मतदान का अधिकार, निर्वाचक नामावली और नागरिकता
वास्तविक विगत वर्ष प्रश्न।
प्रश्न
क्या मतदान का अधिकार एक मौलिक अधिकार है? निर्वाचक नामावली के पुनरीक्षण के दौरान भारत निर्वाचन आयोग की स्थिति की विवेचना कीजिए। क्या वह मतदाताओं की नागरिकता के प्रश्न की भी जाँच कर सकता है?
प्रश्न की मांग
- मतदान के अधिकार की संवैधानिक/वैधानिक प्रकृति स्पष्ट करना।
- अनुच्छेद 324 और निर्वाचक नामावली संबंधी कानून के तहत निर्वाचन आयोग की भूमिका बताना।
- नागरिकता की पात्रता-जाँच और नागरिकता के अंतिम निर्धारण के बीच अंतर करना।
आदर्श उत्तर
भारत में मतदान का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। इसका संवैधानिक आधार अनुच्छेद 326 में है और इसका प्रयोग लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 एवं 1951 द्वारा विनियमित होता है। हालांकि मतदाता की सूचित पसंद और मत की अभिव्यक्ति को न्यायालय ने अनुच्छेद 19(1)(a) से जोड़ा है।
अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को चुनावों तथा निर्वाचक नामावलियों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी देता है। नामावली के पुनरीक्षण में आयोग/निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी पात्रता, आयु, सामान्य निवास, दोहरी प्रविष्टि तथा अपात्रता की जाँच कर सकते हैं; विलोपन से पहले उचित प्रक्रिया और सुनवाई आवश्यक है।
चूँकि मतदाता-पंजीकरण के लिए भारतीय नागरिकता आवश्यक है, आयोग निर्वाचक पात्रता की सीमा तक नागरिकता-संबंधी दस्तावेज़ और तथ्य जाँच सकता है। किंतु किसी व्यक्ति की नागरिकता का अंतिम निर्धारण, निरसन या उसे विदेशी घोषित करना निर्वाचन आयोग का क्षेत्र नहीं; यह नागरिकता अधिनियम, 1955 तथा अन्य सक्षम वैधानिक प्राधिकारों के अधीन है।
अतः शुद्ध मतदाता सूची और मताधिकार—दोनों की रक्षा हेतु आयोग की जाँच शक्ति व्यापक है, पर नागरिकता पर अंतिम निर्णय की शक्ति सीमित है।
मूल्यवर्धन
मुख्य आधार: अनुच्छेद 324, अनुच्छेद 326, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950।