अभ्यास प्रश्न 17
प्रश्न
बौद्ध और जैन शैलकृत गुफाओं एवं पहाड़ी मंदिरों के निर्माण में प्राचीन भारतीय वास्तुकारों के पर्यावरण-बोध, जल-प्रबंधन और भू-वैज्ञानिक ज्ञान का मूल्यांकन कीजिए।
प्रश्न की मांग
गुफाओं के स्थान चयन, चट्टान के प्रकार की समझ, प्राकृतिक प्रकाश व्यवस्था (चैत्य-वातायन) और वर्षा जल-संचयन (कन्हेरी, पितलखोरा) की वैज्ञानिकता को उजागर करना।
भूमिका की दिशा
प्राचीन भारत के शैलकृत चैत्य, विहार और जैन गुम्फाएँ केवल धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं थे, बल्कि वे प्रकृति के साथ सामंजस्य (Eco-sensitive architecture) और उन्नत प्राचीन भू-अभियांत्रिकी के उत्कृष्ट उदाहरण भी थे।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
- भू-वैज्ञानिक समझ (Geological Selection): मौर्य कारीगरों ने पॉलिश के लिए बाराबर की सघन ग्रेनाइट चट्टान चुनी, पश्चिमी दक्कन के शिल्पकारों ने विशाल कक्षों के लिए सह्याद्रि की क्षैतिज परतदार बेसाल्ट चट्टानें चुनीं, और उदयगिरि-खंडगिरि में तराशने में सुगम बलुआ पत्थर को चुना गया।
- उन्नत वर्षा जल-संचयन प्रणाली (Rainwater Harvesting): कन्हेरी, जुन्नर, कार्ले और नासिक की गुफाओं में पहाड़ी की ऊपरी ढलान पर बारीक नालियाँ (Rock-cut channels) काटकर मानसूनी वर्षा के बहते जल को प्रत्येक विहार के बाहर बने गहरे भूमिगत कुंडों (Cisterns) में एकत्र किया जाता था, जिससे पूरे वर्ष शीतल पेयजल मिलता था।
- प्राकृतिक प्रकाश और ताप-नियंत्रण (Passive Solar Design): कार्ले और अजंता के चैत्यगृहों में विशाल 'चैत्य-वातायन' और लकड़ी की जालियाँ इस कोण पर बनाई गईं कि बिना सीधी गर्मी अंदर आए सूर्य का सौम्य प्रकाश भीतर के स्तूप और भित्ति-चित्रों को आलोकित करे।
- ध्वनि-विज्ञान (Acoustics): बाराबर, रानी गुम्फा (उदयगिरि) और अजंता-एलोरा के चैत्यों का वक्राकार विन्यास मंत्रोच्चार और धर्मोपदेश की ध्वनि को पूरे कक्ष में स्पष्ट रूप से गूँजने में सहायक था।
उपयोगी उदाहरण
कन्हेरी के जल-कुंड, पितलखोरा की भूमिगत जल-निकासी सुरंग, कार्ले का चैत्य-वातायन और उदयगिरि-खंडगिरि का ढलानदार जल-प्रवाह।
निष्कर्ष की दिशा
बिना किसी बाहरी ऊर्जा के प्रकाश, जल और ताप का यह प्राकृतिक प्रबंधन आज की 'हरित वास्तुकला' (Green Architecture) के लिए भी एक प्रेरणास्पद मॉडल है।