प्रश्न
प्रश्न 7 (15 अंक | 250 शब्द): "समता निर्णय (1997) से लेकर नियमगिरि निर्णय (2013) और चेब्रोलू लीला प्रसाद राव निर्णय (2020) तक, सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित क्षेत्रों के संवैधानिक न्यायशास्त्र को किस प्रकार आकार दिया है?" विश्लेषण कीजिए।
मॉडल उत्तर
परिचय: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी न्यायिक व्याख्याओं के माध्यम से पाँचवीं और छठी अनुसूची के संवैधानिक प्रावधानों को सामाजिक न्याय, संसाधन लोकतंत्र और मौलिक अधिकारों के साथ जोड़कर एक समृद्ध 'जनजातीय संवैधानिक न्यायशास्त्र' (Tribal Constitutional Jurisprudence) विकसित किया है।
प्रमुख न्यायिक मील के पत्थर:
1.
समता बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1997) — संसाधन न्याय और भूमि संरक्षण:
सर्वोच्च न्यायालय ने पाँचवीं अनुसूची के पैरा 5(2) की व्यापक व्याख्या करते हुए निर्णय दिया कि अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि अंतरण पर प्रतिबंध के संदर्भ में 'व्यक्ति' शब्द में 'राज्य सरकार' भी शामिल है।
न्यायालय ने निजी कंपनियों को दिए गए खनन पट्टों को शून्य घोषित किया और स्थापित किया कि अनुसूचित क्षेत्रों की भूमि व खनिज जनजातियों की आजीविका का आधार हैं।
2.
ओडिशा खनन निगम बनाम पर्यावरण मंत्रालय [नियमगिरि मामला, 2013] — सांस्कृतिक एवं पर्यावरणीय लोकतंत्र:
न्यायालय ने पेसा अधिनियम (1996) और वनाधिकार अधिनियम (2006) को अनुच्छेद 21 (गरिमामय जीवन) और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) से जोड़ते हुए निर्णय दिया कि डोंगरिया कोंध जनजाति के पवित्र नियमगिरि पर्वत पर खनन का अंतिम निर्णय ग्राम सभाएँ करेंगी। इसने भारत में 'पर्यावरणीय जनमत-संग्रह' की नींव रखी।
3.
चेब्रोलू लीला प्रसाद राव बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2020) — मौलिक अधिकारों की सर्वोच्चता:
5-सदस्यीय संविधान पीठ ने अनुसूचित क्षेत्रों में शिक्षकों के 100% आरक्षण की राज्यपाल की अधिसूचना को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि पाँचवीं अनुसूची के पैरा 5(1) के तहत राज्यपाल की अपवाद/संशोधन की शक्ति अनियंत्रित नहीं है; यह संविधान के भाग 3 (अनुच्छेद 14 और 16) के अधीन है।
4.
एडविंगसन बरेह (1966) एवं पु मिल्लई ह्लिछो (2005) — छठी अनुसूची में राज्यपाल का विवेक:
न्यायालय ने छठी अनुसूची में स्वायत्त जिलों के पुनर्गठन और पैरा 20BB के तहत राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों की सीमाओं को स्पष्ट किया।
निष्कर्ष: इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने एक ओर कॉरपोरेट व राज्य के अतिक्रमण से जनजातीय जल-जंगल-जमीन की रक्षा की है, तो दूसरी ओर कार्यपालिका के अतिरेक को संवैधानिक मर्यादा के भीतर रखा है।