1.3.1.1 खनन और ड्रिलिंग
पृथ्वी के आंतरिक भाग का प्रत्यक्ष अध्ययन बहुत सीमित है, क्योंकि पृथ्वी की औसत त्रिज्या लगभग 6,371 किमी है जबकि मनुष्य कुछ ही किलोमीटर गहराई तक पहुँच पाया है। फिर भी खनन और वैज्ञानिक ड्रिलिंग पृथ्वी की ऊपरी पर्पटी की प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त करने के सबसे महत्वपूर्ण साधनों में हैं।
इन्हीं से हमें चट्टानों की वास्तविक संरचना, तापमान, दबाव, दरारों, द्रवों तथा पर्पटी के भौतिक गुणों की प्रत्यक्ष जानकारी मिलती है।
खनन से प्राप्त जानकारी
खनन के दौरान पृथ्वी की सतह के नीचे स्थित वास्तविक चट्टानों और खनिजों तक पहुँचा जाता है।
गहरी खानों से प्राप्त नमूनों के अध्ययन से यह समझने में सहायता मिलती है कि गहराई के साथ—
- तापमान बढ़ता है,
- दबाव बढ़ता है,
- चट्टानों के गुण बदलते हैं,
- खनिजों और द्रवों का वितरण बदल सकता है।
खनन से प्राप्त प्रमाण पृथ्वी की ऊपरी पर्पटी के बारे में उपयोगी जानकारी देते हैं, लेकिन यह बहुत सीमित गहराई तक ही संभव है।
दक्षिण अफ्रीका की कुछ स्वर्ण खदानें लगभग 4 किमी से अधिक गहराई तक पहुँची हैं। इतनी गहराई पर तापमान और चट्टानी दबाव बहुत अधिक हो जाते हैं, जिससे आगे खुदाई तकनीकी और आर्थिक रूप से अत्यंत कठिन होती जाती है।
वैज्ञानिक ड्रिलिंग
वैज्ञानिक ड्रिलिंग का उद्देश्य केवल खनिज या पेट्रोलियम निकालना नहीं होता। इसमें पृथ्वी की पर्पटी का प्रत्यक्ष अध्ययन करने के लिए गहरे बोरहोल बनाए जाते हैं।
इनसे प्राप्त किए जाते हैं—
- चट्टानी कोर,
- तापमान के आँकड़े,
- द्रव और गैस के नमूने,
- विद्युत प्रतिरोधकता,
- घनत्व,
- छिद्रता,
- तनाव और दबाव संबंधी आँकड़े।
इससे सतही भूवैज्ञानिक और भूभौतिकीय मॉडलों की प्रत्यक्ष जाँच संभव होती है।
कोला सुपरडीप बोरहोल
पृथ्वी की पर्पटी में की गई सबसे प्रसिद्ध गहरी वैज्ञानिक ड्रिलिंगों में रूस का कोला सुपरडीप बोरहोल शामिल है।
इसकी अधिकतम गहराई लगभग 12.26 किमी थी।
यह महत्वपूर्ण उदाहरण दिखाता है कि मानव द्वारा की गई सबसे गहरी ड्रिलिंग भी पृथ्वी की कुल त्रिज्या की तुलना में अत्यंत कम है।
इसीलिए मैंटल और क्रोड की संरचना का अध्ययन प्रत्यक्ष ड्रिलिंग से नहीं बल्कि भूकंपीय और अन्य अप्रत्यक्ष विधियों से किया जाता है।
ड्रिलिंग से क्या-क्या पता चलता है?
वैज्ञानिक ड्रिलिंग से प्राप्त चट्टानी कोर हमें वास्तविक भूवैज्ञानिक अनुक्रम दिखाते हैं।
इनसे वैज्ञानिक—
- चट्टानों की आयु,
- खनिज संरचना,
- भ्रंश और दरारें,
- प्राचीन जलवायु रिकॉर्ड,
- भूमिगत द्रवों की प्रकृति,
- तापमान और ऊष्मा प्रवाह,
- चट्टानों की यांत्रिक शक्ति
का अध्ययन करते हैं।
कई गहरे बोरहोलों में उपकरण स्थापित कर उन्हें बोरहोल वेधशाला की तरह भी उपयोग किया जाता है।
ड्रिलिंग और भूकंप अध्ययन
भूकंप सक्रिय क्षेत्रों में गहरी ड्रिलिंग विशेष रूप से उपयोगी है।
सतह से केवल भूकंप के प्रभाव देखे जा सकते हैं, लेकिन गहरे बोरहोलों में सेंसर लगाकर भ्रंश के पास—
- सूक्ष्म भूकंपीय गतिविधि,
- चट्टानों का तनाव,
- द्रव दबाव,
- तापमान,
- विद्युत और भौतिक गुण
सीधे मापे जा सकते हैं।
इससे भूकंप के उत्पन्न होने की प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिलती है।
भारत का कोयना वैज्ञानिक गहरी ड्रिलिंग कार्यक्रम
भारत में महाराष्ट्र के कोयना-वारणा क्षेत्र में वैज्ञानिक गहरी ड्रिलिंग पृथ्वी की पर्पटी और जलाशय-प्रेरित भूकंपों को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
कोयना क्षेत्र कई दशकों से जलाशय-प्रेरित भूकंपीयता के लिए प्रसिद्ध है।
भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत बोरहोल जियोफिजिक्स रिसर्च लेबोरेटरी, कराड इस कार्यक्रम को संचालित कर रही है।
मुख्य उद्देश्य
इस परियोजना का उद्देश्य भूकंप सक्रिय क्षेत्र में कुछ किलोमीटर गहराई तक पहुँचकर—
- चट्टानों के भौतिक गुण,
- द्रव दबाव,
- तापमान,
- जलवैज्ञानिक परिवर्तन,
- भ्रंश क्षेत्र की संरचना,
- भूकंप से पहले और बाद के परिवर्तन
को प्रत्यक्ष रूप से मापना है।
इससे जलाशय-प्रेरित भूकंपों की प्रक्रिया और भ्रंशों के व्यवहार को बेहतर समझने में सहायता मिलेगी।
6 किमी गहरे बोरहोल की योजना
भारत सरकार द्वारा 2025 में संसद में दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार कोयना क्षेत्र में लगभग 6 किमी गहरा वैज्ञानिक बोरहोल बनाने की अगली अवस्था की योजना है।
इसके पहले अन्वेषण और पायलट चरण पूरे किए जा चुके हैं।
पायलट बोरहोल लगभग 3 किमी तक ड्रिल किया गया था और इससे महत्वपूर्ण भूभौतिकीय आँकड़े प्राप्त हुए।
गहरे बोरहोल में स्थायी उपकरण लगाकर इसे पृथ्वी की पर्पटी के भीतर एक भूकंपीय वेधशाला के रूप में विकसित करने का उद्देश्य है।
कोयना कार्यक्रम का परीक्षा महत्व
यह परियोजना तीन विषयों को जोड़ती है—
पृथ्वी की आंतरिक संरचना + वैज्ञानिक ड्रिलिंग + मानव/जलाशय-प्रेरित भूकंप
इसलिए इसे Prelims के साथ Mains में भी उदाहरण के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
यदि प्रश्न हो कि वैज्ञानिक ड्रिलिंग क्यों महत्वपूर्ण है, तो कोयना परियोजना भारत का अच्छा समसामयिक उदाहरण है।
खनन और ड्रिलिंग की सीमाएँ
यद्यपि ये प्रत्यक्ष प्रमाण प्रदान करते हैं, लेकिन इनकी महत्वपूर्ण सीमाएँ हैं।
अत्यंत सीमित गहराई
12 किमी की ड्रिलिंग भी 6,371 किमी त्रिज्या वाली पृथ्वी का अत्यंत छोटा भाग है।
इसलिए इनसे क्रोड या गहरे मैंटल का प्रत्यक्ष नमूना नहीं मिलता।
अत्यधिक तापमान
गहराई बढ़ने पर तापमान तेजी से बढ़ता है, जिससे उपकरण और ड्रिलिंग सामग्री प्रभावित होती है।
अत्यधिक दबाव
चट्टानों पर दबाव बढ़ने से बोरहोल अस्थिर हो सकते हैं और ड्रिलिंग तकनीकी रूप से कठिन हो जाती है।
अत्यधिक लागत
गहरे बोरहोलों के लिए विशेष उपकरण, दीर्घकालीन वैज्ञानिक कार्यक्रम और भारी वित्तीय संसाधन आवश्यक होते हैं।
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अध्ययन का संबंध
खनन और ड्रिलिंग से प्राप्त प्रत्यक्ष नमूनों का उपयोग अक्सर भूकंपीय, गुरुत्वीय और चुंबकीय आँकड़ों की जाँच के लिए किया जाता है।
इसलिए पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विधियाँ एक-दूसरे की पूरक हैं।
उदाहरण के लिए—
ड्रिलिंग से वास्तविक चट्टान मिलती है, जबकि
भूकंपीय तरंगें उसी प्रकार की संरचना को बहुत अधिक गहराई तक समझने में सहायता करती हैं।
Prelims के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
खनन और ड्रिलिंग पृथ्वी के आंतरिक भाग की जानकारी के प्रत्यक्ष स्रोत हैं।
ज्वालामुखीय पदार्थ भी प्रत्यक्ष स्रोत माना जाता है।
भूकंपीय तरंगें, गुरुत्व और चुंबकीय क्षेत्र अप्रत्यक्ष स्रोत हैं।
कोला सुपरडीप बोरहोल की अधिकतम गहराई लगभग 12.26 किमी थी।
मानव अभी तक मैंटल या क्रोड तक ड्रिल नहीं कर पाया है।
भारत का वैज्ञानिक गहरी ड्रिलिंग कार्यक्रम कोयना, महाराष्ट्र में चल रहा है।
कोयना क्षेत्र जलाशय-प्रेरित भूकंपीयता के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है।
कोयना की अगली वैज्ञानिक योजना लगभग 6 किमी गहरे बोरहोल और गहरे बोरहोल वेधशाला से संबंधित है।
Mains के लिए उपयोग
यदि प्रश्न हो कि “पृथ्वी के आंतरिक भाग की प्रत्यक्ष जानकारी के स्रोतों की सीमाएँ बताइए”, तो उत्तर में लिखें—
खनन और ड्रिलिंग वास्तविक चट्टानी नमूने और इन-सीटू मापन प्रदान करते हैं, लेकिन उनकी गहराई पृथ्वी की कुल त्रिज्या की तुलना में अत्यंत कम है। बढ़ते ताप, दबाव और लागत के कारण प्रत्यक्ष अध्ययन सीमित है। इसलिए गहरे मैंटल और क्रोड के लिए भूकंपीय तरंगों जैसे अप्रत्यक्ष साधनों पर निर्भर रहना पड़ता है।
भारत के कोयना वैज्ञानिक गहरी ड्रिलिंग कार्यक्रम को समसामयिक उदाहरण के रूप में जोड़ा जा सकता है।
समसामयिक अद्यतन — कोयना वैज्ञानिक गहरी ड्रिलिंग
मार्च 2025 में भारत सरकार ने लोकसभा में बताया कि कोयना क्षेत्र में लगभग 6 किमी गहरे बोरहोल तथा गहरे बोरहोल वेधशाला की योजना विस्तृत तैयारी के चरण में थी।
इसका मुख्य उद्देश्य भूकंप के निकट क्षेत्र में चट्टानों के गुणों में भूकंप से पहले और बाद में होने वाले परिवर्तन तथा जलाशय-प्रेरित भूकंपीयता की प्रक्रिया को समझना है।
यह कार्यक्रम पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के BGRL, कराड द्वारा संचालित है तथा भारतीय संस्थानों और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक गहरी ड्रिलिंग विशेषज्ञता का सहयोग लिया जा रहा है।
यह उदाहरण UPSC/BPSC Mains में भारत की भूभौतिकीय अनुसंधान क्षमता और भूकंप जोखिम अध्ययन दोनों से जोड़ा जा सकता है।
सत्यापित UPSC Prelims PYQ
इस सूक्ष्म उपविषय “खनन और ड्रिलिंग द्वारा पृथ्वी के आंतरिक भाग का अध्ययन” पर UPSC सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा का ऐसा प्रत्यक्ष, वर्ष-सहित प्रश्न सत्यापित नहीं मिला जिसे बिना संदेह PYQ के रूप में शामिल किया जा सके।
इसलिए किसी कोचिंग के अभ्यास प्रश्न को PYQ के रूप में शामिल नहीं किया गया है।
सत्यापित UPSC Mains PYQ
UPSC सामान्य अध्ययन मुख्य परीक्षा में इस सूक्ष्म उपविषय पर प्रत्यक्ष सत्यापित प्रश्न नहीं मिला।
इसलिए कोई अनुमानित प्रश्न PYQ के नाम से नहीं जोड़ा गया है।
सत्यापित BPSC Prelims PYQ
BPSC संयुक्त प्रतियोगिता प्रारंभिक परीक्षा में इस सूक्ष्म उपविषय पर प्रत्यक्ष सत्यापित PYQ नहीं मिला।
इसलिए कोई स्वयं-निर्मित या टेस्ट-सीरीज प्रश्न नहीं जोड़ा गया है।
सत्यापित BPSC Mains PYQ
BPSC सामान्य अध्ययन मुख्य परीक्षा में खनन और वैज्ञानिक ड्रिलिंग को पृथ्वी की आंतरिक संरचना के प्रत्यक्ष स्रोत के रूप में पूछने वाला प्रत्यक्ष सत्यापित प्रश्न नहीं मिला।
इसलिए यहाँ कोई नकली PYQ नहीं जोड़ा गया है।
निष्कर्ष
खनन और वैज्ञानिक ड्रिलिंग पृथ्वी की ऊपरी पर्पटी के प्रत्यक्ष अध्ययन के महत्वपूर्ण साधन हैं। वे वास्तविक चट्टानी नमूने तथा ताप, दबाव, द्रव और भ्रंश संबंधी प्रत्यक्ष आँकड़े उपलब्ध कराते हैं। किंतु अत्यधिक तापमान, दबाव, लागत और तकनीकी सीमाओं के कारण ये पृथ्वी के बहुत छोटे भाग तक ही पहुँच सकते हैं। इसलिए गहरे मैंटल और क्रोड को समझने के लिए प्रत्यक्ष प्रमाणों को भूकंपीय और अन्य अप्रत्यक्ष प्रमाणों के साथ जोड़ना आवश्यक है। भारत का कोयना वैज्ञानिक गहरी ड्रिलिंग कार्यक्रम इसका महत्वपूर्ण समसामयिक उदाहरण है।