अभ्यास प्रश्न 12
प्रश्न
"शैलकृत गुफाओं और स्तूपों में पत्थर को इस प्रकार तराशा गया मानो शिल्पकार लकड़ी पर काम कर रहे हों।" प्रारंभिक भारतीय स्थापत्य में 'काष्ठ से प्रस्तर संक्रमण' (Transition from Wood to Stone) की इस परिघटना की उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
प्रश्न की मांग
यह बताना कि क्यों और कैसे मौर्य व मौर्योत्तर शिल्पकारों ने पत्थर की गुफाओं और वेदिकाओं में लकड़ी की वास्तुकला (बढ़ईगिरी) के तत्वों की नकल की।
भूमिका की दिशा
तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से जब भारतीय वास्तुकला ने स्थायित्व के लिए लकड़ी (काष्ठ) के स्थान पर पत्थर (प्रस्तर) को अपनाया, तब भी शिल्पकारों की तकनीक और सौंदर्यबोध शताब्दियों पुरानी 'काष्ठ-तक्षण कला' (Carpentry tradition) से ही निर्देशित रहे।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
- बाराबर की गुफाओं में झोपड़ी का अनुकरण: लोमस ऋषि गुफा के प्रवेश द्वार पर पत्थर में तराशी गई मुड़ी हुई शहतीरें (Bent timber beams), बांस की जाली और सुदामा गुफा की फूस की झोपड़ी जैसी छत काष्ठ वास्तुकला की सीधी नकल हैं।
- चैत्यगृहों की छत में लकड़ी की पसलियाँ (Wooden Ribs): भाजा, बेडसा और कार्ले के चैत्यगृहों की चट्टानी छत को सहारे की कोई संरचनात्मक आवश्यकता न होने के बावजूद उनमें सागौन की लकड़ी की असली पसलियाँ लगाई गईं, और एलोरा की विश्वकर्मा गुफा में पत्थर को ही लकड़ी की कड़ियों जैसा तराशा गया।
- झुके हुए स्तंभ और कुंभ-आधार: भाजा और लोमस ऋषि में अंदर की ओर झुके हुए स्तंभ व द्वार तथा कार्ले-नासिक में स्तंभों के नीचे बना 'कलश-आधार' (जैसे लकड़ी के खंभे को दीमक और नमी से बचाने के लिए मिट्टी के घड़े में रखा जाता था) काष्ठ परंपरा के चिह्न हैं।
- साँची और भरहुत की वेदिका व तोरण: पत्थर की वेदिका में 'थंभ' के खाँचे में 'सूची' (क्रॉसबार) को फँसाने की चूल-छेद तकनीक (Mortise and Tenon joint) विशुद्ध बढ़ईगिरी की तकनीक है।
उपयोगी उदाहरण
लोमस ऋषि गुफा, भाजा व कार्ले चैत्य, और साँची के तोरण व वेदिका।
निष्कर्ष की दिशा
पत्थर में सुरक्षित रहे ये काष्ठ-चिह्न हमें मौर्य और पूर्व-मौर्य भारत की उस भव्य लकड़ी की वास्तुकला की झलक दिखाते हैं जो समय के साथ नष्ट हो गई।