अभ्यास प्रश्न 20
प्रश्न
"बौद्ध और जैन स्थापत्य धरोहरें भारत की बहुलतावादी संस्कृति और वैश्विक पर्यटन व सांस्कृतिक कूटनीति (Soft Power) की आधारशिला हैं, किंतु आज वे संरक्षण और प्रबंधन की अनेक चुनौतियों का सामना कर रही हैं।" विश्लेषण कीजिए।
प्रश्न की मांग
बौद्ध/जैन सर्किट और यूनेस्को धरोहरों के समकालीन सांस्कृतिक-कूटनीतिक महत्त्व को बताते हुए, उनके संरक्षण के समक्ष मौजूद चुनौतियों और समाधानों पर चर्चा करना।
भूमिका की दिशा
साँची, अजंता, एलोरा, बोधगया और नालंदा जैसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों से लेकर श्रवणबेलगोला, दिलवाड़ा और राजगीर-पावापुरी तक फैला बौद्ध व जैन स्थापत्य भारत की 'अहिंसा, करुणा और सह-अस्तित्व' की वैश्विक पहचान का जीवंत प्रमाण है।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
- भारत की सांस्कृतिक कूटनीति (Soft Power) में भूमिका: 'बौद्ध सर्किट' (लुंबिनी-बोधगया-सारनाथ-कुशीनगर-राजगीर-नालंदा-साँची) पूर्वी एशिया, आसियान (ASEAN) और श्रीलंका के साथ भारत के कूटनीतिक संबंधों (Act East Policy) का सबसे मजबूत सांस्कृतिक सेतु है।
- बहुलतावाद और पर्यावरणीय नैतिकता का संदेश: एलोरा का त्रि-धार्मिक सह-अस्तित्व और जैन मंदिरों का अहिंसा व प्रकृति-संरक्षण दर्शन आज के संघर्षरत और जलवायु-संकटग्रस्त विश्व को शांति का मार्ग दिखाता है।
- संरक्षण की प्रमुख चुनौतियाँ:
- पर्यावरणीय क्षरण और नमी: अजंता, बाघ और सित्तनवासल के भित्ति-चित्रों को रिसाव, आर्द्रता, पर्यटकों की सांसों की कार्बन डाइऑक्साइड और रासायनिक क्षरण से खतरा।
- उपेक्षित और बिखरे हुए स्थल: साँची-अजंता जैसे प्रसिद्ध स्थलों के अलावा भरहुत, कंगनहल्ली, केसरिया, विक्रमशिला, ललितगिरि और अनेक जैन गुफाओं में बुनियादी ढाँचे और वैज्ञानिक संरक्षण का अभाव।
- अतिक्रमण और अनियंत्रित पर्यटन: ऐतिहासिक स्थलों के बफर जोन में अवैध निर्माण और मूल पुरातात्त्विक स्वरूप से छेड़छाड़।
- आगे की राह (समाधान): 3D लेजर स्कैनिंग और डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन, अजंता की तरह गुफाओं के पास 'रिप्लिका (प्रतिकृति) व्याख्या केंद्र' बनाना ताकि मूल चित्रों पर दबाव कम हो, विदेश ले जाई गईं अमरावती व भरहुत की कलाकृतियों की सांस्कृतिक वापसी/डिजिटल एकीकरण, और स्थानीय समुदायों को धरोहर संरक्षण से जोड़ना।
उपयोगी उदाहरण
साँची, अजंता, एलोरा, महाबोधि मंदिर व नालंदा (UNESCO स्थल), स्वदेश दर्शन योजना का बौद्ध व जैन सर्किट, और नागार्जुनकोंडा का सफल स्थानांतरण मॉडल।
निष्कर्ष की दिशा
इन पाषाण धरोहरों का वैज्ञानिक संरक्षण केवल अतीत के खंडहरों को बचाना नहीं है, बल्कि भारत की सभ्यतागत आत्मा और वैश्विक नेतृत्व की नैतिक पूंजी को भविष्य के लिए सुरक्षित करना है।