1.3.3.1 मोहो
मोहोरोविचिक असांतत्य, संक्षेप में मोहो, पृथ्वी की भूपर्पटी और मैंटल के बीच की प्रमुख भूकंपीय सीमा है।
यह पृथ्वी की आंतरिक संरचना की सबसे प्रसिद्ध सीमाओं में से एक है। इसकी पहचान भूकंपीय P और S तरंगों के वेग में अचानक वृद्धि से की जाती है।
खोज
मोहो की खोज क्रोएशियाई भूकंप विज्ञानी अंद्रिया मोहोरोविचिक ने 1909 के क्रोएशिया भूकंप के बाद सीस्मोग्रामों का अध्ययन करते हुए की।
उन्होंने देखा कि कुछ भूकंपीय तरंगें अपेक्षा से अधिक जल्दी पहुँच रही थीं। इसकी व्याख्या उन्होंने एक ऐसी गहरी सीमा से की जिसके नीचे तरंगों का वेग बढ़ जाता है।
मोहो क्या अलग करता है?
मोहो—
ऊपर: भूपर्पटी
और
नीचे: ऊपरी मैंटल
को अलग करता है।
यह केवल घनत्व में परिवर्तन नहीं, बल्कि चट्टानों की औसत संरचना और भौतिक गुणों में महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत है।
पर्पटी में ग्रेनाइटिक, बेसाल्टिक, गैब्रोिक आदि चट्टानें हो सकती हैं, जबकि मोहो के नीचे ऊपरी मैंटल मुख्यतः पेरिडोटाइट जैसी ultramafic चट्टानों से जुड़ा है।
भूकंपीय वेग परिवर्तन
महाद्वीपीय पर्पटी में P-तरंग वेग सामान्यतः लगभग 6–7 किमी/सेकंड के क्रम में होता है।
मोहो के नीचे ऊपरी मैंटल में यह लगभग 8 किमी/सेकंड के क्रम तक बढ़ सकता है।
S-तरंग वेग में भी वृद्धि होती है।
यही स्पष्ट velocity contrast मोहो की पहचान का आधार है।
मोहो की गहराई
मोहो पूरी पृथ्वी पर समान गहराई पर नहीं है।
महासागरों के नीचे
महासागरीय पर्पटी पतली होती है।
मोहो सामान्यतः समुद्र तल के नीचे लगभग 5–10 किमी के क्रम में मिलता है।
सामान्य महाद्वीपों के नीचे
महाद्वीपीय क्षेत्रों में यह सामान्यतः लगभग 30–40 किमी गहराई पर होता है।
पर्वतों के नीचे
हिमालय, तिब्बत, एंडीज जैसे बड़े पर्वतीय क्षेत्रों के नीचे पर्पटी मोटी होने के कारण मोहो 60–70 किमी या उससे अधिक गहराई तक जा सकता है।
परीक्षा-फँद
मोहो की गहराई 35 किमी हर स्थान पर निश्चित नहीं है।
यह केवल एक औसत महाद्वीपीय मान है।
मोहो और समस्थिति
बड़े पर्वतों के नीचे पर्पटी की गहरी जड़ होती है।
इसलिए वहाँ मोहो अधिक गहराई पर मिलता है।
यह समस्थिति की अवधारणा से जुड़ा है।
हिमालय केवल सतह के ऊपर उठा हुआ भाग नहीं है; उसके नीचे भारतीय और तिब्बती पर्पटी की मोटी जटिल संरचना भी है।
मोहो और LAB में अंतर
यह बहुत महत्वपूर्ण परीक्षा बिंदु है।
मोहो = भूपर्पटी और मैंटल की सीमा।
LAB = कठोर स्थलमंडल और कमजोर दुर्बलतामंडल की सीमा।
स्थलमंडल में पूरी पर्पटी और ऊपरी मैंटल का कठोर भाग शामिल होता है।
इसलिए LAB सामान्यतः मोहो के नीचे स्थित होती है।
दोनों को समान सीमा समझना गलत है।
मोहो की भौतिक प्रकृति
कई सरल चित्रों में मोहो को अत्यंत पतली स्पष्ट रेखा के रूप में दिखाया जाता है।
वास्तविक पृथ्वी में इसकी प्रकृति क्षेत्रीय रूप से बदल सकती है।
कहीं यह बहुत तीक्ष्ण velocity jump है, जबकि कहीं transition अधिक फैला हुआ हो सकता है।
संभावित कारण—
- निचली पर्पटी की संरचना,
- magmatic underplating,
- तापमान,
- कायांतरण,
- विवर्तनिक पुनर्संरचना।
महासागरीय मोहो
महासागरीय पर्पटी का आदर्श क्रम—
समुद्री अवसाद → बेसाल्ट → sheeted dykes → gabbro → mantle peridotite
से जुड़ा है।
महासागरीय मोहो सामान्यतः crustal gabbroic material और mantle peridotite के बीच भूकंपीय/पेट्रोलॉजिकल परिवर्तन से जुड़ा है।
कुछ ophiolite क्षेत्रों में “seismic Moho” और “petrological Moho” बिल्कुल समान स्तर पर हों, यह आवश्यक नहीं।
महाद्वीपीय मोहो
महाद्वीपीय पर्पटी अधिक जटिल है।
निचली पर्पटी में granulite, mafic rocks, intrusions और metamorphic परिवर्तन हो सकते हैं।
इसलिए continental Moho की तीक्ष्णता अलग-अलग प्रांतों में बदलती है।
भारत का मोहो
भारत में मोहो की गहराई में बहुत विविधता है।
प्रायद्वीपीय शील्ड में सामान्यतः लगभग 35–45 किमी के क्रम के मान मिलते हैं।
हिमालय और तिब्बत में भारतीय प्लेट के underthrusting और crustal thickening के कारण Moho बहुत अधिक गहरा है।
कच्छ, सौराष्ट्र, दक्कन और हिमालय जैसे क्षेत्रों की Moho संरचना अलग-अलग भूवैज्ञानिक इतिहास दिखाती है।
2025 का शोध — भारतीय शील्ड
2025 में भारतीय शील्ड के 45 भूकंपीय स्टेशनों पर आधारित अध्ययन ने Moho के आर-पार S-wave velocity contrast का विश्लेषण किया।
मुख्य निष्कर्ष—
- velocity contrast लगभग 0.2 से 1.1 किमी/सेकंड तक क्षेत्रीय रूप से बदलता है।
- मोटी पर्पटी वाले क्षेत्रों में contrast सामान्यतः अधिक पाया गया।
- उच्च surface heat flow वाले पतले crust क्षेत्रों में contrast कम हो सकता है।
- भारतीय Moho हर जगह समान रूप से sharp boundary नहीं है।
2026 का शोध — पूर्वी हिमाचल हिमालय
2026 के अध्ययन में regional earthquake travel times द्वारा पूर्वी हिमाचल हिमालय के नीचे Indian Moho की geometry और uppermost mantle Pn/Sn velocities का अध्ययन किया गया।
यह भारतीय प्लेट के हिमालय के नीचे underthrust होने की ज्यामिति समझने में महत्वपूर्ण है।
इससे Moho केवल स्थिर पर्पटी–मैंटल सीमा नहीं, बल्कि महाद्वीपीय टक्कर में विकृत होने वाली सक्रिय संरचना के रूप में सामने आता है।
2026 — Sub-Moho भूकंप
2026 के Himalayan अध्ययन में 100 से अधिक ऐसे भूकंपों पर चर्चा की गई जो कुछ क्षेत्रों में Moho के नीचे दर्ज हुए।
दक्षिणी तिब्बत के एक क्षेत्र में ऐसी seismicity लगभग 110 किमी तक पहुँचती है।
अध्ययन ने eclogitized lower-crustal material और deep fault/shear processes जैसी संभावनाओं की जाँच की।
सत्यापित UPSC Prelims PYQ
UPSC CSE Prelims में “मोहो किसके बीच है?” जैसे सीधे प्रश्न का विश्वसनीय वर्ष-सहित सत्यापन उपलब्ध स्रोतों में नहीं मिला।
इसलिए अभ्यास प्रश्न को PYQ के रूप में नहीं दिया गया है।
सत्यापित UPSC Mains PYQ
UPSC Geology Optional, 2016 — 10 अंक
प्रश्न:
“Explain the major discontinuities within the Earth's interior.”
इस प्रश्न के उत्तर में मोहो की खोज, crust–mantle boundary और seismic velocity jump मुख्य बिंदु हैं।
यह Geology Optional का प्रश्न है, GS Mains का नहीं।
सत्यापित BPSC Prelims PYQ
BPSC CCE Prelims में मोहो पर प्रत्यक्ष, वर्ष-सहित और विश्वसनीय रूप से सत्यापित प्रश्न उपलब्ध स्रोतों में नहीं मिला।
इसलिए किसी BPSC mock प्रश्न को PYQ नहीं माना गया है।
सत्यापित BPSC Mains PYQ
BPSC GS Mains तथा उपलब्ध नए-pattern Geology Optional में मोहो को अकेले पूछने वाला प्रत्यक्ष सत्यापित प्रश्न नहीं मिला।
इसलिए कोई अनुमानित प्रश्न नहीं जोड़ा गया है।
Prelims के लिए अंतिम तथ्य
मोहो = भूपर्पटी और मैंटल की सीमा।
खोजकर्ता = अंद्रिया मोहोरोविचिक।
खोज = 1909 के भूकंप के अध्ययन से।
मोहो पर P और S तरंग वेग बढ़ते हैं।
महासागर में मोहो उथला।
महाद्वीप में गहरा।
पर्वतों के नीचे और गहरा।
मोहो और LAB अलग सीमाएँ हैं।
मोहो के नीचे ऊपरी मैंटल में पेरिडोटाइट प्रमुख है।
Moho की गहराई और sharpness क्षेत्रीय रूप से बदलती है।
निष्कर्ष
मोहोरोविचिक असांतत्य पृथ्वी की भूपर्पटी और मैंटल के बीच की प्रमुख भूकंपीय सीमा है। इसके पार भूकंपीय वेग में वृद्धि पर्पटी से अधिक घनी मैंटल चट्टानों में परिवर्तन का संकेत देती है। आधुनिक भारतीय अध्ययनों से स्पष्ट है कि Moho की गहराई, तीक्ष्णता और संरचना क्षेत्रीय तापीय तथा विवर्तनिक इतिहास के अनुसार बदलती है।