खाद्य सुरक्षा से पोषण और जलवायु-सहनशील कृषि तक
कृषि, पोषण, जलवायु परिवर्तन और किसान आय को एक साथ देखने वाला प्रश्न।
प्रश्न
“खाद्य सुरक्षा अब केवल अनाज भंडार नहीं, बल्कि पौष्टिक आहार, मृदा स्वास्थ्य और जलवायु सहनशीलता का एकीकृत तंत्र है।” भारत में कृषि-पारिस्थितिकी को बढ़ावा देने की रणनीतियों का मूल्यांकन कीजिए।
प्रश्न की मांग
- खाद्य सुरक्षा को केवल उत्पादन नहीं, पोषण और पारिस्थितिक स्थिरता से जोड़ना।
- कृषि-पारिस्थितिकी की उपयोगिता के साथ उसकी व्यवहारिक सीमाओं का मूल्यांकन करना।
- भारत के लिए नीतिगत, बाजार और अनुसंधान-आधारित रणनीति देना।
आदर्श उत्तर
भारत की खाद्य सुरक्षा नीति ने अनाज उपलब्धता में मजबूती दी है, पर कुपोषण, मृदा क्षरण, भूजल-दोहन, कृषि-रसायनों पर निर्भरता और चरम मौसम यह बताते हैं कि अगला चरण “कैलोरी सुरक्षा” से “पोषण एवं पारिस्थितिक सुरक्षा” की ओर होना चाहिए। कृषि-पारिस्थितिकी (Agroecology) इसी संक्रमण का आधार बन सकती है।
क्यों उपयोगी?
- विविधता: मोटे अनाज, दलहन, तिलहन, बागवानी और मिश्रित खेती पोषण व आय दोनों बढ़ाती है।
- मृदा व जल: फसल चक्र, जैविक पदार्थ, कृषि-वनीकरण और स्थानीय पोषक-चक्र मृदा कार्बन, जल-धारण तथा सूखा-सहनशीलता सुधारते हैं।
- लागत एवं जोखिम: स्थानीय जैव-इनपुट और एकीकृत कृषि बाहरी इनपुट-निर्भरता तथा एकल फसल के जोखिम को घटा सकते हैं।
- जलवायु अनुकूलन: विविध कृषि-तंत्र कीट, ताप और वर्षा-आघात के प्रति अधिक प्रत्यास्थ होते हैं।
भारत के लिए रणनीति
राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन को वैज्ञानिक, क्षेत्र-विशिष्ट परीक्षण और कृषि विज्ञान केंद्रों से जोड़ना; मोटे अनाज-दालों की खरीद को सार्वजनिक वितरण, आंगनवाड़ी और पीएम-पोषण से जोड़कर मांग बनाना; कृषक उत्पादक संगठनों, प्रसंस्करण व स्थानीय मूल्य-शृंखला से बेहतर मूल्य दिलाना; तथा मृदा-स्वास्थ्य, सूक्ष्म सिंचाई और कृषि-वनीकरण को जिला कृषि योजना में समेकित करना आवश्यक है।
सावधानियाँ
संक्रमण अवधि में उपज-अनिश्चितता, अधिक ज्ञान-आवश्यकता, प्रमाणन, बाजार प्रीमियम और छोटे किसानों की जोखिम-वहन क्षमता सीमाएँ हैं। इसलिए एक ही मॉडल पूरे देश पर लागू करने के बजाय स्थानीय पारिस्थितिकी + वैज्ञानिक प्रमाण + किसान आय पर आधारित क्रमिक संक्रमण होना चाहिए।
निष्कर्ष: टिकाऊ खाद्य व्यवस्था वही है जो खेत की मिट्टी, किसान की आय और थाली के पोषण—तीनों को एक साथ सुरक्षित करे।
मूल्यवर्धन
FAO के 10 तत्व: विविधता, सहक्रिया, दक्षता, पुनर्चक्रण, प्रत्यास्थता, ज्ञान-सहसृजन, मानवीय-सामाजिक मूल्य, खाद्य परंपराएँ, उत्तरदायी शासन और परिपत्र अर्थव्यवस्था।
भारत: राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन का कुल परिव्यय ₹2,481 करोड़ है।