UPSC CSE Mains · GS Paper 1
UPSC 2020
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प्रश्न
भारत में बौद्ध धर्म के इतिहास में पाल काल सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण चरण है। गणना कीजिए (स्पष्ट कीजिए)।
प्रश्न की मांग
8वीं से 12वीं शताब्दी ईस्वी के मध्य पूर्वी भारत (बिहार-बंगाल) में पाल शासकों के अधीन बौद्ध स्थापत्य (महाविहार), मूर्तिकला, चित्रकला, दर्शन और अंतर्राष्ट्रीय प्रसार के योगदान को बिंदुवार स्पष्ट करना।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
- परिचय: जब शेष भारत में बौद्ध धर्म पतनोन्मुख था, तब 8वीं–12वीं शताब्दी में पाल शासकों (गोपाल, धर्मपाल, देवपाल, महिपाल) के संरक्षण में पूर्वी भारत में बौद्ध धर्म, स्थापत्य और कला का अंतिम भव्य पुनर्जागरण हुआ।
- महान बौद्ध महाविहारों (विश्वविद्यालयों) की स्थापना: गोपाल ने 'ओदंतपुरी', धर्मपाल ने 'विक्रमशिला' (भागलपुर) और 'सोमपुर महाविहार' (पहाड़पुर - यूनेस्को स्थल), तथा रामपाल ने 'जगद्दल' महाविहार की स्थापना की और नालंदा को200 गाँवों का राजस्व प्रदान किया।
- महाविहार स्थापत्य का नवाचार: सोमपुर और विक्रमशिला की विशाल चतुष्कोणीय आंगन और मध्यवर्ती 'क्रूसीफॉर्म (चतुर्मुखी) सीढ़ीदार स्तूप/मंदिर' की योजना ने दक्षिण-पूर्व एशिया (बोरोबुदुर और म्यांमार के आनंद मंदिर) के स्थापत्य को सीधे प्रेरित किया।
- पाल मूर्तिकला और कांस्य कला (धीमान और वीतपाल): काले बेसाल्ट पत्थर (कसोटी पत्थर) और अष्टधातु/कांस्य (कुर्किहार व नालंदा) में बुद्ध (भूमिस्पर्श मुद्रा) तथा तारा, अवलोकितेश्वर व मंजुश्री की अत्यंत परिष्कृत मूर्तियाँ बनीं।
- वज्रयान एवं तांत्रिक बौद्ध दर्शन का उत्कर्ष: सिद्धाचार्यों (चौरासी सिद्ध) और विक्रमशिला के आचार्यों के माध्यम से मंत्रयान/वज्रयान का विकास हुआ।
- ताड़पत्र पांडुलिपि चित्रकला (Palm-leaf Manuscript Painting): 'अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता' जैसी चित्रित बौद्ध पांडुलिपियों ने भारतीय लघु चित्रकला की नींव रखी।
- अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक कूटनीति: शांतरक्षित, पद्मसंभव और दीपंकर श्रीज्ञान (अतीश) ने तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रसार किया, तथा शैलेंद्र वंशीय शासक बालपुत्रदेव ने देवपाल के सहयोग से नालंदा में विहार बनवाया।
- निष्कर्ष: पाल काल ने बौद्ध धर्म को न केवल भारत में चार शताब्दियों तक जीवंत रखा, बल्कि उसे तिब्बत और दक्षिण-पूर्व एशिया की स्थायी विरासत बना दिया।