सौरमंडल और पृथ्वी की उत्पत्ति
पृथ्वी की उत्पत्ति को सौरमंडल के विकास से अलग करके नहीं समझा जा सकता। पृथ्वी उन्हीं पदार्थों से बनी है जिनसे सूर्य, अन्य ग्रह, उपग्रह, क्षुद्रग्रह और धूमकेतु बने। आधुनिक वैज्ञानिक समझ के अनुसार सौरमंडल का निर्माण लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले गैस और धूल के एक विशाल अंतरतारकीय बादल से हुआ, जबकि पृथ्वी की आयु लगभग 4.54 अरब वर्ष मानी जाती है।
सौरमंडल के निर्माण से पहले यह पदार्थ मुख्यतः हाइड्रोजन, हीलियम तथा पूर्ववर्ती तारों में बने भारी तत्वों के रूप में अंतरिक्ष में फैला हुआ था। गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से यह पदार्थ धीरे-धीरे एकत्र होने लगा और एक घूमती हुई नीहारिका में बदल गया। इसी पदार्थ से आगे चलकर सूर्य और ग्रहों का निर्माण हुआ।
नीहारिका परिकल्पना
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सौरमंडल की उत्पत्ति को समझाने वाले प्रारंभिक वैज्ञानिक विचारों में नीहारिका परिकल्पना का विशेष महत्व है।
इस विचार से मुख्य रूप से इमैनुएल कांट और बाद में लाप्लास का नाम जुड़ा है। कांट ने 1755 में तथा लाप्लास ने 1796 में सौरमंडल की उत्पत्ति को गैसीय नीहारिका के माध्यम से समझाने का प्रयास किया।
नीहारिका का अर्थ गैस और धूल से बने विशाल बादल से है।
इस परिकल्पना के मूल विचार के अनुसार प्रारंभ में सूर्य और ग्रह अलग-अलग पिंडों के रूप में मौजूद नहीं थे। उनके निर्माण के लिए आवश्यक पदार्थ एक विशाल घूमते हुए गैसीय बादल में उपस्थित था।
गुरुत्वाकर्षण के कारण नीहारिका सिकुड़ने लगी। जैसे-जैसे उसका आकार छोटा हुआ, उसकी घूर्णन गति बढ़ती गई। अधिकांश पदार्थ केंद्र की ओर एकत्र हुआ और आगे चलकर सूर्य के निर्माण का आधार बना।
केंद्र के चारों ओर बचा पदार्थ एक चक्राकार संरचना में फैल गया। इसी पदार्थ से धीरे-धीरे ग्रहों का निर्माण हुआ।
पुरानी नीहारिका परिकल्पना आधुनिक विज्ञान के सभी प्रश्नों का पूर्ण उत्तर नहीं देती, लेकिन इसका मूल विचार—कि सूर्य और ग्रह एक ही प्रारंभिक गैस एवं धूल के बादल से बने—आधुनिक ग्रह-निर्माण सिद्धांत का भी आधार है।
सौर नीहारिका की आधुनिक अवधारणा
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आधुनिक वैज्ञानिक व्याख्या को सामान्यतः सौर नीहारिका सिद्धांत के रूप में समझा जाता है।
लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले गैस और धूल का एक विशाल बादल गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में सिकुड़ने लगा। संभव है कि किसी निकटवर्ती खगोलीय घटना ने इस संकुचन की शुरुआत को प्रेरित किया हो, लेकिन मूल प्रक्रिया गुरुत्वीय संकुचन थी।
संकुचन के दौरान अधिकांश पदार्थ केंद्र में एकत्र होने लगा। केंद्र का तापमान और दबाव लगातार बढ़ते गए। अंततः केंद्र में नाभिकीय संलयन प्रारंभ हुआ और सूर्य का निर्माण हुआ।
सूर्य के चारों ओर बचा पदार्थ एक चपटी, घूमती हुई चकती के रूप में व्यवस्थित हो गया। इसे प्रोटोप्लानेटरी डिस्क के रूप में समझा जाता है।
इसी चकती से ग्रहों, उपग्रहों, क्षुद्रग्रहों और अन्य छोटे खगोलीय पिंडों का विकास हुआ।
अभिवृद्धि और ग्रह निर्माण
प्रारंभिक चकती में गैस और धूल के अत्यंत छोटे कण उपस्थित थे। ये कण आपस में टकराते और जुड़ते गए।
छोटे कणों के लगातार जुड़ने की प्रक्रिया को अभिवृद्धि कहा जाता है।
समय के साथ छोटे कण बड़े समूहों में बदले। इनसे किलोमीटर आकार के पिंड बने जिन्हें ग्रहाणु कहा जाता है।
ग्रहाणुओं के बीच टक्कर और गुरुत्वीय आकर्षण जारी रहा। बड़े पिंड छोटे पिंडों को अपनी ओर आकर्षित करते गए और उनका आकार लगातार बढ़ता गया।
धीरे-धीरे प्रोटोग्रह बने और अंततः ग्रहों का निर्माण हुआ।
इस प्रक्रिया को सरल क्रम में इस प्रकार समझा जा सकता है—
गैस और धूल → छोटे ठोस कण → ग्रहाणु → प्रोटोग्रह → ग्रह
सौरमंडल का निर्माण बहुत शांत प्रक्रिया नहीं थी। प्रारंभिक ग्रहों और ग्रहाणुओं के बीच लगातार विशाल टक्करें होती थीं। इन टक्करों ने ग्रहों के आकार, संरचना और कक्षाओं को प्रभावित किया।
आंतरिक और बाहरी ग्रह अलग क्यों हैं?
प्रारंभिक सौरमंडल में सूर्य के निकट तापमान बहुत अधिक था जबकि सूर्य से दूर जाने पर तापमान कम होता गया।
सूर्य के पास केवल वे पदार्थ ठोस अवस्था में रह सके जिनका गलनांक अधिक था, जैसे धातुएँ और सिलिकेट खनिज।
इसलिए सूर्य के पास बने—
बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल
मुख्यतः चट्टानी और धात्विक पदार्थों से निर्मित हुए।
इन्हें स्थलीय ग्रह कहा जाता है।
इनकी प्रमुख विशेषताएँ हैं—
- अपेक्षाकृत छोटा आकार
- अधिक घनत्व
- ठोस सतह
- मुख्यतः चट्टानों और धातुओं से निर्माण
सूर्य से दूर स्थित ठंडे क्षेत्र में जल, अमोनिया और मीथेन जैसे पदार्थ भी बर्फ या अन्य संघनित रूपों में मौजूद रह सकते थे। वहाँ अधिक मात्रा में पदार्थ उपलब्ध होने के कारण बड़े ग्रहों का निर्माण हुआ।
इस बाहरी क्षेत्र में—
बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण
का विकास हुआ।
बृहस्पति और शनि मुख्यतः विशाल गैसीय ग्रह हैं, जबकि अरुण और वरुण में बर्फीले पदार्थों का अनुपात अधिक है।
यह तथ्य परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि स्थलीय और बाहरी ग्रहों के बीच संरचनात्मक अंतर का मुख्य कारण प्रारंभिक सौरमंडल में तापमान का क्षेत्रीय अंतर था।
पृथ्वी का निर्माण
पृथ्वी का निर्माण सूर्य के चारों ओर घूम रहे चट्टानी और धात्विक पदार्थों की अभिवृद्धि से हुआ।
प्रारंभ में पृथ्वी एक छोटे प्रोटोग्रह के रूप में विकसित हुई। इसके आसपास मौजूद पदार्थ लगातार इससे टकराता और इसमें जुड़ता गया।
इस प्रक्रिया के दौरान तीन प्रमुख स्रोतों से भारी मात्रा में ऊष्मा उत्पन्न हुई—
ग्रहाणुओं और अन्य पिंडों की टक्कर,
गुरुत्वीय संपीड़न,
और रेडियोधर्मी तत्वों का क्षय।
इसी कारण प्रारंभिक पृथ्वी अत्यंत गर्म थी और उसके आंतरिक भाग का बड़ा हिस्सा पिघली या अर्ध-पिघली अवस्था में पहुँच गया।
यह स्थिति आगे पृथ्वी के विभेदन के लिए महत्वपूर्ण बनी।
पृथ्वी का विभेदन
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पृथ्वी के प्रारंभिक पदार्थ समान रूप से व्यवस्थित नहीं रहे। जब प्रारंभिक पृथ्वी गर्म होकर पिघली अवस्था में पहुँची, तब विभिन्न पदार्थ अपने घनत्व के अनुसार अलग-अलग स्तरों पर जाने लगे।
इस प्रक्रिया को विभेदन कहा जाता है।
लोहा और निकेल जैसे भारी तत्व पृथ्वी के केंद्र की ओर नीचे चले गए।
इनसे पृथ्वी के क्रोड के निर्माण में प्रमुख योगदान मिला।
हल्के सिलिकेट पदार्थ ऊपरी हिस्सों की ओर आए और उनसे आगे चलकर मैन्टल और पर्पटी का विकास हुआ।
इस प्रकार पृथ्वी की वर्तमान स्तरित आंतरिक संरचना का मूल कारण प्रारंभिक विभेदन है।
इसे सरल रूप में इस प्रकार समझ सकते हैं—
भारी पदार्थ → केंद्र की ओर → क्रोड
हल्के पदार्थ → बाहरी भाग की ओर → मैन्टल और पर्पटी
आगे पृथ्वी की आंतरिक संरचना में इन परतों का विस्तृत अध्ययन किया जाएगा।
प्रारंभिक पर्पटी
प्रारंभिक पृथ्वी की सतह बहुत गर्म और अस्थिर थी। जैसे-जैसे पृथ्वी ने अंतरिक्ष में ऊष्मा खोई, बाहरी भाग ठंडा होने लगा।
ठंडा होने पर कुछ पदार्थ ठोस हुए और प्रारंभिक पर्पटी का निर्माण हुआ।
लेकिन यह पर्पटी आज की महाद्वीपीय पर्पटी जैसी स्थिर नहीं थी। प्रारंभिक पृथ्वी पर—
- विशाल उल्कापिंडों की टक्कर,
- तीव्र ज्वालामुखीय गतिविधि,
- आंतरिक ऊष्मा,
- और लगातार पुनर्गठन
होता रहा।
इसलिए प्रारंभिक पर्पटी का बड़ा भाग बार-बार नष्ट और पुनर्निर्मित होता रहा।
समय के साथ पृथ्वी के अधिक स्थिर भूभाग विकसित हुए और महाद्वीपीय पर्पटी के निर्माण का आधार तैयार हुआ।
प्रारंभिक वायुमंडल का निर्माण
पृथ्वी के निर्माण के समय का वायुमंडल वर्तमान वायुमंडल से बिल्कुल अलग था।
प्रारंभिक अवस्था में हाइड्रोजन और हीलियम जैसी हल्की गैसें उपस्थित रही होंगी, लेकिन पृथ्वी की अत्यधिक गर्म अवस्था और सूर्य से आने वाली तीव्र सौर पवनों के कारण उनका बड़ा भाग अंतरिक्ष में निकल गया।
बाद में पृथ्वी के आंतरिक भाग से ज्वालामुखीय उद्गारों के माध्यम से बड़ी मात्रा में गैसें बाहर निकलीं।
इस प्रक्रिया को गैस-मुक्ति कहा जाता है।
इन गैसों में विशेष रूप से—
- जलवाष्प
- कार्बन डाइऑक्साइड
- नाइट्रोजन
- मीथेन
- अमोनिया
जैसी गैसें शामिल थीं।
प्रारंभिक वायुमंडल में आज की तरह मुक्त ऑक्सीजन प्रचुर मात्रा में नहीं थी।
जल और महासागरों का विकास
प्रारंभ में पृथ्वी इतनी गर्म थी कि जल मुख्यतः जलवाष्प के रूप में मौजूद था।
जब पृथ्वी धीरे-धीरे ठंडी हुई तो जलवाष्प संघनित होने लगी और वर्षा के रूप में पृथ्वी की सतह पर गिरने लगी।
लंबे समय तक चली इस प्रक्रिया से पृथ्वी के निम्न भागों में जल एकत्रित हुआ और प्रारंभिक महासागरों का विकास हुआ।
पृथ्वी के जल के स्रोत को लेकर वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि इसका बड़ा भाग पृथ्वी के निर्माण में शामिल पदार्थों तथा प्रारंभिक गैस-मुक्ति से जुड़ा था। जलयुक्त क्षुद्रग्रहों तथा अन्य छोटे पिंडों ने भी इसमें योगदान दिया हो सकता है।
परीक्षा में यह कहना अधिक उचित है कि पृथ्वी का सारा जल केवल धूमकेतुओं द्वारा लाया गया था—यह सही नहीं है।
चंद्रमा की उत्पत्ति
पृथ्वी के प्रारंभिक विकास से चंद्रमा की उत्पत्ति भी जुड़ी हुई है।
वर्तमान में सबसे अधिक स्वीकार्य वैज्ञानिक व्याख्याओं में विशाल टक्कर परिकल्पना प्रमुख है।
इसके अनुसार प्रारंभिक पृथ्वी से मंगल के लगभग आकार का एक खगोलीय पिंड टकराया। इस काल्पनिक पिंड को सामान्यतः थीया कहा जाता है।
इस विशाल टक्कर से पृथ्वी और टकराने वाले पिंड का बहुत-सा पदार्थ अंतरिक्ष में चला गया। यही पदार्थ पृथ्वी की कक्षा में एकत्रित हुआ और अंततः चंद्रमा का निर्माण हुआ।
चंद्रमा का निर्माण लगभग 4.5 अरब वर्ष पहले पृथ्वी के शुरुआती इतिहास में हुआ माना जाता है।
यह घटना पृथ्वी के बाद के विकास, अक्षीय स्थिति और ज्वार संबंधी प्रक्रियाओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण रही।
पृथ्वी रहने योग्य ग्रह कैसे बनी?
पृथ्वी के विकास में कई परिस्थितियों का संयोजन ऐसा रहा जिसने बाद में जीवन के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया।
पृथ्वी सूर्य से ऐसी दूरी पर स्थित है जहाँ उसकी सतह पर लंबे समय तक तरल जल मौजूद रह सकता है।
पृथ्वी का पर्याप्त गुरुत्व वायुमंडल को बनाए रखने में सहायता करता है।
आंतरिक भूवैज्ञानिक गतिविधियों ने दीर्घकाल में वायुमंडल और कार्बन चक्र को प्रभावित किया।
जल का स्थायी भंडार महासागरों के रूप में विकसित हुआ।
बाद में प्रकाश संश्लेषी जीवों ने वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाई।
लेकिन यह सब पृथ्वी के निर्माण के तुरंत बाद नहीं हुआ। जीवन-अनुकूल पृथ्वी का विकास करोड़ों और अरबों वर्षों की लंबी प्रक्रिया थी।
पृथ्वी की आयु
पृथ्वी की आयु लगभग 4.54 अरब वर्ष मानी जाती है।
यह आयु केवल पृथ्वी की सबसे पुरानी चट्टान देखकर तय नहीं की गई है, क्योंकि पृथ्वी की प्रारंभिक पर्पटी का बड़ा भाग भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं में नष्ट या परिवर्तित हो चुका है।
वैज्ञानिकों ने अत्यंत पुराने खनिजों, उल्कापिंडों और रेडियोमेट्रिक आयु-निर्धारण की सहायता से पृथ्वी और सौरमंडल की आयु निर्धारित की।
सौरमंडल के सबसे पुराने पदार्थ लगभग 4.567 अरब वर्ष पुराने पाए गए हैं।
इसलिए परीक्षा में लगभग—
सौरमंडल = 4.6 अरब वर्ष
और
पृथ्वी = 4.54 अरब वर्ष
याद रखना पर्याप्त और उपयोगी है।
सौरमंडल के निर्माण से जुड़े छोटे पिंड
सौरमंडल के निर्माण में उपलब्ध सारा पदार्थ ग्रहों में शामिल नहीं हुआ।
बचा हुआ पदार्थ विभिन्न रूपों में आज भी मौजूद है।
क्षुद्रग्रह मुख्यतः चट्टानी या धात्विक छोटे पिंड हैं। इनकी बड़ी संख्या मंगल और बृहस्पति के बीच स्थित क्षुद्रग्रह घेरे में पाई जाती है।
धूमकेतु बर्फ, धूल और चट्टानी पदार्थों से बने छोटे पिंड हैं। सूर्य के निकट आने पर इनमें गैस और धूल की पूँछ विकसित हो सकती है।
उल्काभ अंतरिक्ष में मौजूद अपेक्षाकृत छोटे चट्टानी या धात्विक टुकड़े होते हैं। पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते समय चमकने वाली घटना को उल्का कहा जाता है और यदि उसका कोई भाग पृथ्वी की सतह तक पहुँच जाए तो उसे उल्कापिंड कहा जाता है।
उल्कापिंडों का अध्ययन सौरमंडल के प्रारंभिक पदार्थ की संरचना और आयु समझने में बहुत उपयोगी है।
परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण समझ
सौरमंडल और पृथ्वी की उत्पत्ति से जुड़े प्रश्नों में केवल किसी एक पुरानी परिकल्पना को याद करना पर्याप्त नहीं है।
पूरा क्रम समझना अधिक उपयोगी है—
अंतरतारकीय गैस और धूल → सौर नीहारिका → गुरुत्वीय संकुचन → सूर्य का निर्माण → प्रोटोप्लानेटरी डिस्क → अभिवृद्धि → ग्रहाणु → प्रोटोग्रह → ग्रह
पृथ्वी के बनने के बाद—
ऊष्मन → आंशिक पिघलाव → विभेदन → क्रोड, मैन्टल और पर्पटी का विकास
हुआ।
इसके बाद पृथ्वी के ठंडा होने, गैस-मुक्ति और जलवाष्प के संघनन से प्रारंभिक वायुमंडल और महासागर विकसित हुए।
महत्वपूर्ण तथ्य
सौरमंडल की आयु लगभग 4.6 अरब वर्ष है।
पृथ्वी की आयु लगभग 4.54 अरब वर्ष है।
आधुनिक वैज्ञानिक समझ के अनुसार सूर्य और ग्रह एक ही प्रारंभिक सौर नीहारिका से बने।
ग्रह निर्माण की मुख्य प्रक्रिया अभिवृद्धि थी।
ग्रहाणु छोटे पिंड थे जिनके जुड़ने से बड़े प्रोटोग्रह बने।
बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल स्थलीय ग्रह हैं।
आंतरिक ग्रह मुख्यतः चट्टानी और धात्विक पदार्थों से बने हैं।
प्रारंभिक सौरमंडल में तापमान के अंतर ने ग्रहों की संरचना को प्रभावित किया।
प्रारंभिक पृथ्वी की ऊष्मा में ग्रहाणुओं की टक्कर, गुरुत्वीय संपीड़न और रेडियोधर्मी क्षय महत्वपूर्ण थे।
पृथ्वी के भारी तत्व केंद्र की ओर चले गए और हल्के पदार्थ बाहरी भागों में रहे। इस प्रक्रिया को विभेदन कहते हैं।
लोहा और निकेल पृथ्वी के क्रोड के प्रमुख तत्व हैं।
प्रारंभिक वायुमंडल वर्तमान वायुमंडल जैसा नहीं था।
ज्वालामुखीय गैस-मुक्ति ने वायुमंडल के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पृथ्वी के ठंडा होने पर जलवाष्प संघनित हुई और महासागरों के विकास में सहायता मिली।
चंद्रमा की उत्पत्ति के लिए विशाल टक्कर परिकल्पना वर्तमान प्रमुख वैज्ञानिक व्याख्या है।
निष्कर्ष
सौरमंडल और पृथ्वी की उत्पत्ति लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले शुरू हुई एक दीर्घकालीन प्राकृतिक प्रक्रिया का परिणाम है। गैस और धूल की सौर नीहारिका के गुरुत्वीय संकुचन से सूर्य का निर्माण हुआ और उसके आसपास बची पदार्थ-चकती में अभिवृद्धि के माध्यम से ग्रह बने। पृथ्वी के निर्माण के बाद अत्यधिक ऊष्मा के कारण उसका आंतरिक विभेदन हुआ, जिससे क्रोड, मैन्टल और पर्पटी विकसित हुए। बाद में पृथ्वी के ठंडा होने, गैस-मुक्ति और जल के संघनन से वायुमंडल तथा महासागरों के विकास का आधार तैयार हुआ। यही प्रक्रियाएँ आगे पृथ्वी के भूवैज्ञानिक और जैविक विकास की नींव बनीं।