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UPSC Mains अभ्यास · GS Paper 1

अभ्यास प्रश्न 4

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15 अंक250 शब्दबौद्ध और जैन स्थापत्य

प्रश्न

बौद्ध और जैन स्थापत्य एवं प्रतिमा विज्ञान के बीच की प्रमुख समानताओं और विषमताओं का विश्लेषण कीजिए। उनके दार्शनिक अंतरों ने उनकी कलात्मक अभिव्यक्तियों को किस प्रकार भिन्न आकार दिया?

प्रश्न की मांग

बौद्ध और जैन कला की साझा श्रमण जड़ों (समानताओं) को बताते हुए, दोनों के स्थापत्य रूपों (स्तूप/चैत्य बनाम चौमुखी मंदिर/गुम्फा) और प्रतिमा विज्ञान (विविध बुद्ध मुद्राएँ बनाम कायोत्सर्ग/पद्मासन तीर्थंकर) के अंतरों को उनके दर्शन से जोड़कर समझाना।

भूमिका की दिशा

छठी शताब्दी ईसा पूर्व की एक ही श्रमण भूमि से उत्पन्न होने और समान वणिक संरक्षण पाने के बावजूद, बौद्ध धर्म के 'मध्यम मार्ग व करुणा' तथा जैन धर्म के 'कठोर तपश्चर्या व अपरिग्रह' के दार्शनिक अंतर ने दोनों की स्थापत्य और शिल्प परंपराओं को विशिष्ट पहचान दी।

उत्तर-लेखन रूपरेखा

  • साझा आधार (समानताएँ): दोनों ने वैदिक यज्ञ-वेदियों के स्थान पर शैलकृत गुफाओं और स्तूपों/मंदिरों का निर्माण किया; दोनों ने प्रारंभिक काल में धर्मचक्र, त्रिरत्न, स्वस्तिक व अष्टमंगल प्रतीकों का प्रयोग किया; और दोनों ने लोक परंपरा के यक्ष-यक्षिणियों को रक्षक देवताओं के रूप में अपनाया।
  • स्तूप और चैत्य बनाम चौमुखी मंदिर और मानस्तंभ: बौद्ध स्थापत्य में अवशेष-पूजा के कारण 'स्तूप' और गजपृष्ठाकार 'चैत्यगृह' केंद्रीय रहे; जबकि जैन परंपरा में कंकाली टीला के प्रारंभिक स्तूप के बाद 'चतुर्मुख (चौमुखी) मंदिर', 'मानस्तंभ' और 'मंदिर-नगर' (पालीताना) प्रमुख हो गए।
  • गुफा स्थापत्य का अंतर: बौद्ध गुफाओं (कार्ले, अजंता) में विशाल सामूहिक प्रार्थना कक्ष (चैत्य) और बड़े विहार बने; जबकि प्रारंभिक जैन गुफाएँ (उदयगिरि-खंडगिरि) बिना किसी चैत्यगृह के, छोटे द्वार और ढलानदार फर्श वाली एकांत तपोवन कोठरियाँ थीं।
  • प्रतिमा विज्ञान में दार्शनिक अंतर: बौद्ध महायान दर्शन में लोक-कल्याण और करुणा पर बल होने से बुद्ध और बोधिसत्त्वों को अनेक गतिशील मुद्राओं (भूमिस्पर्श, धर्मचक्र, अभय, शयन) और भावों में दिखाया गया; इसके विपरीत जैन दर्शन में 'वीतरागता' (पूर्ण निर्लिप्तता) सर्वोच्च आदर्श होने के कारण सभी 24 तीर्थंकरों को केवल दो ही स्थिर मुद्राओं—'कायोत्सर्ग' या 'पद्मासन'—में तराशा गया और पहचान के लिए 'श्रीवत्स' व 'लांछन' का प्रयोग हुआ।
  • ऐतिहासिक निरंतरता: बौद्ध स्थापत्य 12वीं शताब्दी के बाद भारत में प्रायः लुप्त हो गया (हिमालयी क्षेत्रों को छोड़कर), जबकि जैन मंदिर स्थापत्य (दिलवाड़ा, रणकपुर) मध्यकाल से आधुनिक काल तक भारत में निरंतर फलता-फूलता रहा।

उपयोगी उदाहरण

अजंता के करुणामय पद्मपाणि बनाम श्रवणबेलगोला के अडिग कायोत्सर्ग बाहुबली; कार्ले का चैत्य बनाम रणकपुर का चौमुखी मंदिर।

निष्कर्ष की दिशा

दोनों परंपराओं ने अपने-अपने दार्शनिक सत्य—बौद्ध 'करुणा' और जैन 'तपश्चर्या'—को भारतीय पाषाण में इस प्रकार उकेरा कि भारतीय कला की विविधता अद्वितीय बन गई।