प्रश्न 1 (15 अंक | 250 शब्द): "यद्यपि संविधान की पाँचवीं अनुसूची राज्यपाल को जनजातीय हितों के संरक्षण हेतु असाधारण विधायी और प्रशासनिक शक्तियाँ प्रदान करती है, तथापि व्यवहार में यह एक 'सुप्त संवैधानिक प्रावधान' (Dormant Constitutional Provision) बनकर रह गई है।" इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर
परिचय: संविधान के अनुच्छेद 244(1) के साथ पठित पाँचवीं अनुसूची मध्य और प्रायद्वीपीय भारत के 10 राज्यों के अनुसूचित क्षेत्रों के लिए एक विशिष्ट सुरक्षा कवच है। संविधान निर्माताओं ने इसके पैराग्राफ 5 के तहत राज्य के राज्यपाल को जनजातीय हितों का सर्वोच्च संरक्षक बनाया था, किंतु यू.एन. ढेबर आयोग (1961) और वीरमणि खाखा समिति (2014) ने पाया कि व्यवहार में ये शक्तियाँ प्रायः 'सुप्त' (Dormant) रही हैं।
राज्यपाल को प्रदत्त असाधारण संवैधानिक शक्तियाँ:
1.
अधिनियमों को रोकने या संशोधित करने की शक्ति [पैरा 5(1)]: राज्यपाल लोक अधिसूचना द्वारा संसद या राज्य विधानमंडल के किसी भी कानून को अनुसूचित क्षेत्र में लागू होने से रोक सकते हैं या संशोधनों के साथ लागू कर सकते हैं।
2.
शांति और सुशासन हेतु विनियम बनाने की शक्ति [पैरा 5(2)]: राज्यपाल जनजातीय भूमि के हस्तांतरण को रोकने, भूमि आवंटन और साहूकारी के विनियमन के लिए ऐसे कानून बना सकते हैं जो संसद या राज्य के अधिनियमों को भी निरस्त कर सकें (राम कृपाल भगत मामला, 1969)।
3.
राष्ट्रपति को वार्षिक प्रतिवेदन (पैरा 3): अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन पर राष्ट्रपति को सीधी वार्षिक रिपोर्ट भेजना।
यह प्रावधान 'सुप्त' क्यों बनकर रह गया? (समालोचनात्मक परीक्षण):
1.
अनुच्छेद 163 और मंत्रिपरिषद की बाध्यता: संवैधानिक व्यवहार में राज्यपाल पाँचवीं अनुसूची की शक्तियों का प्रयोग भी राज्य मंत्रिपरिषद की 'सहायता और सलाह' से करते हैं। जब राज्य सरकारें स्वयं खनन या औद्योगिक परियोजनाओं के लिए जनजातीय भूमि का अधिग्रहण करती हैं, तो वे राज्यपाल को अपने विरुद्ध पैरा 5(1) की अधिसूचना जारी करने की सलाह कभी नहीं देतीं।
2.
हानिकारक कानूनों की समीक्षा का अभाव: स्वतंत्रता के बाद सैकड़ों केंद्रीय और राज्य कानून बिना किसी अनुकूलन या समीक्षा के अनुसूचित क्षेत्रों में स्वतः लागू होते चले गए, जिनसे आदिवासियों का वनों और भूमि से विस्थापन हुआ।
3.
वार्षिक रिपोर्टों की अनियमितता: राष्ट्रपति को भेजी जाने वाली राज्यपाल की वार्षिक रिपोर्टें वर्षों तक लंबित रहती हैं और महज नौकरशाही की औपचारिकता बनकर रह गई हैं।
4.
अतिरेक का अपवाद: जहाँ राज्यपाल ने हस्तक्षेप किया भी (जैसे—आंध्र प्रदेश में शिक्षकों के 100% आरक्षण की अधिसूचना), उसे सर्वोच्च न्यायालय ने चेब्रोलू लीला प्रसाद राव मामले (2020) में मौलिक अधिकारों से असंगत पाकर निरस्त कर दिया।
आगे की राह एवं निष्कर्ष:भूरिया आयोग (2004) की सिफारिश के अनुसार, राजभवन में एक स्वतंत्र 'जनजातीय मामलों का प्रकोष्ठ' गठित किया जाना चाहिए, TAC को स्वतः संज्ञान की शक्ति दी जानी चाहिए और पैरा 5 के तहत जनजातीय भूमि व संसाधनों की रक्षा को राज्यपाल का संवैधानिक कर्तव्य बनाया जाना चाहिए ताकि पाँचवीं अनुसूची कागजी प्रावधान से जीवंत सुरक्षा कवच बन सके।