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1.3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना

पृथ्वी की सतह पर हम केवल उसका अत्यंत छोटा भाग प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं, जबकि पृथ्वी की औसत त्रिज्या लगभग 6,371 किमी है। इसलिए पृथ्वी के गहरे आंतरिक भाग का अध्ययन मुख्यतः अप्रत्यक्ष वैज्ञानिक प्रमाणों—विशेषकर भूकंपीय तरंगों—से किया जाता है।

पृथ्वी की आंतरिक संरचना को दो प्रमुख आधारों पर समझा जाता है—

रासायनिक संरचना के आधार पर — भूपर्पटी, मैंटल और क्रोड।

भौतिक/यांत्रिक गुणों के आधार पर — स्थलमंडल, दुर्बलतामंडल, गहरा मैंटल, बाह्य क्रोड और आंतरिक क्रोड।

इन परतों की प्रकृति को समझना प्लेट विवर्तनिकी, भूकंप, ज्वालामुखिता, पर्वतनिर्माण, पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र और पृथ्वी के तापीय विकास को समझने के लिए आवश्यक है।

1.3.2 आंतरिक परतों का विस्तृत अध्ययन पढ़ें →


पृथ्वी के आंतरिक भाग की जानकारी के स्रोत

पृथ्वी के भीतर प्रत्यक्ष रूप से बहुत अधिक गहराई तक पहुँचना संभव नहीं हुआ है। सबसे गहरे कृत्रिम बोरहोल लगभग 12 किमी गहराई तक ही पहुँचे हैं, जो पृथ्वी की 6,371 किमी त्रिज्या की तुलना में बहुत कम है।

इसलिए आंतरिक संरचना के प्रमाण दो प्रकार के माने जाते हैं—

प्रत्यक्ष स्रोत

खनन और गहरी ड्रिलिंग से प्राप्त चट्टानें पृथ्वी के ऊपरी भाग के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी देती हैं।

ज्वालामुखीय उद्गारों द्वारा गहराई से ऊपर आए पदार्थ भी पृथ्वी के आंतरिक भाग के बारे में महत्वपूर्ण प्रमाण देते हैं।

कुछ ज्वालामुखीय चट्टानों में गहरे मैंटल से आए ज़ेनोलिथ पाए जाते हैं, जिनसे ऊपरी मैंटल की संरचना का अध्ययन किया जाता है।

अप्रत्यक्ष स्रोत

पृथ्वी के अधिकांश गहरे भाग की जानकारी अप्रत्यक्ष स्रोतों से मिलती है। इनमें मुख्य रूप से—

शामिल हैं।

इनमें भूकंपीय तरंगें पृथ्वी के गहरे आंतरिक भाग को समझने का सबसे महत्वपूर्ण साधन हैं।


भूकंपीय तरंगें और पृथ्वी का आंतरिक भाग

भूकंप के समय उत्पन्न ऊर्जा तरंगों के रूप में पृथ्वी के भीतर और सतह पर फैलती है।

आंतरिक भाग से होकर गुजरने वाली प्रमुख तरंगें हैं—

P तरंगें और S तरंगें

P तरंगें

P तरंगों को प्राथमिक या संपीडन तरंगें कहा जाता है।

ये सबसे तेज भूकंपीय तरंगें हैं, इसलिए भूकंप के बाद सीस्मोग्राफ पर सबसे पहले दर्ज होती हैं।

इनमें माध्यम के कण तरंग के संचरण की दिशा के समानांतर आगे-पीछे कंपन करते हैं।

P तरंगें—

तीनों माध्यमों से गुजर सकती हैं।

इनकी गति माध्यम के घनत्व, प्रत्यास्थता और संपीड्यता पर निर्भर करती है।

S तरंगें

S तरंगों को द्वितीयक या कतरनी तरंगें कहा जाता है।

ये P तरंगों से धीमी होती हैं और सीस्मोग्राफ पर बाद में पहुँचती हैं।

इनमें माध्यम के कण तरंग संचरण की दिशा के लंबवत कंपन करते हैं।

S तरंगें केवल ठोस पदार्थों से गुजर सकती हैं

वे द्रव से नहीं गुजरतीं क्योंकि द्रव कतरनी तनाव को सहन नहीं कर सकता।

इसी गुण ने वैज्ञानिकों को यह निष्कर्ष निकालने में सहायता की कि पृथ्वी का बाह्य क्रोड द्रव अवस्था में है।


भूकंपीय तरंगों की गति क्यों बदलती है?

भूकंपीय तरंगों की गति पृथ्वी के भीतर हर जगह समान नहीं होती।

जब वे अलग घनत्व और प्रत्यास्थ गुणों वाली परत में प्रवेश करती हैं तो उनकी गति और दिशा बदल सकती है।

इससे—

होता है।

जहाँ तरंगों की गति में अचानक परिवर्तन होता है, वहाँ वैज्ञानिक किसी महत्वपूर्ण आंतरिक सीमा या असांतत्य की पहचान करते हैं।


भूकंपीय छाया क्षेत्र

भूकंपीय तरंगें पृथ्वी की अलग-अलग परतों में मुड़ती या रुकती हैं। इससे पृथ्वी की सतह पर कुछ क्षेत्र ऐसे बनते हैं जहाँ विशेष प्रकार की तरंगें सीधे दर्ज नहीं होतीं।

इन्हें छाया क्षेत्र कहा जाता है।

NCERT आधारित परीक्षा दृष्टि से—

S तरंगें लगभग 105° के बाद दर्ज नहीं होतीं, क्योंकि वे द्रव बाह्य क्रोड से नहीं गुजर सकतीं।

P तरंगों का प्रमुख छाया क्षेत्र लगभग 105° से 145° के बीच माना जाता है। बाह्य क्रोड में प्रवेश करते समय P तरंगों के तीव्र अपवर्तन से यह स्थिति बनती है।

छाया क्षेत्रों ने पृथ्वी के क्रोड की अवस्था और सीमाओं की पहचान में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रासायनिक संरचना के आधार पर पृथ्वी की परतें

पृथ्वी को रासायनिक संरचना के आधार पर तीन मुख्य भागों में बाँटा जाता है—

भूपर्पटी → मैंटल → क्रोड


भूपर्पटी

भूपर्पटी पृथ्वी की सबसे बाहरी और सबसे पतली ठोस परत है।

इसकी मोटाई सभी स्थानों पर समान नहीं है।

महासागरीय पर्पटी

महासागरों के नीचे पर्पटी अपेक्षाकृत पतली होती है। इसकी सामान्य मोटाई लगभग 5–10 किमी होती है।

यह मुख्यतः बेसाल्टिक प्रकृति की होती है और महाद्वीपीय पर्पटी की तुलना में अधिक घनी होती है।

महाद्वीपीय पर्पटी

महाद्वीपों के नीचे पर्पटी अधिक मोटी होती है।

इसकी औसत मोटाई लगभग 30–40 किमी होती है, जबकि हिमालय जैसी विशाल पर्वतीय प्रणालियों के नीचे यह लगभग 70 किमी या उससे अधिक तक हो सकती है।

महाद्वीपीय पर्पटी में ग्रेनाइटिक चट्टानों का महत्व अधिक है और इसका औसत घनत्व महासागरीय पर्पटी से कम होता है।

सियाल और सीमा

पुरानी भौगोलिक शब्दावली में महाद्वीपीय ऊपरी पर्पटी को सिलिका और एल्युमिनियम की अधिकता के कारण सियाल कहा जाता था, जबकि महासागरीय/निचले भाग के लिए सिलिका और मैग्नीशियम से जुड़ा सीमा शब्द प्रयुक्त होता था।

आधुनिक भूविज्ञान में पृथ्वी की पर्पटी की वास्तविक संरचना इससे अधिक जटिल मानी जाती है, इसलिए इन शब्दों को मुख्यतः पारंपरिक परीक्षा-शब्दावली के रूप में समझना चाहिए।


मोहो असांतत्य

भूपर्पटी और मैंटल के बीच की सीमा को मोहोरोविचिक असांतत्य या संक्षेप में मोहो कहा जाता है।

इस सीमा पर भूकंपीय तरंगों की गति में अचानक वृद्धि होती है।

इससे स्पष्ट होता है कि पर्पटी के नीचे अधिक घने और भिन्न संरचना वाले पदार्थ मौजूद हैं।


मैंटल

मोहो के नीचे से लगभग 2,900 किमी की गहराई तक फैले विशाल भाग को मैंटल कहा जाता है।

यह पृथ्वी के आयतन का सबसे बड़ा भाग है।

मैंटल मुख्यतः मैग्नीशियम और लौह-समृद्ध सिलिकेट खनिजों से बना माना जाता है।

यद्यपि मैंटल अत्यधिक गर्म है, इसका अधिकांश भाग उच्च दबाव के कारण ठोस अवस्था में रहता है। लेकिन भूवैज्ञानिक समयमान पर इसके कुछ भाग बहुत धीरे-धीरे प्रवाहित हो सकते हैं।

यही व्यवहार प्लेट विवर्तनिकी और मैंटल संवहन को संभव बनाता है।


ऊपरी और निचला मैंटल

मैंटल को सामान्यतः ऊपरी और निचले मैंटल में विभाजित किया जाता है।

ऊपरी मैंटल में लगभग 410 से 660 किमी के बीच एक संक्रमण क्षेत्र है जहाँ दबाव बढ़ने से खनिजों की क्रिस्टलीय संरचना में परिवर्तन होता है।

लगभग 660 किमी के नीचे निचला मैंटल शुरू होता है और यह लगभग 2,900 किमी गहराई तक फैला है।


क्रोड

लगभग 2,900 किमी की गहराई से पृथ्वी के केंद्र तक का भाग क्रोड कहलाता है।

क्रोड में मुख्यतः लोहा और निकेल प्रमुख माने जाते हैं, साथ ही कुछ हल्के तत्व भी उपस्थित हैं।

पुरानी परीक्षा-शब्दावली में क्रोड को कभी-कभी नाइफे कहा जाता है—

Ni = Nickel

Fe = Iron

क्रोड को दो भागों में बाँटा जाता है—

बाह्य क्रोड और आंतरिक क्रोड


बाह्य क्रोड

बाह्य क्रोड लगभग 2,900 किमी से 5,150 किमी गहराई तक फैला है।

यह द्रव अवस्था में है।

S तरंगों का इसमें प्रवेश न करना इसके द्रव होने का सबसे महत्वपूर्ण भूकंपीय प्रमाण है।

P तरंगें बाह्य क्रोड से गुजरती हैं, लेकिन उनकी गति और दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन होता है।

बाह्य क्रोड में विद्युत-चालक लौह-समृद्ध द्रव का संवहन और पृथ्वी का घूर्णन मिलकर पृथ्वी के भू-चुंबकीय क्षेत्र के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इस प्रक्रिया को भू-डायनेमो कहा जाता है।


आंतरिक क्रोड

लगभग 5,150 किमी गहराई से पृथ्वी के केंद्र 6,371 किमी तक आंतरिक क्रोड स्थित है।

यह मुख्यतः लौह-निकेल से बना और ठोस अवस्था में है।

यहाँ तापमान अत्यंत अधिक होने के बावजूद अत्यधिक दबाव के कारण पदार्थ ठोस बना रहता है।

भूकंपीय तरंगों के अध्ययन से आंतरिक क्रोड की ठोस अवस्था का पता चला।

यांत्रिक गुणों के आधार पर पृथ्वी की संरचना

रासायनिक संरचना के अतिरिक्त पृथ्वी को पदार्थों के यांत्रिक व्यवहार के आधार पर भी बाँटा जाता है।


स्थलमंडल

पृथ्वी की कठोर बाहरी परत को स्थलमंडल कहा जाता है।

इसमें—

शामिल होते हैं।

स्थलमंडल एक अखंड खोल नहीं है। यह कई विवर्तनिक प्लेटों में विभाजित है।

ये प्लेटें नीचे स्थित अपेक्षाकृत कमजोर परत के ऊपर गति करती हैं।


दुर्बलतामंडल

स्थलमंडल के नीचे ऊपरी मैंटल का अपेक्षाकृत कमजोर और नम्य भाग दुर्बलतामंडल कहलाता है।

यह पूरी तरह पिघला हुआ महासागर नहीं है। इसका अधिकांश पदार्थ ठोस है, लेकिन उच्च तापमान और दबाव की परिस्थितियों में यह दीर्घ समय में प्लास्टिक की तरह धीरे-धीरे प्रवाहित कर सकता है।

इसके एक भाग में भूकंपीय तरंगों की गति कम होती है, इसलिए इसे निम्न-वेग क्षेत्र से भी जोड़ा जाता है।

विवर्तनिक प्लेटों की गति को समझने में दुर्बलतामंडल अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पृथ्वी के भीतर तापमान, दबाव और घनत्व

सामान्यतः पृथ्वी के भीतर गहराई बढ़ने के साथ—

तापमान बढ़ता है

दबाव बढ़ता है

औसत घनत्व बढ़ता है

पृथ्वी की पर्पटी की तुलना में क्रोड अत्यधिक घना है।

पृथ्वी का औसत घनत्व लगभग 5.5 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर है, जबकि पर्पटी की अनेक चट्टानों का घनत्व इससे काफी कम होता है।

इससे भी यह संकेत मिलता है कि पृथ्वी के अंदर भारी पदार्थ केंद्रित हैं।

केंद्र के निकट तापमान लगभग 5,000–6,000°C के क्रम का माना जाता है। सटीक मान प्रत्यक्ष रूप से मापा नहीं जा सकता, इसलिए ये भूभौतिकीय और खनिज-भौतिकी मॉडलों पर आधारित अनुमान हैं।

प्रमुख असांतत्य

पृथ्वी की विभिन्न परतों के बीच कुछ महत्वपूर्ण सीमाएँ भूकंपीय तरंगों की गति में परिवर्तन से पहचानी गईं।

असांतत्य किन परतों के बीच
मोहोरोविचिक या मोहो भूपर्पटी और मैंटल
गुटेनबर्ग मैंटल और बाह्य क्रोड
लेहमैन बाह्य क्रोड और आंतरिक क्रोड

इन तीनों का विस्तृत अध्ययन आगे अलग उपविषय में किया जाएगा।

भूकंपीय तरंगों से मिली प्रमुख जानकारी

भूकंपीय तरंगों के अध्ययन से यह समझ विकसित हुई कि—

इसी कारण पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन में भूकंप-विज्ञान केंद्रीय भूमिका निभाता है।

समसामयिक अद्यतन — 2026

पृथ्वी का आंतरिक क्रोड आज भी सक्रिय शोध का विषय है।

2026 में Geophysical Research Letters में प्रकाशित दीर्घकालीन भूकंपीय अध्ययन ने 1980 के दशक से 2024 तक दो अलग भूकंपीय मार्गों के आँकड़ों का विश्लेषण किया।

अध्ययन के अनुसार आंतरिक क्रोड एक समय मैंटल की तुलना में थोड़ा तेज घूमता था, बाद में उसकी सापेक्ष घूर्णन गति धीमी हुई और लगभग 2010 के बाद वह मैंटल की तुलना में कुछ धीमा भी हो सकता है।

यह परिवर्तन पृथ्वी की परतों के बीच कोणीय संवेग और गतिशील परस्पर क्रिया से संबंधित माना जाता है।

2025 के अन्य भूकंपीय अध्ययनों ने यह भी संकेत दिया कि आंतरिक क्रोड के केवल घूर्णन में ही बदलाव नहीं हो सकता, बल्कि उसके बाहरी भाग में सीमित आकार-परिवर्तन या विकृति भी संभव है।

परीक्षा के लिए इसका मुख्य निष्कर्ष यह है—

पृथ्वी का आंतरिक क्रोड पूर्णतः निष्क्रिय ठोस गोला नहीं है; उसके गतिशील व्यवहार का अध्ययन आज भी भूकंपीय तरंगों से किया जा रहा है।

इन निष्कर्षों को अंतिम स्थापित तथ्य की बजाय विकसित होते वैज्ञानिक शोध के रूप में समझना चाहिए।

सत्यापित UPSC पिछले वर्षों के प्रश्न


UPSC सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा, 2023

प्रश्न में निम्न कथन दिए गए थे—

  1. सीस्मोग्राफ में P तरंगें S तरंगों से पहले दर्ज होती हैं।
  2. P तरंगों में कण तरंग संचरण की दिशा में आगे-पीछे कंपन करते हैं, जबकि S तरंगों में कण संचरण दिशा के समकोण पर कंपन करते हैं।

सही उत्तर:

दोनों कथन सही हैं।

यह पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन में भूकंपीय तरंगों के गुणों पर प्रत्यक्ष UPSC प्रश्न है।

सत्यापित BPSC पिछले वर्षों के प्रश्न

इस मुख्य उपविषय “पृथ्वी की आंतरिक संरचना” पर BPSC संयुक्त प्रतियोगिता प्रारंभिक/मुख्य परीक्षा का ऐसा प्रत्यक्ष प्रश्न सत्यापित रूप से नहीं मिला जिसे बिना संदेह यहाँ PYQ के रूप में जोड़ा जा सके।

इसलिए कोई अनुमानित प्रश्न PYQ के नाम से नहीं दिया गया है।

अन्य BPSC परीक्षा

BPSC जिला सांख्यिकी पदाधिकारी परीक्षा, 2025 में पूछा गया था—

अनुदैर्ध्य तरंगें किस माध्यम से नहीं गुजर सकतीं?

सही उत्तर:

निर्वात।

भूकंपीय P तरंगें भी अनुदैर्ध्य यांत्रिक तरंगें हैं और इन्हें संचरण के लिए पदार्थ की आवश्यकता होती है।

इसे BPSC संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा का PYQ नहीं समझना चाहिए; यह BPSC द्वारा आयोजित अलग परीक्षा का प्रश्न है।

परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य

पृथ्वी की औसत त्रिज्या लगभग 6,371 किमी है।

महासागरीय पर्पटी लगभग 5–10 किमी मोटी होती है।

महाद्वीपीय पर्पटी औसतन लगभग 30–40 किमी मोटी है और बड़े पर्वतों के नीचे लगभग 70 किमी या अधिक हो सकती है।

मोहो भूपर्पटी और मैंटल के बीच है।

मैंटल लगभग 2,900 किमी गहराई तक फैला है।

गुटेनबर्ग असांतत्य मैंटल और क्रोड की सीमा है।

बाह्य क्रोड द्रव है।

S तरंगें द्रव बाह्य क्रोड से नहीं गुजरतीं।

P तरंगें ठोस और द्रव दोनों से गुजर सकती हैं।

आंतरिक क्रोड ठोस है।

लेहमैन असांतत्य बाह्य और आंतरिक क्रोड के बीच है।

स्थलमंडल कठोर है और प्लेटों में विभाजित है।

दुर्बलतामंडल अपेक्षाकृत नम्य है और प्लेट गतियों के लिए महत्वपूर्ण है।

पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र मुख्यतः द्रव बाह्य क्रोड की गतियों से उत्पन्न भू-डायनेमो से जुड़ा है।

भूकंपीय तरंगें पृथ्वी के गहरे आंतरिक भाग के अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण अप्रत्यक्ष साधन हैं।


निष्कर्ष

पृथ्वी की आंतरिक संरचना प्रत्यक्ष अवलोकन से नहीं बल्कि विभिन्न भूभौतिकीय प्रमाणों, विशेषकर भूकंपीय तरंगों, से समझी गई है। पृथ्वी रासायनिक रूप से भूपर्पटी, मैंटल और क्रोड में तथा यांत्रिक रूप से कठोर स्थलमंडल, नम्य दुर्बलतामंडल और गहरे आंतरिक भागों में विभाजित है। बाह्य क्रोड का द्रव होना, आंतरिक क्रोड का ठोस होना तथा प्रमुख असांतत्यों की पहचान भूकंपीय तरंगों की गति और व्यवहार से संभव हुई। यही आंतरिक संरचना प्लेट विवर्तनिकी, भूकंप, ज्वालामुखिता और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र जैसी प्रमुख भौगोलिक प्रक्रियाओं की आधारशिला है।