1.4.4.2 क्षेत्रीय कायांतरण

बहुत बड़े भूभाग में पर्वतनिर्माण, प्लेट टक्कर, पर्पटी के मोटा होने और गहरे दफनाव के कारण ताप तथा दबाव के संयुक्त प्रभाव से होने वाले कायांतरण को क्षेत्रीय कायांतरण (Regional Metamorphism) कहा जाता है।

यह संपर्क कायांतरण की तुलना में बहुत अधिक विस्तृत क्षेत्र में होता है।

हिमालय, आल्प्स और प्राचीन वलित पर्वतीय पट्टियाँ इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

मुख्य कारण

महाद्वीपीय टक्कर

दो महाद्वीपीय प्लेटों की टक्कर से पर्पटी सिकुड़ती और मोटी होती है।

शैलें अधिक गहराई पर दबती हैं और ताप तथा दबाव बढ़ता है।

पर्वतनिर्माण

वलन, भ्रंशन, कतरनी और पर्पटी-मोटापन क्षेत्रीय कायांतरण के साथ जुड़े होते हैं।

गहरा दफनाव

अवसादी अथवा ज्वालामुखीय शैलें मोटे शैल-आवरण के नीचे दबकर उच्च ताप-दाब स्थितियों में पहुँच सकती हैं।

क्षेत्रीय कायांतरण के कारक

क्षेत्रीय कायांतरण में सामान्यतः—

सभी महत्वपूर्ण होते हैं।

दिशात्मक तनाव के कारण कई शैलों में पर्णन विकसित होता है।

पर्णन

समतलीय अथवा समानांतर खनिज व्यवस्था को पर्णन (Foliation) कहते हैं।

दबाव के प्रति लंबवत दिशा में प्लेटी या लंबे खनिज व्यवस्थित हो सकते हैं।

सामान्य बढ़ता क्रम—

स्लेटी विदलन → फिल्लाइटिक पर्णन → शिस्टता → नीसीय पट्टियाँ।

शेल का क्षेत्रीय कायांतरण

मृत्तिकायुक्त शेल क्षेत्रीय कायांतरण का प्रसिद्ध उदाहरण है।

बढ़ती श्रेणी में सामान्य क्रम—

शेल → स्लेट → फिल्लाइट → शिस्ट → नीस।

यह क्रम केवल नाम याद करने के लिए नहीं, बल्कि ताप-दाब वृद्धि और पुनःक्रिस्टलीकरण का प्रतिनिधित्व करता है।

स्लेट

निम्न श्रेणी।

बहुत सूक्ष्म दाने।

स्लेटी विदलन।

फिल्लाइट

स्लेट से थोड़ा उच्च श्रेणी।

सूक्ष्म अभ्रक से रेशमी चमक।

शिस्ट

मध्यम से उच्च श्रेणी।

अभ्रक जैसे खनिज स्पष्ट दिखाई देते हैं।

प्रबल शिस्टता।

नीस

उच्च श्रेणी।

हल्के और गहरे खनिजों की पट्टियाँ।

सूचक खनिज और क्षेत्र

स्कॉटलैंड के अध्ययन से प्रसिद्ध बैरोवियन कायांतरण (Barrovian Metamorphism) में बढ़ती श्रेणी के सूचक खनिजों का सामान्य क्रम है—

क्लोराइट → बायोटाइट → गार्नेट → स्टॉरोलाइट → क्यानाइट → सिलिमेनाइट।

हर खनिज की पहली उपस्थिति से मानचित्र पर अलग कायांतरण क्षेत्र पहचाना जा सकता है।

परीक्षा-सावधानी

यह क्रम विशेष मृत्तिकायुक्त मूलशैल और सामान्य बैरोवियन दशाओं के लिए आदर्शीकृत है। हर शैल में यही सभी खनिज नहीं बनेंगे।

समश्रेय रेखा

किसी सूचक खनिज की पहली उपस्थिति वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखा को समश्रेय रेखा (Isograd) कहा जाता है।

यह कायांतरण श्रेणी की सीमा दर्शाती है।

क्षेत्रीय कायांतरण और मुखाकृति

ताप-दाब परिस्थिति के आधार पर क्षेत्रीय कायांतरण में—

जैसी अवस्थाएँ विकसित हो सकती हैं।

उच्च दबाव वाले सबडक्शन क्षेत्रों में ब्लूशिस्ट और एक्लोजाइट भी क्षेत्रीय विवर्तनिक परिवेश से जुड़े हैं।

हिमालय में क्षेत्रीय कायांतरण

हिमालय भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों की टक्कर का परिणाम है।

यहाँ—

ग्रेटर हिमालय में उच्च श्रेणी की नीस, शिस्ट, क्यानाइट और सिलिमेनाइट-युक्त शैलें मिलती हैं।

हिमालयी ल्यूकोग्रेनाइट आंशिक पिघलाव और उच्च श्रेणी कायांतरण से भी जुड़े हैं।

दक्षिण भारत

दक्षिण भारतीय ग्रैनुलाइट भूभाग प्राचीन उच्च श्रेणी क्षेत्रीय कायांतरण का विश्वस्तरीय उदाहरण है।

यहाँ शैलें कभी बहुत गहरी पर्पटी और अत्यधिक उच्च ताप स्थितियों में रही थीं।

आज उनका सतह पर मिलना बाद के उत्थान और अपरदन का परिणाम है।

पूर्वी घाट

पूर्वी घाट भूभाग में अत्यधिक उच्च ताप कायांतरण, ग्रैनुलाइट और चार्नोकाइट व्यापक हैं।

यह भूभाग भारत और पूर्वी गोंडवाना के प्राचीन महाद्वीपीय टक्करों का अभिलेख है।

2025 का समसामयिक अद्यतन

2025 में दक्षिण भारतीय ग्रैनुलाइटों के अध्ययन में जिरकॉन, मोनाजाइट, टाइटेनाइट और एपेटाइट के आधुनिक काल-निर्धारण से अनेक कायांतरित और शीतलन घटनाओं को अलग करने का प्रयास किया गया।

पूर्वी घाट के 2025 अध्ययन में अत्यधिक उच्च ताप वाली खनिज-समष्टियों से लगभग 959 और 846 मिलियन वर्ष पुराने तापीय प्रकरणों के संकेत मिले।

इनसे पता चलता है कि क्षेत्रीय कायांतरण एक क्षणिक घटना नहीं, बल्कि करोड़ों वर्षों तक चलने वाले पर्वतनिर्माण इतिहास का भाग हो सकता है।

2026 का भारतीय भू-गतिशील संदर्भ

2026 की भारतीय प्राचीन भूभाग समीक्षा में दक्षिणी ग्रैनुलाइट भूभाग को उच्च श्रेणी की कायांतरित पर्पटी के रूप में रेखांकित किया गया और इसके उत्थान को प्राचीन संरचनाओं के पुनर्सक्रियण तथा आधुनिक दूरस्थ प्लेट बलों से जोड़ा गया।

परीक्षा-योग्य मूल्यवर्धन

सतह पर ग्रैनुलाइट की उपस्थिति का अर्थ है कि कभी गहराई में रही उच्च श्रेणी की पर्पटी बाद में उत्थान और अपरदन से उजागर हुई।

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प्रारंभिक परीक्षा के अंतिम तथ्य

क्षेत्रीय कायांतरण विशाल पर्वतनिर्माण क्षेत्रों में होता है।

ताप और दबाव दोनों महत्वपूर्ण होते हैं।

दिशात्मक तनाव पर्णन विकसित करता है।

शेल → स्लेट → फिल्लाइट → शिस्ट → नीस बढ़ती श्रेणी का सामान्य क्रम है।

क्लोराइट से सिलिमेनाइट तक सूचक खनिज बढ़ती बैरोवियन श्रेणी दिखाते हैं।

हिमालय क्षेत्रीय कायांतरण का प्रमुख भारतीय उदाहरण है।

निष्कर्ष

क्षेत्रीय कायांतरण पर्वतनिर्माण और प्लेट टक्कर का गहरा शैल-अभिलेख है। इसकी पर्णित शैलें, सूचक खनिज और ताप-दाब इतिहास हमें बताते हैं कि आज सतह पर दिखाई देने वाली शैलें कभी पृथ्वी की पर्पटी में कितनी गहराई और किन विवर्तनिक परिस्थितियों में थीं।