LIVEUPSC CSE 2027 & BPSC • नोट्स • समसामयिकी • PYQ • Tests
UPSC Mains अभ्यास · GS Paper 1

अभ्यास प्रश्न 5

हिंदी आवाज़ तैयार हो रही है…
15 अंक250 शब्दबौद्ध और जैन स्थापत्य

प्रश्न

"बौद्ध कला में अनाकार (प्रतीकात्मक) चरण से मानवाकार (प्रतिमा) चरण की ओर संक्रमण केवल एक कलात्मक परिवर्तन नहीं था, बल्कि यह बौद्ध धर्म के भीतर हो रहे गहरे वैचारिक और सामाजिक परिवर्तनों का प्रतिबिंब था।" आलोचनात्मक चर्चा कीजिए।

प्रश्न की मांग

प्रारंभिक बौद्ध कला के प्रतीकात्मक (Aniconic) स्वरूप के कारणों, कुषाण काल में गांधार व मथुरा में मानवाकार (Iconic) बुद्ध प्रतिमा के उदय के कारकों, और हीनयान बनाम महायान के अतिसरलीकरण की आधुनिक ऐतिहासिक समीक्षा प्रस्तुत करना।

भूमिका की दिशा

तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से प्रथम शताब्दी ईस्वी के बीच भारतीय बौद्ध कला में बोधि वृक्ष, चक्र और रिक्त सिंहासन जैसे प्रतीकों से मानवाकार बुद्ध प्रतिमा की ओर हुआ संक्रमण धार्मिक दर्शन, भक्ति आंदोलन और सांस्कृतिक संपर्क की एक जटिल प्रक्रिया का परिणाम था।

उत्तर-लेखन रूपरेखा

  • अनाकार चरण (साँची, भरहुत, भाजा) का दार्शनिक आधार: प्रारंभिक बौद्ध दर्शन में बुद्ध को निर्वाण प्राप्त कर रूप-जगत (संसार) से परे माना गया था; इसलिए उनकी उपस्थिति को रिक्त सिंहासन (ध्यान), बोधि वृक्ष (संबोधि), चक्र (प्रथम उपदेश) और स्तूप (महापरिनिर्वाण) से दर्शाया गया।
  • वैचारिक परिवर्तन — महासंघिक और महायान का उदय: महासंघिकों (लोकोत्तरवाद) द्वारा बुद्ध के दैवीकरण और महायान में 'बोधिसत्त्व' एवं 'भक्ति' की भावना के प्रसार ने एक ऐसी साकार मानवीय छवि की मांग पैदा की जिससे सामान्य भक्त भावनात्मक रूप से जुड़ सके।
  • सामाजिक और सांस्कृतिक कारक: भागवत/वैष्णव और यक्ष-पूजा परंपराओं में पहले से ही साकार मूर्तियों की उपासना लोकप्रिय हो रही थी तथा पश्चिमोत्तर भारत में यूनानी-रोमन व कुषाण शासकों की मानव-केंद्रित कला परंपरा का संपर्क हुआ।
  • गांधार और मथुरा की दोहरी क्रांति: कनिष्क के काल में गांधार ने अपोलो-सदृश यूनानी-रोमन यथार्थवाद के माध्यम से और मथुरा ने स्वदेशी यक्ष व योगी परंपरा के माध्यम से बुद्ध को मानवीय रूप दिया।
  • आलोचनात्मक परिप्रेक्ष्य (अतिसरलीकरण से बचाव): आधुनिक शोध दर्शाते हैं कि मानवाकार प्रतिमाओं का निर्माण केवल महायान तक सीमित नहीं था—मथुरा और सारनाथ में भिक्षु बल जैसे 'सर्वास्तिवादी' (गैर-महायान) भिक्षुओं ने भी विशाल बोधिसत्त्व प्रतिमाएँ स्थापित करवाईं, और अमरावती में एक ही समय में प्रतीक और प्रतिमा दोनों साथ-साथ चलते रहे।

उपयोगी उदाहरण

साँची के तोरण पर बिना सवार का कंथक अश्व, कनिष्क के सिक्कों पर उत्कीर्ण बुद्ध ('बोद्दो'), भिक्षु बल की सारनाथ बोधिसत्त्व प्रतिमा, और अमरावती के संक्रमणकालीन फलक।

निष्कर्ष की दिशा

प्रतीक से प्रतिमा तक की यह यात्रा बौद्ध धर्म के एक दार्शनिक भिक्षु-संप्रदाय से विश्वव्यापी जन-धर्म में रूपांतरित होने की दृश्य गाथा है।