‘पुनः भरण’ ऐप और भारत का भूजल संकट: तकनीक, जलभृत तथा संरक्षण
28 अक्टूबर 2026 को जारी भूजल पुनर्भरण ऐप: 3 किलोमीटर खोज, BISAG-N, GIS, भारत के 2025 भूजल आँकड़े और समाधान।
प्रकाशन: 28 अक्टूबर 2026 · पाठ्यक्रम: GS-I भूगोल एवं GS-III जल संसाधन
चर्चा में क्यों?
28 अक्टूबर 2026 को जल शक्ति मंत्रालय ने ‘पुनः भरण’ (Punah Bharan) मोबाइल ऐप जारी किया। इसे भास्कराचार्य राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुप्रयोग और भू-सूचना विज्ञान संस्थान (BISAG-N) ने राष्ट्रीय जल मिशन (NWM) के साथ विकसित किया है। इसका उद्देश्य भूजल का कृत्रिम पुनर्भरण करने के लिए वैज्ञानिक आधार पर उपयुक्त स्थानों और संरचनाओं के विकल्प पहचानना है।
समस्या समझें: हर खाली जमीन पर गड्ढा बना देने से भूजल नहीं बढ़ जाता। किसी स्थान की वर्षा, ढलान, भूगर्भीय परत, बहने वाला पानी और वर्तमान भूजल-स्तर तय करते हैं कि पानी नीचे तक जा सकेगा या नहीं। यही काम अब भू-स्थानिक सूचना के सहारे अधिक व्यवस्थित ढंग से किया जा सकता है।
आधिकारिक तथ्य: संक्षिप्त सार
- मंत्रालय: जल शक्ति; जारी: 28 अक्टूबर 2026।
- विकास: BISAG-N और राष्ट्रीय जल मिशन का सहयोग।
- उपयोगकर्ता से अधिकतम 3 किलोमीटर त्रिज्या में संभावित कृत्रिम पुनर्भरण स्थल पहचाने जा सकते हैं।
- वेब पोर्टल पर ग्राम-स्तरीय कृत्रिम पुनर्भरण संरचना (ARS) ज़ोनेशन मानचित्र और GIS परतें उपलब्ध।
- डेटा के घटक: वर्षा, भूजल स्तर, उपलब्ध जल/उपज, ढलान और जल निकासी।
ऐप काम कैसे करता है?
पहले उपयोगकर्ता का स्थान लिया जाता है। फिर उस क्षेत्र की वर्षा, जलस्तर, जलभृत की स्थितियाँ, ढलान और नालों के प्रवाह जैसी भू-स्थानिक (Geospatial) परतों को जोड़ा जाता है। इनके विश्लेषण से ऐप आसपास के संभावित कृत्रिम पुनर्भरण क्षेत्र दर्शाता है और भूगर्भीय परिस्थिति के अनुरूप उपयोगी संरचनाओं का विकल्प तलाशने में सहायता करता है।
तीन किलोमीटर की सीमा केवल आसपास संभावित स्थान खोजने की त्रिज्या है। यह दावा नहीं कि बनाई गई संरचना तीन किलोमीटर तक भूजल बढ़ाएगी। वेब पोर्टल पर ग्राम-स्तर के मानचित्र और GIS औजार स्थानीय योजना की सहायता करते हैं। निर्माण के पहले स्थल-जाँच, जल-गुणवत्ता परीक्षण, लागत तथा भूमि-अधिकार स्पष्ट करना फिर भी आवश्यक है।
जलभृत और पुनर्भरण का वैज्ञानिक आधार
जलभृत (Aquifer) ऐसी चट्टान या अवसाद परत है जहाँ के छिद्रों या दरारों में पानी जमा और प्रवाहित हो सकता है। वर्षा या सतही जल का जमीन में प्रवेश अंतःस्यंदन और नीचे तक पहुँचने की प्रक्रिया परिस्रवण कहलाती है। जब पानी भूजल भंडार में जुड़ता है तो वह पुनर्भरण है।
गंगा के जलोढ़ मैदान की रेतीली-बजरी वाली परत और दक्कन की कठोर चट्टानों के दरारयुक्त जलभृत अलग ढंग से पानी ग्रहण करते हैं। इसी कारण पूरे देश में एक प्रकार के गड्ढे या चेक-डैम की सफलता एक जैसी नहीं होती। सतही जल का संरक्षण और भूमिगत जल का पुनर्भरण संबंधित हैं, लेकिन तकनीकी रूप से एक ही प्रक्रिया नहीं।
देश में भूजल की स्थिति: 2025 के आधिकारिक आँकड़े
| सूचक | भारत, 2025 |
|---|---|
| वार्षिक भूजल पुनर्भरण | 448.52 अरब घन मीटर |
| निकालने योग्य वार्षिक संसाधन | 407.75 अरब घन मीटर |
| वार्षिक दोहन | 247.22 अरब घन मीटर |
| राष्ट्रीय दोहन का चरण | 60.63 प्रतिशत |
| अतिदोहित मूल्यांकन इकाइयाँ | 730/6762, अर्थात् 10.80% |
सूत्र: भूजल दोहन का चरण = वार्षिक दोहन ÷ निकालने योग्य वार्षिक भूजल × 100। कुल प्राकृतिक पुनर्भरण को हर के रूप में रखकर दोहन का चरण नहीं निकालना चाहिए। राष्ट्रीय औसत पूरे देश का है; राजस्थान, पंजाब और हरियाणा जैसे क्षेत्रों में स्थानीय स्थिति इससे कहीं अधिक चिंताजनक हो सकती है।
आधिकारिक 2025 आकलन के अनुसार लगभग 87% दोहन सिंचाई, 11% घरेलू और 2% औद्योगिक उपयोग के लिए था। इसलिए कृषि जल-उपयोग की दक्षता भूजल संकट के समाधान का मुख्य अंग है।
कृत्रिम पुनर्भरण की प्रमुख संरचनाएँ
- सोख्ता गड्ढे और रिचार्ज ट्रेंच: उपयुक्त छिद्रयुक्त जमीन में छत और सतही वर्षाजल के प्रवेश में सहायक।
- रिचार्ज कुएँ और शाफ्ट: उपयुक्त जलभृत तक पानी पहुँचाने के लिए, लेकिन शुद्धिकरण और स्थल परीक्षण अनिवार्य।
- चेक डैम या नाला बाँध: नाले का प्रवाह धीमा करके जल रिसाव की अवधि बढ़ाने का प्रयास।
- परकोलेशन टैंक और तालाब: वर्षाजल संग्रहित कर धीरे-धीरे नीचे जाने का अवसर देते हैं।
- छत-वर्षाजल संचयन: भवन का पानी संग्रह कर घरेलू उपयोग या नियोजित भूजल पुनर्भरण में लगाना।
किसी एक संरचना का चयन स्थानीय मिट्टी, चट्टान, ढलान, भूजल की गहराई, जल प्रदूषण और वर्षा पर निर्भर करेगा।
सरकारी कार्यक्रमों के साथ संबंध
केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) संसाधन आकलन और वैज्ञानिक अनुसंधान करता है। राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण कार्यक्रम (NAQUIM) जलभृत की संरचना और प्रबंधन की जानकारी तैयार करता है। अटल भूजल योजना सामुदायिक जल बजट तथा माँग प्रबंधन पर बल देती है। जल शक्ति अभियान: कैच द रेन स्थानीय वर्षाजल संरक्षण और जलस्रोतों के पुनर्जीवन को प्रोत्साहित करता है।
नया ऐप इन कार्यक्रमों के लिए स्थान-विशिष्ट निर्णय सहायता दे सकता है; इसे सभी पूर्व योजनाओं के विलय या नई वित्तीय गारंटी के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।
चुनौतियाँ, जोखिम और आगे की राह
गलत स्थल चयन, अनुपयुक्त संरचना, खराब निर्माण, रखरखाव का अभाव, पुराने भू-स्थानिक आँकड़े और स्थानीय अधिकारियों के प्रशिक्षण की कमी संभावित समस्याएँ हैं। विशेष खतरा तब है जब प्रदूषित पानी सीधे जलभृत में पहुँच जाए। इससे जलस्तर बढ़ने के बावजूद पेयजल गुणवत्ता बिगड़ सकती है।
नीति समाधान: ऐप आधारित मानचित्र + वास्तविक स्थल सर्वेक्षण; भूजल की गुणवत्ता जाँच; पंचायत और किसान सहभागिता; फसल विविधीकरण, सूक्ष्म सिंचाई और जल-बजट; निर्माण के पहले व बाद जलस्तर की निगरानी; और सार्वजनिक परिणाम-परीक्षण। निष्कर्ष: टिकाऊ भूजल प्रबंधन केवल पानी नीचे भेजने में नहीं, बल्कि पानी निकालने की दर को भी प्रकृति की सीमाओं के भीतर लाने में निहित है।
प्रारंभिक परीक्षा की सावधानियाँ
- 3 किमी—ऐप का खोज-दायरा; संरचना के भौतिक प्रभाव का दायरा नहीं।
- BISAG-N प्रौद्योगिकी और NWM जल नीति में सहयोगी संस्थाएँ हैं।
- सुरक्षित राष्ट्रीय औसत का अर्थ हर ब्लॉक का सुरक्षित होना नहीं।
- भूजल पुनर्भरण तथा भूजल की गुणवत्ता दोनों महत्त्वपूर्ण हैं।
- दोहन का चरण कुल दोहन और निकालने योग्य संसाधन का अनुपात है।
2025 भूजल आकलन: पाँच श्रेणियों की पूरी तस्वीर
भूजल प्रबंधन में पूरे भारत का एक औसत देखने के साथ प्रशासनिक मूल्यांकन इकाई के परिणाम पढ़ना भी जरूरी है। केंद्रीय भूजल बोर्ड और राज्य सरकारों द्वारा संयुक्त रूप से तैयार 2025 के गतिशील भूजल संसाधन आकलन में 6,762 इकाइयों का वर्गीकरण किया गया। इनमें सुरक्षित, अर्ध-संकटग्रस्त, संकटग्रस्त, अतिदोहित और लवणीय श्रेणियाँ शामिल हैं।
| श्रेणी | इकाइयाँ | कुल का हिस्सा | सामान्य व्याख्या |
|---|---|---|---|
| सुरक्षित | 4,946 | 73.14% | दोहन का चरण 70% से कम |
| अर्ध-संकटग्रस्त | 758 | 11.21% | 70%–90% के बीच |
| संकटग्रस्त | 201 | 2.97% | 90%–100% के बीच |
| अतिदोहित | 730 | 10.80% | 100% से अधिक दोहन |
| लवणीय | 127 | 1.88% | भूजल गुणवत्ता की विशिष्ट समस्या |
यह तालिका बताती है कि राष्ट्रीय भूजल दोहन का चरण 60.63% होने पर भी सभी जिलों/ब्लॉकों में स्थिति सुरक्षित नहीं होती। पानी भूमिगत है, किंतु राष्ट्रीय सीमा रेखाओं के भीतर हर स्थान पर समान मात्रा में नहीं है। मान लीजिए कोई कृषि प्रधान क्षेत्र हर वर्ष अपनी निकालने योग्य मात्रा से अधिक पानी निकालता रहे; वहाँ राष्ट्रीय औसत सुरक्षित होने पर भी जलस्तर गिर सकता है।
2017 से 2025 के बीच सुरक्षित इकाइयों का अनुपात 62.64% से 73.14% हुआ और अतिदोहित इकाइयों का अनुपात 17.24% से 10.80% आया। यह राष्ट्रीय आकलन में सकारात्मक परिवर्तन है। लेकिन भूजल दोहन 2024 से 2025 में भी कुछ बढ़ा; इसलिए सुधार को संकट समाप्त होने का प्रमाण नहीं मानना चाहिए। स्रोत: 2025 संसाधन आकलन पर संसद में उत्तर।
जल का सरल बजट: कितना आता है, कितना उपलब्ध होता है?
एक खेत या गाँव को छोटी जल-अर्थव्यवस्था मानें। वर्षा जल की एक मात्रा भूमिगत जाती है, कुछ सतह से बहकर निकलती है, कुछ पौधों या सतही जल तंत्र में रहती है और कुछ प्राकृतिक निकास के लिए जरूरी होती है। इसलिए कुल वार्षिक पुनर्भरण और वर्ष भर निकालने योग्य संसाधन बराबर नहीं होते। 2025 में पुनर्भरण 448.52 अरब घन मीटर था, जबकि निकालने योग्य संसाधन 407.75 अरब घन मीटर आँका गया—प्राकृतिक निर्वहन के लिए भी जल छोड़ना पड़ता है।
गणना का उदाहरण: किसी काल्पनिक ब्लॉक में वार्षिक निकालने योग्य भूजल 100 इकाई और दोहन 120 इकाई है। उसका दोहन चरण 120% होगा। केवल 20 इकाई का कृत्रिम पुनर्भरण प्रस्तावित कर देने से वह स्वतः सुरक्षित श्रेणी में नहीं आता—पुनर्भरण वास्तव में कितना बढ़ा, मौसम कैसा रहा, निकासी घटी या बढ़ी और प्राकृतिक निर्वहन पर क्या प्रभाव पड़ा, इन सबकी माप आवश्यक है।
जल-भंडार और प्रवाह का अंतर: जलभृत में आज कितना जल संचित है तथा एक वर्ष में कितना नया जल प्रवेश करता है, ये दो अलग माप हैं। किसी क्षेत्र में गहरे पुरातन भूजल का व्यापक दोहन हो सकता है, जो मौसमी वर्षा से तेजी से फिर नहीं भरता। ऐसे क्षेत्र में 'एक बरसात से सारा भूजल वापस आ जाएगा' कहना वैज्ञानिक रूप से अनुचित है।
भू-स्थानिक तकनीक: पाँच परतों से निर्णय तक
भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) किसी क्षेत्र की कई सूचनाओं को एक मानचित्र पर जोड़ती है। भूजल पुनर्भरण के लिए स्थानीय वर्षा के अलावा ढलान, मिट्टी/शैल की पारगम्यता, नालों का वितरण, जलस्तर तथा मानवीय बसावट की जानकारी उपयोगी होती है। दूर-संवेदी उपग्रह चित्र भूमि उपयोग, जलनिकासी और भू-आकृति संबंधी जानकारी देने में मदद कर सकते हैं; लेकिन केवल चित्र देखकर जमीन के भीतर पूरे जलभृत की वास्तविक संरचना जानना संभव नहीं।
| सूचना-परत | निर्णय में योगदान | यदि नजरअंदाज की जाए |
|---|---|---|
| वर्षा और मौसमी वितरण | संचयन के संभावित जल का अनुमान | निर्मित संरचना लंबे समय खाली रह सकती है |
| ढलान एवं भूमि रूप | पानी रुकने या तेज बहने की प्रवृत्ति | कटाव, टूट-फूट या कम रिसाव |
| मिट्टी एवं शैल | जल ग्रहण और प्रवाह क्षमता | भूजल में वास्तविक प्रवेश बहुत कम |
| जलस्तर एवं जलभृत | जल-भंडारण की जगह का आकलन | जल भराव या अनुपयुक्त निवेश |
| जलनिकासी एवं जल गुणवत्ता | पानी जुटाने के स्रोत व स्वच्छता | गाद, प्रदूषण या बहाव समस्या |
‘पुनः भरण’ ऐप का तीन किलोमीटर संकेत आसपास विकल्प दिखाने की खोज-सीमा है। यह न तो किसी चिह्नित स्थल की सरकारी स्वीकृति है, न बनाई गई संरचना का प्रभाव-क्षेत्र। तकनीक स्थानीय सर्वेक्षण को प्रतिस्थापित करने के बजाय उसे अधिक लक्षित बनाती है।
कठोर चट्टानी प्रदेश और जलोढ़ मैदान: दो उदाहरण
उदाहरण 1—राजस्थान का शुष्क क्षेत्र: वर्षा कम और अनियमित हो सकती है; तापमान तथा वाष्पीकरण ऊँचे होते हैं। ऐसे में केवल बड़े जलाशय बनाना पर्याप्त नहीं। कैचमेंट की पहचान, पारंपरिक जोहड़/तालाब, पर्याप्त तल-छनन, वर्षाजल का उपयोग और जल बचाने वाली कृषि समान रूप से जरूरी हैं। कुछ इलाकों में भूजल खारा होने से मात्रा के साथ गुणवत्ता पर भी विशेष ध्यान देना होगा।
उदाहरण 2—गंगा का जलोढ़ मैदान: छिद्रयुक्त रेत और बजरी अच्छी पुनर्भरण क्षमता दे सकती हैं, किंतु सभी जलोढ़ परतें समान नहीं; चिकनी मिट्टी और स्थानीय भूगर्भीय स्थितियाँ पानी का प्रवेश सीमित कर सकती हैं। दूषित नाले, भूजल में आर्सेनिक की प्राकृतिक समस्या तथा शहरी सीवेज को देखते हुए सीधे पुनर्भरण से पहले जल-गुणवत्ता की जाँच आवश्यक है।
उदाहरण 3—दक्कन की कठोर शैलें: जल मुख्यतः अपक्षयित परतों और दरारों में उपलब्ध हो सकता है। यहाँ ढलानों, दरारों और नालों की दिशा के अनुरूप छोटी संरचनाएँ उपयोगी हो सकती हैं, लेकिन नीचे की कठोर अभेद्य परत के कारण कई स्थल सीमित जल ग्रहण करेंगे।
UPSC के भूगोल प्रश्न में इन भिन्नताओं का उल्लेख किसी भी एक-सूत्री नीति से बेहतर विश्लेषण दर्शाता है।
जल-गुणवत्ता, न्याय और भूजल शासन
जल की मात्रा बढ़ाने की योजना पेयजल गुणवत्ता को अनदेखा नहीं कर सकती। यदि औद्योगिक अपशिष्ट, अनुपचारित सीवेज, कीटनाशक या बहुत अधिक लवणयुक्त जल पुनर्भरण संरचना में जाए, तो भूमिगत प्रदूषण के उपचार की लागत बहुत ऊँची हो सकती है। प्राकृतिक रूप से फ्लोराइड, आर्सेनिक या लवणता वाले क्षेत्रों में जलभृत की अलग-अलग परतें और उनके प्रदूषण का जोखिम समझना जरूरी है।
न्याय का प्रश्न: खेतों में अधिक गहरे नलकूपों पर निवेश कर सकने वाला किसान कम संसाधन वाले पड़ोसी के मुकाबले अधिक भूजल निकाल सकता है। भूजल का व्यक्तिगत उपयोग दूसरे उपयोगकर्ताओं के जलस्तर को प्रभावित कर सकता है। इसलिए जल शासन में फसल नीति, बिजली की कीमत, सामुदायिक जल-बजट और जल निकालने की निगरानी का जुड़ना जरूरी है।
नीतिगत टकराव: किसी क्षेत्र में वर्षाजल संचयन बढ़ना अच्छा है, पर यदि उसी समय पानी की अधिक खपत वाली फसलों का रकबा बहुत बढ़ जाए तो भूजल स्तर फिर भी गिर सकता है। अतः ऐप द्वारा 'कहाँ पुनर्भरण हो' बताने के साथ योजना को 'कितनी निकासी उचित है' भी पूछना होगा।
पंचायत से जिला प्रशासन तक: एक कार्यान्वयन मॉडल
- स्थल चयन: ऐप व ग्राम स्तरीय GIS मानचित्र से संभावित स्थानों की प्रारंभिक सूची।
- मैदानी सत्यापन: भूगर्भ विशेषज्ञ द्वारा शैल, मिट्टी, जल-गुणवत्ता, भूमि स्वामित्व और बहाव की जाँच।
- जल-बजट: ग्राम सभा/जल उपयोगकर्ता समूह वर्षा, वर्तमान उपयोग और लक्षित बचत का स्थानीय हिसाब तैयार करें।
- संरचना चयन: जलभृत की प्रकृति के अनुसार चेकडैम, परकोलेशन तालाब, रिचार्ज शाफ्ट या वर्षाजल संचयन का डिजाइन।
- रखरखाव: गाद हटाने, निस्पंदन बदलने और गंदे पानी को रोकने की जिम्मेदारी तथा बजट।
- परिणाम मापन: निर्माण से पहले/बाद अलग-अलग मौसमों में जलस्तर, जल गुणवत्ता और दोहन मापना।
यदि सरकार केवल “कितनी संरचनाएँ बनीं” गिनेगी, तो पानी न बढ़ने पर भी सफलता रिपोर्ट हो सकती है। बेहतर प्रदर्शन सूचक हैं—नियोजित स्थलों में कितनों का परीक्षण हुआ, कितनी संरचनाएँ कार्यशील रहीं, जल गुणवत्ता में सुधार हुआ या नहीं तथा दोहन की दर में क्या परिवर्तन आया।
एकीकृत नीति: केंद्रीय भूजल बोर्ड का वैज्ञानिक आकलन, अटल भूजल योजना में समुदाय की भूमिका, जल शक्ति अभियान का वर्षाजल संरक्षण, तथा सूक्ष्म सिंचाई—इन सभी से स्थानीय योजना को जोड़ना इस ऐप की संभावित उपयोगिता बढ़ाएगा।
प्रारंभिक परीक्षा: बहुविकल्पीय अभ्यास
ये स्वनिर्मित अभ्यास प्रश्न हैं; इन्हें वास्तविक UPSC विगत वर्ष प्रश्न नहीं बताया गया है। उत्तर खोलकर व्याख्या पढ़ें।
प्रश्न 1. ‘पुनः भरण’ ऐप के संबंध में सही कथन:
- इसे BISAG-N और राष्ट्रीय जल मिशन ने मिलकर विकसित किया।
- यह आसपास 3 किमी तक संभावित कृत्रिम पुनर्भरण स्थलों की पहचान में मदद करता है।
- यह हर चिह्नित स्थल पर भूजल स्तर बढ़ने की कानूनी गारंटी देता है।
- केवल 1 और 2
- केवल 1 और 3
- केवल 2 और 3
- 1, 2 और 3
सही उत्तर और व्याख्या देखें
उत्तर: A — केवल 1 और 2। पहले दोनों कथन PIB से पुष्ट हैं। ऐप नियोजन का साधन है, परिणाम की गारंटी नहीं।
प्रश्न 2. 2025 के भूजल आकलन के बारे में:
- भारत का वार्षिक भूजल पुनर्भरण 448.52 अरब घन मीटर था।
- दोहन का चरण कुल दोहन और निकालने योग्य संसाधन का अनुपात है।
- देश की सभी मूल्यांकन इकाइयाँ सुरक्षित श्रेणी में थीं।
- केवल 1
- केवल 2
- केवल 1 और 2
- सभी तीन
सही उत्तर और व्याख्या देखें
उत्तर: C — केवल 1 और 2। 730 मूल्यांकन इकाइयाँ अतिदोहित थीं; अतः तीसरा कथन गलत है।
प्रश्न 3. 2025 की भूजल श्रेणियों के संबंध में:
- सुरक्षित इकाइयों का अनुपात लगभग 73.14% था।
- अतिदोहित इकाइयों का अनुपात लगभग 10.80% था।
- सभी लवणीय इकाइयाँ दोहन चरण 100% से ऊपर होने के कारण ही लवणीय कही गईं।
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
- तीनों
उत्तर और व्याख्या पढ़ें
उत्तर: A — केवल 1 और 2। सुरक्षित और अतिदोहित के आँकड़े सही हैं। लवणीय अलग जल-गुणवत्ता श्रेणी है; इसे सीधे 100% से अधिक दोहन की परिभाषा न समझें।
प्रश्न 4. भूजल पुनर्भरण तकनीक पर:
- GIS की परतें वर्षा, ढलान और जल निकासी की जानकारी जोड़ सकती हैं।
- उपग्रह चित्र से बिना मैदानी सर्वेक्षण जलभृत की हर भीतरी परत को सटीक मापा जा सकता है।
- अनुपचारित प्रदूषित जल को जलभृत में पहुँचाना स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है।
- केवल 1 और 2
- केवल 1 और 3
- केवल 2 और 3
- तीनों
उत्तर और व्याख्या पढ़ें
उत्तर: B — केवल 1 और 3। GIS निर्णय-सहायक है; भूपर्पटी के भीतर की वास्तविक स्थिति के लिए भूगर्भीय और जल गुणवत्ता परीक्षण जरूरी हो सकते हैं।
प्रश्न 5. दोहन का चरण निकालने के लिए उपयुक्त अनुपात है:
- कुल जलवर्षा ÷ वार्षिक जलनिकासी
- निकालने योग्य भूजल ÷ कुल वर्षा
- वार्षिक भूजल दोहन ÷ निकालने योग्य वार्षिक भूजल
- कुल नदी प्रवाह ÷ भूमिगत जलस्तर
- केवल 1
- केवल 2
- केवल 3
- केवल 4
उत्तर और व्याख्या पढ़ें
उत्तर: C — केवल 3। सही सूत्र है—वार्षिक भूजल दोहन को उसी क्षेत्र के निकालने योग्य वार्षिक भूजल संसाधन से भाग देकर 100 से गुणा करें।
मुख्य परीक्षा: विश्लेषणात्मक अभ्यास
नीचे दिए प्रश्न मौलिक अभ्यास प्रश्न हैं। प्रत्येक उत्तर में परिचय, तथ्य व आधार, विश्लेषण, चुनौतियाँ, आगे की राह और निष्कर्ष का संतुलन रखें। दोनों प्रश्नों के विस्तृत आदर्श उत्तर नीचे उपलब्ध हैं।
- 15 अंक / 250 शब्द: भारत में भूजल संकट के समाधान के लिए भू-स्थानिक तकनीक, समुदाय आधारित प्रबंधन और कृषि जल-दक्षता के समन्वय की आवश्यकता है। ‘पुनः भरण’ ऐप के संदर्भ में विश्लेषण कीजिए।
- 10 अंक / 150 शब्द: कृत्रिम भूजल पुनर्भरण के स्थल चयन को प्रभावित करने वाले भौतिक कारकों और प्रमुख तकनीकी सीमाओं की चर्चा कीजिए।
मुख्य परीक्षा के आदर्श उत्तर: दोनों अभ्यास प्रश्नों के अलग-अलग उत्तर प्रकाशित हैं।