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अभ्यास प्रश्न • GS-II

सुरक्षा परिषद सुधार और भारत का दावा

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15 अंकशब्द-सीमा: 250 शब्द24 अक्टूबर 2026

प्रश्न

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधार की आवश्यकता व्यापक रूप से स्वीकार की जाती है, फिर भी संस्थागत परिवर्तन अत्यंत धीमा है। भारत के दावे और संयुक्त राष्ट्र चार्टर की संशोधन प्रक्रिया के संदर्भ में कारणों का विश्लेषण कीजिए।

आदर्श उत्तर

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का शक्ति-संतुलन दर्शाती है। बदली वैश्विक वास्तविकताओं के बावजूद इसका विस्तार धीमा है, क्योंकि प्रतिनिधित्व का प्रश्न मौजूदा विशेषाधिकारों के पुनर्वितरण से जुड़ा है।

सुधार की आवश्यकता और भारत का दावा

अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। भारत अपनी बड़ी आबादी, प्रमुख अर्थव्यवस्था, शांति स्थापना में योगदान और वैश्विक दक्षिण के विकास-सरोकारों के आधार पर स्थायी सदस्यता चाहता है। प्रतिनिधिक परिषद की वैधता तथा उसके निर्णयों की स्वीकार्यता बढ़ सकती है।

धीमी प्रगति के कारण

  1. ऊँची वैधानिक सीमा: चार्टर के अनुच्छेद 108 के अनुसार महासभा के दो-तिहाई सदस्यों की स्वीकृति और दो-तिहाई सदस्य देशों द्वारा संवैधानिक अनुसमर्थन आवश्यक है। अनुसमर्थन करने वालों में सभी पाँच स्थायी सदस्य होने चाहिए। केवल महासभा बहुमत पर्याप्त नहीं है।
  2. हितों का टकराव: स्थायी सदस्य अपने प्रभाव में कमी से बचना चाहते हैं। किसी दावेदार का समर्थन और पूरे सुधार-पैकेज पर सहमति अलग बातें हैं।
  3. क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा: नए स्थायी सदस्यों, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और चयन के मानकों पर समूहों में मतभेद हैं। जी-4 तथा अन्य प्रस्तावों के बीच साझा पाठ बनना कठिन है।
  4. वीटो की दुविधा: विस्तार बिना वीटो असमान सदस्यता पैदा कर सकता है; वीटो का विस्तार निर्णयगत अवरोध बढ़ाने की आशंका उत्पन्न करता है।

भारत को अफ्रीकी देशों, जी-4 और व्यापक वैश्विक दक्षिण के साथ सहमति बढ़ाते हुए पाठ-आधारित वार्ता का समर्थन करना चाहिए। साथ ही पारदर्शिता तथा निर्वाचित सदस्यों की भूमिका में सुधार आगे बढ़ सकते हैं। प्रतिनिधित्व और प्रभावशीलता का संतुलन ही टिकाऊ संस्थागत परिवर्तन का आधार बनेगा।

संदर्भ