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BPSC Mains · GS Paper 1

71वीं BPSC

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6 अंकसंक्षिप्त टिप्पणीबौद्ध और जैन स्थापत्य

प्रश्न

पूर्वी भारत की पाल कला।

प्रश्न की मांग

8वीं–12वीं शताब्दी में बिहार और बंगाल में विकसित पाल स्थापत्य (महाविहार, स्तूप, मंदिर), मूर्तिकला (कांस्य व प्रस्तर) और भित्ति/पांडुलिपि चित्रकला की विशेषताओं का वर्णन करना और महायान-वज्रयान बौद्ध धर्म से उसके गहरे संबंध का विश्लेषण करना।

उत्तर-लेखन रूपरेखा

  • परिचय: 8वीं से 12वीं शताब्दी ईस्वी के मध्य बिहार और बंगाल में पाल वंश के शासनकाल में विकसित कला ने महायान और वज्रयान बौद्ध धर्म को दृश्य एवं स्मारकीय रूप प्रदान किया।
  • पाल भवन-निर्माण कला (Architecture):
  • बौद्ध महाविहार: पकी हुई ईंटों से बने विशाल आयताकार आंगन वाले मठ-विश्वविद्यालय—विक्रमशिला (अंतीचक, भागलपुर), ओदंतपुरी (बिहार शरीफ), सोमपुर (पहाड़पुर) और नालंदा का पालकालीन विस्तार।
  • स्तूप एवं चैत्य मंदिर: विक्रमशिला और सोमपुर के केंद्र में सीढ़ीदार 'चतुर्मुखी (Cruciform) स्तूप/मंदिर' तथा दीवारों पर पकी मिट्टी (Terracotta) के कथात्मक फलक; कहलगाँव का शैलकृत मंदिर और बोधगया व नालंदा के मन्नत स्तूप।
  • पाल मूर्तिकला (Sculpture — धीमान एवं वीतपाल की शैली):
  • कांस्य मूर्तियाँ (Bronze): नालंदा और कुर्किहार (गया) से प्राप्त ढलुआ (Lost-wax तकनीक) अष्टधातु की मूर्तियाँ।
  • प्रस्तर मूर्तियाँ (Black Basalt): संथाल परगना और मुंगेर के काले बेसाल्ट पत्थर पर तराशी गई अत्यंत चिकनी और अलंकृत मूर्तियाँ (जिनके पीछे प्रभावली/प्रभा-तोरण और कीर्तिमुख बने होते हैं)।
  • चित्रकला (Painting):
  • ताड़पत्र पर 'अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता' और 'पंचरक्षा' जैसी बौद्ध पांडुलिपियों का चित्रण तथा सराय टीला (नालंदा) के भित्ति-चित्र।
  • बौद्ध धर्म के साथ संबंध:
  • पाल कला के 85% से अधिक नमूने बौद्ध धर्म से जुड़े हैं—बुद्ध के जीवन की अष्टमहाप्रातिहार्य घटनाएँ (जन्म, संबोधि, धर्मचक्रप्रवर्तन, महापरिनिर्वाण आदि) और वज्रयान देवी-देवता (तारा, अवलोकितेश्वर, मंजुश्री, हेवज्र, मारीचि) इसके मुख्य विषय हैं। (हालांकि विष्णुपद व सूर्य मूर्तियों के रूप में हिंदू कला को भी संरक्षण मिला)।
  • निष्कर्ष: पाल कला एवं महाविहार स्थापत्य ने बिहार को संपूर्ण एशियाई बौद्ध जगत का केंद्र बनाया और नेपाल, तिब्बत व दक्षिण-पूर्व एशिया की कला पर अमिट छाप छोड़ी।