शहरी परिवहन: पहुँच और भूमि-उपयोग का समन्वय
प्रश्न
“भारतीय शहरों की परिवहन समस्या वाहनों की कमी नहीं, बल्कि सुगम पहुँच और भूमि-उपयोग के समन्वय की कमी है।” शहरी गतिशीलता भारत 2026 के संदर्भ में विवेचना कीजिए।
आदर्श उत्तर
शहरी परिवहन का उद्देश्य अधिक वाहन चलाना नहीं, लोगों को रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक सुरक्षित तथा सस्ती पहुँच देना है। दूर-दूर बसी आवासीय और कार्यस्थलीय बस्तियाँ बढ़ती यात्रा-माँग पैदा करती हैं, जिसे केवल नई सड़कें बनाकर पूरा नहीं किया जा सकता।
समस्या की संरचनात्मक जड़ें
फैलता शहरीकरण, पृथक भूमि-उपयोग और सार्वजनिक परिवहन से दूर सस्ता आवास दैनिक यात्राएँ लंबी करते हैं। चौड़ी सड़कों से उत्पन्न अतिरिक्त वाहन-माँग कुछ समय बाद भीड़ फिर बढ़ा सकती है। पैदल और साइकिल मार्गों का अभाव तथा अंतिम दूरी की कठिनाई मेट्रो जैसे निवेश का लाभ सीमित करते हैं।
समन्वित समाधान
- भूमि-उपयोग: सार्वजनिक परिवहन केंद्रित विकास में आवास, रोजगार और सेवाएँ स्टेशन के आसपास जुड़ें। साथ ही किफायती आवास सुरक्षित रहे, अन्यथा बढ़ती कीमतें गरीबों को पुनः बाहरी क्षेत्रों में धकेल देंगी।
- बहु-माध्यम एकीकरण: बस, मेट्रो, उपनगरीय रेल और पैदल यात्रा के समय, मार्ग और किराये समन्वित हों। केवल साझा टिकट पर्याप्त नहीं; सेवाओं का भौतिक जुड़ाव भी चाहिए।
- समावेशी सड़कें: निरंतर फुटपाथ, सुरक्षित साइकिल मार्ग, प्रकाश व्यवस्था और दिव्यांग-सुलभ वाहन महिलाओं, बुजुर्गों तथा बच्चों की स्वतंत्र आवाजाही बढ़ाएँ।
- सक्षम संस्थाएँ: एकीकृत महानगरीय परिवहन प्राधिकरण भूमि-उपयोग, यातायात और संचालन संस्थाओं के बीच जवाबदेही तय करे। पार्किंग नीति तथा वित्तीय व्यवस्था निजी वाहन-निर्भरता घटाएँ।
डिजिटल यात्रा-सूचना उपयोगी है, लेकिन स्मार्टफोन-विहीन यात्रियों के लिए ऑफलाइन सुविधा जरूरी रहे। प्रगति का पैमाना वाहन की गति के बजाय सार्वजनिक सेवाओं तक लगने वाला समय, यात्रा-खर्च, सुरक्षा और उत्सर्जन हो। इसी से गतिशीलता वास्तविक शहरी समावेशन बनेगी।