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पृथ्वी की उत्पत्ति और भूवैज्ञानिक विकास

आज की पृथ्वी लगभग 4.54 अरब वर्ष पुराने एक लंबे विकासक्रम का परिणाम है। अपने प्रारंभिक समय में पृथ्वी न तो आज जैसी ठोस थी, न इस पर वर्तमान जैसा वायुमंडल था और न ही महासागर तथा जीवन मौजूद थे। सौरमंडल के निर्माण, पदार्थों के संघनन, पृथ्वी के आंतरिक विभेदन, पर्पटी के विकास, वायुमंडल और महासागरों के निर्माण तथा करोड़ों वर्षों तक चली भूवैज्ञानिक और जैविक प्रक्रियाओं के कारण वर्तमान पृथ्वी का स्वरूप विकसित हुआ।

पृथ्वी के इस विकास को समझना भौतिक भूगोल का आधार है, क्योंकि आगे पढ़े जाने वाले महाद्वीप, महासागर, चट्टानें, पर्वत, प्लेट विवर्तनिकी, ज्वालामुखी और भूवैज्ञानिक संरचनाएँ इसी लंबे इतिहास से जुड़ी हुई हैं।

ब्रह्मांड और सौरमंडल की पृष्ठभूमि

पृथ्वी की उत्पत्ति को सौरमंडल की उत्पत्ति से अलग करके नहीं समझा जा सकता। आधुनिक वैज्ञानिक मत के अनुसार ब्रह्मांड की उत्पत्ति लगभग 13.8 अरब वर्ष पहले अत्यंत सघन और गर्म अवस्था के तीव्र विस्तार से हुई, जिसे सामान्यतः महाविस्फोट सिद्धांत के माध्यम से समझाया जाता है।

समय के साथ पदार्थ एकत्रित होकर आकाशगंगाओं, तारों और अन्य खगोलीय पिंडों में विकसित हुआ। हमारी आकाशगंगा दुग्धमेखला है और इसी के भीतर सूर्य तथा उसका सौरमंडल स्थित है।

सौरमंडल का निर्माण लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले हुआ माना जाता है। सूर्य के निर्माण के साथ उसके चारों ओर उपस्थित गैस और धूल के विशाल चक्राकार बादल से धीरे-धीरे ग्रहों तथा अन्य छोटे खगोलीय पिंडों का निर्माण हुआ।

नीहारिका से सौरमंडल का निर्माण

सौरमंडल की उत्पत्ति को समझाने के लिए प्रारंभिक वैज्ञानिक विचारों में नीहारिका परिकल्पना का विशेष महत्व है। इसके अनुसार प्रारंभ में गैस और धूल का एक विशाल घूमता हुआ बादल था, जिसे नीहारिका कहा गया।

गुरुत्वाकर्षण के कारण यह बादल धीरे-धीरे सिकुड़ने लगा। संकुचन के साथ इसके घूमने की गति बढ़ी और अधिकांश पदार्थ केंद्र में एकत्रित होने लगा। केंद्र में तापमान और दबाव अत्यधिक बढ़ने से सूर्य का निर्माण हुआ।

सूर्य के चारों ओर बचा हुआ पदार्थ चक्राकार रूप में घूमता रहा। इसके छोटे-छोटे कण आपस में टकराते और जुड़ते गए। धीरे-धीरे बड़े पिंड बने और अंततः ग्रहों का विकास हुआ।

आधुनिक ग्रह-निर्माण की अवधारणा भी मूल रूप से इसी प्रक्रिया को अधिक वैज्ञानिक रूप में समझाती है।

ग्रहाणुओं से ग्रहों का निर्माण

सूर्य के चारों ओर उपस्थित धूल और छोटे कण आपसी आकर्षण तथा टक्करों के कारण जुड़ते गए। इस प्रक्रिया को अभिवृद्धि कहा जाता है।

छोटे कणों से बड़े पिंड बने और ये आगे चलकर ग्रहाणु बने। ग्रहाणु आपस में टकराकर और जुड़कर अधिक बड़े पिंडों में बदलते गए। करोड़ों वर्षों में इन्हीं से ग्रहों का निर्माण हुआ।

अर्थात ग्रह निर्माण को सामान्य क्रम में इस प्रकार समझा जा सकता है—

गैस और धूल → छोटे कण → ग्रहाणु → प्रारंभिक ग्रह → ग्रह

पृथ्वी भी इसी प्रक्रिया से बनी।

आंतरिक और बाहरी ग्रहों का अंतर

सूर्य के निकट वाले क्षेत्र में तापमान बहुत अधिक था। इसलिए यहाँ हल्की गैसें आसानी से संघनित नहीं हो सकीं। मुख्यतः भारी और ठोस पदार्थों से बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल जैसे ग्रह बने।

इन्हें स्थलीय ग्रह कहा जाता है। इनकी प्रमुख विशेषताएँ हैं—

इनका आकार अपेक्षाकृत छोटा है, घनत्व अधिक है और इनकी सतह ठोस तथा चट्टानी है।

सूर्य से दूर के क्षेत्रों में तापमान अपेक्षाकृत कम था। वहाँ गैसों और बर्फीले पदार्थों की अधिक मात्रा जमा हो सकी। इससे बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण जैसे विशाल ग्रह बने।

इसलिए सौरमंडल में ग्रहों की संरचना और स्थिति का संबंध प्रारंभिक सौर नीहारिका में तापमान के वितरण से भी है।

प्रारंभिक पृथ्वी

लगभग 4.54 अरब वर्ष पहले बनी प्रारंभिक पृथ्वी आज की पृथ्वी से बहुत अलग थी। अभिवृद्धि के दौरान होने वाली टक्करों, गुरुत्वीय संकुचन और रेडियोधर्मी तत्वों के क्षय से भारी मात्रा में ऊष्मा उत्पन्न हुई।

इस कारण पृथ्वी का आंतरिक भाग अत्यधिक गर्म हो गया और पदार्थ आंशिक या व्यापक रूप से पिघली अवस्था में पहुँच गए।

इस पिघली हुई अवस्था ने पृथ्वी के पदार्थों को उनके घनत्व के अनुसार अलग होने का अवसर दिया। यही प्रक्रिया पृथ्वी की वर्तमान आंतरिक संरचना के विकास का आधार बनी।

पृथ्वी का विभेदन

प्रारंभिक पृथ्वी जब अत्यधिक गर्म और आंशिक रूप से पिघली हुई थी, तब विभिन्न पदार्थ अपने घनत्व के अनुसार अलग-अलग स्तरों पर व्यवस्थित होने लगे। इस प्रक्रिया को विभेदन कहा जाता है।

लोहा और निकेल जैसे भारी तत्व पृथ्वी के केंद्र की ओर चले गए और उन्होंने क्रोड के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाई।

हल्के सिलिकेट पदार्थ ऊपर की ओर आए और उनसे मैन्टल तथा बाद में पर्पटी का विकास हुआ।

इस प्रकार प्रारंभ में लगभग मिश्रित अवस्था वाली पृथ्वी धीरे-धीरे विभिन्न परतों में विभाजित हो गई—

क्रोड → मैन्टल → पर्पटी

पृथ्वी की आंतरिक संरचना के निर्माण की दृष्टि से विभेदन अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया थी।

प्रारंभिक पर्पटी का निर्माण

पृथ्वी की बाहरी सतह धीरे-धीरे ठंडी होने लगी। तापमान कम होने से सतह पर ठोस पदार्थ बनने लगे और प्रारंभिक पर्पटी का निर्माण हुआ।

यह प्रारंभिक पर्पटी स्थायी नहीं थी। ज्वालामुखीय गतिविधियाँ, उल्कापिंडों की टक्कर, आंतरिक ऊष्मा और विवर्तनिक गतिविधियों के कारण इसमें बार-बार परिवर्तन होते रहे।

समय के साथ अधिक स्थिर महाद्वीपीय पर्पटी विकसित हुई और पृथ्वी की सतह पर बड़े भूभागों के विकास का आधार तैयार हुआ।

प्रारंभिक वायुमंडल

पृथ्वी का वर्तमान वायुमंडल उसके प्रारंभिक वायुमंडल जैसा नहीं है।

पृथ्वी के निर्माण के समय हाइड्रोजन और हीलियम जैसी हल्की गैसें मौजूद रही होंगी, लेकिन पृथ्वी की अत्यधिक गर्म अवस्था और सौर पवन के प्रभाव के कारण इनका बड़ा भाग अंतरिक्ष में निकल गया।

बाद में पृथ्वी के आंतरिक भाग से ज्वालामुखीय गतिविधियों द्वारा गैसें बाहर निकलीं। इस प्रक्रिया को गैस-मुक्ति कहा जाता है।

इन गैसों में मुख्यतः—

जलवाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन तथा अन्य गैसें शामिल थीं।

प्रारंभिक वायुमंडल में स्वतंत्र ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम थी।

महासागरों का निर्माण

जैसे-जैसे पृथ्वी ठंडी हुई, वायुमंडल में उपस्थित जलवाष्प संघनित होने लगी। लंबे समय तक वर्षा होने से पृथ्वी की सतह के निम्न भागों में जल जमा हुआ और प्रारंभिक महासागरों का निर्माण हुआ।

महासागरों के निर्माण ने पृथ्वी के तापमान, वायुमंडल और जीवन के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

महासागरों ने बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित किया, जिससे वायुमंडल की संरचना में परिवर्तन हुआ।

ऑक्सीजन का विकास

प्रारंभिक वायुमंडल में वर्तमान जैसी मुक्त ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं थी। प्रकाश संश्लेषण करने वाले प्रारंभिक सूक्ष्मजीवों, विशेषकर सायनोबैक्टीरिया, ने सूर्य के प्रकाश का उपयोग करके कार्बन डाइऑक्साइड और जल से भोजन बनाया तथा उप-उत्पाद के रूप में ऑक्सीजन मुक्त की।

बहुत लंबे समय तक यह ऑक्सीजन महासागरों में उपस्थित लोहे तथा अन्य पदार्थों के साथ प्रतिक्रिया करती रही। बाद में जब इन पदार्थों की प्रतिक्रिया क्षमता कम हुई तो वायुमंडल में मुक्त ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ने लगी।

वायुमंडल में ऑक्सीजन की वृद्धि पृथ्वी के जैविक विकास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक थी।

ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध होने से ऊपरी वायुमंडल में ओजोन परत का विकास भी संभव हुआ। ओजोन ने सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से सुरक्षा प्रदान की और जटिल जीवन के विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनीं।

भूवैज्ञानिक समय

पृथ्वी का इतिहास इतना लंबा है कि इसे सामान्य वर्षों में समझना कठिन है। इसलिए वैज्ञानिक पृथ्वी के इतिहास को विभिन्न भूवैज्ञानिक समय इकाइयों में बाँटते हैं।

सबसे बड़े स्तर पर पृथ्वी का इतिहास बड़े महाकल्पों में बाँटा जाता है। इनके भीतर छोटे-छोटे कल्प, काल और अन्य समय इकाइयाँ होती हैं।

भूवैज्ञानिक समय मापनी चट्टानों, जीवाश्मों और पृथ्वी के इतिहास में हुई प्रमुख घटनाओं के आधार पर विकसित की गई है।

UPSC के लिए इसका उद्देश्य केवल नाम याद करना नहीं, बल्कि यह समझना है कि पृथ्वी के अलग-अलग समय में कौन-सी प्रमुख भूवैज्ञानिक और जैविक घटनाएँ हुईं।

पृथ्वी के प्रारंभिक महाकल्प

पृथ्वी के अत्यंत प्रारंभिक इतिहास में हैडियन समय आता है। इसी दौरान पृथ्वी का निर्माण, प्रारंभिक विभेदन और प्रारंभिक पर्पटी का विकास हुआ।

इसके बाद आर्कियन समय में पृथ्वी की पर्पटी अधिक स्थिर हुई, प्रारंभिक महासागर विकसित हुए और जीवन के सबसे पुराने प्रमाण दिखाई देने लगे।

प्रोटेरोजोइक समय में वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ी और अधिक जटिल जीवों के विकास की दिशा तैयार हुई।

इन अत्यंत पुराने समयों को सामूहिक रूप से कई संदर्भों में प्रीकैम्ब्रियन कहा जाता है। पृथ्वी के कुल इतिहास का अधिकांश भाग प्रीकैम्ब्रियन काल में ही आता है।

दृश्य जीवन का विस्तार

लगभग 541 मिलियन वर्ष पहले फैनेरोजोइक महाकल्प शुरू हुआ, जिसमें जीवाश्म रिकॉर्ड में जटिल जीवन अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

इसके तीन प्रमुख कल्प हैं—

पुराजीवी, मध्यजीवी और नवजीवी।

पुराजीवी समय में समुद्री जीवन का व्यापक विकास हुआ, बाद में मछलियाँ, पौधे, उभयचर और प्रारंभिक सरीसृप विकसित हुए।

मध्यजीवी समय को सामान्यतः सरीसृपों और डायनासोरों के प्रभुत्व के लिए जाना जाता है। इसी दौरान प्रारंभिक पक्षी और स्तनधारी भी विकसित हुए।

नवजीवी समय में स्तनधारियों का व्यापक विकास हुआ और बहुत बाद में मानव का विकास हुआ।

सामूहिक विलुप्तियाँ

पृथ्वी के इतिहास में जीवन का विकास लगातार समान गति से नहीं हुआ। कई बार बहुत कम भूवैज्ञानिक समय में बड़ी संख्या में जीव प्रजातियाँ समाप्त हो गईं। ऐसी घटनाओं को सामूहिक विलुप्ति कहा जाता है।

फैनेरोजोइक इतिहास में पाँच प्रमुख सामूहिक विलुप्तियों का उल्लेख किया जाता है।

इनमें सबसे बड़ी विलुप्ति लगभग 252 मिलियन वर्ष पहले, पर्मियन काल के अंत में हुई।

सबसे प्रसिद्ध विलुप्ति लगभग 66 मिलियन वर्ष पहले क्रिटेशियस काल के अंत में हुई, जिसमें गैर-पक्षी डायनासोर समाप्त हो गए।

इस घटना के पीछे विशाल क्षुद्रग्रह प्रभाव को प्रमुख कारणों में माना जाता है, हालांकि उस समय बड़े ज्वालामुखीय विस्फोट और अन्य पर्यावरणीय परिवर्तन भी महत्वपूर्ण थे।

भारत का दक्कन ट्रैप ज्वालामुखीय प्रकरण भी इसी व्यापक भूवैज्ञानिक समय के आसपास हुआ था, इसलिए भारत के भूगोल में इसका विशेष महत्व है।

पृथ्वी की आयु कैसे ज्ञात की गई?

पृथ्वी की आयु सीधे देखकर निर्धारित नहीं की जा सकती। इसके लिए चट्टानों और खनिजों में मौजूद रेडियोधर्मी तत्वों का अध्ययन किया जाता है।

कुछ तत्व समय के साथ निश्चित दर से दूसरे तत्वों में बदलते हैं। इस प्रक्रिया को रेडियोधर्मी क्षय कहा जाता है।

इस क्षय की दर ज्ञात होने के कारण वैज्ञानिक किसी चट्टान या खनिज की आयु का अनुमान लगा सकते हैं। इस विधि को रेडियोमेट्रिक आयु-निर्धारण कहा जाता है।

यूरेनियम-सीसा प्रणाली अत्यंत प्राचीन चट्टानों और पृथ्वी की आयु के अध्ययन में विशेष रूप से उपयोगी है।

पृथ्वी की स्वीकृत आयु लगभग 4.54 अरब वर्ष मानी जाती है।

सापेक्ष और निरपेक्ष आयु

भूवैज्ञानिक घटनाओं की आयु जानने के दो मूल तरीके हैं।

सापेक्ष आयु यह बताती है कि कौन-सी चट्टान या घटना दूसरी से पुरानी अथवा नई है।

अविक्षुब्ध अवसादी परतों में सामान्यतः नीचे स्थित परत ऊपर की परत से पुरानी होती है। इसे अध्यारोपण का सिद्धांत कहा जाता है।

जीवाश्म भी विभिन्न चट्टान परतों की सापेक्ष आयु समझने में सहायता करते हैं।

इसके विपरीत रेडियोमेट्रिक आयु-निर्धारण चट्टान या खनिज की संख्यात्मक आयु ज्ञात करने का प्रयास करता है।

दोनों विधियाँ मिलकर पृथ्वी के भूवैज्ञानिक इतिहास का क्रम तैयार करने में सहायता करती हैं।

पृथ्वी का विकास आज भी जारी है

यह मानना गलत होगा कि पृथ्वी का भूवैज्ञानिक विकास बहुत पहले समाप्त हो चुका है।

पृथ्वी आज भी एक गतिशील ग्रह है।

प्लेटें लगातार गति कर रही हैं।

पर्वतों का उत्थान और अपरदन जारी है।

ज्वालामुखीय गतिविधियाँ होती रहती हैं।

भूकंप आते हैं।

नदियाँ स्थलरूपों को बदल रही हैं।

समुद्री तल का निर्माण और विनाश जारी है।

हिमनद, पवन और समुद्री तरंगें पृथ्वी की सतह को लगातार रूपांतरित कर रहे हैं।

इसलिए वर्तमान पृथ्वी किसी अंतिम स्थिर अवस्था का परिणाम नहीं, बल्कि निरंतर चल रही भूवैज्ञानिक प्रक्रिया का एक चरण है।

परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य

पृथ्वी की आयु लगभग 4.54 अरब वर्ष है।

सौरमंडल का निर्माण लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले हुआ।

ग्रहों के निर्माण में अभिवृद्धि की प्रक्रिया महत्वपूर्ण थी।

पृथ्वी के भारी पदार्थ केंद्र की ओर और हल्के पदार्थ बाहरी भागों की ओर गए; इसे विभेदन कहा जाता है।

लोहा और निकेल जैसे भारी पदार्थों ने क्रोड के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाई।

प्रारंभिक वायुमंडल वर्तमान वायुमंडल से बहुत अलग था।

ज्वालामुखीय गैस-मुक्ति ने बाद के वायुमंडल के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पृथ्वी के ठंडा होने और जलवाष्प के संघनन से महासागरों के विकास में सहायता मिली।

प्रकाश संश्लेषक सूक्ष्मजीवों ने वायुमंडलीय ऑक्सीजन बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

ऑक्सीजन की वृद्धि से ओजोन परत के विकास में सहायता मिली।

प्रीकैम्ब्रियन पृथ्वी के इतिहास का अधिकांश भाग समाहित करता है।

फैनेरोजोइक महाकल्प लगभग 541 मिलियन वर्ष पहले प्रारंभ हुआ।

पर्मियन के अंत की सामूहिक विलुप्ति लगभग 252 मिलियन वर्ष पहले हुई और इसे सबसे बड़ी ज्ञात सामूहिक विलुप्तियों में माना जाता है।

क्रिटेशियस के अंत की विलुप्ति लगभग 66 मिलियन वर्ष पहले हुई और गैर-पक्षी डायनासोरों के अंत से जुड़ी है।

पृथ्वी की आयु निर्धारित करने में रेडियोमेट्रिक आयु-निर्धारण महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष

पृथ्वी का वर्तमान स्वरूप अरबों वर्षों तक चली भौतिक, रासायनिक, भूवैज्ञानिक और जैविक प्रक्रियाओं का परिणाम है। सौर नीहारिका से ग्रह निर्माण, पृथ्वी का अभिवृद्धि द्वारा विकास, आंतरिक विभेदन, पर्पटी तथा महासागरों का निर्माण, वायुमंडल में ऑक्सीजन की वृद्धि और जीवन का क्रमिक विकास पृथ्वी के इतिहास की प्रमुख अवस्थाएँ हैं। भूवैज्ञानिक समय मापनी इन परिवर्तनों को व्यवस्थित क्रम में समझने में सहायता करती है। पृथ्वी आज भी सक्रिय और परिवर्तनशील ग्रह है, इसलिए उसका भूवैज्ञानिक विकास निरंतर जारी है।