UPSC CSE Mains · GS Paper 1
UPSC 2016
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प्रश्न
प्रारंभिक बौद्ध स्तूप-कला, लोक अभिप्रायों एवं कथाओं को चित्रित करते हुए, बौद्ध आदर्शों की सफलतापूर्वक व्याख्या करती है। विशद कीजिए।
प्रश्न की मांग
यह स्पष्ट करना कि साँची, भरहुत और अमरावती के स्तूपों के तोरणों व वेदिकाओं पर स्थानीय लोक-प्रतीकों (यक्ष, शालभंजिका, नाग) और लोक-कथाओं (जातक) को किस प्रकार बौद्ध दार्शनिक मूल्यों (दान, करुणा, अहिंसा, अष्टांगिक मार्ग) को जनसाधारण तक पहुँचाने के माध्यम के रूप में प्रयुक्त किया गया।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
- परिचय: मौर्योत्तर काल (2री शती ई.पू. – 2री शती ई.) में भरहुत, साँची और अमरावती के स्तूपों ने अमूर्त बौद्ध दर्शन को आम जनता की परिचित 'लोक-भाषा और दृश्य-कथाओं' के माध्यम से प्रस्तुत किया।
- जातक कथाओं (लोक-कथाओं) के माध्यम से पारमिताओं (नैतिक आदर्शों) का शिक्षण:
- वेस्संतर जातक (साँची/अमरावती): सर्वोच्च त्याग और 'दान पारमिता' का आदर्श।
- रुरु जातक और महाकपि जातक (भरहुत): 'करुणा', अहिंसा और राजा के आत्म-बलिदान (राजधर्म) का संदेश।
- छदंत जातक: क्षमा और क्रोध-त्याग (शील) की शिक्षा।
- लोक देवी-देवताओं का बौद्धीकरण: स्थानीय उर्वरता की देवी 'शालभंजिका' (साँची तोरण), 'यक्ष-यक्षिणी' (भरहुत के कुबेर, चुलकोका व सिरिमा देवता) और 'नाग-पूजा' (मुचलिंद नाग) को बुद्ध के धम्म के रक्षक और उपासक के रूप में दिखाकर लोक-आस्था को बौद्ध नैतिकता से जोड़ा गया।
- मांगलिक लोक-अभिप्रायों (Auspicious Motifs) का दार्शनिक रूपांतरण: कमल और 'गजलक्ष्मी' को बुद्ध के पवित्र जन्म और आध्यात्मिक निर्लिप्तता से तथा 'कल्पवृक्ष' को धम्म की सर्व-कल्याणकारी प्रकृति से जोड़ा गया।
- अनाकार प्रतीकों (Aniconic Symbols) द्वारा निर्वाण व अनित्यता का बोध: चक्र (धर्मचक्रप्रवर्तन), रिक्त सिंहासन (ध्यान), बोधि वृक्ष (प्रज्ञा) और स्तूप (महापरिनिर्वाण) ने बिना मानव मूर्ति के भी बुद्ध के सर्वोच्च आदर्शों को स्थापित किया।
- ऐतिहासिक एवं सामाजिक दृश्यों द्वारा संघ-भक्ति: अनाथपिंडिक द्वारा जेतवन क्रय (भरहुत) और नालागिरि हाथी का दमन (अमरावती) ने मैत्री और दान की शक्ति को दर्शाया।
- निष्कर्ष: प्रारंभिक स्तूप-कला ने अभिजात्य दर्शन और लोक-संस्कृति के बीच सेतु बनकर बौद्ध धर्म को एक जन-आंदोलन में रूपांतरित कर दिया।