पृथ्वी का विभेदन
पृथ्वी के निर्माण के प्रारंभिक चरण में उसका पदार्थ आज की तरह स्पष्ट परतों में व्यवस्थित नहीं था। ग्रहाणुओं और प्रोटोग्रहों की लगातार टक्करों, गुरुत्वीय संपीड़न तथा रेडियोधर्मी तत्वों के क्षय से पृथ्वी के भीतर बहुत अधिक ऊष्मा उत्पन्न हुई। इससे प्रारंभिक पृथ्वी का बड़ा भाग पिघली अथवा अर्ध-पिघली अवस्था में पहुँच गया।
जब पदार्थ द्रव या अर्ध-द्रव अवस्था में था, तब विभिन्न तत्व अपने घनत्व के अनुसार अलग-अलग होने लगे। भारी पदार्थ पृथ्वी के केंद्र की ओर डूब गए, जबकि हल्के पदार्थ ऊपर की ओर आ गए। पदार्थों के इस घनत्व-आधारित पृथक्करण को पृथ्वी का विभेदन कहा जाता है।
यही प्रक्रिया पृथ्वी की वर्तमान स्तरित आंतरिक संरचना के निर्माण का मूल आधार बनी।
विभेदन की आवश्यकता क्यों उत्पन्न हुई?
प्रारंभिक पृथ्वी अनेक छोटे खगोलीय पिंडों के आपस में टकराकर जुड़ने से बनी थी। इन टक्करों से भारी मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न हुई और वह ऊष्मा में बदल गई।
इसके अतिरिक्त पृथ्वी के बढ़ते द्रव्यमान के कारण गुरुत्वीय संपीड़न हुआ। पदार्थों पर बढ़ते दबाव से भी तापमान में वृद्धि हुई।
यूरेनियम, थोरियम और पोटैशियम जैसे रेडियोधर्मी तत्वों के क्षय से भी लगातार ऊष्मा उत्पन्न होती रही।
इन सभी कारणों ने प्रारंभिक पृथ्वी को अत्यधिक गर्म कर दिया।
जैसे-जैसे पृथ्वी के अंदर पदार्थ पिघला, भारी और हल्के तत्वों के लिए अपने घनत्व के अनुसार अलग होना संभव हो गया।
भारी तत्वों का केंद्र की ओर जाना
लोहा और निकेल जैसे तत्वों का घनत्व अपेक्षाकृत अधिक था। इसलिए वे पिघले हुए पदार्थ के भीतर नीचे की ओर डूबते गए और पृथ्वी के केंद्र में एकत्र हो गए।
इन भारी धातुओं के एकत्र होने से पृथ्वी के क्रोड का निर्माण हुआ।
इसी कारण पृथ्वी का केंद्रीय भाग मुख्यतः लोहा और निकेल से समृद्ध माना जाता है।
पृथ्वी के भीतर भारी तत्वों के केंद्र की ओर जाने की इस प्रक्रिया ने भी अतिरिक्त गुरुत्वीय ऊर्जा को ऊष्मा में बदला, जिससे पृथ्वी का आंतरिक भाग लंबे समय तक गर्म बना रहा।
हल्के पदार्थों का ऊपर आना
लोहा और निकेल जैसे भारी तत्वों के विपरीत सिलिकेट खनिजों से बने अपेक्षाकृत हल्के पदार्थ ऊपर की ओर आए।
इनसे पृथ्वी के मध्य भाग में मैन्टल और सबसे बाहरी भाग में पर्पटी का विकास हुआ।
इस प्रकार विभेदन के बाद पृथ्वी को मोटे रूप में तीन मुख्य परतों में समझा जा सकता है—
क्रोड
मैन्टल
पर्पटी
इन परतों की वास्तविक संरचना, मोटाई और गुणों का विस्तृत अध्ययन आगे पृथ्वी की आंतरिक संरचना में किया जाएगा।
पृथ्वी की रासायनिक स्तरित संरचना
विभेदन के कारण पृथ्वी में केवल भौतिक परतें ही नहीं बनीं, बल्कि तत्वों का रासायनिक वितरण भी बदल गया।
भारी धात्विक तत्व अंदर की ओर केंद्रित हुए, जबकि सिलिकॉन, ऑक्सीजन, एल्युमिनियम तथा अन्य हल्के तत्व ऊपरी परतों में अधिक पाए गए।
इसी कारण पृथ्वी का क्रोड, मैन्टल और पर्पटी रासायनिक रूप से एक-दूसरे से अलग हैं।
पृथ्वी का औसत घनत्व लगभग 5.5 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर है, लेकिन सतही चट्टानों का घनत्व इससे काफी कम होता है। इससे यह संकेत मिलता है कि पृथ्वी के अंदर अत्यधिक घनत्व वाले पदार्थ मौजूद हैं।
यही तथ्य क्रोड में भारी तत्वों की अधिकता के पक्ष में महत्वपूर्ण प्रमाणों में से एक है।
विभेदन और प्रारंभिक पर्पटी
जब भारी पदार्थ केंद्र की ओर और हल्के पदार्थ ऊपर की ओर जाने लगे, तब पृथ्वी की बाहरी सतह पर हल्के सिलिकेट पदार्थों की परत बनने लगी।
पृथ्वी के धीरे-धीरे ठंडा होने पर बाहरी भाग ठोस हुआ और प्रारंभिक पर्पटी बनी।
लेकिन प्रारंभिक पर्पटी आज की पर्पटी जैसी स्थिर नहीं थी। तीव्र ज्वालामुखीय गतिविधियों, आंतरिक ऊष्मा और बड़े उल्कापिंडों की टक्करों से इसका बार-बार पुनर्गठन हुआ।
समय के साथ पृथ्वी की अधिक स्थिर पर्पटी विकसित हुई और आगे महाद्वीपीय तथा महासागरीय पर्पटी के विकास का आधार बनी।
विभेदन और पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र
पृथ्वी के केंद्र में लोहा और निकेल जैसे धात्विक पदार्थों के एकत्र होने से धातु-समृद्ध क्रोड का निर्माण हुआ।
आज पृथ्वी के बाहरी क्रोड का बड़ा भाग द्रव अवस्था में है। इसमें मुख्यतः लौह-समृद्ध द्रव पदार्थ की गति तथा पृथ्वी के घूर्णन से विद्युत धाराएँ उत्पन्न होती हैं।
इन्हीं प्रक्रियाओं से पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है।
इस प्रकार प्रारंभिक विभेदन का प्रभाव केवल पृथ्वी की परतों तक सीमित नहीं है; इसने पृथ्वी के चुंबकीय गुणों के विकास की आधारभूत परिस्थितियाँ भी तैयार कीं।
विभेदन और ज्वालामुखीय गैसें
पृथ्वी के गर्म आंतरिक भाग में अनेक गैसें और वाष्प भी मौजूद थीं।
विभेदन और आंतरिक ऊष्मा के बाद ज्वालामुखीय गतिविधियों के माध्यम से जलवाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन तथा अन्य गैसें पृथ्वी की सतह तक पहुँचीं।
इस प्रक्रिया ने पृथ्वी के प्रारंभिक वायुमंडल के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
बाद में पृथ्वी के ठंडा होने पर जलवाष्प संघनित हुई और महासागरों के निर्माण में सहायता मिली।
इसलिए विभेदन पृथ्वी के केवल आंतरिक विकास से नहीं, बल्कि उसके बाहरी पर्यावरण के निर्माण से भी अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा था।
विभेदन का महत्व
पृथ्वी का विभेदन न हुआ होता तो आज पृथ्वी की आंतरिक संरचना बिल्कुल अलग होती।
विभेदन ने—
- भारी तत्वों को केंद्र में केंद्रित किया,
- क्रोड का निर्माण किया,
- मैन्टल और पर्पटी को विकसित किया,
- पृथ्वी के घनत्व का स्तरित वितरण बनाया,
- आंतरिक ऊष्मा के विकास को प्रभावित किया,
- चुंबकीय क्षेत्र के लिए आवश्यक धात्विक क्रोड तैयार किया,
- और आगे ज्वालामुखीय तथा विवर्तनिक प्रक्रियाओं की आधारभूत संरचना विकसित की।
इसीलिए पृथ्वी के प्रारंभिक भूवैज्ञानिक विकास में विभेदन एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य
पृथ्वी का विभेदन प्रारंभिक पृथ्वी की गर्म और आंशिक रूप से पिघली अवस्था में हुआ।
विभेदन का आधार मुख्यतः पदार्थों का घनत्व था।
लोहा और निकेल जैसे भारी तत्व पृथ्वी के केंद्र की ओर चले गए।
इनसे क्रोड के निर्माण में प्रमुख योगदान मिला।
हल्के सिलिकेट पदार्थ ऊपरी भाग में आए और उनसे मैन्टल तथा पर्पटी का विकास हुआ।
प्रारंभिक पृथ्वी के गर्म होने के प्रमुख कारण थे—
- ग्रहाणुओं की टक्कर,
- गुरुत्वीय संपीड़न,
- और रेडियोधर्मी तत्वों का क्षय।
विभेदन के परिणामस्वरूप पृथ्वी रासायनिक रूप से विभिन्न परतों में व्यवस्थित हुई।
पृथ्वी का औसत घनत्व सतही चट्टानों की तुलना में अधिक होना पृथ्वी के भीतर भारी पदार्थों की उपस्थिति का संकेत देता है।
धात्विक क्रोड का विकास पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के निर्माण के लिए महत्वपूर्ण आधार बना।
विभेदन और ज्वालामुखीय गैस-मुक्ति ने आगे पृथ्वी के वायुमंडलीय विकास को भी प्रभावित किया।
निष्कर्ष
पृथ्वी का विभेदन उसके प्रारंभिक विकास की वह महत्वपूर्ण प्रक्रिया थी जिसमें गर्म और आंशिक रूप से पिघली पृथ्वी के पदार्थ घनत्व के आधार पर अलग हो गए। भारी लोहा और निकेल केंद्र की ओर जाकर क्रोड के निर्माण का आधार बने, जबकि हल्के सिलिकेट पदार्थों से मैन्टल और पर्पटी विकसित हुई। इसी प्रक्रिया ने पृथ्वी को आज दिखाई देने वाली स्तरित आंतरिक संरचना प्रदान की और आगे चुंबकीय क्षेत्र, ज्वालामुखीय गतिविधियों तथा भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के विकास के लिए आधार तैयार किया।