प्रश्न
मॉडल उत्तर
स्वतंत्रता के पश्चात् भारत के औद्योगीकरण, खनन और वृहद अवसंरचना निर्माण की प्रक्रिया में जनजातीय समुदाय 'विकास की भारी कीमत' चुकाने वाले वर्ग रहे हैं। इस कारण भारत में जनजातीय विकास का विमर्श ऐतिहासिक रूप से 'विस्थापन' (Displacement) और 'पुनर्वास' (Rehabilitation) की दो धुरियों के इर्द-गिर्द घूमता रहा है, किंतु समकालीन संवैधानिक परिप्रेक्ष्य में यह केवल इन्हीं दो धुरियों तक सीमित नहीं है।
क्यों विस्थापन और पुनर्वास केंद्रीय धुरी रहे हैं?
मेरा मत: 'विस्थापन-पुनर्वास' से 'अधिकार और स्वशासन' की ओर बदलाव जनजातीय विकास को केवल विस्थापन और पुनर्वास के चश्मे से देखना अधूरा होगा। भारतीय संविधान और न्यायपालिका ने इसके समानांतर 'अधिकार, स्वायत्तता और क्षमता-निर्माण' की नई धुरियाँ स्थापित की हैं:
निष्कर्षतः, नेहरू के 'जनजातीय पंचशील' की भावना के अनुरूप भारत के जनजातीय विकास को 'विस्थापन-पश्चात् पुनर्वास' के रक्षात्मक मॉडल से बाहर निकलकर पेसा और पाँचवीं-छठी अनुसूची के प्रभावी क्रियान्वयन द्वारा 'स्वशासन और सहभागी विकास' के मॉडल पर आगे बढ़ना होगा।