1.2.3.1 सापेक्ष आयु
सापेक्ष आयु-निर्धारण वह विधि है जिसके द्वारा यह पता लगाया जाता है कि कोई चट्टान, परत, जीवाश्म या भूवैज्ञानिक घटना दूसरी की तुलना में पुरानी है या नई। इसमें आयु वर्षों में नहीं बताई जाती।
इसका मुख्य उद्देश्य भूवैज्ञानिक घटनाओं का सही क्रम स्थापित करना है। रेडियोमेट्रिक विधियों के विकास से पहले पृथ्वी के इतिहास का अधिकांश प्रारंभिक कालक्रम इन्हीं सिद्धांतों से बनाया गया था।
अध्यारोपण का सिद्धांत
अविक्षुब्ध अवसादी चट्टानों में सामान्यतः सबसे पुरानी परत नीचे और क्रमशः नई परतें ऊपर होती हैं।
अर्थात—
नीचे की परत → पुरानी
ऊपर की परत → नई
इसे अध्यारोपण का सिद्धांत कहा जाता है।
यह सिद्धांत तभी सीधे लागू होता है जब चट्टानी परतें बाद में उलटी, तीव्र रूप से मुड़ी या बड़े भ्रंश से विस्थापित न हुई हों।
मूल क्षैतिजता का सिद्धांत
अवसाद सामान्यतः गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में लगभग क्षैतिज परतों के रूप में जमा होते हैं।
यदि आज कोई अवसादी परत मुड़ी हुई, झुकी हुई या लगभग खड़ी दिखाई देती है, तो इसका अर्थ है कि निक्षेपण के बाद उस पर विवर्तनिक बलों ने कार्य किया।
इस प्रकार—
पहले निक्षेपण → बाद में मोड़ या झुकाव
का क्रम स्थापित किया जा सकता है।
पार्श्व निरंतरता का सिद्धांत
एक ही अवसादी परत मूल रूप से पार्श्व दिशा में दूर तक फैली हो सकती है।
यदि बाद में नदी, घाटी या अपरदन ने उसे काट दिया हो, तो आज अलग-अलग दिखाई देने वाले दोनों भाग मूलतः एक ही परत के हिस्से हो सकते हैं।
यह सिद्धांत अलग-अलग स्थानों की चट्टानी परतों के सहसंबंध में उपयोगी है।
क्रॉस-कटिंग संबंध
यदि कोई भ्रंश, डाइक, सिल या अन्य आग्नेय अंत:स्थापन किसी पहले से मौजूद चट्टान को काटता है, तो काटने वाली संरचना उस चट्टान से नई होती है।
उदाहरण—
यदि एक आग्नेय डाइक तीन अवसादी परतों को काटती है, तो तीनों परतें डाइक से पुरानी हैं।
इसी प्रकार यदि कोई भ्रंश कई चट्टानी परतों को विस्थापित करता है, तो भ्रंश की घटना उन परतों के बनने के बाद हुई।
अंत:समावेशन का सिद्धांत
यदि किसी चट्टान के भीतर दूसरी चट्टान के टुकड़े पाए जाते हैं, तो वे टुकड़े उस चट्टान से पुराने होते हैं जिसमें वे सम्मिलित हैं।
अर्थात—
अंत:समाविष्ट टुकड़ा → पुराना
उसे समाहित करने वाली चट्टान → नई
यह सिद्धांत आग्नेय और अवसादी दोनों प्रकार की चट्टानों के इतिहास को समझने में उपयोगी है।
जीवाश्म अनुक्रम का सिद्धांत
पृथ्वी के इतिहास में विभिन्न जीव अलग-अलग समय पर उत्पन्न हुए और विलुप्त हुए। इसलिए विशिष्ट जीवाश्मों की उपस्थिति से चट्टानों की सापेक्ष आयु का अनुमान लगाया जा सकता है।
कुछ जीवाश्म विशेष रूप से उपयोगी होते हैं क्योंकि वे—
- कम भूवैज्ञानिक समय तक जीवित रहे,
- व्यापक भौगोलिक क्षेत्र में फैले थे,
- आसानी से पहचाने जा सकते हैं।
ऐसे जीवाश्मों को सूचक जीवाश्म कहा जाता है।
सूचक जीवाश्म दूर-दूर स्थित चट्टानी परतों के सहसंबंध और सापेक्ष आयु निर्धारित करने में महत्वपूर्ण हैं।
असंगति
भूवैज्ञानिक रिकॉर्ड हमेशा लगातार नहीं मिलता। कभी निक्षेपण रुक जाता है या पहले से बनी चट्टानों का अपरदन हो जाता है और बाद में नई परतें जमा होती हैं।
इस प्रकार भूवैज्ञानिक रिकॉर्ड में उत्पन्न समय-अंतराल को असंगति से पहचाना जा सकता है।
असंगति यह दर्शाती है कि उपलब्ध चट्टानी अनुक्रम के बीच कुछ भूवैज्ञानिक समय का रिकॉर्ड अनुपस्थित है।
इसलिए केवल परतों की मोटाई देखकर यह नहीं माना जा सकता कि पृथ्वी का पूरा इतिहास लगातार सुरक्षित है।
प्रमुख प्रकार की असंगतियाँ
कोणीय असंगति में पुरानी झुकी या मुड़ी परतों के ऊपर अपेक्षाकृत नई परतें अलग कोण पर जमा होती हैं।
डिसकन्फॉर्मिटी में ऊपर और नीचे की अवसादी परतें लगभग समानांतर होती हैं, लेकिन उनके बीच अपरदन या गैर-निक्षेपण का समय-अंतराल होता है।
नॉनकन्फॉर्मिटी में पुरानी आग्नेय या कायांतरित चट्टानों के ऊपर नई अवसादी चट्टानें पाई जाती हैं।
सापेक्ष आयु और जीवाश्म
जीवाश्म केवल जैव-विकास के प्रमाण नहीं हैं; वे चट्टानों का कालक्रम बनाने में भी उपयोगी हैं।
यदि दो दूरस्थ क्षेत्रों की चट्टानों में समान सूचक जीवाश्म पाए जाएँ, तो उन्हें लगभग समान भूवैज्ञानिक समय से जोड़ा जा सकता है।
इसी आधार पर विभिन्न महाद्वीपों की चट्टानी परतों का भी सहसंबंध किया गया।
इसने भूवैज्ञानिक समय मापनी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सापेक्ष आयु की सीमाएँ
सापेक्ष आयु यह नहीं बताती कि किसी चट्टान की आयु ठीक कितने वर्ष है।
उदाहरण के लिए यह कहा जा सकता है कि परत A, परत B से पुरानी है, लेकिन केवल सापेक्ष विधि से यह नहीं बताया जा सकता कि A की आयु 200 मिलियन वर्ष है या 300 मिलियन वर्ष।
इसके अतिरिक्त—
- मोड़ और भ्रंशन परतों का क्रम बदल सकते हैं,
- कायांतरण मूल विशेषताओं को नष्ट कर सकता है,
- अपरदन भूवैज्ञानिक रिकॉर्ड का भाग हटा सकता है,
- जीवाश्म सभी प्रकार की चट्टानों में नहीं मिलते।
इसलिए आधुनिक भूविज्ञान में सापेक्ष आयु को रेडियोमेट्रिक आयु-निर्धारण के साथ मिलाकर उपयोग किया जाता है।
सापेक्ष और रेडियोमेट्रिक आयु में अंतर
| आधार | सापेक्ष आयु | रेडियोमेट्रिक आयु |
|---|---|---|
| परिणाम | पुराना-नया क्रम | संख्यात्मक आयु |
| मुख्य आधार | चट्टानी संबंध, जीवाश्म | रेडियोधर्मी क्षय |
| आयु वर्षों में | नहीं | हाँ |
| प्रमुख उपयोग | घटनाओं का क्रम | वास्तविक आयु निर्धारण |
| उदाहरण | अध्यारोपण | यूरेनियम-सीसा |
दोनों विधियाँ प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक हैं।
परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य
अविक्षुब्ध अवसादी अनुक्रम में सबसे पुरानी परत नीचे होती है।
किसी चट्टान को काटने वाली संरचना उस चट्टान से नई होती है।
किसी चट्टान में समाहित दूसरी चट्टान के टुकड़े उससे पुराने होते हैं।
सूचक जीवाश्म चट्टानी परतों के सहसंबंध में महत्वपूर्ण हैं।
असंगति भूवैज्ञानिक रिकॉर्ड में समय-अंतराल का संकेत देती है।
सापेक्ष आयु किसी घटना की वास्तविक आयु वर्षों में नहीं बताती।
रेडियोमेट्रिक आयु-निर्धारण सापेक्ष कालक्रम को संख्यात्मक आयु से जोड़ता है।
UPSC/BPSC पिछले वर्षों के प्रश्न
इस सूक्ष्म उपविषय “सापेक्ष आयु-निर्धारण” पर UPSC सिविल सेवा सामान्य अध्ययन और BPSC संयुक्त प्रारंभिक/मुख्य परीक्षा का ऐसा प्रत्यक्ष प्रश्न सत्यापित नहीं मिला जिसे बिना संदेह PYQ के रूप में जोड़ा जा सके।
इसलिए यहाँ कोई अनुमानित या स्वयं-निर्मित प्रश्न PYQ के नाम से नहीं जोड़ा गया है।
ध्यान रहे कि UPSC के Geology Optional में सापेक्ष डेटिंग और भूवैज्ञानिक डेटिंग पर प्रश्न पूछे गए हैं, लेकिन वे सामान्य अध्ययन के PYQ नहीं हैं; इसलिए इस UPSC/BPSC भूगोल श्रृंखला में उन्हें प्रत्यक्ष PYQ के रूप में शामिल नहीं किया गया है।
निष्कर्ष
सापेक्ष आयु-निर्धारण पृथ्वी के भूवैज्ञानिक इतिहास का क्रम स्थापित करने की आधारभूत विधि है। अध्यारोपण, मूल क्षैतिजता, पार्श्व निरंतरता, क्रॉस-कटिंग संबंध, अंत:समावेशन और जीवाश्म अनुक्रम जैसे सिद्धांतों की सहायता से यह निर्धारित किया जाता है कि कौन-सी चट्टान या घटना पहले और कौन-सी बाद में हुई। आधुनिक भूविज्ञान में इन सिद्धांतों को रेडियोमेट्रिक आयु-निर्धारण के साथ मिलाकर पृथ्वी के इतिहास की अधिक सटीक समयरेखा तैयार की जाती है।