UPSC Mains अभ्यास · GS Paper 1
अभ्यास प्रश्न 2
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प्रश्न
साँची, भरहुत और अमरावती के स्तूपों की स्थापत्य और मूर्तिकला शैलियों की तुलना करते हुए स्पष्ट कीजिए कि वे किस प्रकार प्रारंभिक भारतीय कला के क्षेत्रीय और कालानुक्रमिक विकास को दर्शाते हैं।
प्रश्न की मांग
तीनों स्तूप केंद्रों की निर्माण सामग्री, स्थापत्य विन्यास, मूर्तिकला की उभार-शैली (Relief depth) और बुद्ध के निरूपण (अनाकार से मानवाकार) की तुलना करना।
भूमिका की दिशा
दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईस्वी के मध्य भरहुत, साँची और अमरावती ने प्रारंभिक भारतीय स्तूप कला के तीन क्रमिक और क्षेत्रीय सोपानों का निर्माण किया।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
- निर्माण सामग्री और भूगोल: भरहुत (सतना) में गहरा लाल बलुआ पत्थर, साँची (रायसेन) में पीला-सफेद बलुआ पत्थर, जबकि अमरावती (कृष्णा घाटी, आंध्र) में संगमरमर जैसा श्वेत-हरित चूना पत्थर (Palnad marble) प्रयुक्त हुआ।
- स्थापत्य भिन्नता: भरहुत और साँची में चार दिशाओं में पाषाण 'तोरण द्वार' बने, जबकि अमरावती में तोरणों के स्थान पर चार 'आयक मंच' और प्रत्येक पर पाँच 'आयक स्तंभ' बनाए गए तथा पूरे अण्ड को संगमरमर के फलकों से ढका गया।
- मूर्तिकला का विकास: भरहुत की नक्काशी उथली (Low relief), सपाट और काष्ठ-शैली से प्रभावित है (जिसमें ब्राह्मी शीर्षक-अभिलेख हैं); साँची में नक्काशी अधिक गहरी और स्वाभाविक हुई; जबकि अमरावती में यह अत्यंत गहरी (High relief), छरहरी, त्रिभंग मुद्राओं वाली और तीव्र गतिशीलता से युक्त हो गई।
- धार्मिक संक्रमण: भरहुत और साँची के तोरण पूर्णतः 'अनाकार' (Aniconic) हैं, जबकि अमरावती के उत्तर-चरण (2री–3री शती ई.) में प्रतीकों के साथ मानवाकार बुद्ध प्रतिमाओं का भी समावेश हुआ।
उपयोगी उदाहरण
भरहुत का जेतवन क्रय पदक, साँची की शालभंजिका व वेस्संतर जातक, और अमरावती का नालागिरि हाथी दमन फलक।
निष्कर्ष की दिशा
ये तीनों केंद्र दर्शाते हैं कि किस प्रकार भारतीय शिल्पकला प्रारंभिक काष्ठ-अनुकरण की सरलता से बढ़कर शास्त्रीय परिपक्वता और मनोवैज्ञानिक गहराई तक पहुँची।