हिमालयी जलविद्युत: ऊर्जा, पारिस्थितिकी और जोखिम
प्रश्न
“हिमालयी जलविद्युत परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल मेगावाट में नहीं, बल्कि नदी-बेसिन की पारिस्थितिकी और आपदा जोखिम के संदर्भ में होना चाहिए।” कमला जलविद्युत परियोजना के संदर्भ में चर्चा कीजिए।
आदर्श उत्तर
अरुणाचल प्रदेश की कमला जलविद्युत परियोजना ऊर्जा उत्पादन और क्षेत्रीय विकास की संभावना रखती है। किंतु पूर्वी हिमालय की भूकंपीय सक्रियता, जैव विविधता तथा नदी-निर्भर आजीविकाएँ बताती हैं कि स्थापित क्षमता अकेली परियोजना की सामाजिक उपयोगिता नहीं दर्शाती।
संभावित लाभ और वास्तविक लागत
जलविद्युत परिवर्तनीय सौर–पवन उत्पादन को संतुलित करने, विद्युत आपूर्ति बढ़ाने और स्थानीय अवसंरचना के विकास में सहायक हो सकती है। परंतु वन-विचलन से आवासों का विखंडन, जलाशय से विस्थापन और नदी-प्रवाह में बदलाव की लागत भी जुड़ती है। मछलियों, तलछट और नीचे बसे समुदायों पर प्रभाव परियोजना-स्थल से बहुत आगे तक जा सकता है।
बेसिन और आपदा आधारित मूल्यांकन
- संचयी प्रभाव: एक नदी-तंत्र पर अनेक बाँधों का संयुक्त असर अलग-अलग पर्यावरण आकलनों में छूट सकता है। सहायक नदियों सहित प्रवाह, तलछट और जैविक संपर्क की जाँच जरूरी है।
- बहु-आपदा जोखिम: भूस्खलन, भूकंप, अतिवृष्टि और ऊपरी जलग्रहण से आने वाली अचानक बाढ़ के संयुक्त परिदृश्य का आकलन हो। हिमनदीय झील का जोखिम स्थल-विशिष्ट अध्ययन से निर्धारित किया जाए।
- जलवायु अनिश्चितता: ऐतिहासिक वर्षा और प्रवाह पर आधारित उत्पादन-आकलन भविष्य के चरम मौसम को पर्याप्त रूप से नहीं पकड़ सकता।
- सामाजिक न्याय: प्रभावित समुदायों की सार्थक भागीदारी, अधिकारों का संरक्षण, पुनर्वास और पारदर्शी लाभ-साझेदारी अनिवार्य हैं।
परियोजना के विकल्पों की तुलना, पर्यावरणीय प्रवाह, जलग्रहण उपचार, स्वतंत्र बाँध-सुरक्षा समीक्षा तथा नीचे बसे लोगों के लिए पूर्व चेतावनी व्यवस्था साथ चलनी चाहिए। स्वीकृतियाँ केवल कागजी अनुपालन न रहें। ऊर्जा लाभ तभी टिकाऊ होगा जब पूरे जीवनचक्र की पारिस्थितिक और सामाजिक लागत निर्णय में शामिल हो।