इतिहास वैकल्पिक • प्रश्नपत्र-I • प्रागैतिहास और आद्य इतिहास

2.3 पुरापाषाण काल

भारतीय पुरापाषाण की तकनीक, जीविका, पर्यावरण, क्षेत्रीय विविधता, प्रमुख स्थलों और नवीन वैज्ञानिक काल-निर्धारण का परीक्षा-केंद्रित अध्ययन।

इस पृष्ठ की विषय-सूची

पुरापाषाण काल (Palaeolithic Age) मानव इतिहास का वह लंबा चरण है जिसमें जीवन मुख्यतः शिकार, मृत पशुओं से प्राप्त भोजन, वनस्पति-संग्रह और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित था तथा पत्थर के औजार प्रमुख तकनीकी साधन थे।

भारतीय उपमहाद्वीप में पुरापाषाण काल को किसी एक कठोर तिथि से बाँधना उचित नहीं है। अलग क्षेत्रों और स्थलों पर तकनीकी परिवर्तन अलग समय पर हुए। इसलिए UPSC में कालक्रम + औजार-तकनीक + जीविका + पर्यावरण + क्षेत्रीय विविधता को साथ पढ़ना चाहिए।


2.3.1 पुरापाषाण काल का मूल स्वरूप

पुरापाषाण जीवन की प्रमुख विशेषताएँ थीं:

  • खाद्य-संग्रह और शिकार पर निर्भरता
  • कृषि और व्यवस्थित खाद्य-उत्पादन का अभाव
  • पत्थर के काटे और तराशे हुए औजार
  • जल, पशु और कच्चे पत्थर के स्रोतों के अनुसार गतिशीलता
  • गुफाओं, शैलाश्रयों और खुले स्थलों का उपयोग
  • छोटे और अपेक्षाकृत गतिशील मानव समूह
  • स्थानीय पर्यावरण के अनुसार अलग अनुकूलन

यह काल केवल “पत्थर के औजारों” का इतिहास नहीं है। इससे मानव की बढ़ती तकनीकी क्षमता, संसाधन-ज्ञान और बदलती जीवन-पद्धति का अध्ययन किया जाता है।


2.3.2 पुरापाषाण का काल-विभाजन

भारतीय पुरापाषाण को सामान्यतः तीन भागों में बाँटा जाता है:

  1. निम्न पुरापाषाण (Lower Palaeolithic)
  2. मध्य पुरापाषाण (Middle Palaeolithic)
  3. उच्च पुरापाषाण (Upper Palaeolithic)

कालक्रम पर सावधानी

पुरानी पाठ्यपुस्तकों में भारत के लिए लगभग निम्न क्रम मिलता है:

  • निम्न पुरापाषाण — लगभग 20 लाख वर्ष पूर्व से 80,000 वर्ष पूर्व
  • मध्य पुरापाषाण — लगभग 80,000 से 35,000 वर्ष पूर्व
  • उच्च पुरापाषाण — लगभग 35,000 से 10,000 वर्ष पूर्व

लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक तिथियों से स्पष्ट है कि यह विभाजन पूरे भारत के लिए कठोर नहीं है।

अत्तिरमपक्कम में:

  • निम्न पुरापाषाण एश्यूलियन परंपरा के स्तर लगभग 15 लाख वर्ष पूर्व तक पीछे जाते हैं।
  • मध्य पुरापाषाण जैसी तकनीकी प्रक्रिया लगभग 3.85 लाख वर्ष पूर्व से दिखाई देती है।

इसलिए परीक्षा में किसी एक सार्वभौमिक सीमा को अंतिम सत्य न लिखें।

सही निष्कर्ष:

पुरापाषाण का विभाजन मुख्यतः तकनीकी और सांस्कृतिक परिवर्तन पर आधारित है; उसकी तिथियाँ क्षेत्र और स्थल के अनुसार बदलती हैं।


2.3.3 प्लाइस्टोसीन पर्यावरण और मानव जीवन

भारतीय पुरापाषाण का अधिकांश भाग प्लाइस्टोसीन युग (Pleistocene) से संबंधित है।

इस लंबे काल में जलवायु और पर्यावरण कई बार बदले।

इन परिवर्तनों का प्रभाव पड़ा:

  • वनस्पति पर
  • पशुओं के वितरण पर
  • जल-स्रोतों पर
  • मानव गतिशीलता पर
  • उपलब्ध भोजन पर

लेकिन पर्यावरणीय नियतिवाद से बचें

जलवायु परिवर्तन महत्वपूर्ण था, लेकिन मानव केवल निष्क्रिय प्राणी नहीं था।

मनुष्य:

  • औजार बदलता था,
  • नए संसाधन खोजता था,
  • नए क्षेत्रों में जाता था,
  • स्थानीय पत्थर का उपयोग करता था।

इसलिए मानव इतिहास को केवल “जलवायु बदल गई इसलिए संस्कृति बदल गई” से नहीं समझना चाहिए।


2.3.4 निम्न पुरापाषाण काल

निम्न पुरापाषाण भारतीय उपमहाद्वीप में मानव गतिविधि के सबसे पुराने प्रमाणों से संबंधित है।

इस चरण की दो प्रमुख तकनीकी परंपराएँ सामान्यतः चर्चा में आती हैं:

  1. एश्यूलियन परंपरा (Acheulean Tradition)
  2. सोहन परंपरा (Soanian Tradition)

2.3.5 एश्यूलियन परंपरा

एश्यूलियन परंपरा की पहचान बड़े, द्विपार्श्वीय रूप से तराशे गए औजारों से होती है।

प्रमुख औजार:

  • हस्तकुठार (Handaxe)
  • विदारणी/क्लीवर (Cleaver)
  • चॉपर
  • बड़े फ्लेक
  • कोर औजार

हस्तकुठार

हस्तकुठार पत्थर को दोनों ओर से तराशकर बनाया जाता था।

संभावित उपयोग:

  • काटना
  • पशु-मांस अलग करना
  • लकड़ी पर काम
  • सामान्य बहुउद्देशीय कार्य

इसके निश्चित उपयोग पर केवल आकार के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।

क्लीवर

क्लीवर का चौड़ा काटने वाला किनारा होता था।

यह बड़े काटने के कार्यों में उपयोगी रहा होगा।


2.3.6 एश्यूलियन तकनीक का महत्व

एश्यूलियन औजारों से पता चलता है कि औजार निर्माता:

  • उपयुक्त पत्थर चुनता था,
  • औजार का पूर्व-कल्पित आकार बनाता था,
  • कई चरणों में पत्थर तराशता था,
  • उपयोग के लिए धार बनाता था।

यह केवल “पत्थर तोड़ना” नहीं था, बल्कि तकनीकी योजना और कौशल का प्रमाण है।


2.3.7 अत्तिरमपक्कम

अत्तिरमपक्कम, तमिलनाडु में चेन्नई के निकट कोर्तलैयार नदी बेसिन में स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुरापाषाण स्थल है।

महत्व

यहाँ से:

  • एश्यूलियन हस्तकुठार और क्लीवर
  • निम्न पुरापाषाण से मध्य पुरापाषाण में तकनीकी परिवर्तन
  • वैज्ञानिक तिथियाँ

प्राप्त हुई हैं।

आधुनिक काल-निर्धारण

वैज्ञानिक शोध ने अत्तिरमपक्कम के प्रारंभिक एश्यूलियन स्तरों को लगभग 15.1 ± 0.7 लाख वर्ष पूर्व का संकेत दिया।

इससे यह स्पष्ट हुआ कि भारतीय उपमहाद्वीप में एश्यूलियन तकनीक पहले की कई धारणाओं की तुलना में बहुत पुरानी थी।

बाद के अनुसंधान में लगभग 3.85 ± 0.64 लाख वर्ष पूर्व से मध्य पुरापाषाण जैसे तकनीकी परिवर्तन के प्रमाण मिले।

UPSC के लिए महत्व

अत्तिरमपक्कम तीन कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है:

  1. भारतीय पुरापाषाण की प्राचीनता
  2. निम्न से मध्य पुरापाषाण संक्रमण
  3. आधुनिक वैज्ञानिक काल-निर्धारण का महत्व

2.3.8 हुंसगी–बैचबल घाटी

कर्नाटक की हुंसगी–बैचबल घाटियाँ भारतीय निम्न पुरापाषाण के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय पुरातात्त्विक परिसरों में हैं।

यहाँ बड़ी संख्या में एश्यूलियन स्थल मिले हैं।

विशेष महत्व

यह क्षेत्र केवल औजार मिलने के कारण महत्वपूर्ण नहीं है।

यहाँ अध्ययन से समझा जा सकता है:

  • स्थल-वितरण
  • कच्चे पत्थर का चयन
  • औजार निर्माण
  • जल-स्रोतों से संबंध
  • मानव द्वारा पूरे भू-दृश्य का उपयोग

इस प्रकार हुंसगी अध्ययन “एक स्थल” से आगे बढ़कर क्षेत्रीय पुरातत्व का उदाहरण है।


2.3.9 इसमपुर

इसमपुर, कर्नाटक की हुंसगी घाटी में स्थित महत्वपूर्ण निम्न पुरापाषाण स्थल है।

यह विशेष रूप से एक औजार निर्माण/पत्थर खदान स्थल के रूप में प्रसिद्ध है।

यहाँ मिले:

  • चूना-पत्थर के बड़े फ्लेक
  • हस्तकुठार
  • क्लीवर
  • कोर
  • निर्माण के अधूरे चरण
  • हथौड़ा पत्थर
  • उत्पादन-कचरा

महत्व

इसमपुर से केवल तैयार औजार नहीं मिले।

औजार निर्माण की पूरी प्रक्रिया के प्रमाण मिलते हैं:

कच्चा पत्थर → बड़े फ्लेक → प्रारंभिक रूप → तैयार औजार → उत्पादन-कचरा

इससे पुरापाषाण तकनीक को वास्तविक कार्यस्थल के स्तर पर समझना संभव हुआ।


2.3.10 भीमबेटका

भीमबेटका, मध्य प्रदेश में विंध्य क्षेत्र के शैलाश्रयों का विशाल परिसर है।

यह भारत के सबसे महत्वपूर्ण दीर्घकालिक पुरातात्त्विक स्थलों में है।

यहाँ मानव गतिविधि के प्रमाण:

  • पुरापाषाण
  • मध्यपाषाण
  • बाद के ऐतिहासिक काल

तक फैले हुए हैं।

पुरापाषाण महत्व

  • शैलाश्रय
  • पाषाण औजार
  • लंबे समय तक मानव उपयोग
  • संसाधन-समृद्ध मध्य भारतीय भू-दृश्य

शैलचित्रों पर सावधानी

भीमबेटका अपने शैलचित्रों के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन सभी चित्रों को निम्न या मध्य पुरापाषाण का मानना गलत है।

अनेक संरक्षित चित्र बाद के प्रागैतिहासिक और ऐतिहासिक चरणों से संबंधित हैं।

इसलिए परीक्षा में:

भीमबेटका का पुरापाषाण निवास और उसकी बाद की शैलकला को बिना प्रमाण एक ही काल का न मानें।


2.3.11 नर्मदा घाटी और हथनौरा

नर्मदा घाटी भारतीय पुरापाषाण और मानव-विकास के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

हथनौरा, मध्य प्रदेश से एक महत्वपूर्ण मानव कपाल-अवशेष प्राप्त हुआ था।

इसे सामान्यतः नर्मदा मानव कहा जाता है।

महत्व

भारत में पुरापाषाण काल के मानव जैविक अवशेष अत्यंत दुर्लभ हैं।

इसलिए नर्मदा जीवाश्म का महत्व असाधारण है।

वर्गीकरण पर बहस

इस मानव अवशेष को अलग-अलग विद्वानों ने अलग मानव वर्गों से जोड़ने का प्रयास किया है।

इसका सटीक प्रजातीय वर्गीकरण और काल-निर्धारण विवादित रहा है।

इसलिए UPSC में इसे निश्चित रूप से किसी एक प्रजाति का घोषित करना उचित नहीं।

सुरक्षित कथन:

हथनौरा से प्राप्त नर्मदा मानव जीवाश्म भारतीय मध्य प्लाइस्टोसीन मानव उपस्थिति का महत्वपूर्ण, लेकिन वर्गीकरण की दृष्टि से विवादित प्रमाण है।


2.3.12 सोहन परंपरा

सोहन परंपरा का नाम सोहन नदी घाटी, वर्तमान पाकिस्तान के पोतवार क्षेत्र से जुड़ा है।

इससे प्रायः जुड़े औजार हैं:

  • चॉपर
  • चॉपिंग औजार
  • फ्लेक

एश्यूलियन से अंतर

पारंपरिक वर्गीकरण में:

  • सोहन → कंकड़ और चॉपर परंपरा
  • एश्यूलियन → हस्तकुठार और क्लीवर परंपरा

के रूप में अंतर किया गया।

आधुनिक सावधानी

सोहन और एश्यूलियन को दो पूर्णतः अलग मानव समुदायों या निश्चित जातीय समूहों से जोड़ना उचित नहीं।

इनका संबंध:

  • कच्चे पदार्थ,
  • स्थानीय पर्यावरण,
  • तकनीकी विकल्प,
  • कालक्रम

से भी हो सकता है।

इसलिए पुरानी “दो अलग संस्कृतियों” वाली कठोर व्याख्या को सावधानी से पढ़ना चाहिए।


2.3.13 अन्य महत्वपूर्ण निम्न पुरापाषाण क्षेत्र

दिदवाना — राजस्थान

दिदवाना क्षेत्र से पुरापाषाण औजार और लंबे सांस्कृतिक अनुक्रम के प्रमाण मिले हैं।

यह शुष्क राजस्थान के वर्तमान पर्यावरण और प्राचीन मानव उपस्थिति के अंतर को समझने में भी उपयोगी है।

नेवासा — महाराष्ट्र

गोदावरी-प्रवरा क्षेत्र से निम्न पुरापाषाण औजार मिले हैं।

बेलन घाटी — उत्तर प्रदेश

बेलन घाटी से पुरापाषाण से बाद के प्रागैतिहासिक चरणों तक महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक क्रम मिलता है।

गुडियम — तमिलनाडु

गुडियम गुफाएँ दक्षिण भारतीय पुरापाषाण के महत्वपूर्ण स्थलों में हैं।


2.3.14 मध्य पुरापाषाण काल

मध्य पुरापाषाण में बड़े द्विपार्श्वीय हस्तकुठारों की तुलना में छोटे और अधिक नियंत्रित फ्लेक औजारों का महत्व बढ़ा।

प्रमुख औजार:

  • खुरचनी
  • नोकदार औजार
  • फ्लेक
  • बोरर
  • छोटे कोर-आधारित औजार

तकनीकी परिवर्तन

निम्न पुरापाषाण में अक्सर बड़े औजार प्रमुख थे।

मध्य पुरापाषाण में:

  • छोटे फ्लेक
  • नियंत्रित फ्लेक उत्पादन
  • कच्चे पदार्थ का अधिक चयनात्मक उपयोग

दिखाई देता है।


2.3.15 फ्लेक तकनीक

फ्लेक तकनीक में बड़े पत्थर के कोर से योजनाबद्ध रूप से छोटे टुकड़े निकालकर उन्हें औजार बनाया जाता था।

यह महत्वपूर्ण है क्योंकि औजार का उपयोगी भाग कई बार निकाला गया फ्लेक होता था, न कि केवल मूल कोर।

इससे:

  • पत्थर की बचत
  • हल्के औजार
  • विविध औजार प्रकार

संभव हुए।


2.3.16 मध्य पुरापाषाण की तिथि पर नई समझ

पुरानी भारतीय रूपरेखाओं में मध्य पुरापाषाण को लगभग 80,000 वर्ष पूर्व से जोड़ा जाता था।

लेकिन अत्तिरमपक्कम की वैज्ञानिक तिथियों से मध्य पुरापाषाण जैसी तकनीकी प्रक्रिया लगभग 3.85 लाख वर्ष पूर्व तक पीछे जाती दिखाई गई है।

यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि:

भारत में तकनीकी परिवर्तन के कालक्रम को यूरोप के तैयार ढाँचे से सीधे नहीं बाँधा जा सकता।


2.3.17 मध्य पुरापाषाण के प्रमुख क्षेत्र

मध्य पुरापाषाण अवशेष भारत के अनेक क्षेत्रों से मिले हैं:

  • नर्मदा घाटी
  • मध्य भारत
  • राजस्थान
  • महाराष्ट्र
  • कर्नाटक
  • दक्षिण भारत
  • बेलन घाटी

इस व्यापक वितरण से स्पष्ट है कि इस चरण के मानव समूहों ने विविध पर्यावरणों में जीवन अपनाया।


2.3.18 उच्च पुरापाषाण काल

उच्च पुरापाषाण में औजार-तकनीक में और परिवर्तन दिखाई देता है।

विशेष रूप से:

  • ब्लेड
  • बुरिन
  • अधिक सूक्ष्म पत्थर तकनीक
  • कभी-कभी हड्डी और अन्य पदार्थों का उपयोग

महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

यह चरण आधुनिक मानव व्यवहार की कई विकसित प्रवृत्तियों से भी जुड़ा हुआ माना जाता है।


2.3.19 ब्लेड तकनीक

ब्लेड ऐसा लंबा और अपेक्षाकृत पतला पत्थर फ्लेक है जिसकी लंबाई सामान्यतः चौड़ाई से काफी अधिक होती है।

ब्लेड तकनीक के लाभ:

  • कम कच्चे पत्थर से अधिक काटने वाली धार
  • हल्का औजार
  • अलग-अलग प्रकार के छोटे औजार बनाने की संभावना

यह आगे मध्यपाषाण की सूक्ष्म पाषाण तकनीक की दिशा में महत्वपूर्ण तकनीकी आधार बना।


2.3.20 उच्च पुरापाषाण के प्रमुख स्थल

पटने — महाराष्ट्र

पटने उच्च पुरापाषाण का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल है।

यहाँ से:

  • ब्लेड औजार
  • हड्डी/पदार्थ-संबंधी अवशेष
  • शुतुरमुर्ग के अंडे के खोल से बने मनके और अन्य अवशेष

मिले हैं।

महत्व

शुतुरमुर्ग अंडाछिलका मनके मानव की:

  • सजावट
  • प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति
  • सामाजिक पहचान

की संभावना का महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।

कर्नूल गुफाएँ — आंध्र प्रदेश

कर्नूल क्षेत्र की गुफाओं से उत्तर पुरापाषाण और बाद के प्रागैतिहासिक मानव जीवन के महत्वपूर्ण प्रमाण मिले हैं।

भीमबेटका

इसके दीर्घ सांस्कृतिक अनुक्रम में उत्तर पुरापाषाण और आगे के चरण भी शामिल हैं।


2.3.21 पुरापाषाण मानव की जीविका

UPSC पाठ्यक्रम पुरापाषाण को स्पष्ट रूप से शिकार और संग्रहण से जोड़ता है।

लेकिन “शिकारी” शब्द से यह नहीं मानना चाहिए कि भोजन केवल बड़े पशुओं के सक्रिय शिकार से मिलता था।

संभावित जीविका में शामिल थे:

  • शिकार
  • मृत पशुओं से मांस प्राप्त करना
  • फल
  • कंद
  • बीज
  • मेवे
  • जंगली पौधे
  • छोटे पशु

जैविक पौध सामग्री कम सुरक्षित रहती है, इसलिए पुरातात्त्विक अभिलेख में मांस और पत्थर के औजार अपेक्षाकृत अधिक दिखाई दे सकते हैं।


2.3.22 शिकार बनाम मृतभक्षण की बहस

पुरापाषाण स्थल पर पशु-अस्थि और औजार मिलने से यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि मनुष्य ने वह पशु स्वयं मारा था।

संभव है:

  • शिकार किया गया हो,
  • मृत पशु से मांस लिया गया हो,
  • शिकारी पशुओं के छोड़े अवशेष उपयोग किए गए हों।

निष्कर्ष के लिए आवश्यक हैं:

  • कट-चिह्न
  • अस्थि टूटने का प्रकार
  • दाँत के निशान
  • औजार और अस्थि का संदर्भ

इसलिए “पुरापाषाण मानव महान शिकारी था” जैसी सामान्यीकृत कल्पना से बचना चाहिए।


2.3.23 गतिशील जीवन

कृषि न होने के कारण अधिकांश पुरापाषाण समूहों को भोजन और जल के लिए गतिशील रहना पड़ता था।

गतिशीलता प्रभावित होती थी:

  • ऋतु
  • पशु
  • जल
  • वनस्पति
  • कच्चा पत्थर
  • सुरक्षित आश्रय

लेकिन “घुमंतू” का अर्थ यह नहीं कि वे बिना योजना के निरंतर घूमते थे।

संभवतः वे परिचित भू-दृश्य में संसाधनों के मौसमी चक्र का ज्ञान रखते थे।


2.3.24 निवास

पुरापाषाण मानव केवल गुफाओं में नहीं रहता था।

पुरास्थल दो बड़े प्रकार के हो सकते हैं:

खुले स्थल

नदी घाटी, मैदान या पत्थर-स्रोत के निकट।

शैलाश्रय और गुफाएँ

प्राकृतिक सुरक्षा वाले स्थान।

भीमबेटका जैसे स्थल शैलाश्रय उपयोग का उदाहरण हैं।

लेकिन खुले स्थलों की बड़ी संख्या बताती है कि “गुफा-मानव” की लोकप्रिय छवि अधूरी है।


2.3.25 कच्चे पदार्थ का चयन

औजार निर्माण के लिए उपयोग किए गए:

  • क्वार्टजाइट
  • चर्ट
  • चाल्सेडोनी
  • क्वार्ट्ज
  • चूना-पत्थर
  • स्थानीय रूप से उपलब्ध अन्य पत्थर

कच्चे पदार्थ का अध्ययन बताता है:

  • संसाधन ज्ञान
  • स्थल चयन
  • मानव गतिशीलता
  • औजार निर्माण की योजना

इसमपुर इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।


2.3.26 आग का प्रश्न

विश्व पुरापाषाण में आग का नियंत्रित उपयोग अत्यंत महत्वपूर्ण मानव उपलब्धि थी।

इससे संभव हुए:

  • ताप
  • प्रकाश
  • पशुओं से सुरक्षा
  • भोजन पकाना
  • सामाजिक गतिविधि

लेकिन भारतीय पुरापाषाण में किसी स्थल पर जली सामग्री मिल जाने से नियंत्रित आग का प्रयोग स्वतः सिद्ध नहीं होता।

प्राकृतिक आग भी संभव है।

इसलिए संदर्भित चूल्हे और बार-बार उपयोग जैसे स्पष्ट प्रमाण आवश्यक हैं।

UPSC उत्तर में इस विषय पर अत्यधिक निश्चित दावा न करें।


2.3.27 सामाजिक जीवन

लिखित स्रोतों के अभाव में पुरापाषाण सामाजिक संस्था का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं है।

फिर भी औजार-निर्माण, भोजन-संग्रह और गतिशीलता से कुछ सावधानीपूर्ण अनुमान लगाए जा सकते हैं:

  • समूह सहयोग
  • ज्ञान का पीढ़ीगत हस्तांतरण
  • संसाधन क्षेत्रों का साझा ज्ञान
  • औजार निर्माण कौशल का शिक्षण

लेकिन परिवार, नेतृत्व या सामाजिक पदानुक्रम की निश्चित संरचना बताना अनुमान से आगे चला जाएगा।


2.3.28 प्रतीकात्मक व्यवहार

उच्च पुरापाषाण में मानव के प्रतीकात्मक व्यवहार के कुछ प्रमाण अधिक स्पष्ट होते हैं।

भारत में:

  • शुतुरमुर्ग अंडाछिलका मनके
  • सजावटी पदार्थ
  • बाद की शैलकला परंपरा

मानव की प्रतीकात्मक दुनिया समझने में सहायक हैं।

सावधानी

भीमबेटका की सारी चित्रकला को उच्च पुरापाषाण की सिद्ध कला के रूप में न लिखें।

शैलचित्रों का बड़ा हिस्सा बाद के चरणों से संबंधित है।


2.3.29 पुरापाषाण तकनीक का क्रम

चरण प्रमुख तकनीकी प्रवृत्ति सामान्य औजार
निम्न पुरापाषाण बड़े कोर और द्विपार्श्वीय औजार हस्तकुठार, क्लीवर, चॉपर
मध्य पुरापाषाण फ्लेक-आधारित तकनीक खुरचनी, नोक, फ्लेक
उच्च पुरापाषाण ब्लेड तकनीक और अधिक सूक्ष्मता ब्लेड, बुरिन, छोटे विशिष्ट औजार

यह क्रम उपयोगी है, लेकिन हर क्षेत्र में अचानक और एक ही समय पर परिवर्तन नहीं हुआ।


2.3.30 तकनीकी परिवर्तन का अर्थ

औजार छोटे हो जाना अपने-आप “बुद्धि बढ़ गई” का सीधा प्रमाण नहीं है।

तकनीक बदल सकती है:

  • कच्चे पदार्थ के कारण
  • कार्य की आवश्यकता के कारण
  • गतिशील जीवन के कारण
  • उपलब्ध संसाधनों के कारण
  • सीखी हुई परंपरा के कारण

इसलिए तकनीकी परिवर्तन को सामाजिक और पर्यावरणीय संदर्भ में पढ़ना चाहिए।


2.3.31 भारतीय पुरापाषाण की क्षेत्रीय विविधता

भारत में कोई एक समान पुरापाषाण संस्कृति नहीं थी।

अलग-अलग क्षेत्रों में अंतर थे:

  • औजार के कच्चे पदार्थ
  • औजार प्रकार
  • स्थल का स्वरूप
  • जलवायु
  • संसाधन
  • कालक्रम

इसलिए भारतीय पुरापाषाण को क्षेत्रीय अनुकूलनों के जाल के रूप में समझना अधिक उचित है।


2.3.32 मानव उपस्थिति और “अफ्रीका से प्रसार” की समस्या

मानव विकास का मूल केंद्र अफ्रीका था और अलग मानव समूह समय-समय पर अफ्रीका से बाहर फैले।

भारतीय उपमहाद्वीप अफ्रीका और पूर्वी/दक्षिण-पूर्वी एशिया के बीच महत्वपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र था।

लेकिन भारतीय पुरापाषाण औजार को किसी निश्चित मानव प्रजाति से केवल तकनीक के आधार पर जोड़ना सुरक्षित नहीं है।

कारण:

  • मानव जीवाश्म बहुत कम हैं।
  • समान तकनीक अलग मानव समूह उपयोग कर सकते थे।
  • पत्थर औजार जैविक पहचान नहीं बताते।

अत्तिरमपक्कम के प्रारंभिक मध्य पुरापाषाण को सीधे आधुनिक मानव के आगमन का प्रमाण मानना भी विवादित है।


2.3.33 नर्मदा मानव का इतिहासलेखन में महत्व

नर्मदा मानव ने भारतीय मानव-विकास अध्ययन में एक बड़ी समस्या सामने रखी:

पत्थर के औजार तो बहुत हैं, लेकिन उन्हें बनाने वाले मनुष्यों के जीवाश्म बहुत कम क्यों हैं?

भारतीय जलवायु और मिट्टी की परिस्थितियाँ मानव अस्थियों के संरक्षण के लिए हमेशा अनुकूल नहीं थीं।

इस कारण भारतीय पुरापाषाण में:

औजारों का इतिहास अधिक स्पष्ट है, मानव जैविक विकास का इतिहास कम स्पष्ट।


2.3.34 पुरापाषाण अध्ययन में प्रमुख विद्वान

रॉबर्ट ब्रूस फूट

1863 में मद्रास के निकट पल्लवरम से पुरापाषाण हस्तकुठार की पहचान ने भारतीय प्रागैतिहासिक पुरातत्व के अध्ययन में महत्वपूर्ण प्रारंभिक मोड़ दिया।

इसी कारण रॉबर्ट ब्रूस फूट को अक्सर भारतीय प्रागैतिहासिक अध्ययन के अग्रदूतों में माना जाता है।

एच. डी. संकालिया

भारतीय प्रागैतिहासिक पुरातत्व को व्यवस्थित क्षेत्रीय अध्ययन और वैज्ञानिक पद्धति से विकसित करने में एच. डी. संकालिया का महत्वपूर्ण योगदान था।

के. पड्डय्या

हुंसगी–बैचबल और इसमपुर के विस्तृत अध्ययन से के. पड्डय्या ने पुरापाषाण मानव के:

  • स्थल चयन
  • कच्चे पदार्थ
  • औजार निर्माण
  • भू-दृश्य उपयोग

को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

शांति पप्पू और सहयोगी

अत्तिरमपक्कम में आधुनिक वैज्ञानिक काल-निर्धारण और लंबे तकनीकी अनुक्रम ने भारतीय पुरापाषाण की पुरानी समय-सीमा पर पुनर्विचार कराया।


2.3.35 पुरानी और नई व्याख्या

पुरानी रूपरेखा

भारतीय पुरापाषाण को अक्सर यूरोपीय कालक्रम के आधार पर अपेक्षाकृत देर से विकसित मान लिया जाता था।

नई पुरातात्त्विक समझ

वैज्ञानिक तिथियों से स्पष्ट हुआ:

  • भारतीय एश्यूलियन अत्यंत प्राचीन है।
  • तकनीकी परिवर्तन की तिथियाँ क्षेत्रीय हैं।
  • मध्य पुरापाषाण का आरंभ पहले माने गए समय से कहीं पुराना हो सकता है।
  • भारत को केवल दूसरे क्षेत्रों से “तकनीक प्राप्त करने वाला” निष्क्रिय क्षेत्र नहीं माना जा सकता।

लेकिन इससे मानव प्रवास के सभी प्रश्न हल नहीं होते।


2.3.36 प्रमुख स्थलों की परीक्षा-सारणी

स्थल वर्तमान क्षेत्र विशेष महत्व
पल्लवरम तमिलनाडु 1863 में प्रारंभिक पुरापाषाण खोज; रॉबर्ट ब्रूस फूट
अत्तिरमपक्कम तमिलनाडु अत्यंत प्राचीन एश्यूलियन; निम्न–मध्य पुरापाषाण संक्रमण
गुडियम तमिलनाडु गुफा-आधारित पुरापाषाण साक्ष्य
हुंसगी–बैचबल कर्नाटक विशाल एश्यूलियन स्थल-समूह; क्षेत्रीय पुरातत्व
इसमपुर कर्नाटक एश्यूलियन खदान/औजार निर्माण स्थल
भीमबेटका मध्य प्रदेश दीर्घ पुरापाषाण–मध्यपाषाण शैलाश्रय परंपरा
हथनौरा मध्य प्रदेश नर्मदा मानव जीवाश्म
दिदवाना राजस्थान पुरापाषाण क्रम और शुष्क क्षेत्र का प्राचीन पर्यावरण
बेलन घाटी उत्तर प्रदेश दीर्घ प्रागैतिहासिक सांस्कृतिक अनुक्रम
पटने महाराष्ट्र उच्च पुरापाषाण; ब्लेड और शुतुरमुर्ग अंडाछिलका
कर्नूल गुफाएँ आंध्र प्रदेश उत्तर पुरापाषाण और गुफा-अवशेष
सोहन घाटी वर्तमान पाकिस्तान चॉपर-चॉपिंग परंपरा

2.3.37 मानचित्रण

History Optional में पुरापाषाण स्थल 50 अंकों के मानचित्र प्रश्न में बार-बार पूछे गए हैं।

कम से कम निम्न स्थल मानचित्र पर निश्चित रूप से पहचानें:

  • पल्लवरम
  • अत्तिरमपक्कम
  • हुंसगी
  • इसमपुर
  • भीमबेटका
  • हथनौरा
  • दिदवाना
  • पटने
  • बेलन घाटी
  • कर्नूल
  • सोहन घाटी

मानचित्र-नोट का 30-शब्दीय ढाँचा

किसी स्थल पर लिखें:

स्थान + काल + मुख्य खोज + ऐतिहासिक महत्व

उदाहरण:

अत्तिरमपक्कम: तमिलनाडु के कोर्तलैयार बेसिन का प्रमुख पुरापाषाण स्थल; एश्यूलियन हस्तकुठार तथा वैज्ञानिक तिथियों से लगभग 15 लाख वर्ष पुरानी मानव तकनीकी गतिविधि के प्रमाण।


2.3.38 निम्न, मध्य और उच्च पुरापाषाण: तुलना

आयाम निम्न मध्य उच्च
औजार का सामान्य आकार बड़ा अपेक्षाकृत छोटा लंबा, पतला, विशिष्ट
मुख्य तकनीक कोर/द्विपार्श्वीय फ्लेक ब्लेड
प्रमुख औजार हस्तकुठार, क्लीवर खुरचनी, नोक ब्लेड, बुरिन
जीविका शिकार-संग्रह शिकार-संग्रह शिकार-संग्रह
गतिशीलता उच्च उच्च क्षेत्रानुसार
प्रतीकात्मक प्रमाण अत्यल्प/अस्पष्ट सीमित अपेक्षाकृत अधिक
प्रमुख भारतीय उदाहरण अत्तिरमपक्कम, इसमपुर अत्तिरमपक्कम, मध्य भारत पटने, कर्नूल

2.3.39 पुरापाषाण से मध्यपाषाण की ओर संक्रमण

पुरापाषाण के अंतिम चरण में:

  • औजार छोटे और अधिक विशिष्ट हुए,
  • ब्लेड तकनीक विकसित हुई,
  • स्थानीय पर्यावरण में संसाधन उपयोग अधिक विविध हुआ।

प्लाइस्टोसीन के अंत और होलोसीन के आरंभ में जलवायु परिवर्तन के साथ आगे:

  • सूक्ष्म पाषाण तकनीक,
  • अधिक विविध भोजन,
  • कुछ क्षेत्रों में अधिक स्थायित्व

दिखाई देता है।

इसी प्रक्रिया को अगले विषय 2.4 मध्यपाषाण काल में विस्तार से पढ़ा जाएगा।


2.3.40 UPSC उत्तर में क्या लिखना है?

यदि प्रश्न हो — “भारतीय पुरापाषाण की विशेषताओं का वर्णन कीजिए” — तो केवल औजारों की सूची न दें।

उत्तर का क्रम:

भूमिका

पुरापाषाण की प्रकृति और क्षेत्रीय कालक्रम।

तकनीक

निम्न → मध्य → उच्च परिवर्तन।

पर्यावरण

प्लाइस्टोसीन और संसाधन।

जीविका

शिकार और संग्रहण।

प्रमुख स्थल

अत्तिरमपक्कम, हुंसगी, भीमबेटका, नर्मदा, पटने।

विश्लेषण

क्षेत्रीय विविधता और आधुनिक वैज्ञानिक तिथियाँ।

निष्कर्ष

भारतीय पुरापाषाण को रैखिक और एक समान क्रम के बजाय दीर्घकालिक क्षेत्रीय अनुकूलन के रूप में समझें।


2.3.41 सामान्य गलतियाँ

गलती 1

“पुरापाषाण मानव केवल गुफाओं में रहता था।”

सही: खुले स्थल भी बड़ी संख्या में मिले हैं।

गलती 2

“हस्तकुठार केवल हथियार था।”

सही: यह बहुउद्देशीय काटने वाला औजार हो सकता है; निश्चित उपयोग संदर्भ पर निर्भर है।

गलती 3

“निम्न पुरापाषाण समाप्त होते ही पूरे भारत में मध्य पुरापाषाण शुरू हो गया।”

सही: परिवर्तन क्षेत्रीय और असमान था।

गलती 4

“भीमबेटका की सभी चित्रकलाएँ पुरापाषाण की हैं।”

सही: स्थल का निवास बहुत पुराना है, पर अधिकांश संरक्षित चित्रों की तिथियाँ बाद के चरणों तक फैली हैं।

गलती 5

“एश्यूलियन औजार = निश्चित मानव प्रजाति।”

सही: केवल पत्थर तकनीक से जैविक प्रजाति तय नहीं की जा सकती।

गलती 6

“नर्मदा मानव निश्चित रूप से अमुक प्रजाति था।”

सही: उसका वर्गीकरण विवादित है।


2.3.42 परीक्षा के लिए केंद्रीय निष्कर्ष

भारतीय पुरापाषाण की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी दीर्घ अवधि और क्षेत्रीय विविधता है।

इस काल में मानव ने:

  • अलग पर्यावरणों में अनुकूलन किया,
  • उपलब्ध कच्चे पदार्थ का चयन किया,
  • औजार निर्माण की तकनीक विकसित की,
  • विशाल भूभाग में संसाधनों का उपयोग किया।

अत्तिरमपक्कम और इसमपुर जैसी खोजें दिखाती हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप प्रारंभिक मानव तकनीकी इतिहास का एक सक्रिय और अत्यंत प्राचीन क्षेत्र था।

सबसे संतुलित निष्कर्ष:

भारतीय पुरापाषाण को औजारों की तीन क्रमिक सूचियों के रूप में नहीं, बल्कि पर्यावरण, गतिशीलता, जीविका और बदलती तकनीक के दीर्घ क्षेत्रीय इतिहास के रूप में समझना चाहिए।


सत्यापित UPSC इतिहास वैकल्पिक PYQ

मुख्य वर्णनात्मक प्रश्नों की स्थिति

2010 से 2026 के सत्यापित विषयवार प्रश्नों में केवल पुरापाषाण काल पर पृथक वर्णनात्मक प्रश्न नहीं मिला

इस इकाई में UPSC ने हाल के वर्षों में अधिकतर:

  • भौगोलिक कारक,
  • नवपाषाण,
  • ताम्रपाषाण

पर प्रत्यक्ष वर्णनात्मक प्रश्न पूछे हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि पुरापाषाण कम महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मानचित्र प्रश्न में बार-बार पूछा जाता है।


2021 — Paper-I — मानचित्र प्रश्न

UPSC ने मानचित्र में दो स्थानों के लिए अलग-अलग संकेत दिए:

  • पुरापाषाण स्थल
  • पुरापाषाण स्थल

स्वीकृत पहचान में प्रमुख रूप से:

  • अत्तिरमपक्कम
  • हुंसगी

जैसे स्थल शामिल किए जाते हैं।

मानचित्र प्रश्न में वास्तविक स्थान प्रश्नपत्र के नक्शे पर दिए बिंदु से निर्धारित होता है; इसलिए केवल संकेत देखकर स्थल का नाम स्थिर नहीं मानना चाहिए।


2019 — Paper-I — मानचित्र प्रश्न

मानचित्र संकेत में “Stone Age site” पूछा गया था।

ऐसे प्रश्न के लिए संबंधित स्थल की:

  • स्थिति,
  • काल,
  • प्रमुख पदार्थ-संस्कृति

का लगभग 30 शब्दों में नोट तैयार रहना चाहिए।


2013 — Paper-I — मानचित्र प्रश्न

मानचित्र अनुभाग में:

  • एक पुरापाषाण–मध्यपाषाण स्थल
  • अनेक पुरापाषाण स्थल
  • महत्वपूर्ण मानव जीवाश्म स्थल

पूछे गए।

प्रमुख उत्तरों में:

  • हुंसगी
  • दिदवाना
  • हथनौरा

जैसे स्थल महत्वपूर्ण रहे हैं।


इस विषय से आगे संभावित प्रश्न की तैयारी

प्रत्यक्ष PYQ कम होने के बावजूद निम्न प्रश्न पूर्ण रूप से तैयार होने चाहिए:

  1. भारतीय निम्न पुरापाषाण की क्षेत्रीय विशेषताओं का विश्लेषण कीजिए।
  2. एश्यूलियन और सोहन परंपराओं की तुलना कीजिए।
  3. अत्तिरमपक्कम ने भारतीय पुरापाषाण कालक्रम की समझ को किस प्रकार बदला?
  4. पुरापाषाण मानव की जीविका और गतिशीलता के पुनर्निर्माण में पुरातात्त्विक साक्ष्य की सीमाओं का परीक्षण कीजिए।
  5. भारतीय पुरापाषाण को एक समान अखिल-भारतीय सांस्कृतिक क्रम मानना कहाँ तक उचित है?

ये अभ्यास-प्रश्न हैं, PYQ नहीं

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