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UPSC Mains अभ्यास · GS Paper 1

अभ्यास प्रश्न 11

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15 अंक250 शब्दबौद्ध और जैन स्थापत्य

प्रश्न

"प्राचीन भारत का बौद्ध और जैन स्थापत्य केवल सम्राटों के राजकोष की देन नहीं था, बल्कि यह सामान्य जनमानस, शिल्पकारों, भिक्षु-भिक्षुणियों और विशेषकर महिलाओं के 'सामूहिक दान' (Collective Patronage) का प्रतिफल था।" अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

प्रश्न की मांग

अशोक और खारवेल जैसे राजकीय संरक्षण से आगे बढ़कर साँची, भरहुत, अमरावती, कार्ले और नागार्जुनकोंडा के छोटे दान-अभिलेखों (Votive inscriptions) के आधार पर सबाल्टर्न (आम जन) और महिला संरक्षण की भूमिका सिद्ध करना।

भूमिका की दिशा

पारंपरिक इतिहासलेखन अक्सर प्राचीन स्मारकों को केवल राजवंशों के नाम से जोड़ता है, किंतु दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईस्वी के मध्य निर्मित अधिकांश बौद्ध और जैन स्मारक वास्तव में प्राचीन भारत के 'सामुदायिक जन-सहयोग' (Community Crowd-funding) के स्मारक थे।

उत्तर-लेखन रूपरेखा

  • छोटे दानदाताओं के सैकड़ों अभिलेख: साँची और भरहुत की वेदिकाओं की एक-एक सूची (क्रॉसबार), स्तंभ और फर्श की पटिया पर दानदाता का नाम, व्यवसाय और गाँव अंकित है—केवल साँची में ही 600 से अधिक ऐसे संक्षिप्त दान-अभिलेख हैं।
  • शिल्पकारों और श्रमजीवी वर्गों की भागीदारी: विदिशा के हाथीदांत कारीगरों (दंतकारों) द्वारा साँची के दक्षिणी तोरण का निर्माण, पितलखोरा में स्वर्णकार कनकदास, अमरावती में चर्मकार (चम्मकार), और कार्ले व कन्हेरी में बढ़इयों, लोहारों, मछुआरों और मालाकारों के दान।
  • महिलाओं की अग्रणी भूमिका और आर्थिक स्वायत्तता: साँची, भरहुत और अमरावती के दानदाताओं में लगभग 30% से 40% महिलाएँ (गृहपति-पत्नियाँ, माताएँ, उपासिकाएँ) हैं। यह दर्शाता है कि महिलाओं का आर्थिक संसाधनों पर अधिकार था।
  • राजपरिवारों में लैंगिक-धार्मिक स्वतंत्रता: नागार्जुनकोंडा (इक्ष्वाकु काल) और नासिक (सातवाहन काल) में जहाँ राजा स्वयं वैदिक यज्ञ कर रहे थे, वहीं रानी गौतमी बलश्री, रानी चाम्तिश्री और उपासिका बोधिश्री ने विशाल बौद्ध विहारों और महाचैत्यों का निर्माण करवाया।
  • भिक्षुओं और भिक्षुणियों द्वारा दान: संन्यास लेने के बाद भी भिक्षु और भिक्षुणियाँ (जैसे सारनाथ में भिक्षु बल और भिक्षुणी बुद्धमित्रा, तथा साँची व कार्ले की दर्जनों भिक्षुणियाँ) भिक्षा या पैतृक सहयोग से मूर्तियों और स्तंभों का दान कर रहे थे।

उपयोगी उदाहरण

साँची का दंतकार अभिलेख, भरहुत में नर्तकी/भिक्षुणी के दान अभिलेख, नागार्जुनकोंडा की चाम्तिश्री व बोधिश्री, और मथुरा के कंकाली टीला में जैन श्राविकाओं द्वारा आयागपट्टों का दान।

निष्कर्ष की दिशा

इस सामूहिक जन-संरक्षण ने ही बौद्ध और जैन स्थापत्य को 'दरबारी कला' की संकीर्णता से मुक्त कर सच्चे अर्थों में 'भारतीय जन-कला' बना दिया।