UPSC CSE Mains · GS Paper 1
UPSC 2019
हिंदी आवाज़ तैयार हो रही है…
प्रश्न
गांधार कला में मध्य एशियाई एवं यूनानी-बैक्ट्रियन तत्त्वों को उजागर कीजिए।
प्रश्न की मांग
गांधार बौद्ध कला में दो विशिष्ट बाहरी प्रभावों—(1) मध्य एशियाई (शक-पार्थियन-कुषाण) तत्त्व और (2) यूनानी-बैक्ट्रियन (हेलेनिस्टिक) तत्त्व—को अलग-अलग उदाहरणों सहित स्पष्ट करना।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
- परिचय: पश्चिमोत्तर भारत (तक्षशिला, पेशावर, स्वात) में 1ली शती ई.पू. से 4थी शती ई. के मध्य विकसित गांधार कला 'विषयवस्तु में भारतीय (बौद्ध)' किंतु 'शैली और तकनीक में यूनानी-बैक्ट्रियन व मध्य एशियाई' समन्वय का परिणाम थी।
- यूनानी-बैक्ट्रियन (Greco-Bactrian) तत्त्व:
- अपोलो-सदृश मुखाकृति: बुद्ध को यूनानी देवता अपोलो के समान तीखी नाक, धनुषाकार भौंहें और लहरदार घुँघराले बालों (Wavy hair knot) के साथ दर्शाना।
- शारीरिक यथार्थवाद (Anatomical Realism): मांसपेशियों, नसों और हड्डियों का सूक्ष्म अंकन (जैसे उपवास करते सिद्धार्थ की अस्थि-पंजर मूर्ति)।
- वस्त्र-विन्यास (Drapery): शरीर को ढकने वाले मोटे और गहरी सिलवटों वाले पारदर्शी लबादे (Himation/Toga शैली)।
- यूनानी देवता और वास्तुकला अभिप्राय: वज्रपाणि को यूनानी वीर 'हेराक्लीज़' (Heracles) के रूप में, स्तंभों पर 'कोरिंथियन शीर्ष' (Corinthian capitals) और एकेंथस की पत्तियों तथा माला-वाहक (Garland-bearers) का प्रयोग।
- मध्य एशियाई (Central Asian — Saka-Parthian-Kushan) तत्त्व:
- प्रभामंडल (Halo/Nimbus): बुद्ध के सिर के पीछे सादा गोलाकार सूर्य-प्रभामंडल (ईरानी/मध्य एशियाई सौर परंपरा से प्रेरित)।
- वेशभूषा एवं संरक्षक प्रतिमाएँ: बोधिसत्त्वों व कुषाण दानदाताओं को मध्य एशियाई लंबे कोट (Tunic/Kaftan), सलवार (Trousers), भारी चमड़े के बूट और नुकीली सीथियन टोपी में दिखाना।
- सामग्री एवं तकनीक: नीले-भूरे शिस्ट पत्थर और बाद में मध्य एशियाई 'स्टुको' (Stucco/प्लास्टर) व टेराकोटा तकनीक का व्यापक प्रयोग तथा विशालकाय (Colossal) बुद्ध प्रतिमाओं (जैसे बामियान) की परंपरा।
- निष्कर्ष: गांधार कला रेशम मार्ग के चौराहे पर पूर्व और पश्चिम के सांस्कृतिक संगम का सबसे शानदार कलात्मक स्मारक थी।