UPSC Mains अभ्यास · GS Paper 1
अभ्यास प्रश्न 14
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प्रश्न
जैन प्रतिमा विज्ञान में 'कायोत्सर्ग', 'श्रीवत्स', 'लांछन' और 'समवसरण' के दार्शनिक और प्रतीकात्मक महत्त्व की व्याख्या कीजिए।
प्रश्न की मांग
जैन कला के इन चारों विशिष्ट तकनीकी एवं प्रतीकात्मक तत्वों का अर्थ और जैन दर्शन (अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांतवाद, केवलज्ञान) से उनका संबंध स्पष्ट करना।
भूमिका की दिशा
जैन प्रतिमा विज्ञान और स्थापत्य में कोई भी अलंकरण केवल सजावट के लिए नहीं है; इसका प्रत्येक प्रतीक जैन दर्शन के कठोर आत्म-संयम, अहिंसा और केवलज्ञान का दृश्य रूपक है।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
- कायोत्सर्ग (शरीर-त्याग की मुद्रा): दोनों पैरों पर अडिग खड़े होकर हाथों को सीधा नीचे लटकाना 'कायोत्सर्ग' है। यह शरीर से ममत्व के त्याग, अहंकार के विसर्जन और कर्म-निर्जरा का सर्वोच्च प्रतीक है (जैसे श्रवणबेलगोला के बाहुबली)।
- श्रीवत्स: तीर्थंकर के वक्षस्थल के केंद्र में अंकित शुभ चतुष्कोणीय/पुष्प चिह्न, जो उनके अनंत ज्ञान (केवलज्ञान), करुणा और महापुरुष लक्षण का द्योतक है।
- लांछन (पहचान चिह्न): चूँकि वीतराग अवस्था में सभी 24 तीर्थंकरों का रूप और भाव एक समान होता है, इसलिए उन्हें अलग पहचानने हेतु उनके सिंहासन (पाद-पीठ) पर वृषभ (आदिनाथ), शंख (नेमिनाथ), सर्प (पार्श्वनाथ) और सिंह (महावीर) जैसे लांछन उकेरे गए।
- समवसरण: केवलज्ञान प्राप्ति के बाद देवताओं द्वारा रचित वह वृत्ताकार त्रि-स्तरीय उपदेश मंडप जहाँ सिंह और हिरण, मनुष्य और देवता एक साथ बैठकर तीर्थंकर की वाणी सुनते हैं—यह सार्वभौमिक अहिंसा और अनेकांतवाद का स्थापत्य रूप है।
उपयोगी उदाहरण
लोहानीपुर और श्रवणबेलगोला की कायोत्सर्ग प्रतिमाएँ, मथुरा के आयागपट्ट, सित्तनवासल का समवसरण चित्र और रणकपुर के समवसरण शिल्प।
निष्कर्ष की दिशा
इन प्रतीकों ने अमूर्त जैन मोक्ष-मार्ग को श्रद्धालुओं के लिए एक स्पष्ट और अनुशासित दृश्य भाषा प्रदान की।