1.2.3.2 रेडियोमेट्रिक आयु-निर्धारण

रेडियोमेट्रिक आयु-निर्धारण वह वैज्ञानिक विधि है जिसके द्वारा चट्टानों, खनिजों और कभी जीवित रहे पदार्थों की संख्यात्मक आयु ज्ञात की जाती है। यह रेडियोधर्मी समस्थानिकों के निश्चित दर से क्षय पर आधारित है।

सापेक्ष आयु केवल यह बताती है कि कौन-सी चट्टान पुरानी या नई है, जबकि रेडियोमेट्रिक विधि यह बताने का प्रयास करती है कि किसी नमूने की आयु लगभग कितने वर्ष है।

रेडियोधर्मी क्षय का आधार

कुछ समस्थानिक अस्थिर होते हैं और समय के साथ स्वतः दूसरे समस्थानिकों में बदलते रहते हैं।

मूल अस्थिर समस्थानिक को जनक समस्थानिक तथा उससे बनने वाले उत्पाद को संतति समस्थानिक कहा जाता है।

उदाहरण—

यूरेनियम-238 → सीसा-206

रेडियोधर्मी क्षय की दर निश्चित होती है। इसी कारण इसे प्राकृतिक भूवैज्ञानिक घड़ी की तरह उपयोग किया जा सकता है।

अर्ध-आयु

किसी रेडियोधर्मी समस्थानिक की प्रारंभिक मात्रा का आधा भाग क्षय होने में जितना समय लगता है, उसे उसकी अर्ध-आयु कहते हैं।

यदि किसी नमूने में प्रारंभिक जनक समस्थानिक का आधा शेष है, तो एक अर्ध-आयु बीत चुकी है। यदि एक-चौथाई शेष है, तो दो अर्ध-आयु बीत चुकी हैं।

हर रेडियोधर्मी समस्थानिक की अर्ध-आयु अलग होती है। इसलिए अलग-अलग आयु के पदार्थों के लिए अलग समस्थानिक उपयोग किए जाते हैं।

यूरेनियम-सीसा विधि

अत्यंत प्राचीन चट्टानों और खनिजों की आयु निर्धारित करने के लिए यूरेनियम-सीसा विधि सबसे महत्वपूर्ण तकनीकों में से एक है।

दो प्रमुख क्षय शृंखलाएँ हैं—

यूरेनियम-238 → सीसा-206

यूरेनियम-235 → सीसा-207

यूरेनियम-238 की अर्ध-आयु लगभग 4.5 अरब वर्ष है, इसलिए यह पृथ्वी जितनी पुरानी सामग्री के अध्ययन के लिए अत्यंत उपयोगी है।

जिरकॉन का महत्व

जिरकॉन रेडियोमेट्रिक आयु-निर्धारण का अत्यंत महत्वपूर्ण खनिज है। इसके क्रिस्टल बनते समय यूरेनियम इसमें प्रवेश कर सकता है, जबकि प्रारंभिक सीसा बहुत कम मात्रा में शामिल होता है। बाद में यूरेनियम के क्षय से उत्पन्न सीसा मापा जा सकता है।

ऑस्ट्रेलिया के जैक हिल्स से प्राप्त कुछ जिरकॉन लगभग 4.4 अरब वर्ष पुराने हैं और पृथ्वी की अत्यंत प्राचीन पर्पटी के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।

पोटैशियम-आर्गन विधि

पोटैशियम-40 के रेडियोधर्मी क्षय से आर्गन-40 बनता है।

पोटैशियम-40 की अर्ध-आयु लगभग 1.25 अरब वर्ष है। इस विधि का उपयोग विशेष रूप से ज्वालामुखीय चट्टानों और ज्वालामुखीय राख की परतों की आयु निर्धारित करने में किया जाता है।

आधुनिक भूविज्ञान में आर्गन-आर्गन विधि भी व्यापक रूप से प्रयुक्त होती है।

रूबिडियम-स्ट्रोंशियम विधि

रूबिडियम-87 के क्षय से स्ट्रोंशियम-87 बनता है। इसकी अर्ध-आयु बहुत लंबी है, इसलिए इसका उपयोग अत्यंत प्राचीन चट्टानों और खनिजों के अध्ययन में किया जा सकता है।

यह विशेष रूप से आग्नेय और कायांतरित चट्टानों के भूवैज्ञानिक इतिहास को समझने में उपयोगी है।

समेरियम-नियोडिमियम विधि

समेरियम-147 के क्षय से नियोडिमियम-143 बनता है। इस विधि का उपयोग प्राचीन चट्टानों, पृथ्वी की पर्पटी के विकास तथा मैन्टल-पर्पटी विभेदन के अध्ययन में किया जाता है।

कार्बन-14 आयु-निर्धारण

कार्बन-14 का उपयोग मुख्यतः कभी जीवित रहे कार्बनिक पदार्थों की आयु निर्धारित करने में किया जाता है।

जीवित जीव वातावरण के साथ लगातार कार्बन का आदान-प्रदान करते रहते हैं। मृत्यु के बाद यह आदान-प्रदान बंद हो जाता है और कार्बन-14 का रेडियोधर्मी क्षय जारी रहता है।

कार्बन-14 की अर्ध-आयु लगभग 5,730 वर्ष है।

इसका उपयोग मुख्यतः अपेक्षाकृत नवीन कार्बनिक नमूनों—जैसे लकड़ी, हड्डी, बीज, वस्त्र, चारकोल और अन्य जैविक अवशेषों—के लिए किया जाता है। सामान्यतः लगभग 50,000 वर्ष तक के नमूनों के लिए यह सबसे उपयोगी है।

महत्वपूर्ण परीक्षा-फँद

कार्बन-14 से पृथ्वी की आयु निर्धारित नहीं की जाती।

पृथ्वी लगभग 4.54 अरब वर्ष पुरानी है, जबकि कार्बन-14 की अर्ध-आयु केवल 5,730 वर्ष है। अत्यंत प्राचीन चट्टानों के लिए यूरेनियम-सीसा जैसी लंबी अर्ध-आयु वाली विधियाँ अधिक उपयुक्त हैं।

कौन-सी विधि कहाँ उपयोगी है?

विधि प्रमुख उपयोग
कार्बन-14 अपेक्षाकृत नवीन कार्बनिक अवशेष
पोटैशियम-आर्गन ज्वालामुखीय चट्टानें
आर्गन-आर्गन ज्वालामुखीय घटनाओं का अधिक सटीक आयु-निर्धारण
यूरेनियम-सीसा अत्यंत प्राचीन चट्टानें और जिरकॉन
रूबिडियम-स्ट्रोंशियम प्राचीन आग्नेय और कायांतरित चट्टानें
समेरियम-नियोडिमियम पर्पटी और मैन्टल के विकास का अध्ययन

बंद तंत्र की आवश्यकता

रेडियोमेट्रिक डेटिंग तभी सबसे विश्वसनीय होती है जब संबंधित खनिज या चट्टान एक बंद तंत्र की तरह व्यवहार करे।

यदि बाद में अत्यधिक ताप, कायांतरण, द्रवों का प्रवेश या अपक्षय जैसी प्रक्रियाएँ समस्थानिकों के अनुपात को बदल दें, तो प्राप्त आयु प्रभावित हो सकती है। इसलिए वैज्ञानिक नमूने के भूवैज्ञानिक इतिहास को भी ध्यान में रखते हैं।

रेडियोमेट्रिक आयु किस घटना को दर्शाती है?

प्राप्त आयु हमेशा चट्टान के पहली बार बनने की आयु ही नहीं बताती। किसी आग्नेय चट्टान में यह खनिज के क्रिस्टलीकरण की आयु हो सकती है, जबकि कायांतरित चट्टान में कुछ समस्थानिक घड़ियाँ कायांतरण के दौरान पुनः निर्धारित हो सकती हैं।

इसलिए रेडियोमेट्रिक आयु की व्याख्या नमूने के भूवैज्ञानिक इतिहास के संदर्भ में की जाती है।

पृथ्वी की आयु और उल्कापिंड

पृथ्वी की प्रारंभिक पर्पटी का बड़ा भाग प्लेट विवर्तनिकी और चट्टान चक्र से बदल चुका है। इसलिए पृथ्वी की सबसे पुरानी चट्टान स्वयं पृथ्वी जितनी पुरानी नहीं है।

पृथ्वी की आयु निर्धारित करने में उल्कापिंडों का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। प्रारंभिक सौरमंडल से बने अनेक उल्कापिंड लगभग 4.56 अरब वर्ष पुराने हैं।

प्राचीन पृथ्वी के खनिजों, उल्कापिंडों और चंद्र नमूनों के रेडियोमेट्रिक अध्ययन को मिलाकर पृथ्वी की स्वीकृत आयु लगभग 4.54 अरब वर्ष निर्धारित की गई है।

क्लेयर पैटरसन का योगदान

अमेरिकी भू-रसायनविद् क्लेयर पैटरसन ने सीसा समस्थानिकों और उल्कापिंडों का अध्ययन करके पृथ्वी की आधुनिक स्वीकृत आयु स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

1956 में प्रकाशित उनके अध्ययन ने पृथ्वी की आयु लगभग 4.55 अरब वर्ष के आसपास निर्धारित की। बाद के अधिक सटीक अध्ययनों से वर्तमान स्वीकृत मान लगभग 4.54 अरब वर्ष है।

रेडियोमेट्रिक आयु-निर्धारण का महत्व

इस तकनीक की सहायता से वैज्ञानिक—

समसामयिक अद्यतन — 2026

NASA का OSIRIS-REx मिशन 2023 में क्षुद्रग्रह बेन्नू के नमूने पृथ्वी पर लाया था। 2026 में इन नमूनों पर हाइड्रोजन, कार्बन और नाइट्रोजन की समस्थानिक संरचना सहित कई अध्ययन प्रकाशित हुए।

इन अध्ययनों का उद्देश्य प्रारंभिक सौरमंडल में जल, वाष्पशील पदार्थों और कार्बन-समृद्ध पदार्थों के स्रोतों को समझना है। यह दिखाता है कि समस्थानिक विश्लेषण केवल चट्टानों की आयु निर्धारित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रहों के निर्माण और पृथ्वी पर जल तथा जीवन-संबंधी पदार्थों की उत्पत्ति को समझने में भी महत्वपूर्ण है।

सत्यापित UPSC पिछले वर्षों के प्रश्न

UPSC प्रारंभिक परीक्षा, 1993

प्रश्न:

लकड़ी, हड्डियों और सीप जैसे पुरातात्विक नमूनों की आयु निर्धारित करने के लिए किसका उपयोग किया जाता है?

सही उत्तर:

कार्बन-14

यह रेडियोकार्बन डेटिंग का प्रत्यक्ष प्रश्न है।

सत्यापित BPSC पिछले वर्षों के प्रश्न

39वीं BPSC प्रारंभिक परीक्षा, 1994

प्रश्न:

सबसे पुराने शैल समूहों की आयु का अनुमान किस विधि से किया जाता है?

सही उत्तर:

यूरेनियम-सीसा विधि।

यह इस उपविषय का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष PYQ है।

PYQ से परीक्षा-प्रवृत्ति

UPSC और BPSC के वास्तविक प्रश्नों से स्पष्ट है कि परीक्षा विशेष रूप से यह पूछ सकती है कि कौन-सी डेटिंग विधि किस प्रकार के नमूने के लिए उपयुक्त है।

विशेष रूप से याद रखें—

कार्बन-14 → कार्बनिक अवशेष

यूरेनियम-सीसा → अत्यंत प्राचीन चट्टानें

पोटैशियम-आर्गन → ज्वालामुखीय चट्टानें

अंतिम परीक्षा-सार

रेडियोमेट्रिक डेटिंग रेडियोधर्मी क्षय पर आधारित है।

अर्ध-आयु किसी रेडियोधर्मी समस्थानिक की आधी मात्रा के क्षय का समय है।

कार्बन-14 की अर्ध-आयु लगभग 5,730 वर्ष है।

कार्बन-14 मुख्यतः अपेक्षाकृत नवीन कार्बनिक अवशेषों के लिए उपयोगी है।

कार्बन-14 से पृथ्वी की आयु निर्धारित नहीं की जाती।

यूरेनियम-सीसा विधि अत्यंत प्राचीन चट्टानों और जिरकॉन के लिए महत्वपूर्ण है।

यूरेनियम-238 की अर्ध-आयु लगभग 4.5 अरब वर्ष है।

पोटैशियम-आर्गन विधि ज्वालामुखीय चट्टानों के लिए उपयोगी है।

जिरकॉन पृथ्वी के प्रारंभिक इतिहास के अध्ययन का महत्वपूर्ण खनिज है।

उल्कापिंडों के अध्ययन ने पृथ्वी की लगभग 4.54 अरब वर्ष आयु निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

निष्कर्ष

रेडियोमेट्रिक आयु-निर्धारण ने भूविज्ञान को वास्तविक समय-माप देने में क्रांतिकारी भूमिका निभाई। रेडियोधर्मी समस्थानिकों और उनकी निश्चित अर्ध-आयु के आधार पर वैज्ञानिक चट्टानों, खनिजों, जीवाश्म-संबंधित परतों और सौरमंडलीय पदार्थों की संख्यात्मक आयु निर्धारित कर सकते हैं। इसी तकनीक से पृथ्वी की आयु लगभग 4.54 अरब वर्ष स्थापित की गई और पृथ्वी के लंबे भूवैज्ञानिक इतिहास को सटीक समयरेखा में व्यवस्थित करना संभव हुआ।