1.3.2.5 स्थलमंडल
पृथ्वी की सबसे बाहरी कठोर और भंगुर यांत्रिक परत को स्थलमंडल कहा जाता है। यह केवल भूपर्पटी नहीं है, बल्कि इसमें—
संपूर्ण भूपर्पटी + ऊपरी मैंटल का सबसे ऊपरी कठोर भाग
शामिल होता है।
स्थलमंडल के नीचे अपेक्षाकृत कमजोर और नम्य दुर्बलतामंडल स्थित है। पृथ्वी का स्थलमंडल कई बड़े और छोटे विवर्तनिक प्लेटों में विभाजित है और इन्हीं प्लेटों की गति से भूकंप, ज्वालामुखिता, पर्वतनिर्माण, महासागरीय गर्त और मध्य-महासागरीय कटक जैसी प्रमुख भू-गतिशील प्रक्रियाएँ जुड़ी हैं।
स्थलमंडल और भूपर्पटी में अंतर
भूपर्पटी और स्थलमंडल समान नहीं हैं।
भूपर्पटी रासायनिक संरचना पर आधारित परत है।
स्थलमंडल यांत्रिक गुणों पर आधारित परत है।
स्थलमंडल में पूरी भूपर्पटी के साथ ऊपरी मैंटल का कठोर भाग भी शामिल होता है।
| आधार | भूपर्पटी | स्थलमंडल |
|---|---|---|
| वर्गीकरण | रासायनिक | यांत्रिक |
| संरचना | केवल पर्पटी | पर्पटी + कठोर ऊपरी मैंटल |
| प्रकृति | ठोस | कठोर एवं भंगुर |
| निचली सीमा | मोहो | स्थलमंडल-दुर्बलतामंडल सीमा |
| प्लेटों से संबंध | प्लेट का केवल ऊपरी भाग | पूरी विवर्तनिक प्लेट |
परीक्षा-फँद
मोहो स्थलमंडल की निचली सीमा नहीं है।
मोहो केवल भूपर्पटी और मैंटल की सीमा है।
स्थलमंडल मोहो के नीचे ऊपरी मैंटल में भी जारी रहता है।
स्थलमंडल की मोटाई
स्थलमंडल की मोटाई पूरी पृथ्वी पर समान नहीं है।
यह मुख्यतः तापमान, आयु, संरचना और विवर्तनिक स्थिति पर निर्भर करती है।
सामान्यतः—
- मध्य-महासागरीय कटक के पास स्थलमंडल बहुत पतला होता है।
- पुरानी महासागरीय प्लेट दूर जाते हुए ठंडी होकर मोटी होती जाती है।
- महाद्वीपीय स्थलमंडल सामान्यतः महासागरीय स्थलमंडल से अधिक मोटा हो सकता है।
- प्राचीन स्थिर क्रेटोन के नीचे स्थलमंडलीय मैंटल 150–200 किमी या उससे अधिक गहराई तक पहुँच सकता है।
इसलिए स्थलमंडल के लिए कोई एक निश्चित वैश्विक मोटाई याद करना उचित नहीं है।
NCERT स्तर पर इसे पृथ्वी की ऊपरी लगभग 100 किमी के क्रम की कठोर परत के रूप में समझा जा सकता है, लेकिन वास्तविक मोटाई स्थान-स्थान पर बहुत बदलती है।
स्थलमंडल-दुर्बलतामंडल सीमा
स्थलमंडल की निचली सीमा को Lithosphere–Asthenosphere Boundary — LAB कहा जाता है।
यह सीमा भूपर्पटी–मैंटल सीमा की तरह केवल रासायनिक संरचना में बदलाव नहीं दर्शाती।
यह मुख्यतः यांत्रिक और तापीय व्यवहार का परिवर्तन है—
ऊपर — कठोर स्थलमंडल
नीचे — अपेक्षाकृत कमजोर और नम्य दुर्बलतामंडल
LAB की गहराई अलग-अलग क्षेत्रों में अलग होती है।
महासागरीय स्थलमंडल
महासागरीय स्थलमंडल में—
- महासागरीय भूपर्पटी,
- ऊपरी मैंटल का कठोर भाग
शामिल होता है।
इसका जन्म मध्य-महासागरीय कटक पर होता है।
मध्य-महासागरीय कटक पर
नई महासागरीय पर्पटी बनती है।
यहाँ ऊपरी मैंटल बहुत गर्म होता है, इसलिए स्थलमंडल पतला होता है।
कटक से दूर
महासागरीय प्लेट ठंडी होती जाती है।
ठंडा होने पर—
- घनत्व बढ़ता है,
- स्थलमंडल मोटा होता है,
- महासागर तल धीरे-धीरे नीचे बैठता है।
इस प्रकार महासागरीय स्थलमंडल की मोटाई उसकी आयु से गहराई से जुड़ी है।
महाद्वीपीय स्थलमंडल
महाद्वीपीय स्थलमंडल में—
- महाद्वीपीय भूपर्पटी,
- नीचे का कठोर स्थलमंडलीय मैंटल
शामिल है।
यह महासागरीय स्थलमंडल की तुलना में अधिक जटिल और सामान्यतः अधिक पुराना है।
प्राचीन क्रेटोनिक क्षेत्रों में स्थलमंडलीय मैंटल बहुत मोटा और ठंडा हो सकता है।
भारत के—
- धारवाड़ क्रेटोन,
- सिंहभूम क्रेटोन,
- बस्तर क्रेटोन,
- बुंदेलखंड क्रेटोन
जैसे प्राचीन भूभाग स्थिर महाद्वीपीय स्थलमंडल के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
स्थलमंडलीय प्लेटें
स्थलमंडल एक अखंड खोल नहीं है।
यह कई कठोर प्लेटों में विभाजित है जिन्हें विवर्तनिक या स्थलमंडलीय प्लेटें कहते हैं।
एक प्लेट—
- केवल महासागरीय हो सकती है,
- केवल महाद्वीपीय भाग प्रधान हो सकती है,
- या महासागरीय और महाद्वीपीय दोनों पर्पटी को शामिल कर सकती है।
उदाहरण—
प्रशांत प्लेट मुख्यतः महासागरीय है।
भारतीय प्लेट में महाद्वीपीय भारत के साथ महासागरीय भाग भी शामिल है।
इसलिए “महाद्वीप = प्लेट” मानना गलत है।
प्लेट सीमाएँ
स्थलमंडलीय प्लेटों की परस्पर गति तीन मुख्य प्रकार की सीमाएँ बनाती है—
अपसारी सीमा
दो प्लेटें एक-दूसरे से दूर जाती हैं।
यहाँ नई महासागरीय स्थलमंडलीय सामग्री बन सकती है।
उदाहरण—
मध्य-अटलांटिक कटक।
अभिसारी सीमा
दो प्लेटें एक-दूसरे की ओर आती हैं।
यदि महासागरीय स्थलमंडल अधिक घना हो तो वह दूसरी प्लेट के नीचे सबडक्ट हो सकता है।
यहाँ—
- महासागरीय गर्त,
- ज्वालामुखीय चाप,
- गहरे भूकंप
हो सकते हैं।
महाद्वीप–महाद्वीप टक्कर में पर्पटी और स्थलमंडल मोटा होकर बड़े पर्वत बना सकते हैं।
उदाहरण—
भारत–यूरेशिया टक्कर और हिमालय।
रूपांतरित सीमा
दो प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर विपरीत दिशा में खिसकती हैं।
यहाँ नया स्थलमंडल न बनता है और न मुख्यतः नष्ट होता है।
ऐसी सीमाओं पर शक्तिशाली भूकंप हो सकते हैं।
स्थलमंडल और भूकंप
पृथ्वी के अधिकांश विवर्तनिक भूकंप कठोर स्थलमंडल में उत्पन्न होते हैं।
स्थलमंडल भंगुर होने के कारण इसमें तनाव जमा हो सकता है।
जब चट्टानों की शक्ति से अधिक तनाव हो जाता है तो भ्रंश पर अचानक खिसकाव होता है और भूकंप उत्पन्न होता है।
गहरे भूकंप की सावधानी
सबडक्शन क्षेत्रों में नीचे जाती ठंडी स्थलमंडलीय स्लैब लगभग 600–700 किमी तक भूकंप उत्पन्न कर सकती है।
इसी कारण कुछ भूकंप सामान्य सतही स्थलमंडल की मोटाई से कहीं अधिक गहराई पर भी मिलते हैं।
ये भूकंप नीचे जाती कठोर स्लैब के भीतर होते हैं।
स्थलमंडल और ज्वालामुखिता
स्थलमंडल स्वयं ज्वालामुखिता का एकमात्र स्रोत नहीं है।
मैग्मा सामान्यतः ऊपरी मैंटल या पर्पटी में आंशिक पिघलाव से बनता है।
लेकिन स्थलमंडलीय प्लेटों की गति मैग्मा निर्माण की परिस्थितियाँ उत्पन्न करती है—
अपसारी सीमा → दाब में कमी से पिघलाव।
सबडक्शन → जल/वाष्पशील पदार्थों के कारण मैंटल वेज का पिघलाव।
हॉटस्पॉट → नीचे से गर्म पदार्थ का प्रभाव।
इस प्रकार स्थलमंडल प्लेट विवर्तनिकी और ज्वालामुखिता के बीच मुख्य संरचनात्मक कड़ी है।
स्थलमंडल और समस्थिति
स्थलमंडल दुर्बलतामंडल/ऊपरी मैंटल पर दीर्घकालीन गुरुत्वीय संतुलन में रहता है।
इसे समस्थिति की अवधारणा से समझा जाता है।
यदि स्थलमंडल पर भार बढ़ता है तो वह नीचे की ओर झुक सकता है।
यदि भार हटता है तो वह धीरे-धीरे ऊपर उठ सकता है।
उदाहरण—
- हिमाच्छादन का भार,
- हिमनद पिघलने के बाद भू-उत्थान,
- पर्वतों का अपरदन,
- बड़े अवसादी बेसिन।
इस प्रतिक्रिया को समस्थितिक समायोजन कहा जाता है।
स्थलमंडलीय लचीलापन
स्थलमंडल पूर्णतः अटूट कठोर प्लेट नहीं है।
लंबी दूरी और लंबे समयमान पर यह बड़े भारों के नीचे कुछ सीमा तक झुक सकता है।
इसे लिथोस्फेरिक फ्लेक्सर कहा जाता है।
उदाहरण—
पर्वत श्रृंखला, ज्वालामुखीय द्वीप या बड़े अवसादी भार के कारण स्थलमंडल में झुकाव।
स्थलमंडल की प्रभावी प्रत्यास्थ मोटाई का अध्ययन यह बताने में सहायता करता है कि किसी क्षेत्र का स्थलमंडल कितना मजबूत है।
महाद्वीपीय जड़ और क्रेटोन
प्राचीन क्रेटोन के नीचे ठंडा, मोटा और कम उछाल वाला स्थलमंडलीय मैंटल पाया जा सकता है।
इसे कभी-कभी क्रेटोनिक रूट कहा जाता है।
ये गहरी जड़ें अरबों वर्षों तक महाद्वीपों को स्थिर बनाए रखने में भूमिका निभाती हैं।
लेकिन प्लूम, रिफ्टिंग और अन्य तापीय प्रक्रियाएँ कभी-कभी इन जड़ों को कमजोर या अलग कर सकती हैं।
इस प्रक्रिया को लिथोस्फेरिक डिलैमिनेशन कहा जा सकता है।
लिथोस्फेरिक डिलैमिनेशन
यदि महाद्वीपीय स्थलमंडल का निचला भाग बहुत घना हो जाए तो वह नीचे के मैंटल में अलग होकर डूब सकता है।
इसे डिलैमिनेशन कहते हैं।
इसके परिणामस्वरूप—
- सतही उत्थान,
- मैग्माई गतिविधि,
- स्थलमंडल का पतला होना,
- गर्म दुर्बलतामंडलीय पदार्थ का ऊपर आना
हो सकता है।
यह आधुनिक भू-गतिशीलता में महत्वपूर्ण अवधारणा है।
भारत और स्थलमंडल
भारत का स्थलमंडल एक समान नहीं है।
इसमें—
- प्राचीन प्रायद्वीपीय क्रेटोन,
- दक्कन ज्वालामुखीय प्रांत,
- हिमालयी टक्कर क्षेत्र,
- पश्चिमी निष्क्रिय महाद्वीपीय किनारा,
- अंडमान–सुमात्रा सबडक्शन क्षेत्र
जैसी अलग-अलग संरचनाएँ शामिल हैं।
हिमालय
भारतीय स्थलमंडलीय प्लेट का यूरेशियाई प्लेट से टकराव आज भी जारी है।
इसके कारण—
- पर्पटी मोटी हुई,
- स्थलमंडलीय विकृति हुई,
- सक्रिय भ्रंश बने,
- तीव्र भूकंपीयता विकसित हुई।
अंडमान–निकोबार
यह क्षेत्र भारतीय महासागरीय स्थलमंडल के बर्मा/सुंडा क्षेत्र के नीचे सबडक्शन से जुड़ा है।
यहाँ गहरे समुद्री गर्त, भूकंप और ज्वालामुखीय चाप एक ही प्लेट-विवर्तनिक व्यवस्था के भाग हैं।
2026 का समसामयिक अद्यतन — इंडो–बर्मा स्थलमंडल
जून 2026 में Geophysical Research Letters में प्रकाशित एक अध्ययन ने इंडो–बर्मा सबडक्शन क्षेत्र में स्थलमंडल–दुर्बलतामंडल सीमा का अध्ययन किया।
Sp receiver-function विश्लेषण से उत्तर-पूर्वी भारतीय प्लेट सीमा के कई भागों में LAB लगभग 70 किमी गहराई पर पाया गया।
इंडो–बर्मा पर्वतमाला के नीचे भारतीय स्थलमंडल पूर्व की ओर लगभग 20° के औसत झुकाव से नीचे जाता हुआ लगभग 140 किमी गहराई तक देखा गया।
यह भारत के पूर्वोत्तर में सक्रिय सबडक्शन और स्थलमंडलीय ज्यामिति का महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष भूभौतिकीय प्रमाण है।
2026 का समसामयिक अद्यतन — पश्चिमी घाट
सितंबर 2026 में Tectonophysics में प्रकाशित अध्ययन ने पश्चिमी घाट के नीचे स्थलमंडल की संरचना को गुरुत्व, चुंबकत्व, स्थलाकृति और ऊष्मा-प्रवाह आँकड़ों से विश्लेषित किया।
अध्ययन ने पश्चिमी घाट के नीचे त्रिभागीय स्थलमंडलीय ढाँचे और उत्तर से दक्षिण तक स्थलमंडलीय शक्ति तथा मोहो की गहराई में अंतर के संकेत दिए।
दक्षिणी पश्चिमी घाट में गहरे मैंटल से गतिशील समर्थन अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण पाया गया।
परीक्षा-योग्य निष्कर्ष
प्रायद्वीपीय भारत का स्थलमंडल भी पूरी तरह समान और निष्क्रिय ब्लॉक नहीं है; पुराने रिफ्ट, दक्कन मैग्माई इतिहास और आधुनिक मैंटल प्रक्रियाएँ इसकी संरचना को प्रभावित करती हैं।
2026 का अद्यतन — भारतीय स्थलमंडलीय जड़ों के अवशेष
2026 के एक अन्य अध्ययन ने हिंद महासागर के ऊपरी मैंटल में ऐसी भूकंपीय विसंगतियों की पहचान की जिन्हें भारतीय उपमहाद्वीप की पुरानी स्थलमंडलीय जड़ों के अलग हुए अवशेषों से जोड़ा गया।
अध्ययन ने क्रिटेशियस काल में प्लूम गतिविधि और स्थलमंडलीय डिलैमिनेशन को भारतीय प्लेट के तेज उत्तरगामी संचलन और हिंद महासागर मैंटल की रासायनिक विशेषताओं से जोड़ने का प्रस्ताव रखा।
यह विकसित होता वैज्ञानिक मॉडल है; इसे अंतिम स्थापित तथ्य के बजाय आधुनिक शोध के रूप में समझना चाहिए।
सत्यापित UPSC Prelims PYQ
UPSC सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा के उपलब्ध सत्यापित प्रश्नपत्रों में इस सूक्ष्म उपविषय “स्थलमंडल की परिभाषा = भूपर्पटी + कठोर ऊपरी मैंटल” पर प्रत्यक्ष, स्पष्ट प्रश्न सत्यापित नहीं मिला।
प्लेट विवर्तनिकी, भूकंप और पृथ्वी की आंतरिक संरचना से जुड़े अनेक UPSC प्रश्न इस अवधारणा का उपयोग करते हैं, लेकिन उन्हें केवल संख्या बढ़ाने के लिए प्रत्यक्ष “स्थलमंडल PYQ” नहीं माना गया है।
इसलिए यहाँ कोई अनुमानित UPSC Prelims PYQ नहीं जोड़ा गया है।
सत्यापित UPSC Mains PYQ
UPSC Geography Optional, 2021
प्रश्न:
“प्लेट विवर्तनिकी की अवधारणा समस्थिति और महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत से विकसित हुई है। उपयुक्त उदाहरणों सहित स्पष्ट कीजिए।”
यह स्थलमंडलीय प्लेटों और उनके गतिशील व्यवहार से सीधे संबंधित Geography Optional Mains प्रश्न है।
इसे GS Mains का प्रश्न नहीं समझना चाहिए।
UPSC GS Mains
इस सूक्ष्म उपविषय “स्थलमंडल की संरचना और मोटाई” पर प्रत्यक्ष GS Mains प्रश्न सत्यापित नहीं मिला।
इसलिए कोई अभ्यास प्रश्न PYQ के नाम से शामिल नहीं किया गया है।
सत्यापित BPSC Prelims PYQ
70वीं BPSC संयुक्त प्रतियोगिता प्रारंभिक परीक्षा, 2024
प्रश्न:
“पृथ्वी का वह दृढ़तम बाहरी भाग कौन-सा है जिसमें संपूर्ण भूपर्पटी और ऊपरी मैंटल शामिल हैं और जो विवर्तनिक प्लेटों में विभाजित है?”
विकल्पों में—
- दुर्बलतामंडल
- स्थलमंडल
- मध्यमंडल
- सेंट्रोस्फीयर
दिए गए थे।
सही उत्तर: स्थलमंडल।
यह इस उपविषय का प्रत्यक्ष और अत्यंत महत्वपूर्ण BPSC CCE Prelims PYQ है।
सत्यापित BPSC Mains PYQ
BPSC सामान्य अध्ययन मुख्य परीक्षा में इस सूक्ष्म विषय “स्थलमंडल की संरचना” पर प्रत्यक्ष, वर्ष-सहित सत्यापित प्रश्न नहीं मिला।
BPSC द्वारा आयोजित अन्य भूगोल/भूविज्ञान परीक्षाओं में प्लेट विवर्तनिकी और स्थलमंडलीय प्लेटों पर प्रश्न मिले हैं, लेकिन उन्हें BPSC CCE GS Mains PYQ के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।
इसलिए कोई अनुमानित प्रश्न यहाँ नहीं जोड़ा गया है।
Prelims के लिए अंतिम तथ्य
स्थलमंडल पृथ्वी की कठोर और भंगुर बाहरी यांत्रिक परत है।
स्थलमंडल = पूरी भूपर्पटी + ऊपरी मैंटल का कठोर भाग।
मोहो स्थलमंडल की निचली सीमा नहीं है।
स्थलमंडल की निचली सीमा स्थलमंडल–दुर्बलतामंडल सीमा है।
स्थलमंडल की मोटाई पूरी पृथ्वी पर समान नहीं है।
महासागरीय स्थलमंडल कटक से दूर जाते हुए ठंडा और मोटा होता जाता है।
पुराने महाद्वीपीय क्रेटोन के नीचे स्थलमंडल बहुत मोटा हो सकता है।
विवर्तनिक प्लेटें स्थलमंडलीय प्लेटें हैं।
एक प्लेट में महाद्वीपीय और महासागरीय दोनों पर्पटी हो सकती हैं।
दुर्बलतामंडल स्थलमंडल के नीचे अपेक्षाकृत कमजोर और नम्य क्षेत्र है।
भूकंप, ज्वालामुखिता और पर्वतनिर्माण का वितरण स्थलमंडलीय प्लेट सीमाओं से निकटता से जुड़ा है।
सबडक्शन में ठंडा महासागरीय स्थलमंडल मैंटल में नीचे जाता है।
समस्थितिक समायोजन स्थलमंडल और नीचे के मैंटल के दीर्घकालीन गुरुत्वीय संतुलन से जुड़ा है।
Mains के लिए उत्तर-ढाँचा
यदि प्रश्न हो—
“स्थलमंडल की प्रकृति, संरचना और प्लेट विवर्तनिकी में उसकी भूमिका स्पष्ट कीजिए।”
उत्तर का क्रम रखें—
भूमिका — कठोर बाहरी यांत्रिक परत।
संरचना — भूपर्पटी + कठोर ऊपरी मैंटल।
सीमा — LAB और दुर्बलतामंडल।
प्रकार — महासागरीय और महाद्वीपीय स्थलमंडल।
तापीय विकास — महासागरीय स्थलमंडल का आयु के साथ मोटा होना।
प्लेट विवर्तनिकी — अपसरण, अभिसरण, सबडक्शन और रूपांतरण।
भारत उदाहरण — हिमालय, इंडो–बर्मा, प्रायद्वीपीय क्रेटोन।
समसामयिक मूल्यवर्धन — 2026 इंडो–बर्मा LAB और पश्चिमी घाट स्थलमंडलीय संरचना।
निष्कर्ष — स्थलमंडल पृथ्वी की सतही आकृति और गहरी गतिशीलता को जोड़ने वाली कठोर बाहरी प्रणाली है।
निष्कर्ष
स्थलमंडल पृथ्वी की भूपर्पटी और ऊपरी मैंटल के कठोर भाग से बनी गतिशील बाहरी परत है। इसका कई विवर्तनिक प्लेटों में विभाजन पृथ्वी की अधिकांश प्रमुख अंतर्जात प्रक्रियाओं की आधारभूत कुंजी है। इसकी मोटाई, शक्ति और तापीय अवस्था अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न होती है। आधुनिक भूकंपीय, गुरुत्वीय और ऊष्मीय अध्ययनों से स्पष्ट हो रहा है कि भारतीय स्थलमंडल भी प्राचीन क्रेटोन, हिमालयी टक्कर, इंडो–बर्मा सबडक्शन और पश्चिमी घाट जैसी अलग-अलग भू-गतिशील व्यवस्थाओं से निर्मित एक जटिल प्रणाली है।