1.3.2 आंतरिक परतें

पृथ्वी एक समान ठोस गोला नहीं है। भूकंपीय तरंगों, गुरुत्व, चुंबकीय क्षेत्र, घनत्व और उच्च-दाब प्रयोगों से स्पष्ट हुआ है कि पृथ्वी कई अलग-अलग परतों से बनी है।

पृथ्वी की आंतरिक संरचना को दो मुख्य आधारों पर समझा जाता है—

रासायनिक संरचना के आधार पर
भूपर्पटी → मैंटल → क्रोड

यांत्रिक गुणों के आधार पर
स्थलमंडल → दुर्बलतामंडल → गहरा मैंटल → बाह्य क्रोड → आंतरिक क्रोड

दोनों वर्गीकरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। पहला बताता है कि पृथ्वी किस प्रकार के पदार्थों से बनी है, जबकि दूसरा बताता है कि वे पदार्थ दबाव और तापमान के प्रभाव में किस प्रकार व्यवहार करते हैं।

भूपर्पटी

भूपर्पटी पृथ्वी की सबसे बाहरी और सबसे पतली ठोस परत है।

यह दो प्रमुख प्रकार की होती है—

महाद्वीपीय पर्पटी

महाद्वीपीय पर्पटी सामान्यतः महासागरीय पर्पटी से मोटी और कम घनी होती है।

इसकी औसत मोटाई लगभग 30–40 किमी है।

हिमालय जैसे बड़े पर्वतीय क्षेत्रों के नीचे यह लगभग 70 किमी या उससे अधिक तक मोटी हो सकती है।

इसमें ग्रेनाइटिक और अन्य सिलिका-समृद्ध चट्टानों का महत्व अधिक होता है।

पुरानी परीक्षा-शब्दावली में महाद्वीपीय ऊपरी पर्पटी को सियाल कहा जाता था—

Si = Silica

Al = Aluminium

लेकिन आधुनिक भूविज्ञान में पूरी महाद्वीपीय पर्पटी को केवल सियाल मानना अत्यधिक सरल व्याख्या है।

महासागरीय पर्पटी

महासागरीय पर्पटी अपेक्षाकृत पतली होती है।

इसकी सामान्य मोटाई लगभग 5–10 किमी है।

यह मुख्यतः बेसाल्ट और गैब्रो जैसी माफिक चट्टानों से बनी होती है और महाद्वीपीय पर्पटी से अधिक घनी होती है।

पुरानी परीक्षा-शब्दावली में इसे सिलिका और मैग्नीशियम से जोड़कर सीमा कहा जाता था।

महासागरीय पर्पटी का निरंतर निर्माण मध्य-महासागरीय कटक पर और विनाश सबडक्शन क्षेत्रों में होता रहता है।

इसी कारण यह सामान्यतः महाद्वीपीय पर्पटी की तुलना में बहुत कम पुरानी होती है।

मोहो असांतत्य

भूपर्पटी और मैंटल के बीच की सीमा को मोहोरोविचिक असांतत्य, संक्षेप में मोहो, कहा जाता है।

इस सीमा पर भूकंपीय तरंगों के वेग में अचानक वृद्धि होती है।

इससे पर्पटी और मैंटल की संरचना में स्पष्ट अंतर का पता चलता है।

मैंटल

मोहो के नीचे से लगभग 2,900 किमी की गहराई तक का क्षेत्र मैंटल कहलाता है।

यह पृथ्वी के आयतन का सबसे बड़ा भाग है।

मैंटल मुख्यतः लौह और मैग्नीशियम से समृद्ध सिलिकेट खनिजों से बना है।

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि—

मैंटल पूरी तरह पिघला हुआ नहीं है।

इसका अधिकांश भाग ठोस है, लेकिन उच्च ताप और दबाव की दशाओं में भूवैज्ञानिक समयमान पर यह बहुत धीरे-धीरे प्रवाहित कर सकता है।

यही धीमा प्रवाह प्लेट विवर्तनिकी और आंतरिक संवहन से जुड़ा है।

ऊपरी मैंटल

ऊपरी मैंटल मोहो के नीचे से लगभग 660 किमी तक माना जाता है।

इसके ऊपरी कठोर भाग का एक हिस्सा भूपर्पटी के साथ मिलकर स्थलमंडल बनाता है।

इसके नीचे अपेक्षाकृत कमजोर और नम्य क्षेत्र दुर्बलतामंडल है।

संक्रमण क्षेत्र

लगभग 410 से 660 किमी गहराई के बीच का भाग मैंटल संक्रमण क्षेत्र कहलाता है।

इस क्षेत्र में बढ़ते दबाव के कारण खनिजों की क्रिस्टलीय संरचना बदलती है।

इन खनिजीय अवस्था-परिवर्तनों के कारण भूकंपीय तरंगों के वेग में भी परिवर्तन दिखाई देता है।

यह क्षेत्र ऊपरी और निचले मैंटल के बीच पदार्थ और ताप के आदान-प्रदान को समझने में महत्वपूर्ण है।

निचला मैंटल

लगभग 660 से 2,900 किमी गहराई तक निचला मैंटल फैला है।

यह अत्यधिक दबाव और तापमान वाला क्षेत्र है।

यह ठोस है, लेकिन अत्यंत लंबे समय में इसमें भी धीमा संवहन संभव है।

निचले मैंटल का प्रमुख खनिजीय चरण ब्रिजमैनाइट माना जाता है, जो पृथ्वी के सबसे अधिक मात्रा वाले खनिजों में से एक है।

D'' क्षेत्र

क्रोड-मैंटल सीमा के ठीक ऊपर निचले मैंटल के अंतिम कुछ सौ किलोमीटर को प्रायः D'' परत कहा जाता है।

यह क्षेत्र अत्यंत जटिल है।

यहाँ—

मिल सकती हैं।

यह पृथ्वी की गहरी गतिशीलता का महत्वपूर्ण क्षेत्र है।

गुटेनबर्ग असांतत्य

लगभग 2,900 किमी गहराई पर मैंटल और बाह्य क्रोड के बीच की सीमा को गुटेनबर्ग असांतत्य कहा जाता है।

यहाँ S तरंगें समाप्त हो जाती हैं और P तरंगों के वेग तथा दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन होता है।

यह बाह्य क्रोड के द्रव होने का प्रमुख प्रमाण है।

बाह्य क्रोड

बाह्य क्रोड लगभग 2,900 किमी से 5,150 किमी गहराई तक फैला है।

यह मुख्यतः लौह-निकेल तथा कुछ हल्के तत्वों से बना द्रव क्षेत्र है।

बाह्य क्रोड द्रव क्यों है?

इस गहराई पर तापमान इतना अधिक है कि यहाँ लौह-समृद्ध पदार्थ द्रव अवस्था में रहता है।

S तरंगें बाह्य क्रोड से नहीं गुजर सकतीं।

यह इसके द्रव होने का सबसे महत्वपूर्ण भूकंपीय प्रमाण है।

भू-चुंबकीय क्षेत्र

बाह्य क्रोड में विद्युत-चालक द्रव का संवहन और पृथ्वी का घूर्णन मिलकर भू-डायनेमो उत्पन्न करते हैं।

इसी प्रक्रिया से पृथ्वी का मुख्य चुंबकीय क्षेत्र बनता है।

इसलिए बाह्य क्रोड केवल पृथ्वी की एक परत नहीं, बल्कि पृथ्वी के चुंबकीय सुरक्षा कवच का मूल स्रोत भी है।

लेहमैन असांतत्य

लगभग 5,150 किमी गहराई पर बाह्य क्रोड और आंतरिक क्रोड के बीच सीमा को लेहमैन असांतत्य कहा जाता है।

भूकंपीय तरंगों के व्यवहार से यह स्पष्ट हुआ कि इस सीमा के अंदर पदार्थ फिर से ठोस अवस्था में है।

आंतरिक क्रोड

आंतरिक क्रोड लगभग 5,150 किमी से पृथ्वी के केंद्र 6,371 किमी तक फैला है।

यह मुख्यतः लौह-निकेल से बना ठोस क्षेत्र है।

अत्यधिक तापमान के बावजूद ठोस क्यों?

आंतरिक क्रोड का तापमान लगभग सूर्य की सतह के तापमान के क्रम का माना जाता है, फिर भी वह ठोस है।

कारण है—

अत्यधिक दबाव।

बहुत अधिक दबाव लोहे के गलनांक को बढ़ा देता है, इसलिए अत्यधिक तापमान के बावजूद पदार्थ ठोस बना रहता है।

आंतरिक क्रोड का निर्माण

पृथ्वी धीरे-धीरे ठंडी हो रही है।

जब द्रव बाह्य क्रोड का कुछ भाग ठंडा होकर जमता है तो ठोस आंतरिक क्रोड का आकार धीरे-धीरे बढ़ता है।

इस क्रिस्टलीकरण के दौरान मुक्त होने वाली ऊष्मा और हल्के तत्वों का पृथक्करण बाह्य क्रोड के संवहन को ऊर्जा देने में योगदान करते हैं।

इस प्रकार आंतरिक क्रोड का विकास और पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र परस्पर जुड़े हुए हैं।

स्थलमंडल

पृथ्वी की कठोर बाहरी यांत्रिक परत को स्थलमंडल कहा जाता है।

इसमें—

शामिल होता है।

स्थलमंडल की मोटाई स्थान के अनुसार बदलती है।

महासागरों के नीचे यह सामान्यतः पतला और पुराने महाद्वीपीय क्षेत्रों के नीचे अधिक मोटा हो सकता है।

यही स्थलमंडल कई विवर्तनिक प्लेटों में विभाजित है।

दुर्बलतामंडल

स्थलमंडल के नीचे ऊपरी मैंटल का अपेक्षाकृत कमजोर और नम्य भाग दुर्बलतामंडल कहलाता है।

इसे पूरी तरह पिघली हुई परत समझना गलत है।

यह मुख्यतः ठोस पदार्थ से बनी है, लेकिन उच्च तापमान के कारण इसकी यांत्रिक शक्ति कम होती है और यह लंबे समय में धीरे-धीरे प्रवाहित कर सकती है।

इसके कुछ भागों में बहुत कम मात्रा में आंशिक पिघलाव भी हो सकता है।

दुर्बलतामंडल का संबंध भूकंपीय निम्न-वेग क्षेत्र से भी जोड़ा जाता है।

प्लेट विवर्तनिकी में भूमिका

कठोर स्थलमंडलीय प्लेटें अपेक्षाकृत नम्य दुर्बलतामंडल के ऊपर गति करती हैं।

लेकिन यह कहना कि प्लेटें केवल “पिघले दुर्बलतामंडल पर तैरती हैं” अत्यधिक सरल व्याख्या है।

प्लेट गति में—

जैसी अनेक प्रक्रियाएँ मिलकर काम करती हैं।

रासायनिक और यांत्रिक परतों का संबंध

रासायनिक परत यांत्रिक व्यवहार
भूपर्पटी + ऊपरी मैंटल का कठोर भाग स्थलमंडल
ऊपरी मैंटल का कमजोर भाग दुर्बलतामंडल
गहरा मैंटल ठोस लेकिन दीर्घकाल में प्रवाही
बाह्य क्रोड द्रव
आंतरिक क्रोड ठोस

गहराई के साथ प्रमुख परिवर्तन

पृथ्वी के भीतर गहराई बढ़ने पर सामान्यतः—

दबाव बढ़ता है।

तापमान बढ़ता है।

औसत घनत्व बढ़ता है।

लेकिन पदार्थ की अवस्था केवल तापमान से निर्धारित नहीं होती।

उदाहरण—

बाह्य क्रोड द्रव है, जबकि उससे अधिक गर्म आंतरिक क्रोड अत्यधिक दबाव के कारण ठोस है।

पृथ्वी की प्रमुख परतें — त्वरित सारणी

परत लगभग गहराई प्रमुख अवस्था/विशेषता
महाद्वीपीय पर्पटी सतह से औसतन 30–40 किमी ठोस, अपेक्षाकृत हल्की
महासागरीय पर्पटी सतह से लगभग 5–10 किमी ठोस, अधिक घनी
ऊपरी मैंटल मोहो से 660 किमी मुख्यतः ठोस
संक्रमण क्षेत्र 410–660 किमी खनिजीय अवस्था परिवर्तन
निचला मैंटल 660–2,900 किमी ठोस, धीमा प्रवाह
बाह्य क्रोड 2,900–5,150 किमी द्रव
आंतरिक क्रोड 5,150–6,371 किमी ठोस

2026 का वैज्ञानिक अद्यतन

पृथ्वी की आंतरिक परतों को आज स्थिर और पूर्णतः सरल गोलाकार परतों की तरह नहीं देखा जाता। आधुनिक भूकंपीय तथा कंप्यूटर मॉडल इनके भीतर जटिल गतिशील संरचनाएँ दिखाते हैं।

क्रोड-मैंटल सीमा पर ऊष्मा प्रवाह

जून 2026 में Nature Geoscience में प्रकाशित एक अध्ययन ने संकेत दिया कि क्रोड-मैंटल सीमा पर ऊष्मा का प्रवाह हर स्थान पर समान दिशा और मात्रा में नहीं हो सकता।

विशेष रूप से अफ्रीका और प्रशांत के नीचे स्थित बड़े निम्न-कतरनी-वेग क्षेत्रों के नीचे कुछ परिस्थितियों में ऊष्मा मैंटल से क्रोड की ओर भी जा सकती है।

यह निष्कर्ष अभी विकसित हो रहे गहरे-पृथ्वी मॉडलों का हिस्सा है और दर्शाता है कि क्रोड और मैंटल के बीच ऊष्मीय अंतःक्रिया पहले माने गए सरल मॉडल से अधिक जटिल हो सकती है।

आंतरिक क्रोड की अनैसोट्रॉपी

मार्च 2026 के एक अन्य अध्ययन ने आंतरिक क्रोड में भूकंपीय तरंगों के दिशानुसार अलग-अलग वेग को लौह क्रिस्टलों के तापीय और संरचनात्मक गुणों से जोड़ने का मॉडल प्रस्तुत किया।

इससे यह समझने में सहायता मिलती है कि आंतरिक क्रोड केवल ठोस लौह गोला नहीं, बल्कि उसमें क्रिस्टलीय व्यवस्था और दिशात्मक संरचना भी महत्वपूर्ण है।

परीक्षा-योग्य निष्कर्ष

पृथ्वी की मुख्य परतें स्थापित हैं, लेकिन प्रत्येक परत के भीतर की सूक्ष्म संरचना और क्रोड-मैंटल अंतःक्रिया पर वैज्ञानिक शोध लगातार जारी है।

सत्यापित UPSC Prelims PYQ

UPSC सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा, 2009

प्रश्न:

“पृथ्वी की संरचना में मैंटल के नीचे स्थित क्रोड मुख्यतः निम्नलिखित में से किससे बना है?”

विकल्पों में एल्युमिनियम, क्रोमियम, लौह और सिलिकॉन दिए गए थे।

सही उत्तर: लौह।

यह पृथ्वी के क्रोड की संरचना पर प्रत्यक्ष UPSC PYQ है।


UPSC सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा, 2023

भूकंपीय तरंगों के संबंध में कथनों में पूछा गया था कि—

  1. P तरंगें S तरंगों से पहले दर्ज होती हैं।
  2. P और S तरंगों में कणों का कंपन अलग-अलग दिशा में होता है।

सही उत्तर: दोनों कथन सही।

यह प्रश्न पृथ्वी की परतों की प्रकृति समझने वाले भूकंपीय प्रमाण से सीधे जुड़ा है।

सत्यापित UPSC Mains PYQ

UPSC Geography Optional, 2005

प्रश्न:

“पृथ्वी के आंतरिक भाग के अध्ययन में भूकंपीय तरंगों की भूमिका पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।”


UPSC Geography Optional, 2010

प्रश्न:

“पृथ्वी के आंतरिक भाग की संरचना निर्धारित करने में भूकंपीय अध्ययन की प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए।”

ये दोनों प्रश्न पृथ्वी की आंतरिक परतों और उनकी पहचान की पद्धति से सीधे संबंधित हैं।

UPSC GS Mains

इस समेकित उपविषय “भूपर्पटी–मैंटल–क्रोड की आंतरिक परतें” पर सामान्य अध्ययन मुख्य परीक्षा में प्रत्यक्ष सत्यापित प्रश्न नहीं मिला।

इसलिए कोई अभ्यास प्रश्न PYQ के नाम से नहीं जोड़ा गया है।

सत्यापित BPSC Prelims PYQ

BPSC संयुक्त प्रतियोगिता प्रारंभिक परीक्षा के उपलब्ध विश्वसनीय प्रश्नपत्रों में इस समेकित उपविषय पर ऐसा प्रत्यक्ष, वर्ष-सहित सत्यापित प्रश्न नहीं मिला जिसे बिना संदेह शामिल किया जा सके।

इसलिए किसी कोचिंग टेस्ट या अन्य परीक्षा के प्रश्न को BPSC CCE PYQ के रूप में नहीं दिया गया है।

सत्यापित BPSC Mains PYQ

BPSC सामान्य अध्ययन मुख्य परीक्षा में इस समेकित उपविषय पर प्रत्यक्ष सत्यापित प्रश्न नहीं मिला।

BPSC की वैकल्पिक अथवा अन्य परीक्षाओं के प्रश्नों को GS Mains के नाम से प्रस्तुत नहीं किया गया है।

Prelims के लिए अंतिम तथ्य

भूपर्पटी पृथ्वी की सबसे पतली बाहरी परत है।

महासागरीय पर्पटी महाद्वीपीय पर्पटी से पतली और अधिक घनी होती है।

मोहो भूपर्पटी और मैंटल की सीमा है।

मैंटल लगभग 2,900 किमी गहराई तक फैला है।

मैंटल का अधिकांश भाग ठोस है; इसे पूरी तरह पिघला हुआ नहीं मानना चाहिए।

410–660 किमी क्षेत्र मैंटल संक्रमण क्षेत्र है।

गुटेनबर्ग असांतत्य मैंटल और बाह्य क्रोड की सीमा है।

बाह्य क्रोड द्रव है।

S तरंगें बाह्य क्रोड से नहीं गुजरतीं।

पृथ्वी का मुख्य चुंबकीय क्षेत्र बाह्य क्रोड के भू-डायनेमो से जुड़ा है।

लेहमैन असांतत्य बाह्य और आंतरिक क्रोड के बीच है।

आंतरिक क्रोड ठोस है।

स्थलमंडल = भूपर्पटी + ऊपरी मैंटल का कठोर भाग।

दुर्बलतामंडल मुख्यतः ठोस लेकिन यांत्रिक रूप से कमजोर और दीर्घकाल में प्रवाही है।

Mains के लिए उत्तर-ढाँचा

यदि प्रश्न हो—

“पृथ्वी की आंतरिक संरचना का वर्णन कीजिए तथा उसके निर्धारण में भूकंपीय प्रमाणों की भूमिका स्पष्ट कीजिए।”

उत्तर का क्रम रखें—

भूमिका — प्रत्यक्ष पहुँच सीमित।

रासायनिक परतें — भूपर्पटी, मैंटल, क्रोड।

यांत्रिक परतें — स्थलमंडल, दुर्बलतामंडल।

प्रमुख सीमाएँ — मोहो, गुटेनबर्ग, लेहमैन।

भूकंपीय प्रमाण — P और S तरंग, छाया क्षेत्र।

गतिशील महत्व — प्लेट विवर्तनिकी और भू-डायनेमो।

समसामयिक मूल्यवर्धन — 2026 का क्रोड-मैंटल ऊष्मा प्रवाह और inner-core anisotropy शोध।

निष्कर्ष — पृथ्वी की परतें रासायनिक और यांत्रिक दोनों दृष्टियों से जटिल एवं गतिशील प्रणाली हैं।

निष्कर्ष

पृथ्वी की आंतरिक संरचना को केवल भूपर्पटी, मैंटल और क्रोड के तीन सरल खोलों के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। रासायनिक संरचना के साथ पदार्थों का यांत्रिक व्यवहार भी महत्वपूर्ण है। कठोर स्थलमंडल, नम्य दुर्बलतामंडल, संवहनीय मैंटल, द्रव बाह्य क्रोड और ठोस आंतरिक क्रोड मिलकर एक सक्रिय ग्रह प्रणाली बनाते हैं। इन्हीं परतों की परस्पर क्रिया प्लेट विवर्तनिकी, ज्वालामुखिता, भूकंप और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र जैसी प्रमुख प्रक्रियाओं का आधार है।