उत्सर्जन अंतराल, विकास और जलवायु न्याय
प्रश्न
उत्सर्जन अंतराल रिपोर्ट 2026 बताती है कि जलवायु नीति में दूरस्थ शुद्ध-शून्य उत्सर्जन प्रतिज्ञाओं से अधिक महत्त्व निकट अवधि की वास्तविक उत्सर्जन कटौती का है। भारत के विकास और जलवायु न्याय के संदर्भ में विश्लेषण कीजिए।
आदर्श उत्तर
वैश्विक तापन संचित उत्सर्जन से निर्धारित होता है। इसलिए दूरस्थ शुद्ध-शून्य लक्ष्य के बावजूद आज का अधिक उत्सर्जन शेष कार्बन बजट घटाता है। उत्सर्जन अंतराल रिपोर्ट 2026 इसी प्रतिज्ञा और वास्तविक कार्रवाई के अंतर को रेखांकित करती है।
निकट अवधि की कार्रवाई क्यों?
रिपोर्ट के न्यूनतम अतिक्रमण-पथ में 2025 के सापेक्ष 2030 तक 18 प्रतिशत और 2035 तक 45 प्रतिशत वैश्विक उत्सर्जन कटौती आवश्यक है। वर्तमान राष्ट्रीय योगदानों का पूर्ण क्रियान्वयन भी अपेक्षित कटौती से पीछे है। विलंब से महँगे कार्बन निष्कासन पर निर्भरता, अपरिवर्तनीय पारिस्थितिक क्षति और अनुकूलन का भार बढ़ता है।
भारत के लिए संतुलित मार्ग
- विकास का अधिकार: ऊर्जा पहुँच, रोजगार और औद्योगिकीकरण आवश्यक हैं। वैश्विक कटौती-प्रतिशत को प्रत्येक देश पर समान रूप से थोपना ऐतिहासिक उत्सर्जन और क्षमता के अंतर की उपेक्षा होगी।
- न्यायपूर्ण जिम्मेदारी: साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व के अनुसार विकसित देशों को तेज कटौती, सुलभ वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में अग्रणी होना चाहिए। ऋण-प्रधान सहायता कमजोर देशों का बोझ बढ़ा सकती है।
- घरेलू कार्रवाई: नवीकरणीय ऊर्जा के साथ भंडारण, पारेषण, ऊर्जा दक्षता, सार्वजनिक परिवहन और स्वच्छ औद्योगिक प्रक्रियाएँ बढ़ानी होंगी। गैर-जीवाश्म स्थापित क्षमता को वास्तविक बिजली उत्पादन या कुल ऊर्जा उपयोग समझना गलत होगा।
- न्यायपूर्ण संक्रमण: कोयला-आश्रित जिलों के श्रमिकों का पुनःकौशलीकरण, वैकल्पिक रोजगार और स्थानीय राजस्व-सुरक्षा जरूरी है।
भारत को अपने 2070 लक्ष्य के साथ मापनीय क्षेत्रीय पड़ाव, विश्वसनीय उत्सर्जन लेखांकन और जलवायु-सहनीय कृषि जोड़नी चाहिए। कार्बन निष्कासन शेष कठिन उत्सर्जन का पूरक हो, तत्काल कटौती का विकल्प नहीं। विकास और जलवायु न्याय का संगम विश्वसनीय कार्रवाई तथा न्यायसंगत वैश्विक सहयोग में है।