COP-26 के परिणाम और भारत की प्रतिबद्धताएँ
प्रश्न
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन (यू.एन.एफ.सी.सी.सी.) के सी.ओ.पी. के 26वें सत्र के प्रमुख परिणामों का वर्णन कीजिए। इस सम्मेलन में भारत द्वारा की गई वचनबद्धताएँ क्या हैं?
आदर्श उत्तर
ग्लासगो में आयोजित COP-26 ने पेरिस समझौते के क्रियान्वयन को आगे बढ़ाते हुए 2020 के दशक में जलवायु कार्रवाई तेज करने पर बल दिया। ग्लासगो जलवायु समझौता इसका परिणाम था।
प्रमुख परिणाम
- तापमान और उत्सर्जन: 1.5°C लक्ष्य को उपलब्ध रखने के लिए देशों से 2030 के लक्ष्यों को मजबूत करने का आग्रह किया गया। पहली बार बिना उत्सर्जन-नियंत्रण वाले कोयला विद्युत उत्पादन को क्रमिक रूप से घटाने और अकुशल जीवाश्म ईंधन सब्सिडी समाप्त करने का उल्लेख हुआ।
- जलवायु वित्त: विकसित देशों की वार्षिक 100 अरब डॉलर उपलब्ध कराने की अपूर्ण प्रतिज्ञा पर चिंता व्यक्त हुई। अनुकूलन वित्त को 2019 के स्तर से 2025 तक कम-से-कम दोगुना करने का आग्रह किया गया।
- पेरिस नियमावली: अनुच्छेद 6 के बाजार और गैर-बाजार तंत्र तथा पारदर्शी रिपोर्टिंग से संबंधित नियमों पर सहमति बनी। इससे उत्सर्जन कटौती के लेखांकन का आधार मजबूत हुआ।
- हानि और क्षति: वित्तीय व्यवस्थाओं पर ग्लासगो संवाद स्थापित हुआ; इसे समर्पित हानि-क्षति कोष की स्थापना नहीं माना जा सकता।
भारत का पंचामृत
भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता; ऊर्जा आवश्यकताओं का 50 प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा से पूरा करने; तब से 2030 तक अनुमानित कुल उत्सर्जन में एक अरब टन कमी; अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता में 2005 के सापेक्ष 45 प्रतिशत कमी; तथा 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन की प्रतिबद्धता घोषित की। साथ ही पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली का विचार प्रस्तुत किया।
इन घोषणाओं और बाद के औपचारिक राष्ट्रीय योगदानों की शब्दावली अलग है। सम्मेलन ने दिशा दी, किंतु उसकी सफलता वित्त, प्रौद्योगिकी और राष्ट्रीय स्तर की वास्तविक कार्रवाई पर निर्भर रही।