अभ्यास प्रश्न 16
प्रश्न
"भारतीय मंदिर वास्तुकला (नागर, द्रविड़ और वेसर) का जन्म किसी शून्य से नहीं हुआ; इसकी संरचनात्मक जड़ें बौद्ध और जैन शैलकृत गुफाओं, चैत्यगृहों और स्तूपों में गहराई से समाहित थीं।" इस कथन की पुष्टि कीजिए।
प्रश्न की मांग
यह सिद्ध करना कि गुप्त और पूर्व-मध्यकालीन हिंदू मंदिरों के प्रमुख अंग (गर्भगृह, मंडप, प्रदक्षिणापथ, गवाक्ष/चंद्रशाला, गजपृष्ठ विमान, चौमुखी योजना) किस प्रकार पूर्ववर्ती बौद्ध और जैन स्थापत्य से विकसित हुए।
भूमिका की दिशा
चौथी-पाँचवीं शताब्दी ईस्वी (गुप्त काल) से जब भारत में संरचनात्मक हिंदू मंदिरों का निर्माण प्रारंभ हुआ, तो वास्तुकारों ने पूर्ववर्ती सात शताब्दियों से विकसित हो रही बौद्ध और जैन स्थापत्य की योजनाओं, तकनीकों और अलंकरण अभिप्रायों को ही रचनात्मक रूप से नया रूप दिया।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
- चैत्यगृह से 'गजपृष्ठ विमान' और 'दुर्गा मंदिर' तक: बौद्ध चैत्यगृहों की गजपृष्ठाकार (Apsidal) योजना, केंद्रीय मंडप और चारों ओर के प्रदक्षिणापथ ने ही ऐहोल के 'दुर्गा मंदिर', महाबलीपुरम के 'सहदेव व नकुल रथ' और दक्षिण भारत के 'गजपृष्ठ' द्रविड़ मंदिरों की नींव रखी।
- महायान विहार से 'गर्भगृह-अंतराल-मंडप' योजना: अजंता और बाघ के महायान विहारों में स्तंभित मंडप, उसके पीछे अंतराल और सबसे भीतर मूर्ति-युक्त गर्भगृह की जो योजना बनी, वही आगे चलकर सभी भारतीय मंदिरों की मानक तल-योजना बन गई।
- चैत्य-वातायन (चंद्रशाला) से 'गवाक्ष', 'कूडु' और 'शुकनास': लोमस ऋषि, भाजा और कार्ले का घोड़े की नाल वाला 'चैत्य-वातायन' ही नागर शिखरों पर 'गवाक्ष' व 'चैत्य-डॉर्मर' (जाल-अलंकरण) और द्रविड़ विमानों पर 'कूडु' (Kudu) के रूप में रूपांतरित हो गया।
- ढोलाकार (Barrel-vaulted) चैत्य छत से 'वलभी' और 'गोपुरम' शिखर: बौद्ध चैत्यों की ढोलाकार छत ने उत्तर भारत के 'वलभी' मंदिरों (तेली का मंदिर, ग्वालियर) और दक्षिण भारत के भीम व गणेश रथ तथा विशाल 'गोपुरम' के शिखर को आकार दिया।
- स्तूप की हर्मिका और छत्रावली से शिखर का 'आमलक और कलश': स्तूप के अण्ड के ऊपर की हर्मिका, यष्टि और छत्रावली की ऊर्ध्वाधर संकल्पना ने मंदिर शिखर के शीर्ष भाग (ग्रीवा, आमलक, कलश) के विकास में योगदान दिया।
उपयोगी उदाहरण
ऐहोल का दुर्गा मंदिर (गजपृष्ठाकार योजना), महाबलीपुरम के पंच रथ, साँची का मंदिर संख्या 17 और देवगढ़ का दशावतार मंदिर (सर्वतोभद्र/पंचायतन)।
निष्कर्ष की दिशा
यह स्थापत्य निरंतरता सिद्ध करती है कि भारतीय वास्तुकला को संकीर्ण धार्मिक खाँचों (बौद्ध, जैन, हिंदू) में नहीं बाँटा जा सकता; यह एक साझा भारतीय शिल्प-परंपरा का क्रमिक विकास था।