2026 · Q3(a)
प्रश्न
डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि एक संवैधानिक लोकतंत्र के भीतर सविनय अवज्ञा ( Civil Disobedience) का प्रयोग करना 'अराजकता' ( Anarchy) का समर्थन करने के समान है। आधुनिक लोकतंत्रों को उन सविनय अवज्ञा आंदोलनों से उत्पन्न नैतिक दुविधाओं से कैसे निपटना चाहिए जो वास्तविक चिंताओं को उठाने वाली नीतियों के विरुद्ध सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखते हैं?
प्रश्न की मांग एवं दृष्टिकोण
संविधान सभा में अपने प्रसिद्ध 'Grammar of Anarchy'
(अराजकता का व्याकरण) भाषण (25 नवंबर 1949) में डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि जब संवैधानिक और वैधानिक मार्ग खुले हों, तब सत्याग्रह,
घेराव या सविनय अवज्ञा का सहारा लेना लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करता है। परंतु आधुनिक लोकतंत्र में जब पर्यावरण, विस्थापन या
सामाजिक न्याय के मुद्दों पर सुनवाई न हो, तब राज्य को दमन और संवाद के बीच नैतिक संतुलन बनाना पड़ता है।
मॉडल उत्तर
भूमिका: संविधान सभा में डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने सविनय अवज्ञा और सत्याग्रह को 'अराजकता का व्याकरण' ( Grammar of
Anarchy) बताते हुए आगाह किया था कि औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध जो साधन वैध थे, वे एक संवैधानिक लोकतंत्र में विधि के शासन
(Rule of Law) को कमजोर कर सकते हैं।
मुख्य भाग:
सविनय अवज्ञा से उत्पन्न प्रमुख नैतिक दुविधाएँ ( Ethical Dilemmas):
विधि व्यवस्था बनाम सामाजिक न्याय ( Law & Order vs Social Justice): एक ओर कानून का कड़ाई से पालन कराना राज्य का
संवैधानिक दायित्व है, तो दूसरी ओर हाशिए के वर्गों (जैसे—जल-जंगल-जमीन बचाने वाले आदिवासी या किसान) की वास्तविक पीड़ा की
अनदेखी करना अन्याय है।
बहुसंख्यक निर्णय बनाम अल्पसंख्यक/वंचित अधिकार: कभी-कभी विधिक रूप से पारित नीतियाँ भी नैतिक रूप से किसी संवेदनशील
समूह के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।
आधुनिक लोकतंत्रों के लिए संतुलित एवं नैतिक मार्ग:
संस्थागत संवाद तंत्र (Institutionalized Dialogue): नीति-निर्माण से पूर्व प्रभावित हितधारकों से वास्तविक परामर्श (Pre-legislative Consultation) और सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन (SIA) किया जाए ताकि अवज्ञा की नौबत ही न आए।
अनुपातिक और सहानुभूतिपूर्ण प्रतिक्रिया (Proportional Response): शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के साथ अपराधी जैसा व्यवहार करने
के बजाय प्रशासनिक अनुनय (Persuasion) और भावनात्मक बुद्धिमत्ता का प्रयोग किया जाए।
संवैधानिक माध्यमों का सुदृढ़ीकरण: जनसुनवाई, लोकपाल और त्वरित न्यायिक समीक्षा को सुलभ बनाकर असंतोष को संवैधानिक दायरे
में हल किया जाए।
निष्कर्ष: जॉन रॉल्स ( John Rawls) के अनुसार, शांतिपूर्ण और अहिंसक सविनय अवज्ञा लोकतंत्र को नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि उसकी
'संवैधानिक नैतिकता' को जगाने की अंतिम अपील होती है; अतः लोकतंत्र को इसे दमन से नहीं बल्कि संवेदनशील संवाद से सुलझाना चाहिए।