अभ्यास प्रश्न 10
प्रश्न
"मध्यकालीन और पूर्व-मध्यकालीन जैन मंदिर स्थापत्य ने बाहरी सादगी के भीतर संगमरमर की जालीदार सूक्ष्मता, ज्यामितीय पूर्णता और 'मंदिर-नगर' की अनूठी अवधारणा को जन्म दिया।" दिलवाड़ा, रणकपुर और पालीताना के विशेष संदर्भ में चर्चा कीजिए।
प्रश्न की मांग
पश्चिमी भारत (राजस्थान व गुजरात) के संरचनात्मक जैन मंदिरों की मारू-गुर्जर शैली, चौमुखी योजना, संगमरमर नक्काशी, और पहाड़ी शिखरों पर बसे मंदिर-नगरों की विशेषताओं का विश्लेषण करना।
भूमिका की दिशा
10वीं से 15वीं शताब्दी के मध्य पश्चिमी भारत में सोलंकी और मेवाड़ शासकों तथा समृद्ध जैन वणिक मंत्रियों के संरक्षण में जैन मंदिर स्थापत्य ने प्रस्तर-तक्षण की वह सूक्ष्मता प्राप्त की जो विश्व वास्तुकला में दुर्लभ है।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
- बाहरी सादगी बनाम आंतरिक संगमरमरी वैभव (दिलवाड़ा, माउंट आबू): विमल वसही (1031 ई.) और लूण वसही (1230 ई.) मंदिर बाहर से सादे प्राचीर से घिरे हैं, किंतु भीतर श्वेत संगमरमर के स्तंभों, तोरणों और गुंबदाकार छतों (रंगमंडप के उल्टे कमल के झूमर और 16 विद्यादेवियों) पर मोम और फीते (Lace-like filigree) जैसी पारदर्शी नक्काशी है।
- चतुर्मुख (चौमुखी / सर्वतोभद्र) ज्यामितीय योजना (रणकपुर): 1439 ई. में धरण शाह और शिल्पी देपाक द्वारा निर्मित रणकपुर का आदिनाथ मंदिर चारों दिशाओं में खुलने वाले गर्भगृह (चतुर्मुख जिन) की जैन दार्शनिक अवधारणा (अनेकांतवाद और चारों दिशाओं में धम्म प्रसार) को वास्तुकला में उतारता है।
- स्तंभों का वन और प्रकाश-छाया का विज्ञान: रणकपुर के 1,444 संगमरमर स्तंभों में से कोई भी दो स्तंभ एक समान नहीं हैं, और उनकी ऊँचाई व अंतराल को इस प्रकार समायोजित किया गया है कि प्राकृतिक प्रकाश और हवा पूरे परिसर में प्रवाहित हो तथा हर कोण से मूलनायक के दर्शन हों।
- 'मंदिर-नगर' (Temple-City) और पवित्र भूगोल (पालीताना व गिरनार): जैन स्थापत्य ने एकल मंदिर के बजाय पूरी पहाड़ी को पवित्र देवलोक (शत्रुंजय पहाड़ी, पालीताना) मानकर 9 घेरों (टूक) में 863 से अधिक मंदिरों का निर्माण किया, जहाँ रात्रि में मनुष्य का रुकना भी वर्जित है।
- ज्ञान-भंडार और सामुदायिक संरक्षण: इन मंदिरों के साथ भूमिगत 'ज्ञान-भंडार' (ताड़पत्र और कागज की चित्रित कल्पसूत्र पांडुलिपियों के पुस्तकालय) जोड़े गए जिन्होंने भारतीय साहित्य को सुरक्षित रखा।
उपयोगी उदाहरण
विमल शाह का विमल वसही, वस्तुपाल-तेजपाल का लूण वसही, धरण शाह का रणकपुर मंदिर, शत्रुंजय (पालीताना) और श्रवणबेलगोला की बाहुबली एकाश्म प्रतिमा।
निष्कर्ष की दिशा
जैन मंदिर स्थापत्य ने सिद्ध किया कि गहरी आध्यात्मिक वैराग्य भावना और सर्वोच्च कलात्मक सौंदर्यबोध एक साथ सह-अस्तित्व में रह सकते हैं।