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भारतीय राजव्यवस्था • वास्तविक UPSC मुख्य परीक्षा प्रश्न

UPSC Mains 2025

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1. प्रश्न2. मॉडल उत्तर

प्रश्न

वर्ष एवं प्रश्नपत्र: 2025 | सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-I (GS Paper I - भारतीय समाज एवं जनजातीय विकास)
प्रश्न: "क्या भारत में जनजातीय विकास दो धुरियों—विस्थापन और पुनर्वास—के इर्द-गिर्द घूमता है? अपना मत प्रकट कीजिए।" (Does tribal development in India centre around two axes, those of displacement and of rehabilitation? Give your opinion.)
अंक एवं शब्द सीमा: 15 अंक | 250 शब्द
प्रश्न की माँग (Demand of the Question):
1.
यह मूल्यांकन करना कि भारत का जनजातीय विकास किस हद तक 'विस्थापन और पुनर्वास' के विरोधाभास के चारों ओर केंद्रित रहा है (तथ्यों व समिति रिपोर्टों के साथ)।
2.
अपना संतुलित मत देना कि यद्यपि विस्थापन-पुनर्वास एक प्रमुख धुरी रहा है, तथापि पाँचवीं-छठी अनुसूची, पेसा (1996) और वनाधिकार अधिनियम (2006) के माध्यम से जनजातीय विकास अब 'मुआवजा-आधारित' मॉडल से आगे बढ़कर 'अधिकार एवं स्वशासन-आधारित' मॉडल की ओर उन्मुख है।

मॉडल उत्तर

स्वतंत्रता के पश्चात् भारत के औद्योगीकरण, खनन और वृहद अवसंरचना निर्माण की प्रक्रिया में जनजातीय समुदाय 'विकास की भारी कीमत' चुकाने वाले वर्ग रहे हैं। इस कारण भारत में जनजातीय विकास का विमर्श ऐतिहासिक रूप से 'विस्थापन' (Displacement) और 'पुनर्वास' (Rehabilitation) की दो धुरियों के इर्द-गिर्द घूमता रहा है, किंतु समकालीन संवैधानिक परिप्रेक्ष्य में यह केवल इन्हीं दो धुरियों तक सीमित नहीं है।

क्यों विस्थापन और पुनर्वास केंद्रीय धुरी रहे हैं?

1.
संसाधन-संपन्न क्षेत्रों का विरोधाभास (Resource Curse): भारत के 80% से अधिक कोयला और खनिज भंडार तथा प्रमुख नदी घाटी परियोजनाएँ पाँचवीं अनुसूची के जनजातीय क्षेत्रों (झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश) में केंद्रित हैं।
2.
असमानुपातिक विस्थापन: प्रो. वीरमणि खाखा समिति (2014) की रिपोर्ट के अनुसार, देश की कुल जनसंख्या में मात्र 8.6% हिस्सेदारी होने के बावजूद, विकास परियोजनाओं (जैसे—सरदार सरोवर, हीराकुंड, पोलावरम और खनन परियोजनाएँ) से विस्थापित होने वाले कुल लोगों में लगभग 40% आदिवासी रहे हैं।
3.
अपूर्ण पुनर्वास और सांस्कृतिक विच्छेद: विस्थापित आदिवासियों में से मात्र 25%–30% का ही समुचित पुनर्वास हो सका। आदिवासी समाज के लिए भूमि केवल आर्थिक संपत्ति नहीं बल्कि उनकी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान (जैसे—नियमगिरि में डोंगरिया कोंध) है, जिसकी भरपाई मौद्रिक मुआवजे से असंभव रही।

मेरा मत: 'विस्थापन-पुनर्वास' से 'अधिकार और स्वशासन' की ओर बदलाव जनजातीय विकास को केवल विस्थापन और पुनर्वास के चश्मे से देखना अधूरा होगा। भारतीय संविधान और न्यायपालिका ने इसके समानांतर 'अधिकार, स्वायत्तता और क्षमता-निर्माण' की नई धुरियाँ स्थापित की हैं:

1.
संवैधानिक एवं न्यायिक कवच: पाँचवीं और छठी अनुसूची, समता निर्णय (1997) और नियमगिरि निर्णय (2013) ने स्थापित किया है कि जनजातीय भूमि और खनिजों पर स्थानीय समुदायों का प्राथमिक अधिकार है।
2.
ग्राम सभा का सशक्तिकरण: पेसा अधिनियम (1996) और वनाधिकार अधिनियम (FRA, 2006) ने आदिवासियों को 'विकास के पीड़ित' के बजाय 'संसाधनों के स्वामी' (लघु वनोपज और सामुदायिक वन संसाधनों पर अधिकार) के रूप में स्थापित किया है।
3.
मानव पूंजी एवं लक्षित विकास: पीएम-जनमन (PM-JANMAN), धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान, एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय और सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन ने शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका को विकास के केंद्र में रखा है।

निष्कर्षतः, नेहरू के 'जनजातीय पंचशील' की भावना के अनुरूप भारत के जनजातीय विकास को 'विस्थापन-पश्चात् पुनर्वास' के रक्षात्मक मॉडल से बाहर निकलकर पेसा और पाँचवीं-छठी अनुसूची के प्रभावी क्रियान्वयन द्वारा 'स्वशासन और सहभागी विकास' के मॉडल पर आगे बढ़ना होगा।