संरक्षित क्षेत्रों से बाहर OECM द्वारा प्रभावी संरक्षण
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प्रश्न
OECM भारत के संरक्षण तंत्र में पारंपरिक संरक्षित क्षेत्रों की किस प्रकार पूरक भूमिका निभा सकते हैं? विश्लेषण कीजिए।
यह अध्ययनसार का मौलिक अभ्यास प्रश्न है, वास्तविक UPSC विगत वर्ष प्रश्न नहीं।
आदर्श उत्तर
भूमिका: राष्ट्रीय उद्यान एवं अभयारण्य महत्त्वपूर्ण हैं, किंतु जैव विविधता उनके बाहर भी रहती है। अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपाय (OECM) ऐसे क्षेत्रों को पहचानते हैं जो औपचारिक संरक्षित क्षेत्र न होकर भी टिकाऊ संरक्षण परिणाम देते हों।
पूरक भूमिका
- विस्तृत संरक्षण: सामुदायिक परिदृश्य, परंपरागत उपयोग क्षेत्र और कुछ संस्थागत भूमि पर वास्तविक जैव विविधता संरक्षण को मान्यता मिल सकती है।
- पारिस्थितिक संपर्क: वन्यजीव आवागमन, जलग्रहण और संवेदनशील आवासों के बीच संपर्क बेहतर हो सकता है।
- स्थानीय भागीदारी: संरक्षण और सतत आजीविका को साथ लेकर सामुदायिक शासन को महत्त्व मिल सकता है।
- परिदृश्य-स्तरीय दृष्टि: जैविक गलियारों, पारंपरिक सामुदायिक संरक्षण स्थलों तथा जलीय पारिस्थितिकी का संरक्षण औपचारिक सीमा से बाहर संभव है; लेकिन किसी स्थल का चयन केवल क्षेत्रफल बढ़ाने के लिए नहीं, उसके मापनीय संरक्षण परिणामों के आधार पर होना चाहिए।
- अंतरराष्ट्रीय लक्ष्य: कुनमिंग–मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढाँचे के 2030 तक 30% प्रभावी संरक्षण लक्ष्य में योगदान संभव है।
सीमाएँ और चुनौतियाँ
- हर ग्रामभूमि स्वतः OECM नहीं; दस्तावेजीकृत, दीर्घकालिक संरक्षण परिणाम आवश्यक हैं।
- स्थानीय समुदायों की सहमति, पारंपरिक अधिकार और शासन-स्वायत्तता की रक्षा करनी होगी।
- परिणाम मापन, पर्यावरणीय वित्त तथा स्वतंत्र निगरानी के संसाधन सीमित हो सकते हैं।
- बिना संवाद संरक्षण-पदवी देना भूमि-उपयोग संघर्ष बढ़ा सकता है।
भारतीय पहल और आगे की राह
अक्टूबर 2026 में CBD COP-17, येरेवन में भारत ने I-OECM दिशानिर्देश जारी किए। जैव विविधता प्रबंधन समितियों, वैज्ञानिक आकलन, सहमति तथा समयबद्ध पुनर्समीक्षा को जोड़ना चाहिए।
निष्कर्ष: OECM संरक्षित क्षेत्रों का विकल्प नहीं, पूरक है—यह संरक्षण की पहुँच बढ़ाते हुए स्थानीय समाज को भागीदार बनाता है।