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UPSC CSE Mains · GS Paper 4

2026 · Q6(b)

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10 अंक150 शब्दअध्याय 1

प्रश्न

कुछ नैतिक दार्शनिकों का तर्क है कि अपनी वित्तीय स्थिरता को गंभीर रूप से प्रभावित किए बिना, अपने कुछ संसाधनों को उन लोगों की मदद के लिए खर्च करना जो बुरी तरह पीड़ित हैं, हमारा 'नैतिक कर्तव्य' ( Moral Duty) है न कि केवल 'दान/परोपकार' (Charity) का विषय। कर्तव्य और दान के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए इस दावे की पुष्टि कीजिए।

प्रश्न की मांग एवं दृष्टिकोण

यह प्रश्न आधुनिक उपयोगितावादी दार्शनिक पीटर सिंगर (Peter
Singer) के प्रसिद्ध निबंध 'Famine, Affluence, and Morality' (1972) और इमैनुएल कांट के कर्तव्यशास्त्र पर आधारित है। पारंपरिक
रूप से लोग गरीबों या पीड़ितों की सहायता को 'दान' ( Charity / Supererogatory Act) मानते हैं—अर्थात ऐसा कार्य जिसे करना अच्छा है,
पर न करना अनैतिक नहीं है। किंतु पीटर सिंगर का 'डूबते बच्चे का उदाहरण' ( Drowning Child Analogy) सिद्ध करता है कि यदि हम अपने
महंगे कपड़ों या सामान्य वित्तीय स्थिरता को खोए बिना किसी डूबते हुए व्यक्ति की जान बचा सकते हैं, तो ऐसा न करना नैतिक रूप से गलत है।
अतः यह मात्र ऐच्छिक दान नहीं, बल्कि अनिवार्य मानवीय कर्तव्य है।

मॉडल उत्तर

भूमिका: नीतिशास्त्र में मानव कल्याण हेतु संसाधनों का साझाकरण एक कें द्रीय विषय है। समकालीन दार्शनिक पीटर सिंगर ( Peter Singer)
तथा भारतीय परंपरा का 'दशमांश' एवं गांधीजी का 'ट्रस्टीशिप' ( Trusteeship - न्यासिता) सिद्धांत यह स्थापित करता है कि समर्थ व्यक्ति
द्वारा अत्यंत पीड़ितों की सहायता करना महज ऐच्छिक दान नहीं, बल्कि अनुल्लंघनीय 'नैतिक कर्तव्य' है।

मुख्य भाग:

कर्तव्य ( Duty) बनाम दान (Charity) में मूल अंतर:
बाध्यता (Obligation): 'कर्तव्य' एक नैतिक बाध्यता (Moral Imperative) है जिसके पालन न करने पर व्यक्ति नैतिक दोष का भागी
होता है, जबकि 'दान' को स्वैच्छिक उदारता (Supererogation) माना जाता है जिसकी अपेक्षा तो की जाती है पर बाध्यता नहीं होती।
अधिकार एवं गरिमा (Rights & Dignity): दान में दाता और प्राप्तकर्ता के बीच पदानुक्रम (Hierarchy) और दया का भाव होता है,
जबकि कर्तव्य में पीड़ित के 'जीने के अधिकार' और मानवीय गरिमा (Human Dignity) का सम्मान होता है।

दावे की पुष्टि ( Justification):
पीटर सिंगर का 'तालाब में डूबते बच्चे' का तर्क: जिस प्रकार अपनी महंगी पोशाक खराब होने के डर से तालाब में डूबते बच्चे को न बचाना
क्रू रता है, उसी प्रकार अपनी अनावश्यक विलासिता ( Luxury) पर खर्च करने के बजाय भूख या बीमारी से मरते व्यक्ति को बचाना हमारा
प्रत्यक्ष नैतिक कर्तव्य है।
कांट का अपूर्ण कर्तव्य ( Imperfect Duty) एवं ऋण की अवधारणा: व्यक्ति की संपत्ति समाज के सहयोग से बनती है; अतः समाज के
वंचित वर्ग के प्रति संसाधनों का उपयोग 'परोपकार' नहीं बल्कि सामाजिक ऋण (Social Debt) की अदायगी है।

निष्कर्ष: इस प्रकार, जब हमारी वित्तीय स्थिरता सुरक्षित हो, तब गंभीर पीड़ा को कम करना 'चैरिटी' (दया) से ऊपर उठकर 'न्याय और मानवीय
कर्तव्य' ( Justice & Moral Duty) बन जाता है, जो कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) और कल्याणकारी राज्य की भी नैतिक नींव है।