1.3.1.2 ज्वालामुखीय पदार्थ
पृथ्वी के आंतरिक भाग तक प्रत्यक्ष रूप से पहुँचना संभव नहीं है, लेकिन ज्वालामुखीय उद्गार पृथ्वी के भीतर से पदार्थ सतह तक लाते हैं। इसलिए लावा, ज्वालामुखीय गैसें, राख, शैल-खंड तथा ज़ेनोलिथ पृथ्वी की ऊपरी पर्पटी और विशेष रूप से ऊपरी मैंटल के अध्ययन के महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष प्रमाण माने जाते हैं।
ध्यान रहे कि ज्वालामुखीय पदार्थ पृथ्वी के क्रोड से सीधे नहीं आता। अधिकांश मैग्मा पर्पटी या ऊपरी मैंटल के आंशिक पिघलाव से बनता है। इसलिए ज्वालामुखीय पदार्थ पृथ्वी के पूरे आंतरिक भाग का प्रत्यक्ष नमूना नहीं, बल्कि मुख्यतः पर्पटी और ऊपरी मैंटल की जानकारी देता है।
मैग्मा और लावा
पृथ्वी के भीतर मौजूद पिघला या अर्ध-पिघला चट्टानी पदार्थ मैग्मा कहलाता है।
जब यही पदार्थ पृथ्वी की सतह पर निकल आता है तो उसे लावा कहा जाता है।
मैग्मा में सामान्यतः तीन घटक पाए जाते हैं—
- पिघला हुआ द्रव पदार्थ,
- ठोस खनिज क्रिस्टल,
- घुली हुई गैसें।
मैग्मा का रासायनिक संघटन, तापमान, गैसों की मात्रा और श्यानता ज्वालामुखीय उद्गार के प्रकार को प्रभावित करते हैं।
मैग्मा कहाँ बनता है?
सामान्यतः मैग्मा पृथ्वी के ऊपरी मैंटल या निचली पर्पटी में आंशिक पिघलाव से बनता है।
आंशिक पिघलाव मुख्यतः तीन परिस्थितियों से जुड़ा हो सकता है—
दाब में कमी — जैसे मध्य-महासागरीय कटक और रिफ्ट क्षेत्रों में।
जल या अन्य वाष्पशील पदार्थों का प्रवेश — जैसे सबडक्शन क्षेत्रों में।
तापमान में वृद्धि — जैसे कुछ हॉटस्पॉट या मैग्माई अंतःक्रियाओं में।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि सामान्य ज्वालामुखीय लावा पृथ्वी के केंद्र से सीधे ऊपर नहीं आता।
लावा के प्रमुख प्रकार
सिलिका की मात्रा मैग्मा और लावा के व्यवहार को बहुत प्रभावित करती है।
बेसाल्टिक लावा
इसमें सिलिका अपेक्षाकृत कम होती है और यह अधिक तरल होता है।
यह सामान्यतः उच्च तापमान पर निकलता है और दूर तक बह सकता है।
मध्य-महासागरीय कटक, महासागरीय हॉटस्पॉट तथा अनेक दरारी उद्गारों में बेसाल्टिक लावा प्रमुख होता है।
बेसाल्टिक मैग्मा का संबंध प्रायः ऊपरी मैंटल के आंशिक पिघलाव से होता है, इसलिए यह मैंटल की संरचना के अध्ययन में महत्वपूर्ण है।
एंडेसाइटिक लावा
इसकी संरचना और श्यानता बेसाल्ट तथा रयोलाइट के बीच होती है।
यह विशेष रूप से अभिसारी प्लेट सीमाओं और द्वीपीय ज्वालामुखीय चापों में सामान्य है।
भारत का बैरन द्वीप ज्वालामुखी बेसाल्ट, पिक्रो-बेसाल्ट तथा बेसाल्टिक एंडेसाइट/एंडेसाइट प्रकार की चट्टानों से जुड़ा है।
रयोलाइटिक लावा
इसमें सिलिका अधिक होती है और यह बहुत अधिक श्यान होता है।
गैसों के आसानी से बाहर न निकल पाने के कारण उच्च-सिलिका मैग्मा अधिक विस्फोटक उद्गार पैदा कर सकता है।
रयोलाइटिक मैग्मा कई बार पर्पटीय पदार्थ के पिघलाव तथा मैग्माई विभेदन से जुड़ा होता है, इसलिए इसे सीधे गहरे मैंटल का नमूना नहीं माना जाना चाहिए।
ज्वालामुखीय गैसें
मैग्मा में अनेक गैसें घुली होती हैं। दबाव कम होने पर ये गैसें अलग होकर सतह पर निकलती हैं।
प्रमुख ज्वालामुखीय गैसों में—
- जलवाष्प,
- कार्बन डाइऑक्साइड,
- सल्फर डाइऑक्साइड,
- हाइड्रोजन सल्फाइड,
- हाइड्रोजन हैलाइड
शामिल हो सकते हैं।
सामान्यतः जलवाष्प ज्वालामुखीय गैसों का प्रमुख घटक होता है।
गैसों की रासायनिक संरचना से वैज्ञानिक मैग्मा की अवस्था, गहराई में होने वाले परिवर्तनों और संभावित उद्गार गतिविधि के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं।
ज्वालामुखीय गैसें आंतरिक संरचना के प्रमाण कैसे हैं?
ज्वालामुखीय गैसों का अध्ययन पृथ्वी के आंतरिक भाग में उपस्थित वाष्पशील पदार्थों के बारे में जानकारी देता है।
इनसे यह समझने में सहायता मिलती है कि—
- मैग्मा में जल और कार्बन जैसी गैसें कितनी मात्रा में हैं,
- गैस-मुक्ति किस गहराई पर शुरू हो रही है,
- मैग्मा ऊपर की ओर बढ़ रहा है या स्थिर है,
- पृथ्वी के प्रारंभिक वायुमंडल के विकास में ज्वालामुखीय गैसों की क्या भूमिका रही होगी।
लेकिन गैसें रास्ते में पर्पटी तथा भूमिगत जल से प्रभावित हो सकती हैं, इसलिए उनकी व्याख्या सावधानी से की जाती है।
पाइरोक्लास्टिक पदार्थ
विस्फोटक ज्वालामुखीय उद्गार के दौरान मैग्मा और पुरानी चट्टानें टूटकर विभिन्न आकार के ठोस टुकड़ों के रूप में बाहर निकलती हैं। इन्हें सामूहिक रूप से पाइरोक्लास्टिक पदार्थ कहा जाता है।
आकार के आधार पर सामान्य वर्गीकरण—
ज्वालामुखीय राख — 2 मिमी से छोटे कण।
लैपिली — लगभग 2 मिमी से 64 मिमी।
बम और ब्लॉक — 64 मिमी से बड़े पदार्थ।
ज्वालामुखीय बम पिघली या अर्ध-पिघली अवस्था में बाहर निकलकर हवा में आकार ग्रहण कर सकते हैं, जबकि ब्लॉक पहले से ठोस चट्टानों के टुकड़े होते हैं।
इन पदार्थों का अध्ययन मैग्मा की संरचना, उद्गार की तीव्रता और ज्वालामुखीय इतिहास को समझने में उपयोगी है।
राख का महत्व
ज्वालामुखीय राख केवल धूल नहीं होती। यह अत्यंत सूक्ष्म चट्टानी और काँचीय कणों से बनी होती है।
राख की परतें दूर-दूर तक फैल सकती हैं और किसी बड़े उद्गार की विशिष्ट समय-चिह्न परत बन सकती हैं।
इस कारण ज्वालामुखीय राख का उपयोग—
- अलग-अलग भूवैज्ञानिक अनुक्रमों का सहसंबंध,
- रेडियोमेट्रिक आयु-निर्धारण,
- प्राचीन पर्यावरण और उद्गार इतिहास
समझने में किया जाता है।
ज़ेनोलिथ — आंतरिक भाग का विशेष प्रमाण
ज्वालामुखीय पदार्थों में सबसे महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष प्रमाणों में ज़ेनोलिथ शामिल हैं।
ज़ेनोलिथ का अर्थ है ऐसी पुरानी चट्टान का टुकड़ा जिसे ऊपर उठता हुआ मैग्मा अपने साथ तोड़कर सतह तक ले आता है।
यदि कोई ज़ेनोलिथ ऊपरी मैंटल से आया हो, तो वैज्ञानिकों को उस गहराई की वास्तविक चट्टान का नमूना मिल सकता है।
मैंटल ज़ेनोलिथ
ऊपरी मैंटल के ज़ेनोलिथ में सामान्यतः पेरिडोटाइट जैसी अति-माफिक चट्टानें मिलती हैं।
इनमें प्रमुख खनिज हो सकते हैं—
- ओलिवीन,
- पाइरोक्सीन,
- स्पिनेल,
- अधिक गहराई पर गार्नेट।
इन खनिजों के अध्ययन से वैज्ञानिक ऊपरी मैंटल की—
- रासायनिक संरचना,
- तापमान,
- दबाव,
- पिघलाव की मात्रा,
- जल और अन्य वाष्पशील पदार्थों
के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं।
यही कारण है कि मैंटल ज़ेनोलिथ पृथ्वी की आंतरिक संरचना के सबसे उपयोगी प्रत्यक्ष नमूनों में गिने जाते हैं।
किम्बरलाइट और गहरे पदार्थ
कुछ तीव्र ज्वालामुखीय मैग्मा बहुत तेजी से गहराई से सतह तक पहुँचते हैं।
किम्बरलाइट पाइप गहरे मैंटल से पदार्थ और कभी-कभी हीरे को सतह तक ला सकते हैं।
हीरा अत्यधिक दबाव की स्थितियों में बनता है, इसलिए कुछ हीरे और उनके भीतर फँसे सूक्ष्म खनिज गहरे मैंटल की परिस्थितियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दे सकते हैं।
फिर भी किम्बरलाइट भी क्रोड का प्रत्यक्ष नमूना नहीं लाता।
ज्वालामुखीय पदार्थ से हमें क्या पता चलता है?
ज्वालामुखीय पदार्थों के अध्ययन से वैज्ञानिक निम्न बातों का अनुमान लगा सकते हैं—
ऊपरी मैंटल की संरचना — बेसाल्ट और मैंटल ज़ेनोलिथ से।
मैग्मा का स्रोत — समस्थानिक और रासायनिक विश्लेषण से।
ताप एवं दबाव की दशाएँ — खनिज संतुलन से।
मैग्मा की गहराई और विकास — क्रिस्टल तथा गैसों के अध्ययन से।
आंशिक पिघलाव की प्रक्रिया — विभिन्न तत्वों की सांद्रता से।
पर्पटी-मैंटल अंतःक्रिया — मैग्मा में पर्पटीय पदार्थ के मिश्रण से।
इसलिए ज्वालामुखीय पदार्थ पृथ्वी के आंतरिक भाग का एक प्रकार का प्राकृतिक “नमूना-वहन तंत्र” है।
सीमाएँ
ज्वालामुखीय पदार्थों को सीधे पृथ्वी के मूल आंतरिक संघटन के समान नहीं मानना चाहिए।
इसके प्रमुख कारण हैं—
मैग्माई विभेदन
मैग्मा ऊपर आते समय ठंडा होता है और विभिन्न खनिज अलग-अलग समय पर क्रिस्टलीकृत होते हैं। इससे बचा हुआ मैग्मा मूल स्रोत से रासायनिक रूप से अलग हो सकता है।
पर्पटी का मिश्रण
मैग्मा ऊपर आते समय आसपास की पर्पटीय चट्टानों को पिघला या अपने भीतर मिला सकता है।
मैग्मा मिश्रण
अलग-अलग स्रोतों से आए मैग्मा आपस में मिल सकते हैं।
सीमित गहराई
अधिकांश ज्वालामुखीय पदार्थ ऊपरी मैंटल और पर्पटी से संबंधित होते हैं।
क्रोड से ज्वालामुखीय पदार्थ सीधे सतह पर नहीं आता।
यह Prelims का महत्वपूर्ण अवधारणात्मक बिंदु है।
बैरन द्वीप — भारत का महत्वपूर्ण उदाहरण
बैरन द्वीप अंडमान सागर में स्थित भारत का एकमात्र ऐतिहासिक रूप से सक्रिय ज्वालामुखी है।
यह पोर्ट ब्लेयर से लगभग 135 किमी उत्तर-पूर्व में स्थित है।
यह अंडमान ज्वालामुखीय चाप का भाग है, जो भारतीय प्लेट/इंडो-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट के पूर्वी भाग और बर्मा माइक्रोप्लेट क्षेत्र की सबडक्शन व्यवस्था से संबंधित है।
बैरन द्वीप एक स्ट्रैटोवोल्केनो है और इसमें विस्फोटक तथा लावा-प्रवाह दोनों प्रकार की गतिविधि देखी जाती है।
इसके प्रमुख शैल प्रकारों में बेसाल्ट, पिक्रो-बेसाल्ट तथा बेसाल्टिक एंडेसाइट/एंडेसाइट शामिल हैं।
बैरन द्वीप और पृथ्वी की आंतरिक संरचना
बैरन द्वीप जैसे ज्वालामुखी से निकले लावा और चट्टानों के भू-रासायनिक अध्ययन से—
- सबडक्शन क्षेत्र में मैग्मा निर्माण,
- मैंटल वेज की प्रकृति,
- समुद्री प्लेट से निकलने वाले जल/वाष्पशील पदार्थ,
- पर्पटी-मैंटल अंतःक्रिया
को समझने में सहायता मिलती है।
इसलिए बैरन द्वीप केवल भारत का सक्रिय ज्वालामुखी नहीं, बल्कि प्लेट विवर्तनिकी और पृथ्वी के आंतरिक भाग के अध्ययन की प्राकृतिक प्रयोगशाला भी है।
समसामयिक अद्यतन — बैरन द्वीप 2025–2026
Smithsonian Institution और USGS के Global Volcanism Program के अनुसार बैरन द्वीप में 30 जुलाई 2025 से 11 जनवरी 2026 तक एक पुष्ट विस्फोटक/प्रवाही उद्गार चरण दर्ज किया गया।
नवंबर–दिसंबर 2025 में राख उत्सर्जन और सक्रिय लावा प्रवाह देखे गए।
10 जनवरी 2026 को उपग्रह चित्रों में लगभग 1.2 किमी ऊँचाई तक उठता राख-स्तंभ दर्ज किया गया और ज्वालामुखी पर तापीय विसंगतियाँ भी देखी गईं।
इसका परीक्षा-योग्य महत्व—
- बैरन द्वीप को “1991 के बाद निष्क्रिय” कहना गलत है।
- यह अभी भी सक्रिय ज्वालामुखीय प्रणाली है।
- उपग्रह तापीय विसंगति और राख-स्तंभ आधुनिक ज्वालामुखी निगरानी के महत्वपूर्ण साधन हैं।
- यह भारत के अंडमान ज्वालामुखीय चाप और सबडक्शन भूगोल से जुड़ा है।
Prelims के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य
मैग्मा पृथ्वी के भीतर का पिघला पदार्थ है; सतह पर निकलने पर इसे लावा कहते हैं।
सभी ज्वालामुखीय लावा क्रोड से नहीं आते।
अधिकांश मैग्मा पर्पटी या ऊपरी मैंटल के आंशिक पिघलाव से बनते हैं।
बेसाल्टिक मैग्मा सामान्यतः कम सिलिका और कम श्यानता वाला होता है।
ज्वालामुखीय राख का आकार 2 मिमी से कम होता है।
लैपिली 2–64 मिमी आकार के पाइरोक्लास्टिक कण हैं।
बम/ब्लॉक 64 मिमी से बड़े होते हैं।
ज़ेनोलिथ मैग्मा द्वारा ऊपर लाया गया दूसरी चट्टान का टुकड़ा है।
पेरिडोटाइट ज़ेनोलिथ ऊपरी मैंटल के अध्ययन में महत्वपूर्ण हैं।
ज्वालामुखीय पदार्थ पृथ्वी के आंतरिक भाग का प्रत्यक्ष प्रमाण है, लेकिन मुख्यतः ऊपरी मैंटल और पर्पटी के लिए।
बैरन द्वीप भारत का एकमात्र ऐतिहासिक रूप से सक्रिय ज्वालामुखी है।
नारकोंडम भी ज्वालामुखीय मूल का द्वीप है, लेकिन बैरन द्वीप जैसी ऐतिहासिक सक्रियता नहीं दिखाता।
Mains के लिए उत्तर-ढाँचा
यदि प्रश्न हो—“ज्वालामुखीय पदार्थ पृथ्वी की आंतरिक संरचना के प्रत्यक्ष प्रमाण कैसे प्रदान करते हैं?”
उत्तर इस क्रम में लिखें—
भूमिका — प्रत्यक्ष ड्रिलिंग की सीमा और प्राकृतिक ज्वालामुखीय नमूनों का महत्व।
पदार्थ — लावा, गैस, पाइरोक्लास्ट, ज़ेनोलिथ।
मुख्य प्रमाण — पेरिडोटाइट ज़ेनोलिथ से ऊपरी मैंटल; बेसाल्ट से मैंटल पिघलाव; गैसों से वाष्पशील पदार्थ।
विश्लेषण — भू-रसायन, समस्थानिक संरचना, ताप-दाब संकेत।
सीमा — मैग्माई विभेदन, पर्पटीय मिश्रण, क्रोड का प्रत्यक्ष नमूना नहीं।
भारत उदाहरण — बैरन द्वीप और अंडमान सबडक्शन चाप।
समसामयिक मूल्यवर्धन — 2025–2026 बैरन द्वीप गतिविधि।
सत्यापित UPSC Prelims PYQ
UPSC सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा, 2018
बैरन द्वीप ज्वालामुखी के संबंध में तीन कथन दिए गए थे—
- बैरन द्वीप ज्वालामुखी भारतीय क्षेत्र में स्थित सक्रिय ज्वालामुखी है।
- बैरन द्वीप ग्रेट निकोबार से लगभग 140 किमी पूर्व में स्थित है।
- इसका अंतिम उद्गार 1991 में हुआ और तब से यह निष्क्रिय है।
सही उत्तर: केवल कथन 1।
दूसरा कथन गलत था क्योंकि बैरन द्वीप लगभग 135–140 किमी उत्तर-पूर्व में पोर्ट ब्लेयर से संबंधित स्थिति में है, ग्रेट निकोबार से नहीं।
तीसरा कथन गलत था क्योंकि 1991 के बाद भी कई उद्गार हुए हैं और 2025–2026 में भी गतिविधि दर्ज हुई है।
सत्यापित UPSC Mains PYQ
UPSC सामान्य अध्ययन मुख्य परीक्षा-I, 2021 — 10 अंक
प्रश्न:
“2021 में ज्वालामुखी विस्फोटों की वैश्विक घटनाओं तथा क्षेत्रीय पर्यावरण पर उनके प्रभाव का उल्लेख कीजिए।”
यह ज्वालामुखीय गतिविधि पर प्रत्यक्ष GS-I Mains प्रश्न है।
इससे स्पष्ट है कि Mains में केवल ज्वालामुखी की परिभाषा नहीं, बल्कि—
- वर्तमान घटनाएँ,
- वैश्विक वितरण,
- राख, लावा और गैस,
- पर्यावरणीय प्रभाव
को जोड़कर पूछा जा सकता है।
सत्यापित BPSC Prelims PYQ
39वीं BPSC प्रारंभिक परीक्षा, 1994
प्रश्न:
“मौना लोआ किसका उदाहरण है?”
सही उत्तर:
सक्रिय ज्वालामुखी।
68वीं BPSC प्रारंभिक परीक्षा, 2023
प्रश्न:
“निम्नलिखित में से कौन-सा विश्व का सबसे बड़ा ज्वालामुखी है, जो 38 वर्षों में पहली बार फटा?”
सही उत्तर:
मौना लोआ।
यह प्रश्न नवंबर 2022 में मौना लोआ के 1984 के बाद पहली बार फटने की समसामयिक घटना से जुड़ा था।
70वीं BPSC प्रारंभिक परीक्षा, 2024
प्रश्न:
“लावा के ठंडा होने और ठोस होने से किस प्रकार की चट्टान बनती है?”
सही उत्तर:
आग्नेय चट्टान।
यह ज्वालामुखीय पदार्थ और शैल-निर्माण से सीधा प्रश्न है।
71वीं BPSC प्रारंभिक परीक्षा, 2025
प्रश्न:
“भारतीय क्षेत्र में दो ज्वालामुखीय द्वीप कौन-से हैं?”
सही उत्तर:
नारकोंडम और बैरन।
यह भारत के ज्वालामुखीय भूगोल का महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष PYQ है।
सत्यापित BPSC Mains PYQ
इस सूक्ष्म विषय “ज्वालामुखीय पदार्थ को पृथ्वी के आंतरिक भाग का प्रत्यक्ष प्रमाण” पर BPSC सामान्य अध्ययन मुख्य परीक्षा का प्रत्यक्ष सत्यापित प्रश्न उपलब्ध स्रोतों में नहीं मिला।
67वीं BPSC Geography Optional के उपलब्ध आधिकारिक प्रश्नपत्र में भी इस विशिष्ट उपविषय पर प्रत्यक्ष प्रश्न नहीं था।
इसलिए कोई अभ्यास प्रश्न या कोचिंग प्रश्न PYQ के नाम से नहीं जोड़ा गया है।
PYQ से परीक्षा-प्रवृत्ति
UPSC और BPSC के वास्तविक प्रश्नों से तीन स्पष्ट प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं—
स्थैतिक तथ्य — सक्रिय ज्वालामुखी, ज्वालामुखीय द्वीप।
प्रक्रिया — लावा ठंडा होकर आग्नेय चट्टान बनाता है।
समसामयिकी — मौना लोआ और बैरन द्वीप जैसी हाल की गतिविधियाँ।
इसलिए इस विषय को केवल “पृथ्वी के आंतरिक प्रमाण” तक सीमित न पढ़ें। इसे—
आंतरिक संरचना + प्लेट विवर्तनिकी + शैल निर्माण + भारत का भूगोल + समसामयिक ज्वालामुखिता
से जोड़कर पढ़ना अधिक उपयोगी है।
निष्कर्ष
ज्वालामुखीय पदार्थ पृथ्वी के आंतरिक भाग के अध्ययन का महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष स्रोत है। लावा और बेसाल्ट मैग्मा-निर्माण की प्रक्रिया बताते हैं, गैसें आंतरिक वाष्पशील पदार्थों का संकेत देती हैं और मैंटल ज़ेनोलिथ ऊपरी मैंटल की वास्तविक चट्टानों को सतह तक लाते हैं। हालांकि मैग्माई विभेदन और पर्पटीय मिश्रण के कारण ज्वालामुखीय पदार्थ को पूरे पृथ्वी-आंतरिक भाग का अपरिवर्तित नमूना नहीं माना जा सकता। भारत का बैरन द्वीप इस विषय को प्लेट विवर्तनिकी, ज्वालामुखिता और वर्तमान भूगोल से जोड़ने वाला प्रमुख उदाहरण है।