अभ्यास प्रश्न 15
प्रश्न
"साँची, अमरावती, गांधार और नालंदा-विक्रमशिला से निकली भारतीय बौद्ध स्थापत्य और मूर्तिकला की धाराओं ने संपूर्ण एशिया के सांस्कृतिक भूगोल को किस प्रकार आकार दिया?" सोदाहरण विश्लेषण कीजिए।
प्रश्न की मांग
भारतीय बौद्ध कला केंद्रों का श्रीलंका, मध्य एशिया, चीन, तिब्बत और दक्षिण-पूर्व एशिया (इंडोनेशिया, म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया) के स्थापत्य और शिल्प पर पड़े प्रभाव को स्पष्ट करना।
भूमिका की दिशा
प्राचीन भारत का बौद्ध स्थापत्य और शिल्प केवल उपमहाद्वीप की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा; वह भिक्षुओं, आचार्यों और नाविक व्यापारियों के साथ थलचर रेशम मार्ग (Silk Route) और समुद्री मार्गों से होकर पूरे एशिया की साझा सांस्कृतिक धरोहर बन गया।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
- साँची और आंध्र स्तूपों का श्रीलंका व म्यांमार पर प्रभाव: साँची और अमरावती के अर्धगोलाकार स्तूपों ने श्रीलंका के 'दागोबा' (जैसे अनुराधापुरा का रुवनवेलिसया और थूपाराम, जहाँ अमरावती के आयक मंचों की तरह 'वाहलकडा' बने हैं) और म्यांमार के पैगोडा को प्रेरित किया।
- अमरावती और गुप्त-सारनाथ शैली का दक्षिण-पूर्व एशिया पर प्रभाव (UPSC Prelims 2026 का बिंदु): कृष्णा घाटी (अमरावती, नागार्जुनकोंडा) से समुद्री व्यापार के जरिए श्वेत चूना पत्थर और कांस्य की बुद्ध प्रतिमाएँ श्रीलंका, थाईलैंड (द्वारवती कला), वियतनाम (डोंग डुओंग) और इंडोनेशिया (सुमात्रा व सुलावेसी) पहुँचीं।
- गांधार कला और मध्य व पूर्वी एशिया: गांधार (तक्षशिला/बामियान) की विशालकाय शैलकृत बुद्ध प्रतिमाओं और स्टुको शैली ने मध्य एशिया से होते हुए चीन की 'दुनहुआंग' (मोगाओ), युनगांग और लोंगमेन की बौद्ध गुफाओं तथा कोरिया और जापान (नारा) की कला को जन्म दिया।
- अजंता की भित्ति-चित्रकला की एशियाई प्रतिध्वनि: अजंता की रेखाओं और रंग-योजना ने श्रीलंका की 'सिगिरिया' गुफाओं और चीन की दुनहुआंग भित्ति-चित्रकला को सीधे तौर पर प्रभावित किया।
- पाल महाविहार (सोमपुर व विक्रमशिला) और बोरोबुदुर व तिब्बत: धर्मपाल कालीन सोमपुर और विक्रमशिला की 'सीढ़ीदार क्रूसीफॉर्म स्तूप-मंडल' योजना ही जावा (इंडोनेशिया) के विश्वप्रसिद्ध 'बोरोबुदुर स्तूप' और म्यांमार के 'आनंद मंदिर' (बगान) का वास्तुशिल्पीय आधार बनी, तथा पाल कांस्य कला ने तिब्बत व नेपाल की कला को गढ़ा।
उपयोगी उदाहरण
अनुराधापुरा (श्रीलंका), बोरोबुदुर (इंडोनेशिया), बगान (म्यांमार), सिगिरिया (श्रीलंका), बामियान (अफगानिस्तान) और दुनहुआंग (चीन)।
निष्कर्ष की दिशा
बिना किसी सैन्य आक्रमण के केवल कला, करुणा और स्थापत्य के माध्यम से पूरे एशिया को जोड़ने वाली यह परंपरा भारत की प्राचीनतम और सबसे सफल 'सांस्कृतिक कूटनीति' (Soft Power) का प्रमाण है।