मृदा स्वास्थ्य, पराली और समेकित कृषि समाधान
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प्रश्न
उत्तर भारत में मृदा क्षरण, उर्वरक असंतुलन और पराली जलाने की समस्या परस्पर जुड़ी हुई हैं। ‘खेत बचाओ अभियान–रबी 2026’ के संदर्भ में समेकित समाधान सुझाइए।
आदर्श उत्तर
उत्तर भारत की गहन धान–गेहूँ कृषि ने खाद्य सुरक्षा को मजबूत किया, पर कई क्षेत्रों में जल दोहन, असंतुलित उर्वरक प्रयोग, घटती जैविक कार्बन और फसल-अवशेष जलाने जैसी समस्याएँ एक-दूसरे को बढ़ाती हैं। ‘खेत बचाओ अभियान–रबी 2026’ इन्हें खेत-स्तर पर एकीकृत ढंग से संबोधित करने का अवसर देता है।
समेकित समाधान
- मृदा-आधारित पोषण: नियमित मृदा परीक्षण और मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर सही स्रोत, सही मात्रा, सही समय और सही स्थान के सिद्धांत से उर्वरक प्रयोग हो। सूक्ष्म पोषक तत्व, जैविक खाद और फसल-अवशेष से कार्बन पुनर्भरण किया जाए।
- फसल विविधीकरण: धान पर निर्भर क्षेत्रों में दलहन, तिलहन और बागवानी को स्थानीय जल-बजट के अनुसार बढ़ाया जाए। केवल सलाह पर्याप्त नहीं; खरीद, प्रसंस्करण, बीमा और बाजार आश्वासन भी चाहिए।
- पराली का मूल्य: Happy Seeder, सुपर-SMS, मल्चिंग और जैव-विघटक जैसे in-situ उपायों के साथ बेलिंग, कम्पोस्ट, जैव-ऊर्जा और औद्योगिक उपयोग जैसे ex-situ बाजार विकसित हों। छोटे किसानों के लिए custom-hiring centres आवश्यक हैं।
- प्रोत्साहनों का सुधार: बिजली, सिंचाई, उर्वरक सब्सिडी और MSP संकेतों को जल एवं मृदा संरक्षण के अनुकूल बनाया जाए।
- स्थानीय विस्तार व्यवस्था: कृषि विज्ञान केंद्र, पंचायत और किसान उत्पादक संगठनों के माध्यम से प्रदर्शन, प्रशिक्षण और परिणाम-आधारित निगरानी हो। प्राकृतिक/जैविक आदानों को भी स्थानीय वैज्ञानिक परीक्षण के साथ अपनाया जाए।
समाधान केवल पराली पर दंड या अधिक खाद पर सलाह नहीं, बल्कि मृदा–जल–फसल–बाजार को एक साथ सुधारने वाला होना चाहिए। किसान की आय सुरक्षित रहेगी तभी पर्यावरणीय परिवर्तन टिकाऊ बनेगा।