इतिहास वैकल्पिक • प्रश्नपत्र-I • प्रागैतिहास और आद्य इतिहास

2.4 मध्यपाषाण काल

UPSC इतिहास वैकल्पिक के लिए भारतीय मध्यपाषाण काल: सूक्ष्म पाषाण तकनीक, जीविका, दफन, शैलकला, प्रमुख स्थल, कालक्रम, इतिहासलेखन, मानचित्रण और सत्यापित PYQ।

इस पृष्ठ की विषय-सूची

मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age) पुरापाषाण शिकारी-संग्राहक जीवन और बाद के खाद्य-उत्पादक नवपाषाण समाजों के बीच का एक महत्त्वपूर्ण संक्रमणकाल था। इसकी पहचान केवल छोटे पत्थर के औजारों से नहीं, बल्कि जीविका के विविधीकरण, सूक्ष्म पाषाण तकनीक, कुछ क्षेत्रों में बढ़ते अर्ध-स्थायित्व, दफन संस्कार, शैलकला और स्थानीय पर्यावरण के अधिक गहन उपयोग से होती है।

भारतीय उपमहाद्वीप में मध्यपाषाण की तिथियाँ पूरे क्षेत्र में एक समान नहीं हैं। सामान्यतः इसका मुख्य विस्तार आरंभिक होलोसीन से जुड़ा माना जाता है, किंतु कई क्षेत्रों में सूक्ष्म पाषाण परंपराएँ कृषि और धातु-उपयोग करने वाले समाजों के साथ भी लंबे समय तक चलती रहीं।

इसलिए सही दृष्टिकोण है:

मध्यपाषाण कोई एक समान अखिल-भारतीय काल नहीं, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में विकसित शिकारी-संग्राहक समुदायों की विविध स्थानीय परंपराओं का समूह था।


2.4.1 पुरापाषाण से मध्यपाषाण की ओर संक्रमण

पुरापाषाण के अंतिम चरण से मध्यपाषाण की ओर परिवर्तन में कई प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं:

  • औजारों का आकार छोटा हुआ,
  • सूक्ष्म पाषाणों का व्यापक उपयोग बढ़ा,
  • भोजन के स्रोत अधिक विविध हुए,
  • बड़े पशुओं के साथ छोटे पशु, पक्षी और मछली का उपयोग बढ़ा,
  • कुछ क्षेत्रों में जल-स्रोतों के निकट अधिक स्थायी या अर्ध-स्थायी निवास दिखता है,
  • दफन संस्कार अधिक स्पष्ट होते हैं,
  • शैलचित्रों और सजावटी वस्तुओं से प्रतीकात्मक व्यवहार का प्रमाण बढ़ता है।

यह परिवर्तन अचानक नहीं था।

कई क्षेत्रों में पुरापाषाण और मध्यपाषाण तकनीकी विशेषताएँ क्रमिक रूप से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं।


2.4.2 पर्यावरणीय पृष्ठभूमि

मध्यपाषाण का अधिकांश विकास होलोसीन (Holocene) के प्रारंभिक चरण से जुड़ा है।

प्लाइस्टोसीन के अंत के बाद:

  • तापमान बढ़ा,
  • हिमयुगीन परिस्थितियों में परिवर्तन हुआ,
  • वनस्पति क्षेत्र बदले,
  • पशु समुदायों में परिवर्तन आया,
  • अनेक क्षेत्रों में जल और आर्द्रभूमि संसाधन बढ़े।

इन परिवर्तनों ने मानव समुदायों के सामने नए अवसर पैदा किए।

लेकिन यह नहीं मानना चाहिए कि जलवायु परिवर्तन ने स्वयं मध्यपाषाण संस्कृति “बना दी।”

मानव समुदायों ने नए पर्यावरण का उत्तर अपनी:

  • तकनीक,
  • स्थानीय ज्ञान,
  • गतिशीलता,
  • भोजन रणनीति

के माध्यम से दिया।


2.4.3 सूक्ष्म पाषाण

मध्यपाषाण काल की सबसे पहचान योग्य तकनीकी विशेषता सूक्ष्म पाषाण (Microliths) हैं।

ये सामान्यतः छोटे, सावधानीपूर्वक बनाए गए पत्थर के औजार होते थे।

इनकी लंबाई प्रायः कुछ सेंटीमीटर के भीतर होती थी।

प्रयुक्त कच्चे पदार्थों में शामिल थे:

  • चर्ट,
  • चाल्सेडोनी,
  • जैस्पर,
  • अगेट,
  • क्वार्ट्ज,
  • अन्य महीन दानेदार पत्थर।

इन पदार्थों से छोटी लेकिन तीखी धार वाले औजार बनाना संभव था।


2.4.4 ज्यामितीय और गैर-ज्यामितीय सूक्ष्म पाषाण

सूक्ष्म पाषाणों को व्यापक रूप से दो वर्गों में रखा जा सकता है।

गैर-ज्यामितीय सूक्ष्म पाषाण

इनमें शामिल हैं:

  • ब्लेड
  • बैक्ड ब्लेड
  • नोक
  • खुरचनी
  • बोरर

ज्यामितीय सूक्ष्म पाषाण

इनमें प्रमुख हैं:

  • त्रिकोण
  • समलंब
  • अर्धचंद्राकार औजार

ज्यामितीय सूक्ष्म पाषाण कई विकसित मध्यपाषाण परंपराओं की विशेष पहचान हैं।

लेकिन किसी स्थल पर ज्यामितीय औजारों का अभाव यह सिद्ध नहीं करता कि वहाँ का समाज “कम विकसित” था।

औजार स्थानीय कार्य और संसाधन से जुड़े थे।


2.4.5 सूक्ष्म पाषाण इतने छोटे क्यों थे?

छोटे औजारों के कई लाभ थे:

  • कम पत्थर में अधिक धार,
  • हल्का वजन,
  • परिवहन में सुविधा,
  • टूटने पर केवल छोटा भाग बदलना,
  • लकड़ी या हड्डी में जड़कर संयुक्त औजार बनाना।

इस प्रकार सूक्ष्म पाषाण केवल तकनीकी लघुकरण नहीं थे, बल्कि संसाधन-कुशल तकनीक थे।


2.4.6 संयुक्त औजार

कई सूक्ष्म पाषाणों को लकड़ी या हड्डी के आधार में जड़कर संयुक्त औजार बनाए जा सकते थे।

संभावित रूप:

  • तीर
  • भाला
  • काटने का औजार
  • दरांती-सदृश उपकरण
  • मछली पकड़ने के उपकरण

इससे एक छोटी पत्थर धार बड़े बहुउद्देशीय औजार का हिस्सा बन सकती थी।

ऐतिहासिक महत्व

संयुक्त औजार बताते हैं कि तकनीक केवल पत्थर तक सीमित नहीं थी।

लकड़ी, हड्डी और रेशों जैसे जैविक पदार्थ भी उपयोग होते होंगे, किंतु उनका संरक्षण कम होता है।

इसलिए पुरातात्त्विक अभिलेख में पत्थर अनुपातहीन रूप से अधिक दिखाई देता है।


2.4.7 सूक्ष्म पाषाण निर्माण

मध्यपाषाण औजार बनाने में:

  • छोटे कोर,
  • नियंत्रित ब्लेड उत्पादन,
  • किनारों का कुंद करना,
  • सूक्ष्म रीटच

जैसी तकनीकें उपयोग होती थीं।

सूक्ष्म-बुरिन तकनीक

कुछ ज्यामितीय सूक्ष्म पाषाण बनाने में ब्लेड को नियंत्रित ढंग से तोड़ने की तकनीक उपयोग हुई।

इससे छोटे आकार के नियमित टुकड़े बनाए जा सकते थे।


2.4.8 तकनीकी परिवर्तन और जीविका का संबंध

सूक्ष्म पाषाणों का विस्तार बदलती जीविका से जुड़ा था।

छोटे प्रक्षेपास्त्र उपयोगी थे:

  • छोटे पशुओं के शिकार में,
  • पक्षी पकड़ने में,
  • मछली पकड़ने के उपकरणों में,
  • तेज और हल्के तीरों में।

इससे मध्यपाषाण भोजन अर्थव्यवस्था पुरापाषाण के कुछ बड़े शिकार-केंद्रित रूपों की तुलना में अधिक विविध हुई।


2.4.9 व्यापक आहार

मध्यपाषाण शिकारी-संग्राहकों की जीविका में शामिल थे:

  • हिरण और अन्य जंगली पशु,
  • छोटे स्तनधारी,
  • पक्षी,
  • मछली,
  • कछुआ,
  • घोंघे और शंख,
  • जंगली फल,
  • बीज,
  • कंद,
  • वनस्पति भोजन।

यह परिवर्तन व्यापक-संसाधन उपयोग की ओर संकेत करता है।

इससे समुदाय एक ही प्रकार के बड़े पशु पर कम निर्भर हो सकते थे।


2.4.10 मछली और जल-संसाधन

मध्य गंगा घाटी के कई मध्यपाषाण स्थल पुराने झील या जल-स्रोतों के निकट स्थित थे।

यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

ऐसे स्थान उपलब्ध कराते थे:

  • मछली,
  • कछुए,
  • पक्षी,
  • जल,
  • वनस्पति,
  • पशुओं के चरने के क्षेत्र।

इस कारण कुछ स्थानों पर मौसमी या लगभग दीर्घकालिक निवास संभव हुआ।


2.4.11 शिकार की बदलती प्रकृति

मध्यपाषाण में बड़े पशुओं का शिकार समाप्त नहीं हुआ।

लेकिन भोजन का आधार व्यापक हुआ।

छोटे और तेज औजारों से:

  • छोटे पशु,
  • पक्षी,
  • मछली

जैसे संसाधनों का प्रभावी उपयोग संभव हुआ।

इसीलिए मध्यपाषाण जीविका को केवल “शिकार” कहने के बजाय:

शिकार + मछली + पक्षी + वनस्पति संग्रह

के व्यापक ढाँचे में समझना अधिक उचित है।


2.4.12 अर्ध-स्थायित्व

पुरापाषाण की तुलना में कुछ मध्यपाषाण स्थलों पर अधिक स्थायित्व के संकेत मिलते हैं।

इनमें शामिल हैं:

  • झोपड़ी के अवशेष,
  • चूल्हे,
  • आवासीय फर्श,
  • दफन,
  • बार-बार निवास,
  • भोजन संसाधनों की स्थानीय प्रचुरता।

लेकिन सभी मध्यपाषाण समुदाय स्थायी ग्रामों में नहीं रहते थे।

सही शब्द है:

अर्ध-स्थायी या मौसमी स्थायित्व


2.4.13 मौसमी गतिशीलता

कई शिकारी-संग्राहक समुदाय संभवतः पूरे वर्ष एक ही स्थल पर नहीं रहते थे।

वे मौसम के अनुसार:

  • जल,
  • मछली,
  • वनस्पति,
  • पशु,
  • कच्चा पत्थर

के लिए अलग क्षेत्रों का उपयोग करते होंगे।

इसलिए:

स्थायित्व और गतिशीलता विरोधी अवस्थाएँ नहीं थीं।

एक समुदाय वर्ष के कुछ हिस्से में स्थायी शिविर और दूसरे समय मौसमी यात्रा कर सकता था।


2.4.14 सराय नाहर राय

सराय नाहर राय, उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ क्षेत्र का अत्यंत महत्वपूर्ण मध्यपाषाण स्थल है।

यह एक प्राचीन झील-सदृश जल-स्रोत के निकट स्थित था।

प्रमुख खोजें

  • ज्यामितीय सूक्ष्म पाषाण
  • पशु-अस्थियाँ
  • मछली और जलीय जीवों के अवशेष
  • चूल्हे
  • मानव दफन

मानव दफन

यहाँ 11 कब्रों में 14 व्यक्तियों के अवशेष मिले।

कुछ कब्रों में एक से अधिक व्यक्ति भी मिले।

ऐतिहासिक महत्व

सराय नाहर राय दिखाता है कि मध्य गंगा मैदान के शिकारी-संग्राहक:

  • केवल घूमते हुए समूह नहीं थे,
  • कुछ संसाधन-समृद्ध स्थानों से गहरा संबंध रखते थे,
  • मृतकों को व्यवस्थित रूप से दफनाते थे।

यह स्थान-आधारित सामाजिक पहचान का संकेत हो सकता है।

लेकिन इससे पूर्ण निजी भूमि-स्वामित्व सिद्ध नहीं किया जा सकता।


2.4.15 महदहा

महदहा, उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ क्षेत्र का एक अन्य महत्वपूर्ण मध्यपाषाण स्थल है।

प्रमुख प्रमाण

  • सूक्ष्म पाषाण
  • मानव दफन
  • पशु-अस्थियाँ
  • झील-आधारित संसाधन

यहाँ 28 कब्रों में लगभग 30 व्यक्तियों के अवशेष दर्ज किए गए हैं।

कुछ दोहरे दफन भी मिले।

महत्त्व

महदहा से:

  • दफन संस्कार,
  • समूह पहचान,
  • शारीरिक मानवविज्ञान,
  • भोजन,
  • शिकार-संग्रह

का अध्ययन संभव हुआ।


2.4.16 दमदमा

दमदमा, प्रतापगढ़ का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण मध्यपाषाण आवास एवं दफन स्थल है।

यहाँ मोटी सांस्कृतिक जमावट और कई चरणों का निवास मिला।

प्रमुख खोजें

  • बड़ी संख्या में सूक्ष्म पाषाण
  • चूल्हे
  • पशु-अस्थियाँ
  • हड्डी की वस्तुएँ
  • पीसने वाले पत्थर
  • अनेक मानव दफन

विशेष रूप से:

  • एकल दफन
  • दोहरे दफन
  • बहु-दफन
  • अलग-अलग शरीर स्थितियाँ

मिली हैं।

महत्त्व

दमदमा मध्यपाषाण समाज की आंतरिक विविधता और मृत्यु-संस्कार के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।


2.4.17 गंगा घाटी के दफन का अर्थ

सराय नाहर राय, महदहा और दमदमा के दफन कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं:

  • मृतक को निवास क्षेत्र के भीतर या निकट क्यों दफनाया गया?
  • क्या समुदाय किसी विशेष स्थान से स्थायी संबंध बना रहा था?
  • क्या समूह पहचान विकसित हो रही थी?
  • क्या कब्र-सामग्री सामाजिक अंतर दिखाती है?

सावधानी

दफन-सामग्री से सीधे “वर्ग समाज” सिद्ध नहीं करना चाहिए।

सामग्री का अंतर:

  • उम्र,
  • लिंग,
  • अनुष्ठान,
  • सामाजिक भूमिका

से भी जुड़ा हो सकता है।


2.4.18 मध्यपाषाण मानव स्वास्थ्य और जीवन

कंकाल अध्ययन से कुछ स्थलों पर:

  • चोट,
  • दाँतों की स्थिति,
  • आयु,
  • रोग,
  • शारीरिक श्रम

के बारे में जानकारी मिलती है।

एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मध्यपाषाण मानव केवल “औजार बनाने वाला” नहीं था; जैव-पुरातात्त्विक अध्ययन हमें उसके वास्तविक शरीर और जीवन के बारे में भी जानकारी देता है।


2.4.19 हिंसा के प्रमाण

कुछ मध्यपाषाण दफनों में शरीर पर चोट और प्रक्षेपास्त्र-सदृश प्रमाण मिले हैं।

इनसे पारस्परिक हिंसा की संभावना पर चर्चा हुई है।

लेकिन एक या कुछ चोटों से पूरे समाज को युद्धप्रिय नहीं कहा जा सकता।

सही निष्कर्ष:

मध्यपाषाण समुदायों में पारस्परिक संघर्ष संभव था, पर उसकी सामाजिक व्यापकता तय करने के लिए पर्याप्त प्रमाण आवश्यक हैं।


2.4.20 चोपनी मांडो

चोपनी मांडो, उत्तर प्रदेश की बेलन घाटी का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थल है।

यह पुरापाषाणोत्तर से मध्यपाषाण और खाद्य-उत्पादन की ओर संक्रमण को समझने में विशेष उपयोगी है।

सांस्कृतिक क्रम

यहाँ क्रमिक रूप से:

  • उत्तर पुरापाषाणोत्तर चरण,
  • गैर-ज्यामितीय मध्यपाषाण,
  • ज्यामितीय मध्यपाषाण,
  • बाद का विकसित चरण

मिला।

आवास

यहाँ गोल और अंडाकार झोपड़ियों के प्रमाण मिले।

कुछ झोपड़ियों में:

  • खंभों के गड्ढे,
  • फर्श,
  • चूल्हे,
  • सूक्ष्म पाषाण,
  • पीसने वाले पत्थर

मिले।

महत्त्व

चोपनी मांडो का सबसे बड़ा महत्त्व है:

शिकारी-संग्राहक जीवन से अधिक स्थायी और खाद्य-उत्पादन की ओर बढ़ती जीवन-पद्धति का क्रमिक प्रमाण।

लेकिन इसे पूर्ण विकसित नवपाषाण ग्राम मानना उचित नहीं।


2.4.21 बेलन घाटी

बेलन घाटी भारतीय प्रागैतिहास का महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है क्योंकि यहाँ:

  • पुरापाषाण,
  • मध्यपाषाण,
  • नवपाषाण

का लंबा सांस्कृतिक क्रम मिलता है।

इससे एक ही क्षेत्र में दीर्घकालीन परिवर्तन का अध्ययन संभव होता है।

ऐतिहासिक महत्व

बेलन घाटी दिखाती है कि:

  • तकनीक,
  • बसावट,
  • भोजन,
  • कृषि

में परिवर्तन क्रमिक और बहु-चरणीय था।


2.4.22 बागोर

बागोर, राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में कोठारी नदी के निकट स्थित एक प्रमुख मध्यपाषाण स्थल है।

यह पश्चिमी भारत के सबसे महत्वपूर्ण शिकारी-संग्राहक स्थलों में से है।

प्रमुख विशेषताएँ

  • सूक्ष्म पाषाण
  • आवासीय गतिविधि
  • पशु-अस्थियाँ
  • दफन
  • चूल्हे
  • बाद के चरणों में पशुपालक और कृषक समुदायों से संपर्क

पशु-पालन का प्रश्न

बागोर की कुछ बाद की परतों में पालतू पशुओं से जुड़े प्रमाणों पर चर्चा की गई है।

लेकिन सावधानी आवश्यक है:

मध्यपाषाण की प्रारंभिक शिकारी-संग्राहक अवस्था और बाद के पशुपालक संपर्क को एक ही समय का न मानें।

बागोर का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान संक्रमण और सांस्कृतिक संपर्क को समझने में है।


2.4.23 लंघनाज

लंघनाज, गुजरात के मेहसाणा क्षेत्र का महत्वपूर्ण मध्यपाषाण स्थल है।

यहाँ से मिले हैं:

  • सूक्ष्म पाषाण
  • मानव कंकाल
  • पशु-अवशेष
  • शिकारी-संग्राहक जीवन के प्रमाण

महत्त्व

लंघनाज पश्चिमी भारत के मध्यपाषाण मानव समुदायों के:

  • शारीरिक अध्ययन,
  • जीविका,
  • क्षेत्रीय अनुकूलन

के लिए विशेष महत्त्व रखता है।


2.4.24 आदमगढ़

आदमगढ़, मध्य प्रदेश के होशंगाबाद/नर्मदापुरम क्षेत्र का प्रमुख शैलाश्रय और मध्यपाषाण स्थल है।

यहाँ:

  • सूक्ष्म पाषाण
  • शैलचित्र
  • मानव निवास

के प्रमाण मिले हैं।

कुछ स्तरों से पशु-पालन की संभावना पर भी चर्चा की गई है।

लेकिन विभिन्न सांस्कृतिक स्तरों को अलग रखना आवश्यक है।


2.4.25 भीमबेटका

भीमबेटका का उपयोग मध्यपाषाण में भी जारी रहा।

यहाँ शैलाश्रय, सूक्ष्म पाषाण और शैलकला की दीर्घ परंपरा का प्रमाण है।

मध्यपाषाण महत्त्व

भीमबेटका मानव और उसके प्राकृतिक परिदृश्य के दीर्घ संबंध को दिखाता है।

सावधानी

भीमबेटका की सभी चित्रकलाओं को मध्यपाषाण का न मानें।

शैलकला विभिन्न कालों में बनी और कई चित्र बाद के हैं।


2.4.26 शैलचित्र

मध्य भारत के शैलाश्रयों की चित्रकला शिकारी-संग्राहक समाज के प्रतीकात्मक और सामाजिक संसार की जानकारी देती है।

चित्रों में दिखाई दे सकते हैं:

  • शिकार
  • नृत्य
  • समूह गतिविधियाँ
  • पशु
  • मानव आकृतियाँ

ऐतिहासिक उपयोग

इनसे अनुमान लगाया जा सकता है:

  • सामूहिक गतिविधि,
  • पशुओं का ज्ञान,
  • शिकार की सामाजिक भूमिका,
  • प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति।

सीमा

चित्र की तिथि तय करना कठिन हो सकता है।

एक ही शैलाश्रय पर अलग-अलग समय की चित्र परतें हो सकती हैं।

इसलिए चित्र को सीधे किसी विशेष मध्यपाषाण औजार-स्तर से जोड़ना सावधानी माँगता है।


2.4.27 शैलकला: इतिहास या प्रत्यक्ष दृश्य?

शैलचित्र को “फोटोग्राफ” की तरह नहीं पढ़ना चाहिए।

चित्र:

  • वास्तविक घटना,
  • अनुष्ठान,
  • स्मृति,
  • प्रतीक,
  • कथा

में से कुछ भी हो सकता है।

इसलिए:

शैलकला सामाजिक और प्रतीकात्मक जीवन का महत्त्वपूर्ण स्रोत है, लेकिन उसका अर्थ पुरातात्त्विक संदर्भ से निर्धारित होना चाहिए।


2.4.28 पालतू पशुओं की शुरुआत का प्रश्न

मध्यपाषाण के अंतिम चरणों में कुछ क्षेत्रों में पालतू पशुओं के प्रमाणों पर चर्चा होती है।

लेकिन तीन सावधानियाँ आवश्यक हैं:

  1. पशु-अस्थि की घरेलू या जंगली पहचान स्पष्ट हो।
  2. वह सही स्तर से संबंधित हो।
  3. शिकारी-संग्राहक और पड़ोसी पशुपालक समूहों के संपर्क की संभावना देखी जाए।

इसलिए मध्यपाषाण को सीधे “पशुपालन काल” कहना गलत होगा।


2.4.29 खाद्य-उत्पादन की ओर संक्रमण

मध्यपाषाण काल का सबसे बड़ा ऐतिहासिक महत्त्व यह है कि कुछ क्षेत्रों में:

  • अधिक स्थायित्व,
  • पीसने के पत्थर,
  • पौध संसाधनों का बढ़ा उपयोग,
  • भंडारण,
  • पशु संपर्क

जैसी प्रवृत्तियाँ आगे नवपाषाण खाद्य-उत्पादन की पृष्ठभूमि बनती हैं।

लेकिन:

मध्यपाषाण = अधूरा नवपाषाण

नहीं है।

मध्यपाषाण शिकारी-संग्राहक जीवन स्वयं एक सफल आर्थिक अनुकूलन था।


2.4.30 पीसने वाले पत्थर

कई मध्यपाषाण स्थलों से:

  • क्वर्न,
  • मुलर,
  • पीसने वाले पत्थर

मिले हैं।

ये संकेत देते हैं कि:

  • बीज,
  • कंद,
  • वनस्पति भोजन

का प्रसंस्करण महत्वपूर्ण था।

इससे उस पुराने दृष्टिकोण को चुनौती मिलती है जिसमें शिकारी-संग्राहकों को लगभग केवल मांस-आधारित माना जाता था।


2.4.31 भंडारण और स्थायित्व

चोपनी मांडो जैसे स्थलों पर संभावित भंडारण संरचनाएँ अधिक स्थायी निवास की ओर संकेत कर सकती हैं।

भंडारण का अर्थ है:

  • संसाधन तत्काल उपभोग से आगे रखा गया,
  • भविष्य की योजना बनी,
  • स्थल का पुनः उपयोग हुआ।

लेकिन सीमित संरचनाओं से पूर्ण कृषि ग्राम सिद्ध नहीं किया जा सकता।


2.4.32 मध्यपाषाण समाज

लिखित स्रोतों के अभाव में समाज की पूरी संरचना ज्ञात नहीं है।

फिर भी पुरातत्व से कुछ सुरक्षित संकेत मिलते हैं:

  • समूह में शिकार,
  • सामूहिक दफन,
  • साझा आवासीय क्षेत्र,
  • स्थल की पुनरावृत्त उपयोगिता,
  • ज्ञान और तकनीक का हस्तांतरण।

सामाजिक असमानता

कब्र-सामग्री में अंतर सामाजिक भिन्नता का संकेत हो सकता है।

लेकिन मध्यपाषाण समाज में स्पष्ट वर्ग या राज्य व्यवस्था सिद्ध नहीं है।


2.4.33 समूह पहचान

दफन और पुनः उपयोग किए गए निवास स्थल समूह-आधारित स्थानिक पहचान का संकेत दे सकते हैं।

यह महत्वपूर्ण परिवर्तन है।

यदि मृतकों को बार-बार किसी परिचित आवासीय स्थान पर दफनाया गया, तो इसका अर्थ हो सकता है कि समुदाय उस स्थान को केवल अस्थायी शिविर नहीं मानता था।

लेकिन इसे निजी संपत्ति या भूमि-स्वामित्व की आधुनिक अवधारणा से नहीं जोड़ना चाहिए।


2.4.34 कच्चे पदार्थ और विनिमय

कुछ मध्यपाषाण स्थलों पर उपयोग किया गया पत्थर स्थानीय क्षेत्र में उपलब्ध नहीं था।

इससे संभावित संकेत मिलते हैं:

  • दूर तक गतिशीलता,
  • विभिन्न समूहों के बीच संपर्क,
  • कच्चे पदार्थ का विनिमय।

उदाहरणतः गंगा मैदान के कुछ स्थलों पर प्रयुक्त चर्ट/चाल्सेडोनी के स्रोत दूर विंध्य क्षेत्र में हो सकते हैं।

यह शिकारी-संग्राहक समुदायों के व्यापक भू-दृश्य ज्ञान को दर्शाता है।


2.4.35 मध्यपाषाण मानव और पर्यावरण

अलग क्षेत्रों में मध्यपाषाण समुदायों ने अलग पर्यावरण का उपयोग किया:

गंगा मैदान

झील और जलीय संसाधन।

राजस्थान और गुजरात

अर्ध-शुष्क पर्यावरण और नदी-घाटियाँ।

मध्य भारत

शैलाश्रय, वन और पशु संसाधन।

दक्षिण भारत

क्षेत्रीय सूक्ष्म पाषाण परंपराएँ।

यही कारण है कि एक ही “मध्यपाषाण जीवन-शैली” पूरे भारत पर लागू नहीं की जा सकती।


2.4.36 मध्यपाषाण स्थलों का व्यापक वितरण

मध्यपाषाण स्थल भारत के लगभग सभी प्रमुख भागों से ज्ञात हैं।

महत्त्वपूर्ण क्षेत्र और स्थल:

  • राजस्थान — बागोर, तिलवाड़ा
  • गुजरात — लंघनाज
  • मध्य प्रदेश — भीमबेटका, आदमगढ़, बाघोर
  • उत्तर प्रदेश — सराय नाहर राय, महदहा, दमदमा, चोपनी मांडो
  • पश्चिम बंगाल — बीरभानपुर
  • कर्नाटक — संगनकल्लु क्षेत्र
  • आंध्र प्रदेश — रेनिगुंटा क्षेत्र
  • अन्य अनेक पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी क्षेत्र

यह व्यापक वितरण मध्यपाषाण को अखिल-उपमहाद्वीपीय घटना बनाता है, लेकिन क्षेत्रीय स्वरूप अलग थे।


2.4.37 बीरभानपुर

बीरभानपुर, पश्चिम बंगाल का महत्वपूर्ण सूक्ष्म पाषाण स्थल है।

यह पूर्वी भारत में मध्यपाषाण तकनीक के प्रसार का प्रमाण देता है।

इसका महत्व यह है कि मध्यपाषाण केवल पश्चिम और मध्य भारत तक सीमित नहीं था।


2.4.38 रेनिगुंटा

रेनिगुंटा, आंध्र प्रदेश क्षेत्र में सूक्ष्म पाषाण परंपरा के लिए जाना जाता है।

यह दक्षिण भारत में मध्यपाषाण/सूक्ष्म पाषाण तकनीक की क्षेत्रीय उपस्थिति को समझने में उपयोगी है।


2.4.39 मध्यपाषाण और “सूक्ष्म पाषाण = मध्यपाषाण” की समस्या

यह बहुत महत्वपूर्ण परीक्षा-सावधानी है।

सूक्ष्म पाषाण मध्यपाषाण की प्रमुख पहचान हैं, लेकिन:

जहाँ सूक्ष्म पाषाण मिले, वह स्थल आवश्यक नहीं कि केवल मध्यपाषाण का हो।

भारत के कई क्षेत्रों में सूक्ष्म पाषाण:

  • नवपाषाण,
  • ताम्रपाषाण,
  • कभी-कभी बाद के चरणों

तक उपयोग होते रहे।

इसलिए किसी स्थल को तिथि देने के लिए केवल औजार प्रकार पर्याप्त नहीं।

आवश्यक हैं:

  • स्तरक्रम,
  • रेडियोकार्बन तिथि,
  • संबंधित पदार्थ,
  • बस्ती-संदर्भ।

2.4.40 कालक्रम

भारतीय मध्यपाषाण के लिए कोई एक सार्वभौमिक तिथि नहीं है।

IGNOU की व्यापक रूपरेखा में अनेक मध्यपाषाण समुदाय लगभग 10,000 ईसा पूर्व से 2,000 ईसा पूर्व के बीच अलग-अलग क्षेत्रों में दिखाई देते हैं।

लेकिन यह सीमा पूरे भारत की हर सूक्ष्म पाषाण परंपरा पर समान रूप से लागू नहीं होती।

कुछ क्षेत्रों में:

  • मध्यपाषाण जल्दी शुरू हुआ,
  • कुछ में देर तक चला,
  • कुछ में कृषक और धातु-उपयोगी समुदायों के साथ सह-अस्तित्व रहा।

इसलिए UPSC में समय-सीमा को लचीला और क्षेत्रीय लिखें।


2.4.41 काल-निर्धारण की समस्या

मध्यपाषाण कालक्रम बनाते समय कठिनाइयाँ:

  • सतही सूक्ष्म पाषाण,
  • स्तरों का मिश्रण,
  • जैविक पदार्थ का कम संरक्षण,
  • बाद के समुदायों द्वारा पुराने औजारों का उपयोग,
  • क्षेत्रीय निरंतरता।

सबसे विश्वसनीय स्थिति:

संदर्भित स्तर + कार्बन तिथि + औजार समूह + अन्य जैविक/आवासीय प्रमाण


2.4.42 पुरापाषाण और मध्यपाषाण की तुलना

आयाम पुरापाषाण मध्यपाषाण
प्रमुख तकनीक बड़े कोर, फ्लेक, ब्लेड सूक्ष्म पाषाण
औजार हस्तकुठार, क्लीवर, बड़े फ्लेक छोटे ब्लेड, त्रिकोण, समलंब, अर्धचंद्र
जीविका शिकार-संग्रह अधिक विविध शिकार-संग्रह, मछली, पक्षी
बसावट अधिक गतिशील कुछ क्षेत्रों में अर्ध-स्थायित्व
दफन बहुत सीमित प्रमाण कई स्पष्ट दफन स्थल
शैलकला सीमित/अस्पष्ट अधिक स्पष्ट, किंतु तिथि सावधानी से
पौध प्रसंस्करण कम प्रमाण पीसने वाले पत्थरों से बढ़े संकेत

2.4.43 मध्यपाषाण और नवपाषाण की तुलना

आयाम मध्यपाषाण नवपाषाण
प्रमुख अर्थव्यवस्था शिकार-संग्रह खाद्य-उत्पादन
औजार सूक्ष्म पाषाण घिसे/पालिश पाषाण + अन्य औजार
पशु मुख्यतः जंगली, कुछ क्षेत्रों में प्रारंभिक पालतू संपर्क व्यवस्थित पशुपालन
पौधे जंगली पौध संसाधन खेती और वशीकृत पौधे
निवास मौसमी/अर्ध-स्थायी अधिक स्थायी ग्राम
भंडारण सीमित संकेत अधिक व्यवस्थित
मृद्भांड क्षेत्रानुसार सीमित/उत्तर चरण अनेक क्षेत्रों में व्यापक

यह अंतर भी पूर्ण नहीं है; संक्रमण क्षेत्रीय और क्रमिक था।


2.4.44 मध्यपाषाण की ऐतिहासिक उपलब्धियाँ

मध्यपाषाण का महत्व केवल “दो युगों के बीच” नहीं है।

इस काल में:

  1. छोटे और कुशल औजारों का विकास हुआ।
  2. भोजन स्रोतों का व्यापक उपयोग बढ़ा।
  3. कुछ क्षेत्रों में निवास अधिक स्थायी हुआ।
  4. दफन संस्कार स्पष्ट हुए।
  5. प्रतीकात्मक कला अधिक दिखाई देती है।
  6. मानव और विशिष्ट भू-दृश्य के बीच गहरा संबंध बना।
  7. कुछ क्षेत्रों में पशुपालन और खाद्य-उत्पादन की ओर संक्रमण की पृष्ठभूमि बनी।

2.4.45 क्या मध्यपाषाण केवल संक्रमणकाल था?

पुराना दृष्टिकोण मध्यपाषाण को कई बार पुरापाषाण और नवपाषाण के बीच “अंतराल” मानता था।

यह दृष्टिकोण अधूरा है।

आधुनिक अध्ययन दिखाता है कि मध्यपाषाण शिकारी-संग्राहक समुदायों की अपनी सफल और जटिल आर्थिक-सामाजिक प्रणालियाँ थीं।

उन्होंने:

  • संसाधनों का सूक्ष्म उपयोग किया,
  • जल-आधारित अर्थव्यवस्था अपनाई,
  • मृतकों को दफनाया,
  • आवास बनाए,
  • समूह पहचान विकसित की।

इसलिए:

मध्यपाषाण को केवल नवपाषाण की तैयारी नहीं, बल्कि अपने आप में विशिष्ट ऐतिहासिक अवस्था मानना चाहिए।


2.4.46 इतिहासलेखन

वी. एन. मिश्र

भारतीय मध्यपाषाण अध्ययन में वी. एन. मिश्र का विशेष योगदान रहा।

उन्होंने राजस्थान और पश्चिमी भारत के शिकारी-संग्राहक समुदायों, बागोर और सूक्ष्म पाषाण परंपराओं के अध्ययन को महत्त्वपूर्ण दिशा दी।

उनके कार्य से क्षेत्रीय पर्यावरण, जीविका और सांस्कृतिक परिवर्तन के संबंध पर बल मिला।

जी. आर. शर्मा और इलाहाबाद विश्वविद्यालय परंपरा

मध्य गंगा और बेलन घाटी में:

  • चोपनी मांडो,
  • सराय नाहर राय,
  • महदहा,
  • दमदमा

जैसे स्थलों के उत्खनन ने भारतीय मध्यपाषाण की समझ बदल दी।

इनसे पहली बार बड़े पैमाने पर:

  • आवास,
  • दफन,
  • मानव कंकाल,
  • जीविका,
  • स्थायित्व

का स्पष्ट पुरातात्त्विक प्रमाण मिला।


2.4.47 मध्यपाषाण का सामाजिक पुनर्मूल्यांकन

पहले मध्यपाषाण समुदायों को अत्यधिक सरल, गरीब और निरंतर घूमने वाला माना जाता था।

नई पुरातात्त्विक सामग्री से स्पष्ट है कि कई समूह:

  • संसाधन-समृद्ध स्थानों पर लंबे समय तक रहते थे,
  • मृतकों को व्यवस्थित दफनाते थे,
  • पौध भोजन संसाधित करते थे,
  • कच्चे पदार्थ के व्यापक नेटवर्क का उपयोग करते थे,
  • प्रतीकात्मक कला बनाते थे।

इसलिए “सरल शिकारी” की छवि पर्याप्त नहीं है।


2.4.48 प्रमुख स्थल: परीक्षा-सारणी

स्थल वर्तमान क्षेत्र प्रमुख महत्त्व
बागोर राजस्थान सूक्ष्म पाषाण, दफन, शिकारी-संग्राहक से पशुपालक संपर्क
तिलवाड़ा राजस्थान मध्यपाषाण निवास और सूक्ष्म पाषाण
लंघनाज गुजरात सूक्ष्म पाषाण, मानव कंकाल, पशु-अवशेष
भीमबेटका मध्य प्रदेश शैलाश्रय, दीर्घ मानव निवास, शैलकला
आदमगढ़ मध्य प्रदेश सूक्ष्म पाषाण और शैलकला
बाघोर II मध्य प्रदेश सूक्ष्म पाषाण, कच्चे पदार्थ, आवासीय संरचना
सराय नाहर राय उत्तर प्रदेश दफन, ज्यामितीय सूक्ष्म पाषाण, झील-संसाधन
महदहा उत्तर प्रदेश अनेक मानव दफन, सूक्ष्म पाषाण
दमदमा उत्तर प्रदेश मोटा मध्यपाषाण स्तर, विविध दफन
चोपनी मांडो उत्तर प्रदेश उत्तर पुरापाषाण से विकसित मध्यपाषाण और स्थायित्व
बीरभानपुर पश्चिम बंगाल पूर्वी भारत की सूक्ष्म पाषाण परंपरा
रेनिगुंटा आंध्र प्रदेश दक्षिण भारतीय सूक्ष्म पाषाण परंपरा

2.4.49 मानचित्रण

History Optional के मानचित्र प्रश्न के लिए विशेष रूप से याद रखें:

  • बागोर
  • लंघनाज
  • सराय नाहर राय
  • महदहा
  • दमदमा
  • चोपनी मांडो
  • भीमबेटका
  • आदमगढ़
  • रेनिगुंटा
  • बीरभानपुर

30-शब्दीय उत्तर सूत्र

स्थान + काल + 2 प्रमुख खोज + ऐतिहासिक महत्त्व

उदाहरण:

सराय नाहर राय: उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ क्षेत्र का मध्यपाषाण झील-किनारे स्थल; ज्यामितीय सूक्ष्म पाषाण और अनेक मानव दफन मिले। गंगा मैदान के शिकारी-संग्राहकों के अर्ध-स्थायित्व और मृत्यु-संस्कार का महत्वपूर्ण प्रमाण।


2.4.50 UPSC उत्तर-लेखन

यदि प्रश्न हो — “भारतीय मध्यपाषाण की प्रमुख विशेषताओं की विवेचना कीजिए।”

उत्तर का क्रम:

भूमिका

होलोसीन और पुरापाषाणोत्तर परिवर्तन।

तकनीक

सूक्ष्म पाषाण और संयुक्त औजार।

जीविका

विविध शिकार, मछली, पक्षी और पौध संग्रह।

बसावट

गतिशीलता से अर्ध-स्थायित्व की ओर क्षेत्रीय प्रवृत्ति।

सामाजिक जीवन

दफन और समूह पहचान।

कला

शैलचित्र।

प्रमुख स्थल

बागोर, लंघनाज, सराय नाहर राय, महदहा, दमदमा, चोपनी मांडो।

आलोचनात्मक निष्कर्ष

मध्यपाषाण को केवल नवपाषाण का पूर्वरूप न मानें।


2.4.51 सामान्य गलतियाँ

गलती 1

“मध्यपाषाण में सभी लोग स्थायी गाँवों में रहने लगे।”

सही: कुछ क्षेत्रों में अर्ध-स्थायित्व बढ़ा, लेकिन गतिशीलता बनी रही।

गलती 2

“सूक्ष्म पाषाण केवल मध्यपाषाण में मिलते हैं।”

सही: उनका उपयोग कई क्षेत्रों में नवपाषाण और बाद के चरणों तक जारी रहा।

गलती 3

“मध्यपाषाण में कृषि शुरू हो गई थी।”

सही: मुख्य अर्थव्यवस्था शिकार-संग्रह थी; कुछ क्षेत्रों में खाद्य-उत्पादन की दिशा में संक्रमण के संकेत हैं।

गलती 4

“बागोर में पालतू पशु मिलना सिद्ध करता है कि सभी मध्यपाषाण लोग पशुपालक थे।”

सही: विभिन्न चरणों और बाद के संपर्क को अलग करना आवश्यक है।

गलती 5

“शैलचित्र वास्तविक दैनिक घटना का सीधा चित्र हैं।”

सही: वे प्रतीकात्मक, अनुष्ठानिक या सामाजिक अर्थ भी रख सकते हैं।

गलती 6

“दफन में वस्तु = स्पष्ट वर्ग व्यवस्था।”

सही: अंतर के कई संभावित सामाजिक और अनुष्ठानिक कारण हो सकते हैं।


2.4.52 परीक्षा के लिए केंद्रीय निष्कर्ष

भारतीय मध्यपाषाण को समझने की कुंजी केवल सूक्ष्म पाषाण नहीं है।

इस काल की वास्तविक ऐतिहासिक विशेषता है:

बदलते होलोसीन पर्यावरण में शिकारी-संग्राहक समुदायों द्वारा अधिक विविध संसाधनों, छोटी और कुशल तकनीक, जल-आधारित जीविका, बढ़ते स्थानिक जुड़ाव और नए सामाजिक-प्रतीकात्मक व्यवहार का विकास।

गंगा मैदान के दफन स्थल और चोपनी मांडो जैसे आवास दिखाते हैं कि शिकारी-संग्राहक समाजों को सरल, अस्थिर और सामाजिक रूप से अविकसित मानना उचित नहीं।

मध्यपाषाण एक स्वतंत्र और सफल अनुकूलन था, जिसने कुछ क्षेत्रों में आगे खाद्य-उत्पादन की प्रक्रियाओं से संपर्क स्थापित किया।


सत्यापित UPSC इतिहास वैकल्पिक PYQ

2016 — Paper-I — मानचित्र प्रश्न

मानचित्र अनुभाग में पहला संकेत था:

“A Mesolithic site” — एक मध्यपाषाण स्थल।

उस मानचित्र-बिंदु की संभावित पहचान सराय नाहर राय/महदहा/चोपनी मांडो क्षेत्र से की जाती है। मानचित्र प्रश्न में अंतिम उत्तर दिए गए बिंदु के वास्तविक स्थान के अनुसार तय किया जाता है।


2014 — Paper-I — मानचित्र प्रश्न

मानचित्र प्रश्न में:

“A Mesolithic site”

पूछा गया था और दिए गए बिंदु की पहचान सराय नाहर राय से की जाती है।

इससे स्पष्ट है कि सराय नाहर राय History Optional मानचित्रण के लिए उच्च प्राथमिकता वाला स्थल है।


2022 — Paper-I — मानचित्र प्रश्न

मानचित्र संकेत में मध्यपाषाण दफन-स्थल से संबंधित बिंदु पूछा गया था, जिसकी संभावित पहचान सराय नाहर राय जैसे गंगा घाटी स्थल से की जाती है।

मानचित्र के बिंदु में स्थानिक अस्पष्टता होने पर संबंधित क्षेत्र के विकल्पों को मानचित्र अभ्यास में अलग-अलग पहचानना चाहिए।


2023 — Paper-I — मानचित्र प्रश्न

मानचित्र अनुभाग में दक्षिण भारत के एक मध्यपाषाण/सूक्ष्म पाषाण स्थल से संबंधित संकेत की पहचान रेनिगुंटा से की गई।


प्रत्यक्ष वर्णनात्मक PYQ की स्थिति

2010–2026 के सत्यापित History Optional Paper-I प्रश्नों में “भारतीय मध्यपाषाण की विशेषताओं का वर्णन कीजिए” जैसे पृथक प्रत्यक्ष वर्णनात्मक प्रश्न का स्पष्ट उदाहरण नहीं मिला।

लेकिन इस विषय की परीक्षा-प्रासंगिकता कम नहीं है क्योंकि:

  • यह आधिकारिक पाठ्यक्रम में प्रत्यक्ष रूप से शामिल है,
  • मानचित्र प्रश्नों में बार-बार आया है,
  • नवपाषाण संक्रमण के प्रश्नों की पृष्ठभूमि है,
  • शिकारी-संग्राहक समाज की क्षेत्रीय विविधता समझने में आवश्यक है।

अभ्यास के लिए संभावित प्रश्न — PYQ नहीं

  1. भारतीय मध्यपाषाण की तकनीकी और आर्थिक विशेषताओं का विश्लेषण कीजिए।
  2. गंगा घाटी के मध्यपाषाण दफन शिकारी-संग्राहक समाज के बारे में क्या बताते हैं?
  3. क्या मध्यपाषाण को केवल पुरापाषाण और नवपाषाण के बीच संक्रमणकाल मानना उचित है?
  4. चोपनी मांडो खाद्य-संग्रह से खाद्य-उत्पादन की ओर परिवर्तन को किस प्रकार स्पष्ट करता है?
  5. मध्यपाषाण में सूक्ष्म पाषाण तकनीक और व्यापक जीविका-पद्धति के बीच संबंध की विवेचना कीजिए।

ये अभ्यास-प्रश्न हैं, वास्तविक PYQ नहीं।

ऊपर जाएँ ↑