1.4.5.4 कायांतरण
शैल चक्र में पहले से मौजूद शैल का ताप, दबाव, दिशात्मक तनाव तथा रासायनिक रूप से सक्रिय द्रवों के प्रभाव से बिना पूर्ण रूप से पिघले नई खनिजीय संरचना और बनावट प्राप्त करना कायांतरण (Metamorphism) कहलाता है।
यह शैल चक्र की वह कड़ी है जो सतही अथवा उथली शैलों को गहरी पर्पटी की परिस्थितियों से जोड़ती है।
शैल चक्र में स्थान
आग्नेय शैल, अवसादी शैल या पुरानी कायांतरित शैल—
गहराई में दफनाव + ताप + दबाव + तनाव + द्रव → कायांतरित शैल
यदि ताप इतना बढ़ जाए कि शैल पिघलने लगे, तो प्रक्रिया कायांतरण से आगे बढ़कर पुनर्पिघलन की ओर चली जाती है।
परीक्षा-फँद
कायांतरण ≠ पिघलाव।
कायांतरण मुख्यतः ठोस अवस्था में होने वाला पुनःक्रिस्टलीकरण और खनिजीय परिवर्तन है।
मूलशैल
जिस शैल से नई कायांतरित शैल बनती है उसे मूलशैल (Protolith) कहते हैं।
उदाहरण—
- शेल → स्लेट
- चूना पत्थर → संगमरमर
- बलुआ पत्थर → क्वार्ट्जाइट
- ग्रेनाइट → नीस
- बेसाल्ट → ऐंफिबोलाइट
ताप की भूमिका
ताप बढ़ने पर—
- खनिज पुनःक्रिस्टलीकृत होते हैं,
- पुराने खनिज अस्थिर होकर नए खनिज बनाते हैं,
- दाने बड़े हो सकते हैं,
- उच्च श्रेणी पर आंशिक पिघलाव की सीमा निकट आ सकती है।
दबाव की भूमिका
गहराई बढ़ने पर सर्वदिशीय दबाव बढ़ता है।
यह अधिक सघन खनिज संरचनाओं को स्थिर कर सकता है।
उदाहरण—
उच्च दबाव में बेसाल्टिक शैल एक्लोजाइट में बदल सकती है।
दिशात्मक तनाव
प्लेट टक्कर और पर्वतनिर्माण में तनाव सभी दिशाओं में समान नहीं होता।
खनिज एक विशेष दिशा में व्यवस्थित हो सकते हैं।
इससे पर्णन (Foliation) विकसित होता है।
द्रवों की भूमिका
गरम जल और अन्य द्रव—
- आयनों का परिवहन,
- रासायनिक अभिक्रिया,
- पुनःक्रिस्टलीकरण
तेज कर सकते हैं।
शैल चक्र के मुख्य कायांतरण परिवेश
महाद्वीपीय टक्कर
भारत–यूरेशिया टक्कर जैसे क्षेत्रों में पर्पटी मोटी होती है और क्षेत्रीय कायांतरण होता है।
सबडक्शन
नीचे जाती महासागरीय प्लेट उच्च दबाव तथा अपेक्षाकृत कम ताप की दशाओं से गुजर सकती है।
ब्लूशिस्ट और एक्लोजाइट ऐसे परिवेश के महत्वपूर्ण संकेत हैं।
मैग्माई अंतर्वेध
गरम मैग्मा आसपास की शैल को गर्म कर संपर्क कायांतरण उत्पन्न करता है।
भ्रंश क्षेत्र
कतरनी और घर्षण से गतिशील कायांतरण हो सकता है।
प्रगतिशील और प्रतिगामी कायांतरण
ताप-दाब बढ़ने के साथ निम्न से उच्च श्रेणी की ओर बढ़ना प्रगतिशील कायांतरण (Prograde Metamorphism) कहलाता है।
उत्थान और ठंडने के दौरान उच्च श्रेणी की शैल का निम्न ताप खनिजों की ओर आंशिक परिवर्तन प्रतिगामी कायांतरण (Retrograde Metamorphism) कहलाता है।
शैल चक्र का सामान्य उदाहरण
शेल → स्लेट → फिल्लाइट → शिस्ट → नीस
यह बढ़ती कायांतरण श्रेणी का आदर्श क्रम है।
यदि उच्च श्रेणी की नीस आंशिक रूप से पिघले तो मिग्माटाइट और आगे मैग्मा बन सकता है।
भारत के उदाहरण
हिमालय
महाद्वीपीय टक्कर से व्यापक क्षेत्रीय कायांतरण।
दक्षिण भारतीय ग्रैनुलाइट भूभाग
उच्च ताप और उच्च श्रेणी कायांतरण का प्राचीन अभिलेख।
पूर्वी घाट
ग्रैनुलाइट और अत्यधिक उच्च ताप वाली कायांतरित शैलें।
धारवाड़ और सिंहभूम
प्राचीन ग्रीनस्टोन तथा कायांतरित पट्टियाँ।
2025–2026 समसामयिक अद्यतन
2025 के दक्षिण भारतीय ग्रैनुलाइट अध्ययनों में आधुनिक खनिज काल-निर्धारण से अनेक कायांतरित घटनाओं को अलग किया गया।
2025–26 के हिमालयी अध्ययनों ने दिखाया कि पर्पटी का मोटा होना, कायांतरण और आंशिक पिघलाव पर्वतनिर्माण के दौरान परस्पर जुड़े रहते हैं।
परीक्षा-योग्य मूल्यवर्धन
आधुनिक भूविज्ञान में शैल का ताप–दाब–समय पथ पुनर्निर्मित करके यह समझा जाता है कि वह कितनी गहराई गई, कब अधिकतम कायांतरण पर पहुँची और कैसे सतह पर लौटी।
सत्यापित UPSC प्रारंभिक परीक्षा PYQ
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सत्यापित UPSC मुख्य परीक्षा PYQ
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UPSC भूविज्ञान वैकल्पिक में कायांतरण, मुखाकृति और ताप-दाब संबंध नियमित परीक्षा-विषय हैं।
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प्रारंभिक परीक्षा के अंतिम तथ्य
कायांतरण में पूर्ण पिघलाव नहीं होता।
मूलशैल किसी भी प्रमुख शैल-प्रकार की हो सकती है।
क्षेत्रीय कायांतरण प्लेट टक्कर से जुड़ा है।
संपर्क कायांतरण में ताप प्रमुख है।
पर्णन दिशात्मक तनाव से जुड़ा है।
एक्लोजाइट उच्च दबाव परिवेश का महत्वपूर्ण संकेत है।
निष्कर्ष
कायांतरण शैल चक्र की गहरी-पर्पटी वाली कड़ी है। यह पुरानी शैलों को नई खनिजीय और संरचनात्मक अवस्था में बदलता है और प्लेट टक्कर, सबडक्शन, पर्वतनिर्माण तथा मैग्माई गतिविधि के इतिहास को सुरक्षित रखता है।