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अभ्यास प्रश्न • GS-II

यूरेशिया और हिंद-प्रशांत के बीच भारत की रणनीतिक स्वायत्तता

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यूरेशिया और हिंद-प्रशांत के बीच भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर 250 शब्द का मुख्य परीक्षा आदर्श उत्तर: प्रश्न की मांग, विश्लेषण, समाधान और निष्कर्ष।

15 अंकशब्द-सीमा: 250 शब्द21 अक्टूबर 2026

प्रश्न

अभ्यास प्रश्न

यूरेशियाई सहयोग और हिंद-प्रशांत साझेदारियों के बीच भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का मूल्यांकन कीजिए। दुशांबे बैठक तथा हालिया सैन्य अभ्यासों से उदाहरण दीजिए।

प्रश्न की मांग

  • यूरेशियाई और हिंद-प्रशांत मंचों में भारत की भागीदारी के हित स्पष्ट करने हैं।
  • दुशांबे बैठक तथा इंद्र, ऑस्ट्राहिंद और लोकायन जैसे उदाहरणों से उपलब्धियों, सीमाओं और संतुलन का मूल्यांकन करना है।

आदर्श उत्तर

भूमिका: रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ प्रत्येक मुद्दे पर राष्ट्रीय हित के अनुसार निर्णय लेना है। भारत की यूरेशियाई संस्थाओं और हिंद-प्रशांत साझेदारियों में समानांतर भागीदारी इसी बहुआयामी विदेश नीति को दर्शाती है।

यूरेशियाई हित: शंघाई सहयोग संगठन भारत को मध्य एशिया, रूस और अन्य सदस्यों से संपर्क, ऊर्जा सहयोग तथा आतंकवाद पर संवाद का अवसर देता है। दुशांबे में शासनाध्यक्ष परिषद की बैठक आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय संपर्क के लिए प्रासंगिक है। चीन और पाकिस्तान की उपस्थिति के बावजूद मंच छोड़ने के बजाय अपने हित प्रस्तुत करना भारत के लिए उपयोगी है।

हिंद-प्रशांत सहयोग: ऑस्ट्रेलिया के साथ ऑस्ट्राहिंद जैसे अभ्यास अंतरसंचालनीयता, साझा प्रशिक्षण और रक्षा संबंध मजबूत करते हैं। लोकायन जैसे समुद्री संपर्क अभियान नौसैनिक सद्भाव और समुद्री पहचान बढ़ाते हैं। रूस के साथ इंद्र अभ्यास पुराने रक्षा संबंधों की निरंतरता दिखाता है। अलग साझेदारियाँ अलग सुरक्षा आवश्यकताएँ पूरी करती हैं।

सीमाएँ: रूस–पश्चिम तनाव, चीन के साथ मतभेद, पाकिस्तान-प्रेरित सुरक्षा चुनौतियाँ और संपर्क परियोजनाओं पर संप्रभुता संबंधी चिंताएँ संतुलन कठिन बनाती हैं। सभी मंचों की घोषणाएँ समान रूप से लागू नहीं होतीं; सहयोग की सीमा वास्तविक परिणामों से आँकनी चाहिए।

आगे की राह: भारत को आतंकवाद पर समान मानक, संप्रभुता-सम्मत संपर्क, सुरक्षित समुद्री मार्ग और रक्षा आपूर्ति के विविधीकरण पर बल देना चाहिए। घरेलू उत्पादन, तकनीकी क्षमता और आर्थिक ताकत विदेश नीति की स्वतंत्रता का वास्तविक आधार बनेंगे।

निष्कर्ष: किसी स्थायी गुट पर निर्भर हुए बिना मुद्दा-आधारित सहयोग भारत को विकल्प देता है। स्वायत्तता तभी प्रभावी होगी जब विविध साझेदारियाँ स्पष्ट प्राथमिकताओं और विश्वसनीय राष्ट्रीय क्षमता से जुड़ी हों।

मूल्यवर्धन

  • SCO की शासनाध्यक्ष परिषद और राष्ट्राध्यक्ष परिषद अलग निकाय हैं।
  • सैन्य अभ्यास अपने आप पारस्परिक रक्षा-संधि या किसी गुट की सदस्यता नहीं बनाता।

संदर्भ