँची (Sanchi) | मध्य प्रदेश (रायसेन) | बौद्ध स्तूप, स्तंभ, चैत्य व विहार | अशोक द्वारा स्थापित महास्तूप, शुंगकालीन पाषाण विस्तार, सातवाहन कालीन चार अलंकृत तोरण और अनाकार बुद्ध कला का सर्वश्रेष्ठ केंद्र (UNESCO - 1989)। |
| 2. | भरहुत (Bharhut) | मध्य प्रदेश (सतना) | बौद्ध स्तूप एवं पाषाण वेदिका | शुंगकालीन लाल बलुआ पत्थर की वेदिका, जिस पर ब्राह्मी लिपि में शीर्षक-अभिलेखों के साथ जातक कथाएँ और यक्ष-यक्षिणी उत्कीर्ण हैं। |
| 3. | अमरावती (धान्यकटक) | आंध्र प्रदेश (गुंटूर) | बौद्ध महाचैत्य (स्तूप) | कृष्णा नदी तट पर महासंघिक केंद्र; श्वेत-हरित चूना पत्थर, आयक मंच व आयक स्तंभ तथा अनाकार से मानवाकार संक्रमण की गतिशील कला। |
| 4. | नागार्जुनकोंडा | आंध्र प्रदेश (गुंटूर/पालनाडु) | बौद्ध स्तूप एवं विहार | इक्ष्वाकु रानियों द्वारा संरक्षित; पहिए की तीलियों (Spoked-wheel) व स्वस्तिक योजना पर निर्मित ईंट के स्तूप। |
| 5. | बाराबर गुफाएँ | बिहार (जहानाबाद) | आजीवक शैलकृत गुफाएँ | भारत की सबसे प्राचीन जीवित शैलकृत गुफाएँ; अशोक द्वारा आजीवकों को समर्पित, चमकदार मौर्य पॉलिश और लोमस ऋषि का चैत्य-मेहराब। |
| 6. | भाजा (Bhaja) | महाराष्ट्र (पुणे) | बौद्ध शैलकृत चैत्य एवं विहार | पश्चिमी घाट की सबसे प्राचीन (2री शती ई.पू.) प्रारंभिक बौद्ध बौद्ध गुफाओं में से एक; झुके हुए स्तंभ, काष्ठ रिब्स और सूर्य-इंद्र का शिल्प। |
| 7. | कार्ले (Karla) | महाराष्ट्र (पुणे) | बौद्ध शैलकृत चैत्यगृह | भारत का सबसे विशाल और भव्य प्रारंभिक बौद्ध चैत्यगृह; कुंभ-आधार स्तंभ, मिथुन आकृतियाँ और सागौन की मूल लकड़ी की छत-कड़ियाँ। |
| 8. | नासिक (पांडुलेना) | महाराष्ट्र (नासिक) | बौद्ध शैलकृत गुफा समूह (24 गुफाएँ) | सातवाहन (गौतमीपुत्र विहार) और क्षहरात (नहपान विहार) के अभिलेखों व दान-प्रणाली के लिए प्रसिद्ध प्रारंभिक बौद्ध व महायान विहार। |
| 9. | कन्हेरी (Kanheri) | महाराष्ट्र (मुंबई) | बौद्ध शैलकृत गुफा समूह (109 गुफाएँ) | पश्चिमी तट के व्यापारिक मार्ग पर सबसे बड़ा गुफा परिसर; उन्नत वर्षा जल-संचयन प्रणाली और 1ली से 10वीं शती ई. तक निरंतर उपयोग। |
| 10. | अजंता (Ajanta) | महाराष्ट्र (छत्रपति संभाजीनगर) | बौद्ध शैलकृत चैत्य एवं विहार (30 गुफाएँ, अपूर्ण सहित) | वाघोरा नदी खड्ड में स्थित; सातवाहन व वाकाटक (हरिषेण) संरक्षण, पद्मपाणि भित्ति-चित्र और महापरिनिर्वाण शिल्प (UNESCO - 1983)। |
| 11. | एलोरा (Ellora) | महाराष्ट्र (छत्रपति संभाजीनगर) | बौद्ध (1-12), हिंदू (13-29) व जैन (30-34) गुफाएँ | तीन धर्मों के सह-अस्तित्व का केंद्र; बौद्ध विश्वकर्मा चैत्य (गुफा 10), तीन-मंजिला विहार (तीन ताल) और दिगंबर जैन इंद्रसभा (गुफा 32)। |
| 12. | उदयगिरि-खंडगिरि | ओडिशा (भुवनेश्वर) | जैन शैलकृत गुफाएँ (गुम्फा) | कलिंग नरेश खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख, दोमंजिला रानी गुम्फा और जैन मुनियों के लिए निर्मित आवासीय गुफाएँ (1ली शती ई.पू.)। |
| 13. | माउंट आबू (दिलवाड़ा) | राजस्थान (सिरोही) | जैन संरचनात्मक मंदिर (मारू-गुर्जर शैली) | विमल शाह (विमल वसही - 1031 ई.) और वस्तुपाल-तेजपाल (लूण वसही - 1230 ई.) द्वारा निर्मित सूक्ष्म संगमरमर नक्काशी के मंदिर। |
| 14. | रणकपुर (Ranakpur) | राजस्थान (पाली) | जैन चतुर्मुख (चौमुखी) मंदिर | 15वीं शती में सेठ धरण शाह द्वारा निर्मित और शिल्पी देपाक द्वारा डिज़ाइन किया गया 1,444 अद्वितीय संगमरमर स्तंभों वाला आदिनाथ मंदिर। |
| 15. | पालीताना (शत्रुंजय) | गुजरात (भावनगर) | जैन मंदिर-नगर (Temple-City) | शत्रुंजय पहाड़ी पर स्थित 863 से अधिक श्वेतांबर संगमरमर जैन मंदिरों का विशाल परिसर (मुख्य मंदिर—आदिनाथ)। |
| 16. | श्रवणबेलगोला | कर्नाटक (हासन) | जैन तीर्थ एवं एकाश्म प्रतिमा | चंद्रगिरि (चंद्रगुप्त मौर्य का संल्लेखना स्थल) और विंध्यगिरि पर चामुंडराय द्वारा निर्मित 57 फीट ऊँची बाहुबली (गोम्मटेश्वर) की प्रतिमा। |
22. कालक्रम एवं बहु-चरणीय विकास
1. पूर्व-मौर्य काल (5वीं – 4थी शताब्दी ईसा पूर्व):
- वैशाली और पिपरहवा (सिद्धार्थनगर, उ.प्र.) के प्रारंभिक मिट्टी/ईंट के स्तूप; राजगृह (सप्तपर्णी गुफा व जीवक आम्रवन) के प्रारंभिक प्रस्तर-आधार।
2. मौर्य काल (3री शताब्दी ईसा पूर्व — अशोक एवं दशरथ):
- स्तूप: साँची (स्तूप 1 का मूल ईंट-अण्ड), सारनाथ (धर्मराजिका स्तूप), भरहुत (मूल ईंट-स्तूप), तक्षशिला (धर्मराजिका), वैशाली और बैराठ (वृत्ताकार चैत्यगृह व स्तूप)।
- शैलकृत गुफाएँ: बाराबर (सुदामा, लोमस ऋषि, कर्ण चौपड़, विश्व झोपड़ी — अशोक) और नागार्जुनी (गोपिका, वापीयक, वडथिका — दशरथ) — आजीवक संप्रदाय हेतु।
- जैन मूर्ति: लोहानीपुर (पटना) से प्राप्त पॉलिशदार जैन तीर्थंकर धड़।
3. शुंग एवं चेदि काल (2री – 1ली शताब्दी ईसा पूर्व):
- स्तूप: भरहुत स्तूप की लाल बलुआ पत्थर की वेदिका व तोरण; साँची स्तूप 1 का पाषाण आच्छादन, मेधि, प्रदक्षिणापथ व वेदिका तथा स्तूप 2 व 3; बोधगया की पाषाण वेदिका।
- पश्चिमी दक्कन बौद्ध गुफाएँ (प्रारंभिक चरण): भाजा, कोंडाने, पितलखोरा और अजंता का प्रथम चरण (गुफा 9, 10, 12, 13)।
- जैन गुफाएँ: ओडिशा की उदयगिरि-खंडगिरि गुफाएँ (हाथीगुम्फा, रानी गुम्फा, गणेश गुम्फा — खारवेल काल)।
4. सातवाहन एवं पश्चिमी क्षत्रप काल (1ली शताब्दी ईसा पूर्व – 2री शताब्दी ईस्वी):
- साँची: स्तूप 1 के चारों अलंकृत तोरण द्वार (प्रथम शताब्दी ई.पू.)।
- आंध्र स्तूप: अमरावती महाचैत्य का मुख्य विस्तार, भट्टीप्रोलु, जग्गय्यपेट, घंटाशाला और सालिहुंडम तथा कंगनहल्ली (सान्नाति, कर्नाटक - जहाँ ‘राण्यो अशोक’ अभिलेख के साथ अशोक की प्रस्तर प्रतिमा मिली है)।
- पश्चिमी दक्कन गुफाएँ: बेडसा, कार्ले चैत्य, नासिक (पांडुलेना), जुन्नर और कन्हेरी का प्रारंभिक चरण।
5. कुषाण एवं इक्ष्वाकु काल (1ली – 3री शताब्दी ईस्वी):
- गांधार और मथुरा कला: बुद्ध और बोधिसत्त्वों की प्रथम मानवाकार प्रतिमाएँ; पेशावर का कनिष्क स्तूप (शाह-जी-की-ढेरी)।
- मथुरा (कंकाली टीला): जैन स्तूप, आयागपट्ट और सर्वतोभद्रिका (चौमुखी) तीर्थंकर प्रतिमाएँ।
- इक्ष्वाकु काल (3री–4थी शताब्दी ई.): नागार्जुनकोंडा (आंध्र प्रदेश) के पहिए के आकार वाले स्तूप और विहार।
6. गुप्त एवं वाकाटक काल (4थी – 6ठी शताब्दी ईस्वी):
- अजंता का द्वितीय (महायान) चरण: गुफा 1, 2, 16, 17, 19, 26 (वाकाटक नरेश हरिषेण का काल, 5वीं शती का उत्तरार्ध)।
- अन्य गुफाएँ: बाघ की बौद्ध गुफाएँ (म.प्र.), राजगीर की सोन भंडार जैन गुफाएँ (बिहार), और बादामी की गुफा संख्या 4 (जैन)।
- संरचनात्मक स्थापत्य: सारनाथ का धमेख स्तूप, नालंदा महाविहार का गुप्तकालीन विकास, और बोधगया के महाबोधि मंदिर का गुप्तकालीन विस्तार।
7. प्रारंभिक मध्यकाल एवं मध्यकाल (7वीं – 15वीं शताब्दी ईस्वी):
- एलोरा (महाराष्ट्र): बौद्ध गुफाएँ 1–12 (5वीं–7वीं शती ई.), हिंदू गुफाएँ 13–29 (6ठी–9वीं शती ई.), और दिगंबर जैन गुफाएँ 30–34 (इंद्रसभा व जगन्नाथ सभा — 9वीं–10वीं शती ई.)।
- सित्तनवासल जैन गुफा (तमिलनाडु — 7वीं–9वीं शती ई.)।
- पाल कालीन बौद्ध महाविहार (8वीं–12वीं शती ई.): ओदंतपुरी (गोपाल), विक्रमशिला और सोमपुर (धर्मपाल), जगद्दल (रामपाल)।
- श्रवणबेलगोला (कर्नाटक): चामुंडराय द्वारा बाहुबली की एकाश्म प्रतिमा का निर्माण (लगभग 981 ई.)।
- जैन संरचनात्मक मंदिर: खजुराहो के जैन मंदिर (पार्श्वनाथ, आदिनाथ, घंटाई — 10वीं–11वीं शती), माउंट आबू के दिलवाड़ा मंदिर (विमल वसही 1031 ई., लूण वसही 1230 ई.), पालीताना (11वीं शती से आगे) और रणकपुर चौमुखी मंदिर (1439 ई.)।
23. Prelims Quick Facts (50 उच्च-मूल्य तथ्य)
1. स्तूप की अवधारणा मूल रूप से पूर्व-बौद्ध (Pre-Buddhist) शवाधान टीलों से जुड़ी है, किंतु बौद्ध धर्म ने इसे अपने केंद्रीय स्थापत्य रूप में विकसित किया।
2. उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में स्थित ‘पिपरहवा स्तूप’ (शाक्य क्षेत्र) भारत का सबसे प्राचीन जीवित बौद्ध स्तूप माना जाता है।
3. स्तूप के शिखर पर बनी चौकोर रेलिंग को ‘हर्मिका’ कहा जाता है, जो सबसे पवित्र भाग है और देवताओं के निवास का प्रतीक है।
4. वेदिका के ऊर्ध्वाधर स्तंभों को ‘थंभ’, क्षैतिज पट्टियों को ‘सूची’ और सबसे ऊपरी अर्धगोलाकार पत्थर को ‘उष्णीष’ कहते हैं।
5. साँची स्तूप संख्या 1 मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में बेतवा नदी के पास स्थित है (चंबल नदी के पास नहीं)।
6. साँची के महास्तूप में कुल 4 तोरण हैं, जिनमें दक्षिणी तोरण सबसे प्राचीन है और इसका निर्माण सातवाहन शासक सातकर्णी के काल में हुआ था।
7. साँची के स्तूप संख्या 3 से बुद्ध के दो प्रमुख शिष्यों—सारिपुत्र और महामोग्गल्लान—के अस्थि-अवशेष प्राप्त हुए थे, जबकि स्तूप संख्या 2 में अशोककालीन धर्मप्रचारकों के अवशेष हैं।
8. भरहुत स्तूप (सतना, मध्य प्रदेश) शुंग काल में लाल बलुआ पत्थर से बना था; इसके अवशेष मुख्यतः कोलकाता के इंडियन म्यूजियम में हैं।
9. भरहुत की वेदिका पर राजा अजातशत्रु की बुद्ध से भेंट और अनाथपिंडिक द्वारा सिक्कों से ढककर जेतवन खरीदने का दृश्य ब्राह्मी अभिलेख सहित उत्कीर्ण है।
10. प्राचीन ‘धान्यकटक’ (धरणीकोटा/अमरावती) आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर महासंघिक बौद्ध संप्रदाय का प्रमुख केंद्र था।
11. अमरावती और नागार्जुनकोंडा के स्तूपों में तोरण द्वारों के स्थान पर चार दिशाओं में ‘आयक मंच’ और प्रत्येक पर पाँच ‘आयक स्तंभ’ बनाए जाते थे।
12. अमरावती स्तूप में श्वेत-हरित चूना पत्थर (Palnad Marble) का प्रयोग हुआ है और इसका प्रभाव श्रीलंका व दक्षिण-पूर्व एशिया की कला पर पड़ा।
13. नागार्जुनकोंडा (आंध्र प्रदेश) के स्तूप इक्ष्वाकु काल (3री शती ई.) में पहिए की तीलियों (Spoked-wheel) और स्वस्तिक आकार की ईंट-दीवारों पर बनाए गए थे।
14. कर्नाटक के गुलबर्गा (कलबुर्गी) जिले में भीमा नदी के तट पर स्थित ‘कंगनहल्ली’ (सान्नाति) स्तूप से प्राप्त उभारदार शिल्प में ‘राण्यो अशोक’ (राजा अशोक) अभिलेख के साथ सम्राट अशोक की पाषाण छवि मिली है।
15. आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले में वंशधारा नदी के तट पर स्थित ‘सालिहुंडम’ पहाड़ी स्तूपों, चैत्यगृहों और विहारों का प्रसिद्ध बौद्ध पुरातात्त्विक स्थल है (यहाँ शैलकृत गुफाएँ नहीं बल्कि ईंट व पत्थर की संरचनाएँ हैं)।
16. आंध्र प्रदेश के एलुरु जिले में स्थित ‘गुंटुपल्ली’ की बौद्ध गुफा में भारत के सबसे प्राचीन शैलकृत वृत्ताकार चैत्यगृहों में से एक है।
17. राजस्थान के जयपुर के पास ‘बैराठ’ (विराटनगर) से अशोक कालीन ईंट और लकड़ी के एक स्वतंत्र वृत्ताकार बौद्ध चैत्यगृह (मंदिर) के अवशेष मिले हैं।
18. ‘चैत्य’ बौद्ध भिक्षुओं और उपासकों का प्रार्थना/उपासना मंडप होता था, जबकि ‘विहार’ भिक्षुओं का निवास स्थान होता था।
19. बिहार के जहानाबाद जिले की ‘बाराबर और नागार्जुनी गुफाएँ’ भारत की सबसे प्राचीन जीवित शैलकृत गुफाएँ हैं।
20. बाराबर गुफाएँ सम्राट अशोक ने और नागार्जुनी गुफाएँ उनके पौत्र दशरथ ने ‘आजीवक संप्रदाय’ के अनुयायियों को दान दी थीं।
21. बाराबर की ‘लोमस ऋषि गुफा’ का मेहराबदार प्रवेश द्वार (जिस पर हाथियों द्वारा स्तूप पूजा का अंकन है) लकड़ी की वास्तुकला का पत्थर में प्रथम अनुकरण है।
22. पुणे (महाराष्ट्र) के पास स्थित ‘भाजा गुफाएँ’ पश्चिमी भारत के सबसे प्राचीन प्रारंभिक बौद्ध बौद्ध शैलकृत चैत्य और विहारों में से हैं; यहाँ सूर्य और इंद्र की प्रसिद्ध मूर्तियाँ हैं।
23. लोनावला (महाराष्ट्र) के पास स्थित ‘कार्ले का चैत्य’ भारत का सबसे बड़ा और भव्य शैलकृत प्रारंभिक बौद्ध चैत्यगृह है, जिसका निर्माण वैजयंती के श्रेष्ठि भूतपाल ने करवाया था।
24. नासिक की बौद्ध गुफाओं को ‘पांडुलेना’ या ‘त्रिरश्मि गुफाएँ’ कहा जाता है; ये गोदावरी की सहायक नदी के क्षेत्र में हैं (नर्मदा घाटी में नहीं)।
25. मुंबई के संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान में स्थित ‘कन्हेरी गुफाओं’ में 109 से अधिक बौद्ध गुफाएँ हैं जो अपनी प्राचीन जल-संचयन प्रणाली के लिए प्रसिद्ध हैं।
26. अजंता की 29 बौद्ध गुफाएँ महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर जिले में ‘वाघोरा नदी’ के घोड़े की नाल के आकार के खड्ड (Gorge) में स्थित हैं।
27. अजंता में कुल 5 चैत्यगृह हैं—गुफा संख्या 9 और 10 (सातवाहन/प्रारंभिक बौद्ध काल) तथा गुफा संख्या 19, 26 और 29 (वाकाटक/महायान काल)।
28. अजंता के महायान चरण का सर्वाधिक विकास वाकाटक वंश की वत्सगुल्म शाखा के शासक ‘हरिषेण’ (5वीं शती ई.) के संरक्षण में हुआ।
29. विश्वप्रसिद्ध ‘बोधिसत्त्व पद्मपाणि’ और ‘वज्रपाणि’ के भित्ति-चित्र अजंता की गुफा संख्या 1 में स्थित हैं।
30. ‘मरणासन्न राजकुमारी’ (Dying Princess) का प्रसिद्ध चित्र अजंता की गुफा संख्या 16 में है, जिसे हरिषेण के मंत्री वराहदेव ने बनवाया था।
31. बुद्ध के ‘महापरिनिर्वाण’ (लेटे हुए बुद्ध) की विशाल पाषाण मूर्ति अजंता की गुफा संख्या 26 में उत्कीर्ण है।
32. एलोरा (महाराष्ट्र) में कुल 34 गुफाएँ हैं जो बौद्ध (1–12), हिंदू/ब्राह्मण (13–29) और दिगंबर जैन (30–34) तीनों धर्मों से संबंधित हैं।
33. एलोरा की गुफा संख्या 10 को ‘विश्वकर्मा गुफा’ (बढ़ई की गुफा) कहा जाता है, जो वहाँ का एकमात्र बौद्ध चैत्यगृह है।
34. एलोरा की गुफा संख्या 11 (‘दो ताल’) और गुफा संख्या 12 (‘तीन ताल’) तीन-मंजिला विशाल बौद्ध विहार हैं जो वज्रयान परंपरा से जुड़े हैं।
35. प्रारंभिक बौद्ध कला (अनाकार चरण) में ‘रिक्त सिंहासन’ (Empty Seat) बुद्ध के ध्यान (Meditation) का, ‘चक्र’ प्रथम उपदेश का, और ‘स्तूप’ महापरिनिर्वाण का प्रतीक है।
36. बुद्ध की ‘भूमिस्पर्श मुद्रा’ मार के प्रलोभनों के विरुद्ध अपनी पवित्रता और सत्य के साक्षी के रूप में पृथ्वी का आह्वान करने का प्रतीक है।
37. बौद्ध परंपरा में ‘मैत्रेय’ (Maitreya) भविष्य के बुद्ध (Future Buddha) हैं जो अभी संसार की रक्षा के लिए अवतरित होने वाले हैं।
38. गांधार कला में नीले-भूरे शिस्ट पत्थर और स्टुको का प्रयोग हुआ, जबकि मथुरा कला में चित्तीदार लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग हुआ।
39. सारनाथ का ‘धमेख स्तूप’ गुप्त काल का एक बेलनाकार ईंट-प्रस्तर स्तूप है, जो बिना मेधि के सीधे भूमि से उठता है और इस पर सुंदर ज्यामितीय व वानस्पतिक अलंकरण हैं।
40. नालंदा का संगठित महाविहार के रूप में उत्कर्ष गुप्तकाल से स्पष्ट होता है; चीनी बौद्ध परंपरा में ‘शक्रादित्य’ को इसके आरंभिक संरक्षकों में जोड़ा गया है और कई विद्वान उसकी पहचान कुमारगुप्त प्रथम से करते हैं। विक्रमशिला महाविहार (अंतीचक, भागलपुर) पाल शासक धर्मपाल से जुड़ा है।
41. भुवनेश्वर (ओडिशा) की ‘उदयगिरि और खंडगिरि गुफाएँ’ कलिंग नरेश खारवेल (चेदि/महामेघवाहन वंश) के काल की जैन गुफाएँ हैं; यहाँ का ‘रानी गुम्फा’ सबसे बड़ा दोमंजिला गुफा परिसर है।
42. तमिलनाडु के पुदुक्कोट्टई में स्थित ‘सित्तनवासल गुफा’ (अरिवर कोविल) एक प्रसिद्ध जैन गुफा है जो अपने ‘समवसरण’ (कमल-सरोवर) भित्ति-चित्र के लिए विख्यात है।
43. एलोरा की प्रसिद्ध जैन गुफाएँ—गुफा संख्या 30 (छोटा कैलाश), गुफा 32 (इंद्रसभा) और गुफा 33 (जगन्नाथ सभा)—दिगंबर संप्रदाय से संबंधित हैं।
44. श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में स्थित गोम्मटेश्वर की 57 फीट ऊँची एकाश्म प्रतिमा प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र ‘बाहुबली’ की है; इसका निर्माण गंग मंत्री चामुंडराय ने करवाया था।
45. माउंट आबू (राजस्थान) के दिलवाड़ा जैन मंदिरों में ‘विमल वसही’ (आदिनाथ मंदिर) का निर्माण विमल शाह ने और ‘लूण वसही’ (नेमिनाथ मंदिर) का निर्माण वस्तुपाल-तेजपाल ने करवाया।
46. राजस्थान के पाली जिले में स्थित ‘रणकपुर का चौमुखी जैन मंदिर’ प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है और अपने 1,444 नक्काशीदार स्तंभों के लिए प्रसिद्ध है।
47. जैन तीर्थंकरों के वक्षस्थल पर अंकित शुभ चिह्न ‘श्रीवत्स’ कहलाता है, और पाद-पीठ पर अंकित पहचान चिह्न ‘लांछन’ कहलाता है।
48. प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का लांछन ‘वृषभ’ (सांड), 22वें अरिष्टनेमि का ‘शंख’, 23वें पार्श्वनाथ का ‘सर्प’ और 24वें महावीर का लांछन ‘सिंह’ है।
49. जैन धर्म की श्वेतांबर शाखा का ‘स्थानकवासी’ (Sthanakvasi) संप्रदाय (17वीं शती में लवजी द्वारा स्थापित) मूर्ति-पूजा और मंदिर अनुष्ठानों का विरोध करता है।
50. राजगीर (बिहार) की रत्नागिरि पहाड़ी पर स्थित ‘विश्व शांति स्तूप’ (1969) जापानी भिक्षु निचिदात्सु फूजी (फूजी गुरुजी) के प्रयासों से निर्मित संगमरमर का शांति पैगोडा है, जिसकी रूपरेखा उपेंद्र महारथी ने तैयार की थी।
24. Prelims Conceptual Traps (22 कठिन परीक्षा-जाल एवं भ्रांतियाँ)
1. Trap 1 (स्तूप की उत्पत्ति): "स्तूप की अवधारणा मूलतः बौद्ध है" — गलत। स्तूप (शवाधान टीला) की परंपरा पूर्व-बौद्ध (Pre-Buddhist) और वैदिक/श्रमण काल से चली आ रही थी; बौद्ध धर्म ने इसे अपनाया और स्मारकीय रूप दिया।
2. Trap 2 (बाराबर गुफाओं का धर्म और निर्माता): "बाराबर की गुफाएँ सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा बौद्ध भिक्षुओं के लिए बनवाई गई थीं" — दोनों तथ्य गलत। इन्हें सम्राट अशोक (और नागार्जुनी को दशरथ) ने ‘आजीवक संप्रदाय’ के लिए बनवाया था।
3. Trap 3 (दो अलग-अलग उदयगिरि गुफाएँ): ओडिशा (भुवनेश्वर) की ‘उदयगिरि-खंडगिरि गुफाएँ’ ईसा पूर्व पहली शताब्दी (खारवेल काल) की ‘जैन गुफाएँ’ हैं; जबकि मध्य प्रदेश (विदिशा) की ‘उदयगिरि गुफाएँ’ गुप्त काल (चंद्रगुप्त द्वितीय, 5वीं शती ई.) की ‘हिंदू (वैष्णव/शैव) गुफाएँ’ हैं जहाँ प्रसिद्ध वराह अवतार मूर्ति है।
4. Trap 4 (चैत्य बनाम विहार का उलटफेर): परीक्षा में अक्सर लिखा जाता है कि "विहार पूजा स्थल है जबकि चैत्य भिक्षुओं का निवास स्थान है" — यह ठीक उल्टा है। चैत्य पूजा/प्रार्थना मंडप है और विहार निवास स्थान है।
5. Trap 5 (सबसे प्राचीन शैलकृत गुफाएँ): "बादामी या अजंता की गुफाएँ भारत की सबसे प्राचीन जीवित शैलकृत गुफाएँ हैं" — गलत। सबसे प्राचीन जीवित शैलकृत गुफाएँ बिहार की ‘बाराबर गुफाएँ’ (3री शती ई.पू.) हैं; बादामी गुफाएँ 6ठी शती ई. की हैं।
6. Trap 6 (अजंता बनाम एलोरा का धार्मिक संबंध): अजंता की सभी 30 गुफाएँ (अपूर्ण गुफाओं सहित) बौद्ध परंपरा से संबंधित हैं; जबकि एलोरा की 34 गुफाएँ ‘बौद्ध, हिंदू और जैन’ तीनों धर्मों से संबंधित हैं।
7. Trap 7 (नदी और स्मारक का गलत युग्म): अजंता गुफाएँ ‘वाघोरा नदी’ के खड्ड में हैं (सही); किंतु साँची स्तूप ‘बेतवा नदी’ के पास है (चंबल नदी के पास नहीं), अमरावती स्तूप ‘कृष्णा नदी’ के तट पर है (गोदावरी के तट पर नहीं), और पांडुलेना (नासिक) गुफाएँ ‘गोदावरी बेसिन’ में हैं (नर्मदा घाटी में नहीं)।
8. Trap 8 (साँची स्तूप और भित्ति-चित्र): "साँची स्तूप अपने भित्ति-चित्रों (Mural Paintings) के लिए प्रसिद्ध है" — गलत। साँची अपने तोरणों की उभारदार मूर्तिकला (Relief Sculptures) के लिए प्रसिद्ध है, भित्ति-चित्रों के लिए अजंता, बाघ और लेपाक्षी प्रसिद्ध हैं।
9. Trap 9 (गोम्मटेश्वर बाहुबली की पहचान): "श्रवणबेलगोला की गोम्मटेश्वर प्रतिमा जैनों के अंतिम (24वें) तीर्थंकर को दर्शाती है" — गलत। यह प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र ‘बाहुबली’ को दर्शाती है, जो स्वयं 24 तीर्थंकरों की सूची में नहीं हैं।
10. Trap 10 (अजंता और महाबलीपुरम की तुलना): "अजंता और महाबलीपुरम एक ही काल और एक ही धर्म से संबंधित हैं" — गलत। अजंता बौद्ध (2री शती ई.पू. – 6ठी शती ई.) है और महाबलीपुरम पल्लवकालीन हिंदू (7वीं–8वीं शती ई.) है; दोनों में केवल एक ही समानता है कि दोनों में ‘शैलकृत स्मारक’ (Rock-cut monuments) हैं।
11. Trap 11 (बेसनगर और सित्तनवासल): बेसनगर (विदिशा) शैव गुफा मंदिर के लिए नहीं बल्कि हेलियोडोरस के वैष्णव ‘गरुड़ स्तंभ’ के लिए प्रसिद्ध है; जबकि ‘सित्तनवासल’ बौद्ध नहीं बल्कि ‘जैन गुफा मंदिर’ है।
12. Trap 12 (सालिहुंडम की प्रकृति): आंध्र प्रदेश का ‘सालिहुंडम’ शैलकृत गुफा मंदिर (Rock-cut cave shrine) नहीं है, बल्कि पहाड़ी पर स्थित ईंट व पत्थर से बना संरचनात्मक बौद्ध स्तूप और विहार परिसर है।
13. Trap 13 (रिक्त सिंहासन का अर्थ): प्रारंभिक बौद्ध प्रतिमा विज्ञान में ‘खाली सिंहासन’ (Empty Seat) महापरिनिर्वाण या प्रथम उपदेश का नहीं, बल्कि बुद्ध के ‘ध्यान’ (Meditation) का प्रतीक है।
14. Trap 14 (साँची स्तूप का मूल निर्माता और तोरण): साँची का मूल ईंट स्तूप अशोक ने बनवाया था, किंतु उसके चारों ओर पत्थर की वेदिका शुंग काल में और चार नक्काशीदार तोरण ‘सातवाहन काल’ में बने—अशोक ने तोरण नहीं बनवाए थे।
15. Trap 15 (आयक स्तंभों का क्षेत्र): ‘आयक मंच’ और ‘आयक स्तंभ’ उत्तर या मध्य भारत (साँची/भरहुत) के स्तूपों में नहीं मिलते; यह केवल आंध्र क्षेत्र (अमरावती, नागार्जुनकोंडा, जग्गय्यपेट, घंटाशाला) के स्तूपों की विशिष्टता है।
16. Trap 16 (अनाकार बनाम मानवाकार का अतिसरलीकरण): यह मानना कि साँची, भरहुत और अमरावती में कहीं भी बुद्ध की मानव मूर्ति नहीं मिली है—अर्धसत्य है। साँची और भरहुत की शुंगकालीन वेदिकाओं/तोरणों पर बुद्ध अनाकार हैं, किंतु अमरावती के उत्तर-चरण (2री–3री शती ई.) और साँची के गुप्तकालीन मंदिरों में बुद्ध की मानवाकार मूर्तियाँ भी बनीं।
17. Trap 17 (मथुरा कला का धर्म): "मथुरा कला शैली केवल बौद्ध धर्म से संबंधित थी" — गलत। मथुरा शैली में बौद्ध, जैन और हिंदू तीनों धर्मों की मूर्तियाँ समान रूप से बनीं (जबकि गांधार शैली मुख्यतः बौद्ध धर्म तक सीमित थी)।
18. Trap 18 (विक्रमशिला का जिला और संस्थापक): विक्रमशिला महाविहार वर्तमान बिहार के बाँका जिले में नहीं बल्कि ‘भागलपुर जिले’ (अंतीचक गाँव) में स्थित था, और इसकी स्थापना गोपाल प्रथम ने नहीं बल्कि ‘धर्मपाल’ ने की थी।
19. Trap 19 (एलोरा की कालानुक्रमिक भ्रांति): सामान्यतः पुस्तकों में लिखा होता है कि एलोरा में पहले बौद्ध, फिर हिंदू और अंत में जैन गुफाएँ बनीं; किंतु वास्तव में गुफा संख्या 14, 15, 21, 29 जैसी कई प्रारंभिक हिंदू गुफाओं का निर्माण बौद्ध गुफाओं (11 व 12) के समकालीन या उनसे पहले ही शुरू हो चुका था।
20. Trap 20 (उदयगिरि-खंडगिरि में चैत्यगृह): उदयगिरि-खंडगिरि की जैन गुफाओं में बौद्ध गुफाओं की तरह कोई गजपृष्ठाकार ‘चैत्यगृह’ या आंतरिक स्तूप नहीं है; वे केवल आवासीय गुम्फाएँ हैं।
21. Trap 21 (जैन स्तूप का अस्तित्व): "जैन धर्म में कभी भी स्तूप का निर्माण नहीं हुआ" — गलत। कुषाण काल में मथुरा के कंकाली टीला में एक भव्य जैन स्तूप (सुपार्श्वनाथ को समर्पित) मौजूद था।
22. Trap 22 (भूमिस्पर्श मुद्रा का सूक्ष्म अर्थ): भूमिस्पर्श मुद्रा का अर्थ यह नहीं है कि बुद्ध पृथ्वी को मार की निगरानी करने के लिए बुला रहे हैं, बल्कि वे अपनी तपस्या, पवित्रता और सत्य के ‘साक्षी’ (Witness) के रूप में पृथ्वी का आह्वान कर रहे हैं।
25. Mains Analytical Dimensions (मुख्य परीक्षा हेतु विश्लेषणात्मक आयाम)
मुख्य परीक्षा के विश्लेषणात्मक प्रश्नों में उच्च अंक प्राप्त करने के लिए विषय को निम्न 11 आयामों से जोड़कर लिखना चाहिए:
1. धर्म और कला का अंतःसंबंध (Religion and Art):
- कला कभी भी केवल सौंदर्यबोध के लिए नहीं बनी, वह दर्शन की संवाहक रही। जैसे—साँची-भरहुत का अनाकार प्रतीकवाद, गांधार-मथुरा की मानवाकार बुद्ध प्रतिमाएँ और अजंता के बोधिसत्त्व चित्र अलग-अलग काल, अनुष्ठानिक आवश्यकताओं, संरक्षण और क्षेत्रीय कलाशैलियों के परिवर्तन को दिखाते हैं; और जैन धर्म के ‘कठोर कायोत्सर्ग व अहिंसा’ ने बाहुबली की अडिग एकाश्म प्रतिमा को आकार दिया।
2. राजनीति और संरक्षण की प्रकृति (Polity and Patronage):
- मौर्य काल में स्थापत्य साम्राज्यवादी एकता और राजा के ‘धम्म’ का प्रतीक था, जबकि मौर्योत्तर और गुप्त-वाकाटक काल में विभिन्न राजवंशों (सातवाहन, इक्ष्वाकु, गुप्त, चालुक्य, राष्ट्रकूट) ने स्वयं वैदिक धर्मानुयायी होते हुए भी बौद्ध और जैन विहारों को दान देकर अपनी ‘राजनीतिक वैधता’ और सामाजिक सामंजस्य को सुदृढ़ किया।
3. व्यापार, नगरीकरण और आर्थिक नेटवर्क (Trade and Economy):
- उत्तरापथ और दक्षिणापथ के व्यापारिक मार्गों तथा पश्चिमी व पूर्वी तट के बंदरगाहों से प्राप्त व्यापारिक अधिशेष (Surplus) ने ही शैलकृत गुफाओं और स्तूपों को वित्तीय आधार दिया। विहारों ने बदले में व्यापारिक काफिलों को सुरक्षा, साख और संस्थागत स्थायित्व प्रदान किया।
4. तकनीकी नवाचार और अभियांत्रिकी (Technological Innovation):
- मौर्यकालीन काँच-जैसी पॉलिश (बाराबर), ग्रेनाइट और बेसाल्ट की खड़ी चट्टानों को ऊपर से नीचे (Top-down) तराशकर तीन-मंजिला विहार बनाना (एलोरा गुफा 12), नागार्जुनकोंडा में पहिए की तीलियों (Spoked-wheel) जैसी संरचनात्मक रूप से सक्षम रेडियल ईंट-योजना, कन्हेरी का वर्षा जल-संचयन तंत्र, और अजंता के खनिज रंगों का रसायन विज्ञान प्राचीन भारतीय अभियांत्रिकी की वैज्ञानिक परिपक्वता को दर्शाते हैं।
5. सामाजिक संरचना और समावेशन (Social Structure & Inclusivity):
- बौद्ध और जैन स्मारकों के निर्माण में वर्ण-व्यवस्था की सीमाएँ टूटती हुई दिखाई देती हैं। रथकारों, बढ़इयों, लोहारों, दंतकारों, सार्थवाहों और विदेशी यवनों (इंडो-ग्रीक/शक) के दान-अभिलेख दर्शाते हैं कि इन स्थापत्य केंद्रों ने विविध सामाजिक और नृजातीय समूहों को मुख्यधारा में समाहित किया।
6. सामूहिक दान परंपरा और महिलाओं की भूमिका (Collective Patronage & Gender):
- साँची, भरहुत, कार्ले और नागार्जुनकोंडा के अभिलेख सिद्ध करते हैं कि प्राचीन भारत में महिलाओं (भिक्षुणियों, गृहपति-पत्नियों, गणिकाओं और रानियों) को अपनी संपत्ति दान करने का स्वतंत्र अधिकार था और उन्होंने धार्मिक स्थापत्य के निर्माण में पुरुषों के बराबर भूमिका निभाई।
7. सांस्कृतिक समन्वय और लोक तत्त्वों का समावेशन (Cultural Syncretism & Folk Elements):
- बौद्ध और जैन स्थापत्य ने स्थानीय लोक संस्कृति को नकारा नहीं, बल्कि उसे आत्मसात कर उच्च दार्शनिक अर्थ दिया। उदाहरण के लिए—लोक परंपरा के उर्वरता प्रतीक ‘शालभंजिका’ (वृक्ष-देवता), ‘यक्ष-यक्षिणी’, ‘नाग-पूजा’ और ‘गजलक्ष्मी’ को साँची, भरहुत और जैन मंदिरों के द्वारों पर स्थान देकर जनसाधारण को संघ से जोड़ा गया।
8. क्षेत्रीय विविधता (Regional Diversity):
- एक ही धार्मिक विचार ने अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में स्थानीय सामग्री और संस्कृति के अनुसार भिन्न रूप लिए—मध्य भारत में लाल/पीले बलुआ पत्थर के तोरणयुक्त स्तूप (साँची, भरहुत), आंध्र में श्वेत-हरित चूना पत्थर के आयक-स्तंभयुक्त स्तूप (अमरावती), पश्चिमी घाट में बेसाल्ट की शैलकृत गुफाएँ (कार्ले, अजंता), पश्चिमोत्तर में शिस्ट पत्थर की गांधार कला, बिहार-बंगाल में ईंट के महाविहार व काले बेसाल्ट की पाल मूर्तियाँ, और राजस्थान-गुजरात में संगमरमर के जैन मंदिर।
9. प्रतीक से प्रतिमा तक का विकास (Aniconic to Iconic Transition):
- यह संक्रमण केवल कला का बदलाव नहीं था, बल्कि यह श्रमण परंपरा के ‘तर्क और ध्यान-प्रधान’ स्वरूप से ‘भक्ति और उपासना-प्रधान’ स्वरूप की ओर बढ़ने का ऐतिहासिक दस्तावेज है।
10. कलात्मक और स्थापत्य की निरंतरता (Cultural Continuity):
- बौद्ध चैत्यों का ‘गजपृष्ठाकार’ (Apsidal) विन्यास और ‘चंद्रशाला’ (चैत्य-वातायन) आगे चलकर हिंदू मंदिरों के ‘गवाक्ष’ और ‘शुकनास’ में रूपांतरित हो गए; मौर्य स्तंभों की पॉलिश और घंटाकृति शीर्ष गुप्त व चालुक्य स्तंभों में ढल गए; और अजंता की चित्रकला की रेखाएँ सित्तनवासल, एलोरा और बाद की भारतीय लघु चित्रकला में जीवित रहीं।
11. वैश्विक सांस्कृतिक कूटनीति (Soft Power & Cultural Diplomacy):
- साँची, अमरावती, गांधार, अजंता और नालंदा-विक्रमशिला से निकली स्थापत्य एवं कला परंपराओं ने रेशम मार्ग (Silk Route) और समुद्री मार्गों से होकर श्रीलंका (अनुराधापुरा), म्यांमार (बगान), इंडोनेशिया (बोरोबुदुर), कंबोडिया, तिब्बत, चीन (दुनहुआंग गुफाएँ), कोरिया और जापान तक पूरे एशिया को एक साझा सांस्कृतिक सूत्र में पिरोया।
26. Mains Answer-Enrichment Material (उत्तर-संवर्धन हेतु 22 विशिष्ट उदाहरण)
नीचे दिए गए 22 ठोस पुरातात्त्विक और अभिलेखीय उदाहरणों का सीधा उपयोग मुख्य परीक्षा के उत्तरों में अपने तर्कों को प्रामाणिक बनाने के लिए करें:
1. विदिशा के हाथीदांत कारीगरों (दंतकारों) का अभिलेख (साँची दक्षिणी तोरण):
- किस प्रश्न में उपयोगी: कला में श्रेणी (Guild) संरक्षण या लकड़ी/हाथीदांत से पत्थर में तकनीक के हस्तांतरण पर।
- क्या सिद्ध करेगा: यह सिद्ध करता है कि पत्थर के तोरणों पर इतनी सूक्ष्म नक्काशी इसलिए संभव हुई क्योंकि उसे पेशेवर हाथीदांत कारीगरों की श्रेणी ने स्वयं दान देकर तराशा था।
2. भरहुत का ‘जेतवन क्रय’ पदक (Anathapindika Medallion):
- किस प्रश्न में उपयोगी: द्वितीय नगरीकरण, मुद्रीकरण (Monetisation) और व्यापारी-बौद्ध गठजोड़ पर।
- क्या सिद्ध करेगा: श्रावस्ती के सेठ अनाथपिंडिक द्वारा जेतवन की भूमि को चाँदी के आहत सिक्कों (कार्षापण) से ढककर खरीदने का दृश्य व्यापारिक पूंजी और बौद्ध संघ के गहरे संबंध को दर्शाता है।
3. साँची के तोरण की ‘शालभंजिका’ और भरहुत की ‘चुलकोका व सिरिमा देवता’:
- किस प्रश्न में उपयोगी: बौद्ध कला में लोक तत्वों (Folk motifs) के समावेशन पर।
- क्या सिद्ध करेगा: बौद्ध धर्म ने जनसाधारण की पूर्व-प्रचलित वृक्ष और यक्ष पूजा को समाप्त करने के बजाय उन्हें स्तूप के रक्षक के रूप में अपनाकर सामाजिक स्वीकार्यता प्राप्त की।
4. नागार्जुनकोंडा की इक्ष्वाकु रानी ‘चाम्तिश्री’ और उपासिका ‘बोधिश्री’:
- किस प्रश्न में उपयोगी: प्राचीन भारत में महिलाओं की स्थिति या धार्मिक सहिष्णुता पर।
- क्या सिद्ध करेगा: जब इक्ष्वाकु राजा वैदिक अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे, तब राजपरिवार की महिलाओं ने स्वतंत्र रूप से बौद्ध महाचैत्य और विहारों का निर्माण करवाया—यह परिवार के भीतर धार्मिक बहुलवाद और महिला स्वायत्तता का प्रमाण है।
5. कार्ले चैत्य का श्रेष्ठि ‘भूतपाल’ और ‘यवन’ दानदाता:
- किस प्रश्न में उपयोगी: हिंद-रोमन व्यापार, वैश्वीकरण और शैलकृत स्थापत्य के अर्थशास्त्र पर।
- क्या सिद्ध करेगा: कर्नाटक (वैजयंती) के व्यापारी और पश्चिमी तट के विदेशी यवन (इंडो-ग्रीक) व्यापारियों द्वारा महाराष्ट्र के कार्ले चैत्य में स्तंभ दान करना अखिल भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक एकीकरण को सिद्ध करता है।
6. बाराबर की ‘लोमस ऋषि गुफा’ का प्रवेश-मेहराब:
- किस प्रश्न में उपयोगी: भारतीय स्थापत्य के क्रमिक विकास (Evolution) और धार्मिक सहिष्णुता पर।
- क्या सिद्ध करेगा: बौद्ध सम्राट अशोक द्वारा आजीवक संप्रदाय को गुफा दान देना राजकीय पंथनिरपेक्षता का और काष्ठ झोपड़ी का पत्थर में अनुकरण तकनीकी क्रांति का प्रमाण है।
7. कंगनहल्ली (सान्नाति, कर्नाटक) का ‘राण्यो अशोक’ शिल्प:
- किस प्रश्न में उपयोगी: मौर्य स्मृति की निरंतरता और दक्कन में बौद्ध प्रसार पर।
- क्या सिद्ध करेगा: अशोक की मृत्यु के तीन सौ वर्ष बाद भी सातवाहन काल में दक्कन के स्तूप पर अशोक की छवि और नाम उत्कीर्ण होना उनकी अखिल भारतीय सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है।
8. अमरावती स्तूप का ‘नालागिरि दमन’ (Taming of Mad Elephant Nalagiri) फलक:
- किस प्रश्न में उपयोगी: अमरावती कला शैली की गतिशीलता और मनोवैज्ञानिक गहराई पर।
- क्या सिद्ध करेगा: एक ही फलक के बाएँ भाग में पागल हाथी से भागती भयभीत भीड़ का कोलाहल और दाएँ भाग में बुद्ध के सामने घुटने टेककर शांत बैठे हाथी का दृश्य अमरावती की नाटकीय कथा-शैली का सर्वोच्च उदाहरण है।
9. नागार्जुनकोंडा की ‘स्पोक-व्हील’ (पहिए की तीली) स्तूप योजना:
- किस प्रश्न में उपयोगी: प्राचीन भारतीय वास्तुकला में विज्ञान, अभियांत्रिकी और प्रतीकवाद के समन्वय पर।
- क्या सिद्ध करेगा: ईंटों को धर्मचक्र (पहिए) के आकार में जोड़ना एक साथ धार्मिक प्रतीकवाद भी था और गुंबद के दबाव को समान रूप से बाँटने वाली उन्नत सिविल इंजीनियरिंग भी।
10. अजंता गुफा 1 का ‘बोधिसत्त्व पद्मपाणि’ और गुफा 16 की ‘मरणासन्न राजकुमारी’:
- किस प्रश्न में उपयोगी: गुप्त-वाकाटक शास्त्रीय कला (Classical Art) में आध्यात्मिकता और मानवीय संवेदना के संतुलन पर।
- क्या सिद्ध करेगा: पद्मपाणि जहाँ प्राणिमात्र के दुख के प्रति महायान की अलौकिक करुणा दर्शाते हैं, वहीं मरणासन्न राजकुमारी मानवीय विरह और पीड़ा का सजीव मनोवैज्ञानिक चित्रण करती है।
11. अजंता गुफा 26 की ‘महापरिनिर्वाण’ प्रतिमा:
- किस प्रश्न में उपयोगी: शैलकृत मूर्तिकला में भाव-प्रवणता पर।
- क्या सिद्ध करेगा: एक ही शिल्प में नीचे रोते हुए नश्वर शिष्यों का दुख (संसार) और ऊपर उत्सव मनाते देवताओं का आनंद (निर्वाण की प्राप्ति) बौद्ध दर्शन के द्वैत को पत्थर में जीवंत करता है।
12. एलोरा (गुफा 1–34) का त्रि-धार्मिक सह-अस्तित्व:
- किस प्रश्न में उपयोगी: भारतीय समाज की बहुलतावादी संस्कृति (Pluralism) और सहिष्णुता पर।
- क्या सिद्ध करेगा: एक ही पहाड़ी की चट्टान में 5वीं से 10वीं शताब्दी के बीच बौद्ध (1–12), हिंदू (13–29) और जैन (30–34) गुफाओं का बिना किसी संघर्ष के साथ-साथ बनना भारतीय सभ्यता की समावेशी प्रकृति का ठोस प्रमाण है।
13. एलोरा गुफा 12 (‘तीन ताल’) और गुफा 5 (‘महारवाड़ा’):
- किस प्रश्न में उपयोगी: बौद्ध विहारों के शिक्षा केंद्रों में रूपांतरण पर।
- क्या सिद्ध करेगा: पत्थर की अध्ययन-चौकियाँ और तीन मंजिला विशाल कक्ष दिखाते हैं कि विहार अब केवल ध्यान की कोठरियाँ नहीं बल्कि संगठित आवासीय शिक्षण संस्थान बन चुके थे।
14. खारवेल का ‘हाथीगुम्फा अभिलेख’ (उदयगिरि, ओडिशा):
- किस प्रश्न में उपयोगी: जैन स्थापत्य, लोक-कल्याणकारी राज्य और ऐतिहासिक चेतना पर।
- क्या सिद्ध करेगा: यह एक महत्त्वपूर्ण आरंभिक दीर्घ प्रशस्ति है जो खारवेल के शासन-वर्षों के क्रम में राजनीतिक, सिंचाई, सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों का विवरण देती है।
15. श्रवणबेलगोला की ‘गोम्मटेश्वर बाहुबली’ प्रतिमा (लगभग 981 ई.):
- किस प्रश्न में उपयोगी: जैन दर्शन (कायोत्सर्ग, अहिंसा व वैराग्य) की मूर्तिकला में अभिव्यक्ति पर।
- क्या सिद्ध करेगा: चक्रवर्ती सम्राट बनने की क्षमता रखने वाले योद्धा बाहुबली द्वारा हिंसा का त्याग कर लताओं से घिरे रहकर शांत खड़े रहना सत्ता पर अध्यात्म की विजय का अद्वितीय स्मारक है।
16. रणकपुर के ‘1,444 स्तंभ’ और शिल्पी ‘देपाक’:
- किस प्रश्न में उपयोगी: मध्यकालीन जैन मंदिर वास्तुकला की ज्यामितीय और सौंदर्यशास्त्रीय श्रेष्ठता पर।
- क्या सिद्ध करेगा: 1,444 स्तंभों की भिन्न नक्काशी और प्रकाश-छाया (Light and Shade) का ऐसा संयोजन कि हर कोण से गर्भगृह दिखे, भारतीय मंदिर वास्तुकला की सर्वोच्च ज्यामितीय दक्षता दर्शाता है।
17. मथुरा के कंकाली टीला के ‘आयागपट्ट’ और ‘जैन स्तूप’:
- किस प्रश्न में उपयोगी: श्रमण परंपराओं के साझा कलात्मक स्रोतों पर।
- क्या सिद्ध करेगा: यह सिद्ध करता है कि प्रारंभिक काल में स्तूप-पूजा और अष्टमंगल प्रतीकों की परंपरा बौद्ध और जैन दोनों धर्मों में साझा रूप से प्रचलित थी।
18. गांधार कला में ‘हेराक्लीज़ के रूप में वज्रपाणि’ और ‘अपोलो-सदृश बुद्ध’:
- किस प्रश्न में उपयोगी: गांधार कला में यूनानी-रोमन प्रभाव पर।
- क्या सिद्ध करेगा: बुद्ध के रक्षक वज्रपाणि को यूनानी वीर देवता हेराक्लीज़ (Heracles) की तरह गदा और सिंह-चर्म के साथ दिखाना सांस्कृतिक वैश्वीकरण (Cultural Globalization) का जीवंत उदाहरण है।
19. कन्हेरी गुफाओं की ‘जल-प्रबंधन प्रणाली’ (Water Harvesting System):
- किस प्रश्न में उपयोगी: प्राचीन भारत के पर्यावरण-अनुकूल स्थापत्य और जल संरक्षण पर।
- क्या सिद्ध करेगा: बेसाल्ट की चट्टानों पर बारीक नालियाँ काटकर वर्षा के जल को प्रत्येक गुफा के भूमिगत कुंडों में मोड़ना प्राचीन जल-अभियांत्रिकी की प्रासंगिकता सिद्ध करता है।
20. नालंदा और विक्रमशिला के ‘पंचायतन एवं आंगन-आधारित महाविहार’:
- किस प्रश्न में उपयोगी: पाल कला एवं बौद्ध धर्म के अंतिम महान चरण पर।
- क्या सिद्ध करेगा: इन महाविहारों की स्थापत्य योजना ने तिब्बत, नेपाल और दक्षिण-पूर्व एशिया (जैसे बोरोबुदुर व आनंद मंदिर, म्यांमार) के मठ स्थापत्य को सीधे तौर पर आकार दिया।
21. सित्तनवासल की गुफा का ‘समवसरण’ चित्र:
- किस प्रश्न में उपयोगी: दक्षिण भारत में जैन कला और अजंता चित्रकला परंपरा की निरंतरता पर।
- क्या सिद्ध करेगा: यह सिद्ध करता है कि शास्त्रीय भित्ति-चित्रकला की परंपरा केवल बौद्ध या गुप्त-वाकाटक क्षेत्र तक सीमित नहीं थी, बल्कि तमिल क्षेत्र में जैन संरक्षण में भी समान रूप से पल्लवित हुई।
22. पालीताना (शत्रुंजय) का ‘मंदिर-नगर’ (Temple-City):
- किस प्रश्न में उपयोगी: पवित्र भूगोल (Sacred Geography) और व्यापारी संरक्षण की निरंतरता पर।
- क्या सिद्ध करेगा: नौ शताब्दियों तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी व्यापारिक घरानों द्वारा एक ही पहाड़ी पर 860 से अधिक मंदिर बनवाना भारतीय सांस्कृतिक निरंतरता का जीवंत प्रमाण है।
27. निष्कर्ष
निष्कर्षतः, बौद्ध और जैन स्थापत्य की यात्रा केवल ईंट, पत्थर और चट्टानों को तराशने का तकनीकी इतिहास नहीं है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता की आध्यात्मिक गहराई, सामाजिक समावेशन और कलात्मक कल्पनाशीलता का जीवंत महाकाव्य है। मौर्यकालीन बाराबर की सादी किंतु दर्पण-सी चमकती आजीवक गुफाओं और साँची-भरहुत के प्रतीकात्मक स्तूपों से प्रारंभ हुई यह परंपरा अमरावती की गतिशीलता, कार्ले की भव्यता, अजंता के करुणा-सिक्त भित्ति-चित्रों, एलोरा के बहुधार्मिक समन्वय, श्रवणबेलगोला की अडिग तपश्चर्या और दिलवाड़ा-रणकपुर की संगमरमरी सूक्ष्मता से होती हुई विश्व कला के शिखर तक पहुँची।
इस स्थापत्य की सबसे बड़ी शक्ति यह रही कि इसने राजकीय संरक्षण के साथ-साथ सामान्य जनमानस—वणिकों, शिल्पकार श्रेणियों, कृषकों, भिक्षु-भिक्षुणियों और महिलाओं—की सामूहिक भागीदारी को अपना आधार बनाया तथा यक्ष-यक्षिणी जैसे लोक-तत्त्वों को उच्च दार्शनिक आदर्शों में पिरोया। अहिंसा, करुणा, सह-अस्तित्व और प्रकृति के साथ सामंजस्य का जो संदेश इन स्तूपों, चैत्यों, विहारों और जैन मंदिरों ने पत्थरों में अमर कर दिया, वह न केवल प्राचीन भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ के रूप में पूरे एशिया में फैला, बल्कि आज के ध्रुवीकृत विश्व में भी भारत की बहुलतावादी सांस्कृतिक विरासत के सबसे सशक्त प्रतीक के रूप में प्रासंगिक बना हुआ है।
28. 5-Minute Revision Sheet (अंतिम त्वरित पुनरावलोकन पत्रक)
(A) 20 प्रमुख स्थापत्य एवं तकनीकी शब्द (20 Key Terms)
1. अण्ड (Anda): स्तूप का अर्धगोलाकार मुख्य गुंबद (अनंत आकाश का प्रतीक)।
2. मेधि (Medhi): वह ऊँचा वृत्ताकार चबूतरा जिस पर अण्ड टिका होता है।
3. हर्मिका (Harmika): अण्ड के शिखर पर बना चौकोर घेरा (अवशेष-मंजूषा का स्थान व देव-निवास)।
4. यष्टि (Yashti): हर्मिका के मध्य में लगा दंड (विश्व-धुरी / Axis Mundi का प्रतीक)।
5. छत्रावली (Chhatravali): यष्टि के ऊपर लगे तीन छत्र (बुद्ध, धम्म, संघ रूपी त्रिरत्न)।
6. वेदिका (Vedika): स्तूप के चारों ओर बनी पत्थर की रेलिंग (थंभ + सूची + उष्णीष)।
7. तोरण (Torana): स्तूप के चार दिशाओं के अलंकृत प्रवेश द्वार।
8. आयक मंच एवं स्तंभ (Ayaka Platform & Pillars): आंध्र स्तूपों (अमरावती, नागार्जुनकोंडा) में चार दिशाओं के मंच और उन पर खड़े 5-5 स्तंभ (बुद्ध के जीवन की 5 घटनाओं के प्रतीक)।
9. चैत्यगृह (Chaityagriha): गजपृष्ठाकार (Apsidal) बौद्ध प्रार्थना/उपासना मंडप।
10. चैत्य-वातायन / चंद्रशाला (Chaitya Window): चैत्य के द्वार के ऊपर बनी घोड़े की नाल के आकार की खिड़की।
11. विहार / संघाराम (Vihara): भिक्षुओं के निवास हेतु बना केंद्रीय मंडप और चारों ओर की कोठरियाँ।
12. शालभंजिका (Shalabhanjika): तोरण के कोष्ठक पर वृक्ष की डाली पकड़े खड़ी यक्षिणी (उर्वरता का लोक प्रतीक)।
13. अनाकार कला (Aniconic Art): बुद्ध को मानव रूप के बजाय प्रतीकों (चक्र, वृक्ष, स्तूप) द्वारा दर्शाना।
14. आयागपट्ट (Ayagapatta): कुषाण काल (मथुरा) में जैन उपासना हेतु प्रयुक्त चौकोर अलंकृत पाषाण पट्टियाँ।
15. कायोत्सर्ग (Kayotsarga): जैन तीर्थंकरों/संतों की सीधे खड़े होकर शरीर से ममत्व त्यागने की ध्यान मुद्रा।
16. श्रीवत्स (Shrivatsa): जैन तीर्थंकर प्रतिमाओं के वक्षस्थल पर अंकित शुभ चिह्न।
17. लांछन (Lanchhana): 24 तीर्थंकरों की पहचान के लिए उनके आसन (पाद-पीठ) पर बना पशु या वस्तु का प्रतीक।
18. मानस्तंभ (Manastambha): दिगंबर जैन मंदिरों के सामने खड़ा स्तंभ जिसके शीर्ष पर चौमुखी प्रतिमा होती है।
19. समवसरण (Samavasarana): केवलज्ञान प्राप्ति के बाद तीर्थंकर का दिव्य वृत्ताकार उपदेश मंडप।
20. बसदि (Basadi): कर्नाटक/दक्षिण भारत में जैन मंदिर या मठ के लिए प्रयुक्त शब्द।
(B) 15 प्रमुख स्थल एवं उनकी एक-पंक्ति पहचान (15 Key Sites)
1. साँची (म.प्र.): अशोक का मूल स्तूप, शुंग पाषाण विस्तार, सातवाहन तोरण, स्तूप-3 में सारिपुत्र-मोग्गल्लान के अवशेष।
2. भरहुत (म.प्र.): शुंगकालीन लाल बलुआ पत्थर वेदिका, ब्राह्मी शीर्षक-अभिलेखों युक्त जातक पदक (इंडियन म्यूजियम, कोलकाता)।
3. अमरावती (आंध्र प्रदेश): कृष्णा नदी तट (धान्यकटक), महासंघिक केंद्र, श्वेत चूना पत्थर, आयक स्तंभ, गतिशील मूर्तिकला।
4. नागार्जुनकोंडा (आंध्र प्रदेश): इक्ष्वाकु रानियों का संरक्षण, पहिए की तीली (Spoked-wheel) के आकार के ईंट स्तूप।
5. बाराबर (बिहार): अशोक द्वारा आजीवक संप्रदाय को दान, मौर्य पॉलिश, लोमस ऋषि गुफा का चैत्य-मेहराब।
6. भाजा (महाराष्ट्र): 2री शती ई.पू. का प्राचीनतम प्रारंभिक बौद्ध चैत्य, झुके हुए स्तंभ, लकड़ी की छत-कड़ियाँ, सूर्य-इंद्र शिल्प।
7. कार्ले (महाराष्ट्र): भारत का सबसे बड़ा प्रारंभिक बौद्ध चैत्यगृह, श्रेष्ठि भूतपाल द्वारा निर्मित, कुंभ-आधार स्तंभ और मिथुन मूर्तियाँ।
8. कन्हेरी (महाराष्ट्र): मुंबई में 109 बौद्ध गुफाएँ, प्राचीन वर्षा जल-संचयन प्रणाली और दरबार हॉल (गुफा 11)।
9. अजंता (महाराष्ट्र): वाघोरा नदी खड्ड, 29 बौद्ध गुफाएँ, वाकाटक नरेश हरिषेण, गुफा-1 में पद्मपाणि, गुफा-26 में महापरिनिर्वाण।
10. एलोरा (महाराष्ट्र): 34 गुफाएँ (बौद्ध 1-12, हिंदू 13-29, जैन 30-34); गुफा-10 विश्वकर्मा चैत्य, गुफा-12 तीन ताल, गुफा-32 इंद्रसभा।
11. उदयगिरि-खंडगिरि (ओडिशा): खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख और दोमंजिला रानी गुम्फा (जैन गुफाएँ)।
12. सित्तनवासल (तमिलनाडु): पांड्य-पल्लव कालीन जैन गुफा (अरिवर कोविल) और समवसरण कमल-सरोवर भित्ति-चित्र।
13. दिलवाड़ा, माउंट आबू (राजस्थान): मारू-गुर्जर शैली के संगमरमर जैन मंदिर—विमल वसही (आदिनाथ) और लूण वसही (नेमिनाथ)।
14. रणकपुर (राजस्थान): 15वीं शती का चौमुखी आदिनाथ जैन मंदिर, 1,444 नक्काशीदार स्तंभ, शिल्पी देपाक।
15. श्रवणबेलगोला (कर्नाटक): विंध्यगिरि पर चामुंडराय द्वारा निर्मित 57 फीट ऊँची बाहुबली की एकाश्म प्रतिमा।
(C) 10 प्रमुख स्थापत्य विशेषताएँ (10 Key Architectural Features)
1. काष्ठ से प्रस्तर संक्रमण: पत्थर की गुफाओं और तोरणों में लकड़ी के जोड़, शहतीर और कड़ियों का अनुकरण।
2. मौर्य पॉलिश: बाराबर गुफाओं और अशोक स्तंभों की दर्पण जैसी चमकदार सतह।
3. गजपृष्ठाकार (Apsidal) योजना: चैत्यगृहों का अंतिम सिरा अर्धवृत्ताकार होना ताकि स्तूप की परिक्रमा हो सके।
4. कुंभ-आधार और घंटाकृति शीर्ष: कार्ले और नासिक के स्तंभों में कलश जैसा आधार और उल्टे कमल का शीर्ष।
5. आयक मंच और पंच-आयक स्तंभ: आंध्र के स्तूपों की विशिष्ट क्षेत्रीय पहचान।
6. स्पोक-व्हील (चक्राकार) ईंट विन्यास: नागार्जुनकोंडा के स्तूपों की आंतरिक मजबूती की तकनीक।
7. विहार में गर्भगृह का समावेशन: महायान काल (अजंता, बाघ, एलोरा) में आवासीय विहार का मंदिर-सह-विहार में रूपांतरण।
8. बहुमंजिला शैलकृत उत्खनन: उदयगिरि की रानी गुम्फा (2 मंजिल) और एलोरा की तीन ताल (3 मंजिल) गुफा।
9. चतुर्मुख (चौमुखी / सर्वतोभद्र) योजना: रणकपुर और छोटा कैलाश जैसे जैन मंदिरों में चारों दिशाओं में खुलने वाला गर्भगृह।
10. मंदिर-नगर (Temple-City): पालीताना, गिरनार और सोनागिरि में पहाड़ी शिखरों पर सैकड़ों मंदिरों का समूह।
(D) 10 प्रमुख प्रतीक और उनके अर्थ (10 Key Symbols)
1. कमल और वृषभ: बुद्ध का जन्म / प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का लांछन (वृषभ)।
2. कंथक अश्व (बिना सवार का घोड़ा): बुद्ध का गृहत्याग (महाभिनिष्क्रमण) / संभवनाथ का लांछन।
3. रिक्त सिंहासन (Empty Seat): प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध का ध्यान (Meditation)।
4. बोधि वृक्ष (पीपल): बुद्ध को संबोधि (ज्ञान प्राप्ति)।
5. धर्मचक्र: बुद्ध का प्रथम उपदेश (धर्मचक्रप्रवर्तन, सारनाथ)।
6. स्तूप: बुद्ध का महापरिनिर्वाण।
7. भूमिस्पर्श मुद्रा: मार पर विजय और अपनी पवित्रता की साक्षी के रूप में पृथ्वी का आह्वान।
8. सिंह: 24वें तीर्थंकर महावीर का लांछन / शाक्यसिंह बुद्ध।
9. सर्प (सप्त-फण): 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का लांछन।
10. शंख: 22वें तीर्थंकर अरिष्टनेमि (नेमिनाथ) का लांछन।
(E) 10 त्वरित तुलना बिंदु (10 Quick Comparison Points)
1. चैत्य बनाम विहार: चैत्य = उपासना मंडप (गजपृष्ठाकार); विहार = भिक्षु निवास (वर्गाकार आंगन व कोठरियाँ)।
2. साँची बनाम अमरावती: साँची = बलुआ पत्थर, तोरण द्वार, अनाकार कला; अमरावती = श्वेत चूना पत्थर, आयक स्तंभ, अनाकार+मानवाकार।
3. गांधार बनाम मथुरा: गांधार = नीला-भूरा शिस्ट/स्टुको, यूनानी-रोमन प्रभाव, लहरदार बाल; मथुरा = लाल बलुआ पत्थर, स्वदेशी यक्ष परंपरा, अलंकृत प्रभामंडल।
4. अजंता बनाम एलोरा: अजंता = केवल बौद्ध, खड़ी चट्टान, भित्ति-चित्र प्रधान; एलोरा = बौद्ध+हिंदू+जैन, ढलानदार पहाड़ी व प्रांगण, शिल्प व तीन-मंजिला विहार प्रधान।
5. बाराबर बनाम भाजा: बाराबर = मौर्य काल, आजीवक संप्रदाय, ग्रेनाइट पॉलिश; भाजा = शुंग/सातवाहन काल, प्रारंभिक बौद्ध बौद्ध, बेसाल्ट चट्टान।
6. उदयगिरि (ओडिशा) बनाम उदयगिरि (म.प्र.): ओडिशा = 1ली शती ई.पू., खारवेल, जैन गुफाएँ; म.प्र. = 5वीं शती ई., गुप्त काल, हिंदू (वराह) गुफाएँ।
7. बौद्ध गुफा बनाम जैन गुफा (प्रारंभिक): बौद्ध = विशाल चैत्य और विहार; जैन = बिना चैत्य के छोटे तपोवन कक्ष और ढलानदार फर्श।
8. बुद्ध प्रतिमा बनाम तीर्थंकर प्रतिमा: बुद्ध = विविध मुद्राएँ व वस्त्र; तीर्थंकर = केवल कायोत्सर्ग या पद्मासन, वक्ष पर श्रीवत्स व आसन पर लांछन।
9. दिगंबर बनाम श्वेतांबर प्रतिमा: दिगंबर = पूर्ण नग्न, निराभरण, झुकी दृष्टि; श्वेतांबर = वस्त्र-आभूषण युक्त व खुली काँच की आँखें।
10. विमल वसही बनाम लूण वसही: विमल वसही = 1031 ई., विमल शाह, आदिनाथ मंदिर; लूण वसही = 1230 ई., वस्तुपाल-तेजपाल, नेमिनाथ मंदिर।
(F) 10 अत्यंत महत्त्वपूर्ण परीक्षा तथ्य (10 Must-Know Exam Facts)
1. कंगनहल्ली (कर्नाटक) एकमात्र ऐसा स्तूप स्थल है जहाँ ‘राण्यो अशोक’ अभिलेख के साथ अशोक की पाषाण छवि मिली है।
2. धमेख स्तूप (सारनाथ) गुप्तकालीन है, जबकि साँची का मूल ईंट स्तूप मौर्यकालीन है।
3. नालंदा का प्रमुख संस्थागत विकास गुप्तकाल से हुआ; विक्रमशिला महाविहार (भागलपुर) पाल शासक धर्मपाल से जुड़ा है।
4. हाथीगुम्फा अभिलेख (खारवेल) में भारतवर्ष शब्द, नंद राजा की नहर और कलिंग-जिन प्रतिमा की वापसी का उल्लेख है।
5. अजंता गुफा-1 में पद्मपाणि चित्र, गुफा-16 में मरणासन्न राजकुमारी चित्र, और गुफा-26 में महापरिनिर्वाण की मूर्ति है।
6. एलोरा गुफा-10 बौद्ध विश्वकर्मा चैत्य है, गुफा-16 हिंदू कैलाश मंदिर है, और गुफा-32 जैन इंद्रसभा है।
7. श्रवणबेलगोला में हर 12 वर्ष पर बाहुबली का ‘महामस्तकाभिषेक’ होता है।
8. बौद्ध और जैन दोनों धर्मों ने वेदों की प्रामाणिकता और यज्ञीय कर्मकांड को अस्वीकार किया, किंतु बौद्ध धर्म ने ‘मध्यम मार्ग’ और जैन धर्म ने ‘कठोर तपश्चर्या’ को अपनाया।
9. जैन धर्म के अनुसार आत्मा (जीव) केवल पशुओं और वनस्पतियों में ही नहीं, बल्कि पत्थर, बहते जल और अन्य प्राकृतिक वस्तुओं (स्थावर जीव) में भी होती है।
10. सान्नाति/कंगनहल्ली (भीमा नदी), अजंता (वाघोरा नदी), अमरावती/नागार्जुनकोंडा (कृष्णा नदी), साँची (बेतवा नदी), बाघ (बाघ नदी), और सालिहुंडम (वंशधारा नदी) के नदी-युग्म सदैव याद रखें।
(G) 10 शीर्ष Prelims Traps (10 Top Prelims Traps at a Glance)
1. स्तूप की उत्पत्ति बौद्ध है ❌ (पूर्व-बौद्ध शवाधान टीलों से उत्पत्ति ✔)।
2. बाराबर गुफाएँ बौद्ध हैं / चंद्रगुप्त मौर्य ने बनवाईं ❌ (आजीवक संप्रदाय / अशोक व दशरथ ने बनवाईं ✔)।
3. बादामी भारत की सबसे प्राचीन शैलकृत गुफाएँ हैं ❌ (बाराबर सबसे प्राचीन हैं ✔)।
4. साँची स्तूप चंबल नदी के खड्ड में है और भित्ति-चित्रों के लिए प्रसिद्ध है ❌ (बेतवा के पास पहाड़ी पर है और तोरण शिल्प के लिए प्रसिद्ध है ✔)।
5. अमरावती स्तूप गोदावरी घाटी में है ❌ (निचली कृष्णा घाटी में है ✔)।
6. गोम्मटेश्वर प्रतिमा अंतिम तीर्थंकर महावीर की है ❌ (प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र बाहुबली की है ✔)।
7. बेसनगर शैव गुफा के लिए और सालिहुंडम शैलकृत गुफाओं के लिए प्रसिद्ध है ❌ (बेसनगर वैष्णव गरुड़ स्तंभ और सालिहुंडम संरचनात्मक बौद्ध स्तूप परिसर है ✔)।
8. विक्रमशिला महाविहार बाँका जिले में गोपाल प्रथम ने बनवाया ❌ (भागलपुर जिले के अंतीचक में धर्मपाल ने बनवाया ✔)।
9. रिक्त सिंहासन को हर दृश्य में केवल ‘ध्यान’ या ‘प्रथम उपदेश’ से जोड़ना गलत है ❌; यह प्रसंग के अनुसार बुद्ध की प्रतीकात्मक उपस्थिति या किसी पवित्र घटना/स्थान का संकेत हो सकता है, जबकि धर्मचक्र अक्सर धर्मचक्रप्रवर्तन से जुड़ता है ✔।
10. अजंता और एलोरा दोनों में तीनों धर्मों की गुफाएँ हैं ❌ (अजंता बौद्ध गुफा-समूह है; एलोरा में बौद्ध, ब्राह्मण और जैन तीनों परंपराओं की गुफाएँ हैं ✔)।